सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)
Siddhanta Lesha Sangraha Hindi
श्रीमदप्पय्य दीक्षित द्वारा
स्रोत: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (उद्गम)
पृष्ठ 113, कुल 590 में से
संदर्भ में पढ़ेंजीवेश्वरस्वरूपविचारं ] भाषांनुवादसहित ८३
उक्ता तत्त्वविवेके तु शुद्धसत्त्वमयी स्फुटा ।
माया रजस्तमोऽवरस्ताऽविद्या, शेषं तु पूर्ववत् ॥ ३० ॥
तत्त्वविवेकमें तो शुद्धसत्त्वप्रधान मूलप्रकृति माया कही गई है तथा रज और तमसे तिरस्कृत मूलप्रकृति अविद्या कही गई है, शेष पूर्वके समान है ॥ ३० ॥
तत्त्वविवेके तु—त्रिगुणात्मिकाया मूलप्रकृतेः 'जीवेशावाभासेन करोति माया चाऽविद्या च स्वयमेव भवति' इति श्रुतिसिद्धौ द्वौ रूपभेदौ । रजस्तमोऽनभिभूतशुद्धसत्त्वप्रधाना माया, तदभिभूतमलिनसत्त्वा अविद्येति मायाऽविद्याभेदं परिकल्प्य, मायाप्रतिबिम्ब ईश्वरः, अविद्याप्रतिबिम्बो जीव इत्युक्तम् ।
त्रिगुणात्मिका अर्थात् सत्त्व, रज और तम इन तीन गुणोंकी साम्यावस्था-रूप मूल प्रकृतिके माया और अविद्या दो स्वरूप 'जीवेशावाभासेन करोति'० ( जीव और ईशको आभाससे करती है माया और अविद्या स्वयं होती है ) इत्यादि श्रुतिसे सिद्ध हैं । उनमें रज और तमसे तिरस्कृत न होकर जो मुख्य-रूपसे शुद्धसत्त्वप्रधान है वह माया है । जो रज और तमसे अभिभूत होकर मलिनसत्त्वप्रधान है, वह अविद्या है, इस प्रकार माया और अविद्याके भेदकी कल्पना करके मायामें प्रतिबिम्बित चैतन्य ईश्वर और अविद्यामें प्रतिबिम्बित चैतन्य जीव है, ऐसा तत्त्वविवेकमें * कहा गया है ।
गये हैं । आवरणशक्ति—ब्रह्म चैतन्यको आवृत्त करनेवाली मायाकी शक्ति और आवरण—'ब्रह्म नहीं है, ब्रह्म प्रकाशित नहीं होता' इस प्रकारके व्यवहारकी योग्यता । विक्षेपशक्ति—तत्तज्जीवोंमें रहनेवाले असाधारण दुःखोंके अनुकूल मायाकी शक्ति । भाष्यकार अविद्याको जीवकी उपाधि मानते हैं वह भी प्रदेशोंके अभिप्रायसे है अर्थात् उन उन स्थलोंमें आया हुआ अविद्याशब्द प्रदेशार्थक है ।
* तत्त्वविवेकशब्दसे विद्यारण्यस्वामीकृत पञ्चदशीका प्रथमप्रकरण ही अभिप्रेत है, क्योंकि पञ्चदशीके आरम्भमें तत्त्वविवेकप्रकरण है । किसी-किसीका मत है कि पञ्चदशीमें आये हुए सभी प्रकरणोंके कर्त्ता श्रीविद्यारण्यस्वामी नहीं हैं प्रत्युत भिन्न-भिन्न हैं, कुछ कालके बाद कर्त्ताओंके नामका ठीक-ठीक स्मरण न होनेके कारण उन सब प्रकरणोंको मिलाकर एक ग्रन्थ विद्यारण्यस्वामीजीके नामसे प्रसिद्ध हुआ, इसीलिए सिद्धान्तलेशमें उन उन प्रकरणोंका पृथक्-पृथक्रूपसे उद्धरण किया है अन्यथा 'पञ्चदशीमें ऐसा प्रतिपादन किया है' ऐसा ग्रन्थकार क्यों नहीं लिखते, परन्तु इस बातका विवेचन इतिहासके यथार्थवेत्ताओंके ऊपर छोड़कर हम प्रकृत अर्थकी पुष्टिके