भारतकोश
सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

Siddhanta Lesha Sangraha Hindi

श्रीमदप्पय्य दीक्षित द्वारा

स्रोत: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (उद्गम)

DevanagariHindipublished590 पृष्ठ

पृष्ठ 118, कुल 590 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 118

८८ | सिद्धान्तलेशसंग्रह | [ प्रथम परिच्छेद

अयं चापरस्तदभिहितो विशेषः—चतुर्विधेषु चैतन्येषु जीवः 'अहम्' इति प्रकाशमानः कूटस्थे अविद्यातिरोहितासङ्गानन्दरूपविशेषांशे शुक्तौ रूप्यवदध्यस्तः । अत एवेदन्त्व-रजतत्वयोरिवाऽधिष्ठानसामान्यांशाध्यस्त-विशेषांशरूपयोः स्वयन्त्वाहन्त्वयोः सह प्रकाशः 'स्वयमहं करोमि' इत्यादौ ।

धीवासनोपरक्त अज्ञानरूप दो उपाधियोंके भेदसे जीव और ईश्वरका विभाग बतलाया गया है * ।

इस विषयमें चित्रदीपमें कहा गया यह अन्य विशेष है अर्थात् इसमें पूर्व ग्रन्थसे चैतन्यका चातुर्विध्य विशेष दिखलाया उसकी अपेक्षा अन्य प्रतिबिम्ब मिथ्यात्वरूप विशेष है, यह भाव है। चार प्रकारके चैतन्योंमेंसे 'अहम्' (मैं) इस प्रकारसे प्रकाशमान जो जीव है, वह अविद्यासे आच्छादित हुए हैं असङ्ग और आनन्दरूप विशेष अंश जिसके, ऐसे कूटस्थ चैतन्यमें—शुक्तिमें रजतके समान—अध्यस्त है, इसीलिए अर्थात् अहमर्थके कूटस्थमें अध्यस्त


* पञ्चदशीके चित्रदीपप्रकरणमें इस अभिप्रायके सूचक निम्नलिखित श्लोक हैं—

कूटस्थो ब्रह्म जीवेशावित्येवं चिच्चतुर्विधा ।
घटाकाशमहाकाशौ जलाकाशाभ्रखे यथा ॥१८॥
घटावच्छिन्नखे नीरं यत्तत्र प्रतिबिम्बितः ।
साभ्रनक्षत्र आकाशो जलाकाश उदीर्यते ॥१९॥
महाकाशस्य मध्ये यन्मेघमण्डलमीक्ष्यते ।
प्रतिबिम्बतया तत्र मेघाकाशो जले स्थितः ॥२०॥
मेघांशरूपमुदकं तुषाराकारसंस्थितम् ।
तत्र खप्रतिबिम्बोऽयं नीरत्वादनुमीयते ॥२१॥
अधिष्ठानतया देहद्वयावच्छिन्नचेतनः ।
कूटवन्निर्विकारेण स्थितः कूटस्थ उच्यते ॥ २२ ॥
कूटस्थे कल्पिता बुद्धिस्तत्र चित्प्रतिबिम्बकः ।
प्राणानां धारणाज्जीवः संसारेण स युज्यते ॥ २३ ॥
जलव्योम्ना घटाकाशो यथा सर्वस्तिरोहितः ।
तथा जीवेन कूटस्थः सोऽन्योन्याध्यास उच्यते ॥ २४ ॥

इन श्लोकोंका भाव मूल ग्रन्थसे व्यक्त है, केवल अन्तिम श्लोकका सार यह है कि यदि कूटस्थ चेतन है, तो उसका अनुभव क्यों नहीं होता है? इसका उत्तर है कि जैसे जलाकाशसे घटाकाश तिरोहित हो जाता है, वैसे ही जीवसे तिरोहित हो जानेके कारण कूटस्थका अनुभव नहीं होता है, और इसीको अन्योन्याध्यास कहते हैं ।

ankurnagpal108@gmail.com