भारतकोश
सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

Siddhanta Lesha Sangraha Hindi

श्रीमदप्पय्य दीक्षित द्वारा

स्रोत: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (उद्गम)

DevanagariHindipublished590 पृष्ठ

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जीवेश्वरस्वरूपविचार ] भाषानुवादसहित ८७


चित्रदीपे—'जीव ईशो विशुद्धा चित्' इति त्रैविध्यप्रक्रियां विहाय यथा घटावच्छिन्नाकाशो घटाकाशः, तदाश्रिते जले प्रतिबिम्बितस्साभ्रनक्षत्रो जलाकाशः, अनवच्छिन्नो महाकाशः, महाकाशमध्यवर्तिनि मेघमण्डले दृष्टिलक्षणकार्यानुमेयेषु जलरूपतदवयवेषु तुषाराकारेषु प्रतिबिम्बितो मेघाकाशः' इति वस्तुत एकस्याप्याकाशस्य चातुर्विध्यम्, तथा स्थूलसूक्ष्मदेहद्वयस्याऽधिष्ठानतया वर्तमानं तदवच्छिन्नं चैतन्यं कूटवन्निर्विकारत्वेन स्थितं कूटस्थम्, तत्र कल्पितेऽन्तःकरणे प्रतिबिम्बितं चैतन्यं संसारयोगी जीवः, अनवच्छिन्नं चैतन्यं ब्रह्म, तदाश्रिते मायातमसि स्थितासु सर्वप्राणिनां धीवासनासु प्रतिबिम्बितं चैतन्यमीश्वरः इति चैतन्यस्य चातुर्विध्यं परिकल्प्य अन्तःकरणधीवासनोपरक्ताज्ञानोपाधिभेदेन जीवेश्वरविभागो दर्शितः ।


इष्टापत्तिसे परिहार करते हैं—'एवम्' इत्यादिसे ] इस प्रकारसे जीव और ईश्वरके विषयमें कहे गये इन प्रतिबिम्बविशेष पक्षोंमें जो बिम्बस्थानीय शुद्ध चैतन्य ब्रह्म है, वही मुक्तों द्वारा प्राप्य है ।

चित्रदीपमें 'जीव ईशो विशुद्धा चित्' (जीव, ईश और शुद्ध चेतन) इस प्रकार चैतन्यके तीन भेदोंकी प्रक्रियाको छोड़कर—जैसे घटरूप उपाधिसे युक्त आकाश—घटाकाश है, उस घटस्थ आकाशमें आश्रित जलमें प्रतिबिम्बित बादल और नक्षत्रोंके सहित जो आकाश है—वह जलाकाश है, घट आदि उपाधिसे रहित आकाश—महाकाश है और महाकाशके मध्यवर्ती मेघमण्डलमें वृष्टिरूप कार्यसे अनुमित जलरूप तुषाराकार मेघमण्डलके अवयवोंमें प्रतिबिम्बित आकाश मेघाकाश है, इस प्रकार वस्तुस्थितिमें एक ही आकाशके चार भेद हैं, वैसे ही स्थूल और सूक्ष्म दो शरीरोंमें अधिष्ठानरूपसे वर्तमान दो देहोंसे अवच्छिन्न (युक्त) चैतन्य कूटके—लोहघनके—समान निर्विकाररूपसे स्थित कूटस्थ चैतन्य है, उस कूटस्थ चैतन्यमें कल्पित अन्तःकरणमें प्रतिबिम्बित चैतन्य—सांसारिक जीव चैतन्य है, समस्त उपाधिसे रहित अर्थात् अनवच्छिन्न चैतन्य—ब्रह्मचैतन्य है और ब्रह्मके आश्रित मायारूप तममें विद्यमान सब प्राणियोंकी धीवासनाओंमें (धी उनका नाम है जो अन्तःकरण जाग्रत् और स्वप्न दो अवस्थाओंमें स्थूलरूपसे अनुगत हैं और उन अन्तःकरणोंकी सुषुप्तिकालीन सूक्ष्मावस्थाको वासना कहते हैं) प्रतिबिम्बित चैतन्य—ईश्वरचैतन्य है,—इस रीतिसे चैतन्यके चार विभाग करके अन्तःकरण और

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