सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)
Siddhanta Lesha Sangraha Hindi
श्रीमदप्पय्य दीक्षित द्वारा
स्रोत: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (उद्गम)
पृष्ठ 115, कुल 590 में से
संदर्भ में पढ़ेंजीवेश्वरस्वरूपविचार ] भाषानुवादसहित ८५
कार्योपाधिर्भवेज्जीवः कारणोपाधिरीश्वरः ।
प्रतिबिम्बोऽत्र सङ्क्षेपशारीरककृतां नये ॥ ३२ ॥
संक्षेपशारीरककारके मतमें अविद्यामें चैतन्यका प्रतिबिम्ब ईश्वर है और अन्तःकरणमें चैतन्यका प्रतिबिम्ब जीव है ॥ ३२ ॥
सङ्क्षेपशारीरके तु—कार्योपाधिरयं जीवः कारणोपाधिरीश्वरः । इति श्रुतिमनुसृत्याऽविद्यायां चित्प्रतिबिम्ब ईश्वरः, अन्तःकरणे चित्प्रतिबिम्बो जीवः । न चाऽन्तःकरणरूपेण द्रव्येण घटेनाऽऽकाशस्येव चैतन्यस्याऽवच्छेदसम्भवात् तदवच्छिन्नमेव चैतन्यं जीवोऽस्त्विति वाच्यम्, इह
संक्षेपशारीरकमें तो कहा गया है कि 'कार्योपाधिरयं जीवः कारणोपाधिरीश्वरः' (कार्योपाधिक—अन्तःकरणोपाधिक जीव है और मायोपाधिक ईश्वर है) इस श्रुतिके आधारपर अविद्यामें चैतन्यका प्रतिबिम्ब ईश्वर है और अन्तःकरणमें चैतन्यका प्रतिबिम्ब जीव है ❊। शङ्का होती है कि जैसे आकाशका घटरूप द्रव्यसे परिच्छेद होता है, वैसे ही अन्तःकरणरूप द्रव्यसे चैतन्यका परिच्छेद
❊ इस विषयमें थोड़ा विचारणीय है—'जीवेशावाभासेन करोति' इत्यादि श्रुतिके साथ इस मतका विरोध है, क्योंकि इस श्रुतिसे जीवमें कारणोपाधिकता प्रतीत होती है, इसपर कहा जाता है—'जीवेशावाभासेन' इस पूर्ण भागसे जीव और ईश्वर दोनोंका प्रतिबिम्बभाव प्रतीत होता है, जहां बिम्ब एक ही होगा उस स्थलमें उपाधिके भेदके बिना वह नहीं हो सकता है, कारण कि सूर्य आदिके प्रतिबिम्बस्थलमें उपाधिकी भिन्नताके बिना भेद नहीं देखा जाता है, इसलिए उक्त श्रुतिसे प्रतिबिम्बरूप जीव और ईश्वरमें क्रमसे माया और अविद्या शब्दोंसे उपाधि समर्पित होती है। इस श्रुतिमें मायाशब्द मायाका कार्य अन्तःकरणरूप अर्थका बोधक है। 'माया चाविद्या च स्वयमेव भवति' इस वाक्यशेषकी उपपत्ति भी—माया-शब्दसे कहलानेवाले अन्तःकरण और मूल प्रकृतिमें मुख्य अभेदके न होनेपर भी प्रकृति विकृतिभावप्रयुक्त अभेदके सम्भव होनेसे—हो सकती है।
कृतहान—किये गये कर्मोंकी निष्फलता, भाव यह है कि ब्राह्मण आदि शरीरोंमें रहनेवाले अन्तःकरणसे अवच्छिन्न चैतन्यप्रदेश ही इस लोकके कर्मोंका कर्ता है और अन्य लोकमें देव आदिगत अन्तःकरणावच्छिन्न चैतन्य प्रदेश, जो कि किसी कर्मका कर्ता नहीं है, भोक्ता होगा, इसलिए उसका भोग किसी पूर्वोपार्जित कर्मका फल नहीं हो सकता है, अतः कृतकर्मका हान स्पष्ट होगा, यदि अन्तःकरणावच्छिन्न चैतन्य प्रदेशको जीव माना जाय, तो अकृताभ्यागम—जिसने कर्म किया उसको भोगप्राप्ति नहीं होगी और जिसने कर्म नहीं किया उसको भोग प्राप्ति होगी। अर्थात् देवादिशरीरके अन्तःकरणसे युक्त चैतन्य किसी कर्मका कर्ता नहीं है तो भी फलका भोक्ता है और मनुष्य आदि शरीरगत अन्तःकरणसे युक्त चैतन्य कर्मका कर्ता है, तो भी फलका भोक्ता नहीं हो सकता, ये दोनों दोष अन्तःकरणावच्छिन्न चैतन्यके जीव माननेमें होंगे