भारतकोश
सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

Siddhanta Lesha Sangraha Hindi

श्रीमदप्पय्य दीक्षित द्वारा

स्रोत: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (उद्गम)

DevanagariHindipublished590 पृष्ठ

पृष्ठ 119, कुल 590 में से

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जीवेश्वरस्वरूपविचार ] भाषानुवादसहित ८९

अहन्त्वं ह्यध्यस्तविशेषांशरूपम्, पुरुषान्तरस्य पुरुषान्तरे 'अहम्' इति व्यवहाराभावेन व्यावृत्तत्वात् । स्वयन्त्वं चान्यत्वप्रतियोग्यधिष्ठानसामान्यांशरूपम् । 'स्वयं देवदत्तो गच्छति' इति पुरुषान्तरेऽपि व्यवहारेणाऽनुवृत्तत्वात् , एवं परस्पराध्यासादेव कूटस्थजीवयोरविवेको लौकिकानाम् ।

होनेसे ही जैसे 'इदं रजतम्' ( यह रजत है ) इसमें इदन्त्व और रजतत्वका, जो क्रमशः अधिष्ठानसामान्य अंश और अध्यस्तविशेष अंश हैं, साथ-साथ प्रकाश होता है, वैसे ही स्वयन्त्व और अहन्त्वका साथ-साथ प्रकाश होता है—'स्वयमहं करोमि' ( मैं स्वयं करता हूँ ) इत्यादिमें । *प्रकृतमें अहन्त्व अध्यस्तविशेष अंश है, क्योंकि अन्य पुरुषका अन्य पुरुषमें 'अहम्' इस प्रकारका व्यवहार नहीं होता, इसलिए व्यावृत्त है । और स्वयन्त्व तो अन्यत्वका विरोधी है और अधिष्ठानसामान्य अंश है, क्योंकि 'स्वयं देवदत्तः गच्छति' ( देवदत्त स्वयं जाता है ) इस प्रकार अन्य पुरुषमें भी स्वयन्त्वका व्यवहार होनेसे वह अनुवृत्त है । ऐसा होनेपर—अहमर्थ जीवके शुक्तिमें रूप्यके समान कूटस्थमें अध्यस्त होनेपर—परस्पर अभेदके अध्याससे ही कूटस्थ और जीवका लोकमें अन्योन्य अभेद भासता है ।


  • कूटस्थके असङ्गत्व, आनन्दत्व और पूर्णत्व आदि विशेषधर्म अविद्याके प्रभावसे प्रतीत नहीं होते, यह हम मानते हैं, परन्तु जैसे शुक्तिका इदन्त्व अंश प्रकाशित होता है, वैसे अधिष्ठानका सामान्य अंश प्रकाशित नहीं होता । किंच, जैसे 'इदं रजतम्' इत्यादिमें अधिष्ठानके सामान्य अंशका और आरोपित विशेष अंशका साथ-साथ प्रकाश होता है, वैसे प्रकृतमें अहंवरूप विशेष अंश और सामान्य अंशका प्रकाश नहीं होता किन्तु अहमर्थ विशेषका ही प्रकाश होता है इसलिए कूटस्थमें 'अहम्' का शुक्तिमें रूप्यके समान अध्यास है, यह कहना असङ्गत है, इसपर 'अत एव' इत्यादिसे कहते हैं । यद्यपि कूटस्थका सामान्य अंश कूटस्थत्व होना चाहिए, तथापि शास्त्रीय-प्रमाणके अनुसार 'स्वयन्त्व' ही उसका सामान्य अंश है, ऐसा माननेके लिए हमें बाध्य होना पड़ता है, इसलिए अहमर्थके—जीवके—आरोपकालमें स्वयन्त्वका साथ-साथ प्रकाश होता है, किं बहुना स्वयन्त्वके कूटस्थ चैतन्यरूप होनेसे आरोप-पूर्वकालमें भी उसका भान होता है । यद्यपि स्वयन्त्व और कूटस्थ एक ही है, तथापि 'राहोः शिरः' ( राहुका माथा ) के समान यहाँ भेदकी कल्पना करके धर्मधर्मिभावकी उपपत्ति करनी चाहिए । अतः स्वयन्त्वसामान्यरूपसे कूटस्थका सर्वदा प्रकाश होनेसे अहमर्थ ( जीव ) रूप चिदाभासके अध्यासका अधिष्ठान कूटस्थ उपपन्न हुआ । पुरुषान्तरमें 'मैं' शब्दका व्यवहार न होनेसे उसमें 'अहन्त्व' की व्यावृत्तिका अवगम होता है, अतः अहन्त्व विशेष अंश है । स्वयम् और अन्य शब्द एकार्थक नहीं हैं, परन्तु पुरुषान्तरमें स्वयंशब्दका व्यवहार होता है, इसलिए उसे सामान्यांश माननेमें कोई हरकत नहीं

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