सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)
Siddhanta Lesha Sangraha Hindi
श्रीमदप्पय्य दीक्षित द्वारा
स्रोत: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (उद्गम)
पृष्ठ 110, कुल 590 में से
संदर्भ में पढ़ें८० | सिद्धान्तलेशसंग्रह | [ प्रथम परिच्छेद
अपूर्वानपरं ब्रह्म नोपादानं जगत्स्थितेः ।
माया तु मुख्योपादानमिति मुक्तावलीकृतः ॥ २७ ॥
कार्य्य कारणसे रहित ब्रह्म जगत्के प्रति उपादान नहीं हो सकता है, इसलिए माया ही मुख्य कारण है, ऐसा सिद्धान्त मुक्तावलीकार कहते हैं ॥ २७ ॥
सिद्धान्तमुक्तावलीकृतस्तु—मायाशक्तिरेवोपादानं न ब्रह्म ‘तदेतद् ब्रह्मापूर्वमनपरमवाह्यम्’ ‘न तस्य कार्यं करणं च विद्यते’ इत्यादिश्रुतेः जगदुपादानमायाधिष्ठानत्वेन उपचारादुपादानम्, तादृशमेवोपादानत्वं लक्षणे विवक्षितमित्याहुः ॥ ५ ॥
मायाशक्ति ही उपादान है ब्रह्म उपादान नहीं है, क्योंकि ‘तदेतत् ०’ (प्रकृत बुद्धि आदिका साक्षीरूप ब्रह्म कारण नहीं है, कार्य नहीं है और वाह्य नहीं है) ‘न तस्य०’ (उसका अर्थात् ब्रह्मका कोई कारण और कार्य नहीं है) इत्यादि श्रुतियोंसे ब्रह्ममें उपादानताका निषेध किया गया है । और ब्रह्ममें जो उपादानताका व्यवहार होता है, वह तो केवल जगत्की उपादान मायाके अधिष्ठान होनेसे औपचारिक व्यवहार होता है । इसीलिए जगदुपादानमायाधिष्ठानत्व ही उपादानत्व लक्षणमें अर्थात् ब्रह्मके लक्षणमें विवक्षित है, ऐसा सिद्धान्त-मुक्तावलीकार कहते हैं * ॥ ५ ॥
वियदादिकी आकारताको प्राप्त होता है और उसके द्वारा व्यवहारकी विषयताको प्राप्त होता है, इस दृष्टान्तसे भामतीकारका मत शङ्कराचार्यके अनुकूल है, ऐसा प्रतीत होता है [ पृ० ४७१ कल्पतरु निर्णय० मु० ] और 'न ह्यचेतनं चेतना...’ से लेकर 'तस्माज्जीवाधिकरणाप्यविद्या निमित्ततया विषयतया चेश्वरमाश्रयते इतीश्वराश्रयेत्युच्यते, न त्वाधारतया, विद्यास्वभावे ब्रह्मणि तदनुपपत्तेरिति' भाव यह है कि जीवमें रहनेवाली अविद्या निमित्त और विषय रूपसे ईश्वरको आश्रय करती है, अतः ईश्वराश्रय माया कही जाती है, वस्तुतः आधाररूपसे ईश्वराश्रय है नहीं, क्योंकि जिसका विद्यास्वभाव है, उसमें अविद्या कैसे रह सकती है [ कल्पतरुसहित भाम० पृ० ३७८ निर्णय-सागर मु० ] इससे स्पष्ट ज्ञात होता है कि मूलोक्त वाचस्पतिमिश्रका पक्ष भामती ग्रन्थमें स्पष्ट ही है ।
* इसी भावको सिद्धान्तमुक्तावलीकार श्रीप्रकाशानन्दस्वामीजी निम्न लिखित पंक्तियोंसे प्रकट करते हैं—
ब्रह्माज्ञानात् जगज्जन्म ब्रह्मणोऽकारणत्वतः ।
अधिष्ठानत्वमात्रेण कारणं ब्रह्म गीयते ॥३८॥
दृश्यत्वाद्यनुमानसिद्धानिर्वचनीयस्य जगतः अनाद्यनिर्वचनीया अविद्यैव कारणम्, न ब्रह्म, तस्य कूटस्थस्य कार्यकारणविलक्षणत्वात्, 'तदेतद् ब्रह्मापूर्वमनपरमनन्तरमवाह्यम्' 'अयमात्मा .