भारतकोश
सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

Siddhanta Lesha Sangraha Hindi

श्रीमदप्पय्य दीक्षित द्वारा

स्रोत: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (उद्गम)

DevanagariHindipublished590 पृष्ठ

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८४ | सिद्धान्तलेशसंग्रह | [ प्रथम परिच्छेद


विक्षेपशक्तिप्राधान्यात् मायेशोपाधिरुच्यते ।
अविद्याऽऽवरणोत्कर्षात् जीवस्येत्यपि कश्चन ॥ ३१ ॥

विक्षेपशक्तिकी प्रधानतासे मूलप्रकृति-मायाशब्दसे कहलानेवाली ईश्वरकी उपाधि कही जाती है और आवरणशक्तिकी प्रधानतासे अविद्याशब्दसे वाच्य मूलप्रकृति जीवकी उपाधि कही जाती है, ऐसा भी कोई लोग कहते हैं ॥ ३१ ॥

एकैव मूलप्रकृतिर्विक्षेपप्राधान्येन मायाशब्दितेश्वरोपाधिः, आवरण- प्राधान्येनाविद्याऽज्ञानशब्दिता जीवोपाधिः । अत एव तस्या जीवेश्वर- साधारणचिन्मात्रसम्बन्धित्वेऽपि जीवस्यैव ‘अज्ञोऽस्मि’ इत्यज्ञानसम्बन्धा- नुभवः, नेश्वरस्येति जीवेश्वरविभागः क्वचिदुपपादितः ।

एक ही मूलप्रकृति विक्षेप अंशकी प्रधानतासे मायाशब्दसे वाच्य होकर ईश्वरकी उपाधि होती है और आवरण अंशकी प्रधानतासे अविद्या होकर अर्थात् अज्ञानसे वाच्य होकर जीवकी उपाधि होती है । इसी लिए—जीवके ही आवरणशक्तिमदुपाधिसे उक्त होनेके कारण मूल प्रकृतिका जीव और ईश्वर साधारण चिन्मात्रके साथ सम्बन्ध होनेपर भी ‘अज्ञोऽस्मि’ ( मैं अज्ञानी हूँ ) इस प्रकार जीवको ही अज्ञानके संसर्गका अनुभव होता है, ईश्वरको* नहीं होता है, क्योंकि आवरणशक्ति ईश्वर भी अंशमें प्रविष्ट नहीं है । इसलिए जीव और ईश्वरकी उपाधिके एक होनेपर भी सर्वज्ञत्व और असर्वज्ञत्वधर्मोंसे जो उनमें वैलक्षण्य है, उसकी अनुपपत्ति नहीं है । इस प्रकार भी जीव और ईश्वरका कहींपर विभाग बतलाया गया है ।


लिए उक्त प्रकरणके कुछ वचन उद्धृत करते हैं—उसमें माया और अविद्याका भेद इस तरह कहा गया है—

सत्त्वशुद्धयविशुद्धिभ्यां मायाविद्ये च ते मते ।
मायाविम्बो वशीकृत्य तां स्यात् सर्वज्ञ ईश्वरः ॥ १६ ॥
अविद्यावशगस्त्वन्यस्तद्वैचित्र्यादनेकधा ॥ १७ ॥

सत्त्वकी शुद्धि और अशुद्धिसे प्रकृतिके माया और अविद्या दो भेद हैं, उस मायामें प्रति- फलित चिदात्मा मायाको अधीन करके सर्वज्ञ ईश्वर होता है और अविद्यामें प्रतिबिम्ब- रूपसे स्थित परतन्त्र अन्य चिदात्मा जीव है, उक्त वचनोंका यह भाव है । [ पंच० तत्त्व० पृ० १२ निर्ण० मु० ] ।


* यहाँपर भी ‘अत एव’ शब्दका सम्बन्ध करना चाहिए । इसलिए आवरणशक्तिका ईश्वरकी उपाधिकुक्षिमें सम्बन्ध न होनेसे अज्ञानका सम्पर्क ईश्वरमें नहीं होगा, यह भाव है ।

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