सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)
Siddhanta Lesha Sangraha Hindi
श्रीमदप्पय्य दीक्षित द्वारा
स्रोत: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (उद्गम)
पृष्ठ 112, कुल 590 में से
संदर्भ में पढ़ें८२ सिद्धान्तलेशसंग्रह [ प्रथम परिच्छेद
अनादिरनिर्व्वाच्या भूतप्रकृतिश्चिन्मात्रसम्बन्धिनी माया । तस्यां चित्प्रतिबिम्ब ईश्वरः, तस्या एव परिच्छिन्नानन्तप्रदेशेष्वावरणविक्षेपशक्तिमत्सु अविद्याभिधानेषु चित्प्रतिबिम्बो जीव इति ।
विवरणमें कहा गया है—अनादि, अनिर्वचनीय, * सर्व भूतोंकी प्रकृति और चिन्मात्रमें रहनेवाली जो माया है, उस मायामें चैतन्यका जो प्रतिबिम्ब है, वह ईश्वर है और उसी मायाके अविद्या नामक आवरण और विक्षेपशक्तिवाले जो परिच्छिन्न अनन्त प्रदेश हैं, उनमें चैतन्यका प्रतिबिम्ब जीव है ।
* यहाँ अनिर्वचनीयशब्दसे मायाकी सत्यताका निराकरण किया गया है, अन्यथा जैसे सांख्य प्रकृतिको सत्य मानते हैं; वैसे ही किसीको यह शङ्का हो सकती है कि 'माया' वेदान्तमतमें भी सत्य है। माया अनिर्वचनीय है, इसमें भी युक्तियोंका अनुसन्धान करना चाहिए, माया ब्रह्मसे वस्तुतः भिन्न भी नहीं है, क्योंकि ब्रह्मभिन्न सम्पूर्ण प्रपञ्चके मिथ्या होनेसे उसका भेद वास्तविक हो ही नहीं सकता। ब्रह्मसे माया अभिन्न भी नहीं है, क्योंकि चैतन्य और जड़ एक कैसे हो सकते हैं, भिन्ना-भिन्न अर्थात् ब्रह्मसे भिन्न भी है और अभिन्न भी है, ऐसा नहीं कह सकते, कारण कि परस्पर विरुद्ध भिन्नत्व और अभिन्नत्व धर्म एक मायामें कैसे रहेंगे। माया सत् भी नहीं है, द्वैतापत्ति होनेसे अद्वैत श्रुतिके साथ विरोध होगा, असत् भी वह नहीं कही जा सकती, क्योंकि जगत्की प्रकृति वह कैसे होगी, अर्थात् असत् पदार्थ किसी भी वस्तुके प्रति उपादान या निमित्त कारण नहीं हो सकता है। मायाको सदसत् नहीं कह सकते, पूर्वके समान सत्त्व और असत्त्व, जो परस्पर तेज और अन्धकारके समान विरुद्ध हैं, एकमें कदापि नहीं रह सकते। इसी प्रकार मायाको सावयव नहीं कह सकते, क्योंकि ऐसा स्वीकार करनेसे मायामें सादित्वका प्रसङ्ग होगा और सुतरां उसके प्रतिबिम्बभूत ईश्वरमें भी सादित्वकी प्रसक्ति होगी, और मायाके सादि माननेसे उसकी कारण और माया माननी पड़ेगी, निरवयव भी नहीं मान सकते हैं, क्योंकि जो निरवयव पदार्थ है, वह भी किसीका उपादान कारण या प्रकृति नहीं हो सकता।
निरवयव और सावयवरूप नहीं कह सकते, क्योंकि सावयत्व और निरवयवत्वके एक स्थलमें रहनेमें विरोध है। इससे सभी प्रकारसे मायाका निर्वचन करना असम्भव होनेके कारण परिशेषात् उसे अनिर्वचनीय ही मानना चाहिए।
मूलमें प्रदेशशब्दमें परिच्छिन्नत्व विशेषण देनेसे उसमें प्रतिबिम्ब जीव भी परिच्छिन्न है, यह लाभ होता है। इसीलिए अनेक स्थलोंमें भाष्यमें भी जीवका परिच्छिन्नत्व कथन सङ्गत होता है—जैसे 'सर्वत्र प्रसिद्धोपदेशात्' इस सूत्रके भाष्यमें जीवनिरूपणमें अर्थात् सूत्रस्थ शारीरपदके निर्वचनमें 'शारीर इति शरीरे भव इत्यर्थः । ननु ईश्वरोऽपि शरीरे भवति, सत्यं शरीरे भवति, न तु शरीर एव भवति' इत्यादिसे जीवमें परिच्छिन्नत्वका व्यपदेश भली भाँति किया गया है। यद्यपि अनादि होनेसे मायामें अनन्त प्रदेश नहीं हो सकते है, तथापि मायाके आवरणशक्ति और विक्षेपशक्तिसे युक्त होनेसे उसके आधारपर मायाके अनेक प्रदेश बतलाये-