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सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

Siddhanta Lesha Sangraha Hindi

श्रीमदप्पय्य दीक्षित द्वारा

स्रोत: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (उद्गम)

DevanagariHindipublished590 पृष्ठ

जीवेश्वरस्वरूपविचार ] भाषानुवादसहित ८७


चित्रदीपे—'जीव ईशो विशुद्धा चित्' इति त्रैविध्यप्रक्रियां विहाय यथा घटावच्छिन्नाकाशो घटाकाशः, तदाश्रिते जले प्रतिबिम्बितस्साभ्रनक्षत्रो जलाकाशः, अनवच्छिन्नो महाकाशः, महाकाशमध्यवर्तिनि मेघमण्डले दृष्टिलक्षणकार्यानुमेयेषु जलरूपतदवयवेषु तुषाराकारेषु प्रतिबिम्बितो मेघाकाशः' इति वस्तुत एकस्याप्याकाशस्य चातुर्विध्यम्, तथा स्थूलसूक्ष्मदेहद्वयस्याऽधिष्ठानतया वर्तमानं तदवच्छिन्नं चैतन्यं कूटवन्निर्विकारत्वेन स्थितं कूटस्थम्, तत्र कल्पितेऽन्तःकरणे प्रतिबिम्बितं चैतन्यं संसारयोगी जीवः, अनवच्छिन्नं चैतन्यं ब्रह्म, तदाश्रिते मायातमसि स्थितासु सर्वप्राणिनां धीवासनासु प्रतिबिम्बितं चैतन्यमीश्वरः इति चैतन्यस्य चातुर्विध्यं परिकल्प्य अन्तःकरणधीवासनोपरक्ताज्ञानोपाधिभेदेन जीवेश्वरविभागो दर्शितः ।


इष्टापत्तिसे परिहार करते हैं—'एवम्' इत्यादिसे ] इस प्रकारसे जीव और ईश्वरके विषयमें कहे गये इन प्रतिबिम्बविशेष पक्षोंमें जो बिम्बस्थानीय शुद्ध चैतन्य ब्रह्म है, वही मुक्तों द्वारा प्राप्य है ।

चित्रदीपमें 'जीव ईशो विशुद्धा चित्' (जीव, ईश और शुद्ध चेतन) इस प्रकार चैतन्यके तीन भेदोंकी प्रक्रियाको छोड़कर—जैसे घटरूप उपाधिसे युक्त आकाश—घटाकाश है, उस घटस्थ आकाशमें आश्रित जलमें प्रतिबिम्बित बादल और नक्षत्रोंके सहित जो आकाश है—वह जलाकाश है, घट आदि उपाधिसे रहित आकाश—महाकाश है और महाकाशके मध्यवर्ती मेघमण्डलमें वृष्टिरूप कार्यसे अनुमित जलरूप तुषाराकार मेघमण्डलके अवयवोंमें प्रतिबिम्बित आकाश मेघाकाश है, इस प्रकार वस्तुस्थितिमें एक ही आकाशके चार भेद हैं, वैसे ही स्थूल और सूक्ष्म दो शरीरोंमें अधिष्ठानरूपसे वर्तमान दो देहोंसे अवच्छिन्न (युक्त) चैतन्य कूटके—लोहघनके—समान निर्विकाररूपसे स्थित कूटस्थ चैतन्य है, उस कूटस्थ चैतन्यमें कल्पित अन्तःकरणमें प्रतिबिम्बित चैतन्य—सांसारिक जीव चैतन्य है, समस्त उपाधिसे रहित अर्थात् अनवच्छिन्न चैतन्य—ब्रह्मचैतन्य है और ब्रह्मके आश्रित मायारूप तममें विद्यमान सब प्राणियोंकी धीवासनाओंमें (धी उनका नाम है जो अन्तःकरण जाग्रत् और स्वप्न दो अवस्थाओंमें स्थूलरूपसे अनुगत हैं और उन अन्तःकरणोंकी सुषुप्तिकालीन सूक्ष्मावस्थाको वासना कहते हैं) प्रतिबिम्बित चैतन्य—ईश्वरचैतन्य है,—इस रीतिसे चैतन्यके चार विभाग करके अन्तःकरण और

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८८ | सिद्धान्तलेशसंग्रह | [ प्रथम परिच्छेद

अयं चापरस्तदभिहितो विशेषः—चतुर्विधेषु चैतन्येषु जीवः 'अहम्' इति प्रकाशमानः कूटस्थे अविद्यातिरोहितासङ्गानन्दरूपविशेषांशे शुक्तौ रूप्यवदध्यस्तः । अत एवेदन्त्व-रजतत्वयोरिवाऽधिष्ठानसामान्यांशाध्यस्त-विशेषांशरूपयोः स्वयन्त्वाहन्त्वयोः सह प्रकाशः 'स्वयमहं करोमि' इत्यादौ ।

धीवासनोपरक्त अज्ञानरूप दो उपाधियोंके भेदसे जीव और ईश्वरका विभाग बतलाया गया है * ।

इस विषयमें चित्रदीपमें कहा गया यह अन्य विशेष है अर्थात् इसमें पूर्व ग्रन्थसे चैतन्यका चातुर्विध्य विशेष दिखलाया उसकी अपेक्षा अन्य प्रतिबिम्ब मिथ्यात्वरूप विशेष है, यह भाव है। चार प्रकारके चैतन्योंमेंसे 'अहम्' (मैं) इस प्रकारसे प्रकाशमान जो जीव है, वह अविद्यासे आच्छादित हुए हैं असङ्ग और आनन्दरूप विशेष अंश जिसके, ऐसे कूटस्थ चैतन्यमें—शुक्तिमें रजतके समान—अध्यस्त है, इसीलिए अर्थात् अहमर्थके कूटस्थमें अध्यस्त


* पञ्चदशीके चित्रदीपप्रकरणमें इस अभिप्रायके सूचक निम्नलिखित श्लोक हैं—

कूटस्थो ब्रह्म जीवेशावित्येवं चिच्चतुर्विधा ।
घटाकाशमहाकाशौ जलाकाशाभ्रखे यथा ॥१८॥
घटावच्छिन्नखे नीरं यत्तत्र प्रतिबिम्बितः ।
साभ्रनक्षत्र आकाशो जलाकाश उदीर्यते ॥१९॥
महाकाशस्य मध्ये यन्मेघमण्डलमीक्ष्यते ।
प्रतिबिम्बतया तत्र मेघाकाशो जले स्थितः ॥२०॥
मेघांशरूपमुदकं तुषाराकारसंस्थितम् ।
तत्र खप्रतिबिम्बोऽयं नीरत्वादनुमीयते ॥२१॥
अधिष्ठानतया देहद्वयावच्छिन्नचेतनः ।
कूटवन्निर्विकारेण स्थितः कूटस्थ उच्यते ॥ २२ ॥
कूटस्थे कल्पिता बुद्धिस्तत्र चित्प्रतिबिम्बकः ।
प्राणानां धारणाज्जीवः संसारेण स युज्यते ॥ २३ ॥
जलव्योम्ना घटाकाशो यथा सर्वस्तिरोहितः ।
तथा जीवेन कूटस्थः सोऽन्योन्याध्यास उच्यते ॥ २४ ॥

इन श्लोकोंका भाव मूल ग्रन्थसे व्यक्त है, केवल अन्तिम श्लोकका सार यह है कि यदि कूटस्थ चेतन है, तो उसका अनुभव क्यों नहीं होता है? इसका उत्तर है कि जैसे जलाकाशसे घटाकाश तिरोहित हो जाता है, वैसे ही जीवसे तिरोहित हो जानेके कारण कूटस्थका अनुभव नहीं होता है, और इसीको अन्योन्याध्यास कहते हैं ।

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जीवेश्वरस्वरूपविचार ] भाषानुवादसहित ८९

अहन्त्वं ह्यध्यस्तविशेषांशरूपम्, पुरुषान्तरस्य पुरुषान्तरे 'अहम्' इति व्यवहाराभावेन व्यावृत्तत्वात् । स्वयन्त्वं चान्यत्वप्रतियोग्यधिष्ठानसामान्यांशरूपम् । 'स्वयं देवदत्तो गच्छति' इति पुरुषान्तरेऽपि व्यवहारेणाऽनुवृत्तत्वात् , एवं परस्पराध्यासादेव कूटस्थजीवयोरविवेको लौकिकानाम् ।

होनेसे ही जैसे 'इदं रजतम्' ( यह रजत है ) इसमें इदन्त्व और रजतत्वका, जो क्रमशः अधिष्ठानसामान्य अंश और अध्यस्तविशेष अंश हैं, साथ-साथ प्रकाश होता है, वैसे ही स्वयन्त्व और अहन्त्वका साथ-साथ प्रकाश होता है—'स्वयमहं करोमि' ( मैं स्वयं करता हूँ ) इत्यादिमें । *प्रकृतमें अहन्त्व अध्यस्तविशेष अंश है, क्योंकि अन्य पुरुषका अन्य पुरुषमें 'अहम्' इस प्रकारका व्यवहार नहीं होता, इसलिए व्यावृत्त है । और स्वयन्त्व तो अन्यत्वका विरोधी है और अधिष्ठानसामान्य अंश है, क्योंकि 'स्वयं देवदत्तः गच्छति' ( देवदत्त स्वयं जाता है ) इस प्रकार अन्य पुरुषमें भी स्वयन्त्वका व्यवहार होनेसे वह अनुवृत्त है । ऐसा होनेपर—अहमर्थ जीवके शुक्तिमें रूप्यके समान कूटस्थमें अध्यस्त होनेपर—परस्पर अभेदके अध्याससे ही कूटस्थ और जीवका लोकमें अन्योन्य अभेद भासता है ।


  • कूटस्थके असङ्गत्व, आनन्दत्व और पूर्णत्व आदि विशेषधर्म अविद्याके प्रभावसे प्रतीत नहीं होते, यह हम मानते हैं, परन्तु जैसे शुक्तिका इदन्त्व अंश प्रकाशित होता है, वैसे अधिष्ठानका सामान्य अंश प्रकाशित नहीं होता । किंच, जैसे 'इदं रजतम्' इत्यादिमें अधिष्ठानके सामान्य अंशका और आरोपित विशेष अंशका साथ-साथ प्रकाश होता है, वैसे प्रकृतमें अहंवरूप विशेष अंश और सामान्य अंशका प्रकाश नहीं होता किन्तु अहमर्थ विशेषका ही प्रकाश होता है इसलिए कूटस्थमें 'अहम्' का शुक्तिमें रूप्यके समान अध्यास है, यह कहना असङ्गत है, इसपर 'अत एव' इत्यादिसे कहते हैं । यद्यपि कूटस्थका सामान्य अंश कूटस्थत्व होना चाहिए, तथापि शास्त्रीय-प्रमाणके अनुसार 'स्वयन्त्व' ही उसका सामान्य अंश है, ऐसा माननेके लिए हमें बाध्य होना पड़ता है, इसलिए अहमर्थके—जीवके—आरोपकालमें स्वयन्त्वका साथ-साथ प्रकाश होता है, किं बहुना स्वयन्त्वके कूटस्थ चैतन्यरूप होनेसे आरोप-पूर्वकालमें भी उसका भान होता है । यद्यपि स्वयन्त्व और कूटस्थ एक ही है, तथापि 'राहोः शिरः' ( राहुका माथा ) के समान यहाँ भेदकी कल्पना करके धर्मधर्मिभावकी उपपत्ति करनी चाहिए । अतः स्वयन्त्वसामान्यरूपसे कूटस्थका सर्वदा प्रकाश होनेसे अहमर्थ ( जीव ) रूप चिदाभासके अध्यासका अधिष्ठान कूटस्थ उपपन्न हुआ । पुरुषान्तरमें 'मैं' शब्दका व्यवहार न होनेसे उसमें 'अहन्त्व' की व्यावृत्तिका अवगम होता है, अतः अहन्त्व विशेष अंश है । स्वयम् और अन्य शब्द एकार्थक नहीं हैं, परन्तु पुरुषान्तरमें स्वयंशब्दका व्यवहार होता है, इसलिए उसे सामान्यांश माननेमें कोई हरकत नहीं

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९०सिद्धान्तलेशसंग्रह[ प्रथम परिच्छेद

विवेकस्तु तयोर्बृहदारण्यके—'प्रज्ञानघन एवैतेभ्यो भूतेभ्यः समुत्थाय तान्येवानु विनश्यति' इति जीवाभिप्रायेणोपाधिविनाशानुपविनाशप्रति-


[ 'इदं रजतम्' (यह रजत है ) इत्यादि भ्रमस्थलमें 'यह शुक्ति है' इस प्रकारके विशेष परिज्ञानसे 'इदं रजतम्' इससे प्रतीत सामान्य और विशेष पदार्थोंमें शुक्तित्व और रजतत्वरूप विरुद्ध धर्मोंका निश्चय होनेसे उनका भेद माना जाता है, परन्तु प्रकृतमें जीव और कूटस्थका भेद कैसे अवगत हो सकता है ? यदि भेदका परिज्ञान न हो, तो 'स्वयमहम्' ( मैं स्वयम् ) इस प्रकार सामान्यविशेषभावसे प्रतीयमान जीव और कूटस्थका सत्यस्थलीय रजत और इदमर्थके समान वस्तुतः एकत्वापत्ति होनेसे अहमर्थ-जीवकी स्वयंशब्दार्थ-कूटस्थमें कल्पना नहीं हो सकती, इस प्रकारकी आशङ्का करके श्रुतिसे उनका भेद दिखलाते हैं ]—बृहदारण्यकमें जीव और ईश्वरका भेदानुभव तो 'प्रज्ञानघन एवैतेभ्यो भूतेभ्यः समुत्थाय०' (प्रज्ञानरूप आत्मा ही देहादिरूपसे परिणत सन्निहित उपाधिरूप भूतोंसे समुत्थानकर—उपाधिभूत बुद्धि आदिकी उत्पत्तिसे उत्पत्तियुक्त होकर—तत्त्वज्ञानसे उन उपाधियोंका विनाश होनेपर उन्हीं भूतोंमें लीन हो जाता है) इत्यादि श्रुतिसे जीवके अभिप्रायसे ही अर्थात् जीवका ही उपाधिके विनाशके अनन्तर विनाशप्रतिपादन


है—जैसे इदन्त्व शुक्तिमें रहता है, वैसे ही पट आदिमें भी रहता है। इस विशेष पक्षके संग्राहक निम्न लिखित श्लोक हैं—

'अविद्यावृतकूटस्थे देहद्वययुता चितिः ।
शुक्तौ रूप्यवदध्यस्ता विक्षेपाध्यास एव हि ॥३३॥
आरोपितस्य दृष्टान्ते रूप्यं नाम यथा तथा ।
कूटस्थाध्यस्तविक्षेपनामाहमिति निश्चयः ॥३६॥
इदमंशं स्वतः पश्यन् रूप्यमित्यभिमन्यते ।
तथा स्वं च स्वतः पश्यन्नहमित्यभिमन्यते ॥३७॥
इदन्त्वरूप्यते भिन्ने स्वत्वाहमन्ते तथेष्यताम् ।
सामान्यं च विशेषश्च ह्युभयत्रापि गम्यते ॥३८॥
देवदत्तः स्वयं गच्छेत्त्वं वीक्षस्व स्वयं तथा ।
अहं स्वयं न शक्नोमीत्येवं लोके प्रयुज्यते ॥३९॥' [पञ्च० चित्रदी०]

इन श्लोकोंके आधारपर ही 'अयञ्चापरस्तदभिहितो विशेषः' इत्यादिसे विशेष बात कही गई है, और जो मूलमें विशेष कहा है, वही इन श्लोकोंका अर्थ है, अतः श्लोकोंका अनुवाद नहीं किया गया।

जीवेश्वरस्वरूपविचार ] भाषानुवादसहित ९१


पादनेन, 'अविनाशी वा अरेऽयमात्मा' इति कूटस्थाभिप्रायेणाऽविनाशप्रतिपादनेन च स्पष्टः । अहमर्थस्य जीवस्य विनाशित्वे कथमविनाशिब्रह्माभेदः । नेदमभेदे सामानाधिकरण्यम् , किन्तु बाधायाम् । यथा 'यः स्थाणुरेष पुमान्'

किया गया है, इससे और 'अविनाशी वा अरे०' (हे मैत्रेयि ! यह आत्मा अविनाशी है) इत्यादि श्रुतिसे कूटस्थ आत्माके अविनाशित्वका प्रतिपादन करनेसे स्पष्ट ही है *। यहांपर शङ्का होती है कि यदि श्रुतिसे वह विनाशी सिद्ध हो तो उसका—अहमर्थ जीवका—अविनाशी ब्रह्मके साथ अभेद कैसे होगा ? यह शङ्का युक्त नहीं है, क्योंकि अविनाशी ब्रह्म और जीवका सामानाधिकरण्य अभेद अर्थमें नहीं है, † परन्तु बाध अर्थमें सामानाधिकरण्य है—जैसे


* भाव यह है कि यद्यपि 'अयमात्मा प्रज्ञानघनः' इत्यादि श्रुतिसे ज्ञात होता है कि चिदेकरस आत्मा ही उपाधिके उद्भवके पश्चात् उत्पन्न होता है और उपाधिके नाशके अनन्तर नष्ट होता है, अतः उपाधिकी उत्पत्ति और विनाशसे पृथक् ही चिदात्माकी उत्पत्ति और विनाशका प्रतिपादन है, क्योंकि अनुशव्दका प्रयोग है, तथापि चिदात्माकी उत्पत्ति और विनाश स्वभावसिद्ध है, ऐसा नहीं कह सकते; क्योंकि 'अविनाशी वा अरेऽयमात्मा०' ( हे मैत्रेयि, यह आत्मा अविनाशी है) इस श्रुतिसे विज्ञानघन आत्माके अविनाशका प्रतिपादन है। इसलिए उत्पत्ति-विनाशवान् चैतन्य प्रतिबिम्बरूप जीवके तादात्म्यके आधारपर विनाश आदि वचनकी उपपत्ति करनी चाहिए। इससे भ्रमस्थलमें रजत और इदमर्थमें जैसे विनाशित्व और अविनाशित्वरूप विरुद्ध धर्मके निश्चयसे भेदम्रह होता है, वैसे ही प्रकृतमें भी विनाशित्व और अविनाशित्वरूप विरुद्ध धर्मके निश्चयसे ही जीव और कूटस्थके भेदका परिज्ञान होता है।

† इसका यह भाव है 'सोऽयम् नरेन्द्रः' (वह यह नरेन्द्र है) इत्यादि समानाधिकरण वाक्यका जैसे अभेद अर्थ प्रतीत होता है—कलकत्तेमें जिस नरेन्द्रको देखा था वही यह है, अतः कलकत्तेके नरेन्द्र और इस नरेन्द्रका भेद नहीं है किन्तु अभेद ही है, वैसे 'यः स्थाणुः स पुरुषः' ( जो स्थाणु था वह पुरुष है ) इस समानाधिकरण वाक्यसे अभेद—प्रतीत नहीं होता, क्योंकि स्थाणु और पुरुषका अभेद कभी नहीं घट सकता, इसलिए यहाँपर वाच्यार्थ है—बाध, अर्थात् उक्त वाक्यसे—जिस आधारभूत पुरुषमें स्थाणुत्वकी कल्पना की गई है, उसमें स्थाणुतादात्म्य नहीं है—इस प्रकार बाधरूप वाक्यार्थ देखा जाता है। इसलिए 'यः स्थाणुः स पुरुषः' इस वाक्यसे 'वस्तुतः स्थाणुतादात्म्याभाववानयं पुरुषः' ( वस्तुतः पुरुष स्थाणु-तादात्म्यका आधार नहीं है ) यह बोध होता है। इस बोधसे पुरुषमें स्थाणुरूप निश्चयके सहित आरोप निवृत्त होता है। इसी रीतिसे 'अहं ब्रह्मास्मि' (मैं ब्रह्म हूँ) अहमर्थ (जीव) तादात्म्यसे शून्य 'मैं ब्रह्म हूँ' यह ज्ञान होता है और इस ज्ञानसे 'मैं कर्त्ता हूँ' इत्यादि आरोप—सम्पूर्ण कर्तृत्व आदि धर्मोंसे विशिष्ट जीवरूप अपने विषयोंके साथ निवृत्त होता है। आरोपित अहमर्थकी निवृत्ति होनेपर जो जीवका कूटस्थसत्यस्वरूप स्वरूप है वह पूर्ण ब्रह्मरूपसे रहता है, इसलिए श्रुत्यन्तरके साथ विरोध नहीं है ॥

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९२ सिद्धान्तलेशसंग्रह [ प्रथम परिच्छेद


इति पुरुषत्वबोधेन स्थाणुत्वबुद्धिर्निवर्त्यते । एवम् 'अहं ब्रह्मास्मि' इति कूटस्थब्रह्मस्वरूपत्वबोधेनाऽध्यस्ताहमर्थरूपत्वं निवर्त्यते ।

'योऽयं स्थाणुः पुमानेष पुन्धिया स्थाणुधीरिव ।
ब्रह्माऽस्मीति धियाऽशेषा ह्यहम्बुद्धिर्निवर्त्तते ॥'

इति नैष्कर्म्यसिद्धिवचनात् । यदि च विवरणाद्युक्तरीत्या दृढ़मभेदे सामानाधिकरण्यम्, तदा जीववाचिनोऽहंशब्दस्य लक्षणया कूटस्थपरत्व-मस्तु । तस्याऽनध्यस्तस्य ब्रह्माभेदे योग्यत्वात् ।


'जो स्थाणु है, वह पुरुष है, इस प्रकार स्थाणुमें पुरुषत्वके ‡ बोधनसे स्थाणु-त्वका ज्ञान निवृत्त होता है, वैसे ही 'मैं ब्रह्म हूं' इस प्रकार जीवमें ब्रह्मस्वरूपत्वके बोधसे अध्यस्त अहमर्थरूपताकी—जीवरूपताकी—निवृत्ति होती है ।

'योऽयं स्थाणुः०' ( जैसे मन्द अन्धकारमें 'जिसे स्थाणु [ पुरुषाकार खड़ा हुआ सूखा वृक्ष विशेष ] समझा था यह तो पुरुष है, इस प्रकारके महाजनके वाक्यसे उत्पन्न हुई पुरुषविषयक बुद्धिसे अर्थात् 'यह पुरुष ही है स्थाणु नहीं' इस प्रकारकी बुद्धिसे 'यह स्थाणु है' इस प्रकारकी बुद्धि आरोपित स्थाणु तादात्म्य के साथ निवृत्त होती है, वैसे ही 'मैं ब्रह्म हूँ' इस वाक्यसे उत्पन्न बुद्धिसे—अहमर्थभूत जीवके तादात्म्यसे शून्य केवल ब्रह्मरूप ही मैं हूँ, इस प्रकारकी अहंबुद्धिसे—'मैं करता हूँ' इत्यादि सम्पूर्ण बुद्धि आरोपित अहमर्थके साथ निवृत्त होती है ) ऐसा नैष्कर्म्यसिद्धिका ※ वचन भी है । यदि विवरण आदिके कथना-नुसार 'अहं ब्रह्मास्मि' ( मैं ब्रह्म हूँ ) यह सामानाधिकरण्य अभेदमें माना जाय, तो जीववाचक अहंशब्दका लक्षणावृत्तिसे कूटस्थ चैतन्य ही अर्थ मानना होगा, क्योंकि उसीकी अनध्यस्त ब्रह्मके अभेदमें योग्यता है ।


‡ पुरुषत्वपदसे कल्पितस्थाणुतादात्म्याभाववत्त्व विवक्षित है, क्योंकि बाधक ही वाक्यार्थ माना गया है, यह भाव है ।
※ नैष्कर्म्यसिद्धिमें सुरेश्वराचार्यका यह वचन है, इसलिए बाधको वाक्यार्थ माननेमें कोई हानि नहीं है। इस श्लोकमें 'हि' शब्द इस अर्थका सूचन करता है—महावाक्यार्थके ठीक-ठीक परिज्ञानसे सम्पूर्ण अनर्थकी निवृत्ति होती है, यह अनुभवी पुरुषोंके अनुभवसे सिद्ध है ।
† समानाधिकरण वाक्योंका यह स्वभाव है कि उनका अर्थ मुख्यतः अभेद ही होता है, और विवरण आदिमें ऐसे समानाधिकरण वाक्योंकी अभेदार्थकता ही मानी गई है । वाक्यवृत्तिमें भगवत्पादशङ्कराचार्यजी महाराजने भी 'तादात्म्यमात्रं वाक्यार्थस्तयोरेव पदार्थयोः' इस श्लोकसे

जीवेश्वरस्वरूपविचार ] भाषानुवादसहित ९३


यस्तु मेघाकाशतुल्यो धीवासनाप्रतिविम्ब ईश्वर उक्तः, सोऽयं 'सुषुप्तस्थान एकीभूतः प्रज्ञानघन एवानन्दमयो ह्यानन्दभुक्' इति माण्डूक्यश्रुतिसिद्धः सौषुप्तानन्दमयः, तत्रैव तदनन्तरम् 'एष सर्वेश्वर एष सर्वज्ञ एषोऽन्तर्याम्येष योनिः सर्वस्य प्रभवाप्ययौ हि भूतानाम्' इति श्रुतेः ।


* और मेघाकाशके समान धीवासनाओंमें प्रतिबिम्ब चैतन्य ईश्वर है, ऐसा जो कहा गया है, वह 'सुषुप्तस्थान एकीभूतः' ( सुषुप्तस्थान—सुषुप्त है स्थान जिसका, ऐसा एकीभूत और प्रज्ञानघन—जीव ही आनन्दमय और आनन्दभोक्ता है ) इस माण्डूक्यश्रुतिसे सिद्ध सुषुप्तिकालीन आनन्दमय है, क्योंकि वहींपर उसके बाद 'एष सर्वेश्वरः०' ( यही सर्वेश्वर, सर्वज्ञ और


'तत्त्वमसि' महावाक्यमें तत् और त्वंकः तादात्म्यशब्दसे कहे जानेवाला अभेद ही वाक्यार्थ माना है, इसलिए वार्तिककारके वचनानुसार 'अहं ब्रह्मास्मि' इत्यादि स्थलमें वाक्यका वाक्यार्थकत्व केवल प्रौढिवाद ही है, इसलिए 'अहं ब्रह्मास्मि' इत्यादिमें अभेदको ही वाक्यार्थ मानना चाहिए । इस परिस्थितिमें विनाशी जीव और अविनाशी ब्रह्मका अभेद नहीं हो सकता है, इसलिए पूर्वमतमें अस्वरस है, अतः 'यदि च' शब्दसे विवरणका मत कहते हैं ।

* यहाँ तुशब्द अवधारणार्थक है अर्थात् पूर्वमें जो ईश्वर कहा गया है, वह श्रुतिमें उक्त आनन्दमय ही है, उससे अन्य नहीं है, यह भाव है । 'सुषुप्तस्थान' इत्यादि श्रुतिका स्पष्ट अर्थ यह है—सुषुप्तं स्थानं यस्य सः—सुषुप्तस्थानः अर्थात् जिसका सुषुप्ति स्थान है । जाग्रदवस्थामें अन्तःकरणके साथ तादात्म्यका अध्यास होनेसे विज्ञानमयत्व, मनोमयत्व और मन्तृत्व आदि रूप जीवके धर्म हैं, देहमें 'मैं स्थूल हूँ' इत्यादि अध्याससे स्थूलत्व, कृशत्व, ब्राह्मणत्व आदि रूप धर्म हैं, तथा चक्षु आदिमें 'मैं काना हूँ' इत्यादिके अध्याससे काणत्व आदि धर्म हैं, इसी प्रकार आकाश आदि बाह्य पदार्थोंमें अध्याससे होनेवाले श्रुतिद्वारा प्रतिपादित आकाशगत्व आदि धर्म हैं और सुषुप्तिमें तो बुद्धि आदिका विलय होनेसे समस्त संसारकी भ्रान्तिका अभाव होनेसे उक्त सभी प्रकारके स्वरूप लीन होते हैं, अतः इसी अभिप्रायसे श्रुतिमें एकीभूत कहा गया है, इसीसे इस अर्थका संग्राहक श्लोक उपलब्ध होता है—

'विज्ञानमयमुख्यैर्यो रूपैर्युक्तः पुराऽधुना ।
स लयेनैकतां प्राप्तो बहुत्तण्डुलपिष्टवत् ॥' [ प० ब्रह्मानन्द श्लो० ६९ ]

सुषुप्तिके पूर्वमें विज्ञानमय आदि स्वरूपोंसे जो युक्त था वह सुषुप्तिमें उन रूपोंके विनाशसे अनेक तण्डुलोंका पिष्ट जैसे एकरूप हो जाता है, वैसे ही एकरूप हो गया । प्रज्ञान चैतन्य है । जागरणमें वृत्तियोंके अनेक होनेसे जीवका चैतन्य उस समयमें शिथिल हो जाता है,


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९४सिद्धान्तलेशसंग्रह[ प्रथम परिच्छेद

सर्ववस्तुविषयसकलप्राणिधीवासनोपाधिकस्य तस्य सर्वज्ञत्वस्य तत एव सर्वकर्तृत्वादेरप्युपपत्तेश्च। न चास्मद्बुद्धिवासनोपहितस्य कस्यचित् सार्वज्ञ्यं नाऽनुभूयते इति वाच्यम्, वासनानां परोक्षत्वेन तदुपहितस्याऽपि परोक्षत्वादिति।


अन्तर्यामी है और यह उत्पत्ति और विनाशका कारण है, इसलिए सम्पूर्ण जगत्का उपादान कारण है) इत्यादि श्रुति है। सम्पूर्ण वस्तुको विषय करनेवाली सब प्राणियोंकी धीवासनाओंसे † उपहित उस चैतन्यमें सर्वज्ञत्व और उसी श्रुतिसे सर्वकर्तृत्वकी उपपत्ति भी होती है। और हम लोगोंकी बुद्धिकी वासनाओंसे उपहित किसी चैतन्यमें सर्वज्ञत्वका अनुभव नहीं होता, यह आपत्ति नहीं है, क्योंकि वासनाओंके परोक्ष होनेसे उपहित चैतन्य भी परोक्ष है।


और सुषुप्तिमें वृत्तियोंका लय होनेसे उसका घनीभाव रहता है, इसे प्रज्ञानघन—चैतन्यघन कहते हैं, आनन्दमय है अर्थात् बिम्बभूत ब्रह्मानन्दका प्रतिबिम्ब होनेसे जीव आनन्दमय है। और यह आनन्दमय जीव सुषुप्तिकालमें अविद्यावृत्तिसे उपभोग करता है, इसलिए आनन्दभुक् भी उसे कह सकते हैं।

† आनन्दमय सर्वज्ञ है इसमें युक्ति इस ग्रन्थसे देते हैं—एक बुद्धि किसी एक वस्तुको विषय करती है और सब बुद्धियां मिलकर सभी वस्तुओंको विषय करती हैं। इस प्रकारसे सब बुद्धियाँ यदि सब वस्तुओंका अवगाहन करें, तो उन बुद्धियोंकी वासनाएँ भी सब पदार्थोंको अवश्य विषय करेंगी। इसलिए सब प्राणियोंकी बुद्धिवासनाओंसे उपहित आनन्दमयमें भी सर्ववस्तुविषयकत्व होनेसे सर्वज्ञत्व अर्थात् सिद्ध ही है, अतः आनन्दमयको सर्वज्ञ माननेमें कोई आपत्ति नहीं है। प्रकृतमें यह चिन्ता होती है कि धीवासनाओंसे उपरक्त अज्ञानसे उपहित जो ईश है, उसमें शुद्ध अज्ञान ही उपाधि है अथवा वासनासे उपरक्त, या सम्पूर्ण धीवासना अथवा प्रत्येक वासना उपाधि है, यदि प्रथम पक्षका स्वीकार किया जाय, तो ‘धीवासनाओंमें प्रतिबिम्बित चैतन्य ईश्वर है, ऐसा जो कहा गया है, उसके साथ विरोध होगा, क्योंकि केवल अज्ञान उपाधि हो तो धीवासनाको उपाधि कहना व्यर्थ ही है। और द्वितीय पक्ष भी अयुक्त है, क्योंकि अज्ञानमें रहनेवाले सत्त्वांशकी परिणामरूप सर्वविषयक वृत्तियोंसे सर्वज्ञत्वकी उपपत्ति हो सकती है, तो फिर वासनोपरक्त अज्ञानको उपाधि मानना केवल मूर्खता है। तृतीय पक्ष भी अयुक्त है, क्योंकि एक कालमें सब वृत्तियाँ नहीं हो सकती हैं। इसलिए चौथा पक्ष ही परिशेषसे बचता है, परन्तु इसमें अनुभवविरोध है, और इसी अनुभवविरोधका ‘न चा०’ इत्यादि ग्रन्थसे परिहार भी किया गया है। अर्थात् वासनाओंके परोक्ष होनेसे उन वासनाओंसे उपहित आनन्दमयकी ‘अहं सर्वज्ञः’ इस प्रकार अपरोक्षानुभूति नहीं होती है, यह भाव है।

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जीवेश्वरस्वरूपविचार ] भाषानुवादसहित ९५


ब्रह्मानन्दे विराडादिसमष्टिव्यष्ट्युपाधितः ।
षोढा चिदानन्दमयव्यष्टिर्जीव इतीरितम् ॥ ३५ ॥
शुद्धलाञ्छितापूर्णवर्णचित्रपटोपमाः ।
ब्रह्मेशसूत्रवैराजाः पराभाससमोऽसुभृत् ॥
चित्रदीपे चित्रपटन्यायेनेत्थं निरूपिताः ॥ ३६ ॥
विराट्सूत्राक्षराण्यादौ विभज्य प्रणवाक्षरैः ।
विलाप्य गौडपादीये तुरीयात्माऽवशेषितः ॥ ३७ ॥

ब्रह्मानन्द (प्रकरण) में विराद् आदि समष्टि और व्यष्टिरूप उपाधिके भेदसे चैतन्यके छः भेद हैं व्यष्टि आनन्दमय जीव है, ऐसा कहा गया है । चित्रदीपमें—चित्रपटके दृष्टान्तसे अर्थात् जैसे शुद्ध, लाञ्छित, अङ्कित और वर्णसे पूरित इस प्रकारसे वस्त्रके चार भेद होते हैं, वैसे ही ब्रह्म, ईश, सूत्र और विराट् ये चैतन्यके चार भेद हैं और जीव ब्रह्मके आभासके समान है, ऐसा निरूपण किया गया है । पहले विराट्, सूत्र और अक्षरका विभाग करके 'ओम्के' अ, उ और म्—इन तीन अक्षरोंके साथ उनका प्रविलापन करके तुरीय आत्माका गौडपादकी कारिकाओंके विवरणमें अवशेष बतलाया है ॥३५॥३६॥३७॥

ब्रह्मानन्दे तु सुषुप्तिसंयोगात् माण्डूक्त्योक्त आनन्दमयो जीव इत्युक्तम् ।

ब्रह्मानन्दमें * तो माण्डूक्यमें कहा गया आनन्दमय सुषुप्तिके संयोगसे


* पञ्चदशीमें ब्रह्मानन्दके योगानन्दप्रकरणमें इस अर्थके संग्राहक निम्न लिखित श्लोक हैं—

'स आनन्दमयः सुप्तौ य विज्ञानमयात्मताम् ।
गत्वा स्वप्नं प्रबोधं वा प्राप्नोति स्थानभेदतः ॥' [पञ्च०प्र० यो० श्लो० ९०]

और पञ्चदशीके चित्रदीपप्रकरणमें चैतन्यके चार भेद चित्रपटके दृष्टान्तसे बतलाये गये हैं—

'यथा चित्रपटे दृष्टमवस्थानां चतुष्टयम् ।
परमात्मनि विज्ञेयं तथाऽवस्थाचतुष्टयम् ॥१॥
यथा धौतो घटितश्च लाञ्छितो रञ्जितः पटः ।
चिदन्तर्यामी सूत्रात्मा विराट् चाऽऽत्मा तथेर्यते ॥२॥
स्वतः शुद्धोऽत्र धौतःस्याद्धटितोऽन्नविलेपनात् ।
मष्याकारैर्लाञ्छितः स्याद्रञ्जितो वर्णपूरणात् ॥३॥
स्वतश्चिदन्तर्यामी तु मायावी सूक्ष्मसृष्टितः ।
सूत्रात्मा स्थूलसृष्ट्यैव विराडित्युच्यते परः ॥४॥

इन सभी श्लोकोंका भाव मूलमें ग्रन्थकारने स्पष्टरूपसे लिखा है । इसलिए पुनरुक्ति नहीं करते हैं ।

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९६सिद्धान्तलेशसंग्रह[ प्रथम परिच्छेद

यदा हि जाग्रदादिषु भोगप्रदस्य कर्मणः क्षये निद्रारूपेण विलीनमन्तःकरणं पुनर्भोगप्रदकर्मवशात् प्रबोधे घनीभवति, तदा तदुपाधिको जीवः विज्ञानमय इत्युच्यते। स एव पूर्वं सुषुप्तिसमये विलीनावस्थोपाधिकः सन्नानन्दमय इत्युच्यते। स एव माण्डूक्ये ‘सुषुप्तस्थानः’ इत्यादिना दर्शित इति। एवं सति तस्य सर्वेश्वरत्वादिवचनं कथं सङ्गच्छताम् ?

इत्थम्, सन्त्यधिदैवतमध्यात्मं च परमात्मनः सविशेषाणि त्रीणि त्रीणि रूपाणि। तत्राऽधिदैवतं त्रीणि शुद्धचैतन्यं चेति चत्वारि रूपाणि चित्रपट-दृष्टान्तेन चित्रदीपे समर्थितानि। यथा स्वतश्शुभ्रः पटो धौतः, अन्नलिप्तो घट्टितः, मष्यादिविकारयुक्तो लाञ्छितः, वर्णपूरितो रञ्जितः, इत्यवस्थाचतुष्टयमेकस्यैव चित्रपटस्य, तथा परमात्मा मायातत्कार्योपाधिरहितः शुद्धः,


जीव ही है, ऐसा कहा गया है। और जब जाग्रत् आदि अवस्थाओंमें भोग-प्रद कर्मका विनाश होनेपर निद्रारूपसे तिरोहित अन्तःकरण फिर भोग देनेवाले कर्मके बलसे प्रबोध अवस्थामें स्थूलरूपताको प्राप्त होता है, तब उस अन्तःकरणरूप उपाधिसे युक्त जीव ‘विज्ञानमय’ शब्दसे कहा जाता है। यही जीव पहले निद्राके समयमें विलीनावस्थोपाधिक (जिसकी उपाधिकी अवस्था विलीन है) होता हुआ ‘आनन्दमय’ शब्दसे कहा जाता है। और इसीका माण्डूक्य उपनिषत्में ‘सुषुप्तस्थानः’ इत्यादिसे परिचय कराया गया है। यदि आनन्दमय जीव ही है, तो ‘एष सर्वेश्वरः’ इत्यादि वाक्यशेषके साथ, जो जीवमें ईश्वरत्वका प्रतिपादन करता है, विरोध होगा अर्थात् उपक्रम-वाक्यकी उपसंहारवाक्यके साथ सङ्गति कैसे होगी ?

इस प्रकार उसकी सङ्गति होगी। [ भाव यह है कि यद्यपि सुषुप्तिकालिक जीवरूप आनन्दमय चैतन्य ईश्वररूप नहीं है, तो भी ईश्वरके साथ अभेदकी विवक्षा करके उक्त उपक्रम और उपसंहारकी सङ्गति होगी इसीको दिखलाते हैं— ] परमात्माके अधिदैव और अध्यात्म सविशेष तीन-तीन रूप हैं। उनमें से देवतात्मक तीन रूप और चौथा शुद्ध चैतन्य, इस प्रकार चार रूपोंका चित्रित वस्त्रके दृष्टान्तसे चित्रदीपमें समर्थन किया गया है—जैसे स्वाभाविक शुभ्र वस्त्र धौत कहलाता है, अन्न आदिसे लिप्त घट्टित कहा जाता है, स्याही आदिसे संयुक्त लाञ्छित कहा जाता है, वर्णोंसे रंगा हुआ रञ्जित कहा जाता है, इस प्रकार

जीवेश्वरस्वरूपविचार ] भाषानुवादसहित ९७

मायोपहित ईश्वरः, अपञ्चीकृतभूतकार्यसमष्टिसूक्ष्मशरीरोपहितो हिरण्यगर्भः, पञ्चीकृतभूतकार्यसमष्टिस्थूलशरीरोपहितो विराट् पुरुष इत्यवस्थाचतुष्टयमेकस्यैव परमात्मनः। अस्मिंश्च चित्रपटस्थानीये परमात्मनि चित्रस्थानीयः स्थावरजङ्गमात्मको निखिलः प्रपञ्चः। यथा चित्रगतमनुष्याणां चित्राधारवस्त्रसदृशा वस्त्राभासा लिख्यन्ते, तथा परमात्माध्यस्तदेहिनामधिष्ठानचैतन्यसदृशाश्चिदाभासाः कल्प्यन्ते। ते च जीवनामानः संसरन्तीति। अध्यात्मं तु विश्वतैजसप्राज्ञभेदेन त्रीणि रूपाणि। तत्र सुषुप्तौ विलीने अन्तःकरणे अज्ञानमात्रसाक्षी प्राज्ञः, योऽयमिहानन्दमय उक्तः। स्वप्ने व्यष्टि-


एक ही चित्रित पटकी चार अवस्थाएँ होती हैं, वैसे ही माया और उसके कार्यरूप उपाधिसे रहित परमात्मा शुद्ध कहा जाता है, माया उपाधिसे युक्त ईश्वर, अपञ्चीकृत भूतोंके कार्यभूत समष्टि (समूह) सूक्ष्म शरीरसे उपहित * हिरण्यगर्भ और पञ्चीकृत भूतोंके कार्यभूत समष्टि स्थूल शरीरसे उपहित विराट् पुरुष कहलाता है। इस प्रकार एक ही परमात्माकी चार अवस्थाएँ हैं। इस परिस्थितिमें चित्रपटस्थानीय परमात्मामें चित्रस्थानापन्न सम्पूर्ण स्थावर और जङ्गम रूप प्रपञ्च है। जैसे—चित्रमें चित्रित मनुष्योंके चित्रके आधारभूत वस्त्रके सदृश वस्त्रोंके आभास लिखे जाते हैं, वैसे ही परमात्मामें अध्यस्त स्थूल देहके अभिमानी अहङ्कारोंके अधिष्ठानभूत—आधारभूत—चैतन्यसदृश चिदाभासोंकी कल्पना की जाती है, और वे जीव-नामधारी होकर संसारके भागी होते हैं। जीवात्मक चैतन्यके विश्व, तैजस और प्राज्ञ भेदसे तीन रूप होते हैं। उनमेंसे सुषुप्ति अवस्थामें अन्तःकरणके तिरोहित होनेपर अज्ञानमात्रका साक्षी चैतन्य—प्राज्ञ है, जो कि प्रकृतमें † आनन्दमय-


* यह शङ्का होती है कि हिरण्यगर्भ कहलानेवाला जो सूत्रात्मा है, उसीमें श्रुति और स्मृतियोंमें जीवत्वकी प्रसिद्धि है, अतः उसे ईश्वर मानना प्रमाणविरुद्ध है, परन्तु यह शङ्का युक्त नहीं है, क्योंकि समष्टि सूक्ष्म शरीरके अभिमानसे विशिष्ट सत्यलोकका स्वामी जीवरूप हिरण्यगर्भ ईश्वरसे अन्य है, ऐसा स्वीकार किया गया है। ईश्वरमें यद्यपि समष्टि सूक्ष्म शरीरका अभिमान नहीं है, तो भी समष्टिसूक्ष्मशरीरोंका नियन्ता होनेसे समष्टि सूक्ष्म उपाधिसे उपहितत्व गुणके योगसे ईश्वरका हिरण्यगर्भ और सूत्रात्माशब्दसे व्यवहार होता है। ईश्वरमें हिरण्यगर्भत्वका व्यवहार गौण है, मुख्य नहीं है। यही कारण है कि चित्रदीपमें ईश्वर और हिरण्यगर्भकी अपेक्षासे सत्यलोकके अधिपति ब्रह्माका—उन उन वादियोंसे अभिमत ईश्वरकी गणनाके अवसरमें—पृथक् उपादान किया गया है।

† प्रकृतमें अर्थात् माण्डूक्यश्रुतिमें। यहाँपर 'आनन्दभुक्' शब्दके अनन्तर 'चेतोमुखः

९८सिद्धान्तलेशसंग्रह[ प्रथम परिच्छेद

सूक्ष्मशरीराभिमानी तैजसः । जागरे व्यष्टिस्थूलशरीराभिमानी विश्वः । तत्र माण्डूक्यश्रुतिरहमनुभवे प्रकाशमानस्याऽऽत्मनो विश्वतैजसप्राज्ञतुर्यावस्थाभेद-

शब्दसे कहा गया है । स्वप्नमें परिच्छिन्न (अल्प) सूक्ष्म शरीरका अभिमानी चैतन्य—तैजस है और जाग्रदवस्थामें परिच्छिन्न स्थूलशरीरका अभिमानी चैतन्य—विश्व है । इस रीतिसे पादकल्पनाके युक्त होनेपर माण्डूक्य उपनिषत्की श्रुतिने 'अहम्' अनुभवमें प्रकाशित होनेवाले आत्माके *


प्राज्ञस्तृतीयः पादः' ऐसा वाक्यशेष कहा गया है, अतः यह ज्ञात होता है, यह भाव है । चेतोमुखशब्दका अर्थ है—चेतांसि सुखानि यस्य सः चेतोमुखः अर्थात् चित्प्रतिविम्बसे युक्त हैं अविद्यावृत्तिरूप सुषुप्तिकालीन आनन्दके अनुभवके साधन जिसके, ऐसा तृतीय पाद प्राज्ञ है । सुषुप्तिकालमें भी सुखका अनुभव होता है, क्योंकि उठनेके बाद 'मैं सुखसे सोया था' यह स्मरण होता है । यदि सुखका अनुभव न होता, तो यह स्मरण कैसे होता, कारण कि अनुभवके विना स्मरण नहीं हो सकता, यह रहस्य है ।

* इस श्रुतिमें पादशब्दका अर्थ है—पद्यते—अवगम्यते ब्रह्मात्मैक्यम्, एभिः इति पादाः अर्थात् जिनके द्वारा ब्रह्म और आत्माका ऐक्य जाना जाता है, वे पादशब्दसे कहे जाते हैं । इसी व्युत्पत्तिका अङ्गीकार करके श्रौतपादकल्पनाका प्रयोजन भी 'पूर्वपूर्वं' इत्यादिग्रन्थसे बतलाया गया है । अभिप्राय यह है कि 'सोयमात्मा चतुष्पात्' इस वाक्यसे जीवके चार पादोंका उपक्रम करके 'जागरितस्थानो वैश्वानरः प्रथमः पादः' इत्यादिसे प्रथम पाद कहा गया है । यहाँपर जीवपादोंका उपक्रम होनेसे 'विश्वः प्रथमः पादः' ऐसा कहना चाहिए, परन्तु वैश्वानरशब्दके वाच्य विराद् पुरुषरूप ईश्वरमें प्रथमपादत्वका कथन विश्वमें वैश्वानरका अन्तर्भाव सूचन करता है । द्वितीयपादके बोधक वाक्यमें 'स्वप्नस्थानस्तैजसो द्वितीयः पादः' ऐसा कहा गया है, यहाँ सूक्ष्म उपाधिकी समानता होनेसे हिरण्यगर्भका तैजसमें अन्तर्भाव होता है, कारण कि 'वैश्वानरः प्रथमः पादः' ऐसा उपक्रम है । 'सुषुप्तस्थान एकीभूत आत्मा' यह तृतीय पादका प्रतिपादक, जो पूर्व वाक्य है, इसमें भी तृतीय पादरूपसे कहे गये प्राज्ञशब्दित आनन्दमयमें सूक्ष्मतर उपाधिकी समानतासे ईश्वरका अन्तर्भाव विवक्षित है । इसलिए 'एष-सर्वेश्वरः' इत्यादि वाक्यशेषके आनन्दमय और ईश्वरकी परस्पर अभेदविवक्षामें प्रवृत्त होनेसे अनुपपत्ति नहीं है । तुरीयपादका प्रतिपादक वाक्य है—'अदृष्टमव्यवहार्यमग्राह्यमलक्षणमचिन्त्यमव्यपदेश्यमेकात्मप्रत्ययसारं प्रपञ्चोपशमं शिवमद्वैतं चतुर्थं मन्यन्ते' ( इन्द्रियोंका अविषय, व्यवहारका अविषय, कर्मेन्द्रियोंका अविषय, असाधारण धर्मोंसे शून्य, शुष्कतर्कसे अगम्य, शब्दशक्तिका अविषय, स्वगतभेदसे रहित, सब देहोंमें व्याप्त, चिद्रूप, आनन्दरूप, प्रपञ्चाभावरूप, शुद्ध और अद्वैत—विश्व, तैजस, और प्राज्ञरूप तीन पादोंकी अपेक्षा—चतुर्थ-पाद है, ऐसा मानते हैं—चिन्तन करते हैं ) इसमें विश्व, तैजस और प्राज्ञलक्षण पादोंमें वैश्वानर, हिरण्यगर्भ और ईश्वरका जो अन्तर्भाव कहा गया है, वह—उनके परस्पर एकत्वका अनुचिन्तन करनेके लिए है । इसी प्रकार विश्व आदि पादोंका और ओंकारके अवयवभूत

जीवेश्वरस्वरूपविचार ] भाषाऽनुवादसहितं ९९


रूपं पादचतुष्टयम् 'सोऽयमात्मा चतुष्पात्' इत्युपक्षिप्य पूर्वपूर्वपादप्रविलापनेन निष्प्रपञ्चब्रह्मात्मकतुर्यपादप्रतिपत्तिसौकर्याय स्थूलसूक्ष्मसूक्ष्मतरोपाधिसा-

'सोऽयमात्मा चतुष्पात्' (यह आत्मा चार पादवाला है) इस प्रकार विश्व, तैजस, प्राज्ञ और तुरीय अवस्था विशेषरूप चार पादोंका उपक्रम करके पूर्व-पूर्व पादोंके तिरोधानसे निष्प्रपञ्च ब्रह्मरूप चतुर्थपादके ज्ञानके सौलभ्यके लिए मात्राओंका एकत्व-चिन्तन यहाँ विवक्षित है । इसमें श्रुति है—'पादा मात्रा मात्राश्च पादाः' (पाद मात्राएँ हैं और मात्राएँ पाद हैं) इसी अर्थका प्रतिपादक गौड़पादका वचन भी है—'ओङ्कारं पादशो विद्यात् पादा मात्रा न संशयः ।' अर्थात् विश्व आदि पाद और मात्राओंके परस्पर एकत्वका अनुचिन्तन करना चाहिए, यह इस वचनका भाव है। मात्रा—अकार, उकार, और मकार। इसी रीतिसे विश्वादिपाद, वैश्वानरादि पाद और मात्राओंका एकत्वचिन्तन उन सबका निष्प्रपञ्च ब्रह्मरूप चतुर्थपादमें प्रविलापनार्थ है। इसमें यह क्रम है—विश्व, वैश्वानर और अकारके एकत्वका पहले चिन्तन करनेके अनन्तर तैजस, हिरण्यगर्भ और उकारके एकत्वका अनुचिन्तन करे, उसके बाद ईश्वर, प्राज्ञ और मकारके एकत्वका अनुचिन्तन करे। इसी चिन्ताके क्रमसे प्रविलापन करे । अकार आदि त्रिकका उकारमें, उकारादि त्रिकका मकारमें और मकार आदि त्रिकका चिन्मात्र तुरीयपादमें प्रविलापन करे। चिन्मात्रमें प्रविलापन करके वहीं चित्तको स्थिर करे। उकार-आदिमें प्रविलापन करना अर्थात् अकार आदि तीन उकारसे पृथक् नहीं है, इस प्रकार आहार्य निश्चय करना। इस प्रकार प्रतिदिन समाधि करनेवालेको ब्रह्मका साक्षात्कार होता है। और ब्रह्मसाक्षात्कारसे—ब्रह्मप्राप्तिसे—कृतकृत्यता होती है।

इसी भावको सुरेश्वराचार्यने वार्तिकमें इस रूपसे कहा है—

'अकारमात्रं विश्वः स्यादुकारस्तैजसः स्मृतः ।
प्राज्ञो मकार इत्येवं परिपश्येत् क्रमेण तु ॥४७॥
समाधिकालात् प्रागेवं विचिन्त्यातिप्रयत्नतः ।
स्थूलसूक्ष्मक्रमात् सर्वं चिदात्मनि विलापयेत् ॥४८॥
अकारं पुरुषं विश्वमुकारे प्रविलापयेत् ।
उकारं तैजसं सूक्ष्मं मकारे प्रविलापयेत् ॥४९॥
मकारं कारणं प्राज्ञं चिदात्मनि विलापयेत् ।
चिदात्माहं नित्यशुद्धबुद्धमुक्तसदद्वयः ॥५०॥
परमानन्दसन्दोहोवासुदेवोऽहमोमिति ।
ज्ञात्वा विवेचकं चित्तं तत्साक्षिणि विलापयेत् ॥५१॥
चिदात्मनि विलीनं चेत्तच्चित्तं नैव चालयेत् ।
पूर्णबोधात्मनाऽऽसीनं पूर्णाचलसमुद्रवत् ॥५२॥
एवं समाहितो योगी श्रद्धाभक्तिसमन्वितः ।
जितेन्द्रियो जितक्रोधः पश्येदात्मानमद्वयम् ॥५३॥'

:१०.० सिद्धान्तलेशसंग्रह [ प्रथम परिच्छेद

म्यात् विराडादीन् विश्वादिष्वन्तर्भाव्य 'जागरितस्थानो बहिःप्रज्ञः' इत्यादिना विश्वादिपादान् न्यरूपयत् । अतः प्राज्ञशब्दिते आनन्दमये अव्याकृतस्येश्वरस्याऽन्तर्भावं विवक्षित्वा तस्य सर्वेश्वरत्वादितद्धर्मवचनमिति । इत्थमेव भगवत्पादैर्गौडपादीयविवरणे व्याख्यातम् ।

मायाच्छन्ने चिदाभासः कूटस्थे व्यावहारिकः ॥
तस्मिन्निद्रावृते तादृक् जीवोऽन्यः प्रातिभासिकः ३८ ॥
जीवस्त्रिधैवं दृग्दृश्यविवेके प्रतिपादितः ॥
इत्येते दर्शिताः पक्षाः प्रतिबिम्बेशवादिनाम् ॥ ३९ ॥

अन्तःकरणावच्छिन्न कूटस्थ चैतन्य पारमार्थिक जीव है, मायावृत कूटस्थमें (मायामें कल्पित अन्तःकरणमें ) जो चित्‌का आभास है, वह व्यावहारिक जीव है और निद्रासे आवृत व्यावहारिक जीवमें कल्पित चिदाभास प्रातिभासिक है, इस प्रकार त्रिविध जीव का दृग्दृश्यविवेकमें प्रतिपादन किया गया है, इस रीतिसे ईश्वरको प्रतिबिम्बरूप माननेवालोंके पक्ष दिखलाये गये हैं ॥३८॥३९॥

स्थूल, सूक्ष्म और सूक्ष्मतर उपाधिकी समानतासे विराड् आदिका विश्व आदिमें अन्तर्भाव करके 'जागरितस्थानो बहिःप्रज्ञः' (जाग्रदवस्थाका अभिमानी बहिःप्रज्ञ है) इत्यादिसे विश्व आदि पादोंका निरूपण किया है। इससे प्राज्ञशब्दसे कहे जानेवाले आनन्दमयमें अव्याकृत * ईश्वरके अन्तर्भावकी विवक्षाकरके उसमें (आनन्दमयमें) सर्वेश्वरत्व आदि ईश्वरके धर्मोंका कथन है। भगवान् शङ्करने गौड़पादीय-विवरणमें भी ऐसा ही व्याख्यान किया है।


* यद्यपि अव्याकृत शब्दका अर्थ है—अनभिव्यक्त जगत्, तथापि लक्षणावृत्तिसे अनेक स्थलोंमें वह ईश्वरार्थक भी प्रसिद्ध है, अतः यहाँ अव्याकृतशब्द ईश्वरके अर्थमें आया है । इस ग्रन्थमें विश्व आदि पादोंका पूर्व-पूर्वमें प्रविलापन करनेसे निष्प्रपञ्च ब्रह्मका ज्ञान अत्यन्त सुलभ कहा गया है । यद्यपि श्रवण आदि अन्य ब्रह्मज्ञानके साधन हैं, तो भी मन्दबुद्धिवाले संन्यासीको अथवा प्रखर-बुद्धिमान् होते हुए भी जिसको न्याय-व्युत्पादक कुशल आचार्य नहीं मिला है, ऐसे संन्यासीको साङ्ख्यमार्ग द्वारा तत्त्वप्रतिपत्ति नहीं हो सकती है, इसलिए उक्त पुरुषोंको अनायास ब्रह्मज्ञानके साधनरूपसे बुद्धिपूर्वक प्रविलापन क्रमसे माण्डूक्य आदि ग्रन्थमें समाधिका विधान है, इसीलिए ध्यानदीपमें विद्यारण्यस्वामीजीने भी कहा है—
'अत्यन्तबुद्धिमान्द्याद्वा सामग्र्या वाप्यसम्भवात् ।
यो विचारं न लभते ब्रह्मोपासीत सोऽनिशम् ॥' ५४ ध्या० दीप ॥

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जीवईश्वरस्वरूपविचार ]भाषानुवादसहित

दृग्दृश्यविवेके तु चित्रदीपव्युत्पादितं कूटस्थं जीवकोटावन्तर्भाव्य चित्रैविध्यप्रक्रियैवाऽऽलम्बितेति विशेषः ।

तत्र ह्युक्तं जलाशयतरङ्गबुद्बुदन्यायेनोपर्युपरि कल्पनाद् जीवः त्रिविधः— पारमार्थिकः, व्यावहारिकः, प्रातिभासिकश्चेति । तत्राऽवच्छिन्नः पारमार्थिकः

विद्यारण्यस्वामीजीने दृग्दृश्यविवेकमें तो—चित्रदीपप्रकरणमें व्युत्पादित कूटस्थका जीवकोटिमें अन्तर्भाव करके—चैतन्यकी त्रिविधप्रक्रियाका ही अवलम्बन किया है, यह विशेष है ।

दृग्दृश्यविवेकमें जलाशयके तरङ्ग और बुद्बुदके दृष्टान्तसे * ऊपर ऊपरकी कल्पनासे जीवके तीन भेद कहे गये हैं—पारमार्थिक, व्यावहारिक और प्रातिभासिक । तीन जीवोंमें से अवच्छिन्न अर्थात् स्थूल और सूक्ष्म दो शरीरोंसे अवच्छिन्न कूटस्थ आत्मा—पारमार्थिक जीव है । उस अवच्छिन्न जीवमें


अर्थात् बुद्धिकी मन्दतासे अथवा सामग्रीके अभावसे जो विचार नहीं कर सकता, वह प्रतिदिन ब्रह्मकी उपासना करे, यह भाव है । अतः मूलमें भी 'प्रतिपत्तिसौकर्याय' यही कहा गया है यह ध्यान रखना चाहिए ।

* जलाशय, तरङ्ग और बुद्बुदके दृष्टान्तका सारांश यह है—जैसे समुद्र आदि जलाशयमें तरङ्ग ऊपर रहती हैं और उनके ऊपर बुद्बुद रहते हैं, यह प्रसिद्ध है, इसी प्रकार कूटस्थके ऊपर व्यावहारिक अन्तःकरणमें प्रतिबिम्बरूप सम्पूर्ण व्यवहारकालमें अनुगत व्यावहारिक जीवकी कल्पना की जाती है और उसके ऊपर स्वप्नकालमें वासनामय प्रातिभासिक रथ आदिके समान वासनामय अन्तःकरणमें प्रतिबिम्बरूप प्रातिभासिक जीवकी कल्पना की जाती है । इस विषयमें दृग्दृश्यविवेकके निम्न लिखित श्लोक हैं, जिनका भाव भी मूल ग्रन्थके अनुसार ही है—

'अवच्छिन्नः चिदाभासस्तृतीयः स्वप्नकल्पितः ।
विज्ञेयस्त्रिविधो जीवस्तत्राद्यः पारमार्थिकः ॥३२॥
अवच्छेदः कल्पितः स्यात् अवच्छेद्यन्तु वास्तवम् ।
तस्मिन् जीवत्वमारोपात् ब्रह्मत्वन्तु स्वभावतः ॥३३॥
अवच्छिन्नस्य जीवस्य पूर्णेन ब्रह्मणैकताम् ।
तत्त्वमस्यादिवाक्यानि जगुर्नितरजीवयोः ॥३४॥
ब्रह्मण्यवस्थिता माया विक्षेपशक्तिरूपिणी ।
आवृत्याखण्डतां तस्मिन् जगज्जीवौ प्रकल्पयेत् ॥३५॥
जीवो धीस्थचिदाभासो जगत् स्यात् भूतभौतिकम् ।
अनादिकालमारभ्य मोक्षात् पूर्वमिदं द्वयम् ॥३६॥'

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१०२सिद्धान्तलेशसंग्रह[ प्रथम परिच्छेद

जीवः । तस्मिन्नवच्छेदकस्य कल्पितत्वेऽपि अवच्छेद्यस्य तस्याऽकल्पितत्वेन ब्रह्मणोऽभिन्नत्वात् । तमावृत्य स्थितायां मायायां कल्पितेऽन्तःकरणे चिदाभासोऽन्तःकरणतादात्म्यापत्त्या 'अहम्' इत्यभिमन्यमानो व्यावहारिकः, तस्य मायिकत्वेऽपि यावद्व्यवहारमनुवृत्तेः । स्वप्ने तमप्यावृत्य स्थितया मायावस्थाभेदरूपया निद्रया कल्पिते स्वप्नदेहादावहमभिमानी प्रातिभासिकः । स्वप्नप्रपञ्चेन सह तद्द्रष्टुर्जीवस्यापि प्रबोधे निवृत्तेरिति । एवमेते प्रतिबिम्बेश्वरवादिनां पक्षभेदा दर्शिताः ।

अविद्यायां चिदाभासो जीवो बिम्बचिदीश्वरः ।
स्वातन्त्र्याद्युपपत्तेरित्याहुर्विवरणानुगाः ॥ ४० ॥

विवरणके अनुसारियोंका कहना है कि अविद्यामें चैतन्य का आभास जीव है और बिम्बस्थानापन्न चैतन्य ईश्वर है, क्योंकि उसमें स्वातन्त्र्य आदिकी उपपत्ति है ॥४०॥

विशेषणीभूत स्थूल और सूक्ष्म शरीरोंके कल्पित होनेपर भी विशेष्यभूत चैतन्यके स्वतः सत्य होनेसे उसका (जीवका) ब्रह्मके साथ अभेद हो सकता है । कूटस्थ आत्माको आवृत करके अविद्याके स्थित होनेपर कूटस्थ आत्मामें कल्पित अन्तःकरणमें—अन्तःकरणके तादात्म्यसे 'अहम्' (मैं) इस प्रकारका अभिमान करनेवाला—चिदाभास व्यावहारिक जीव है। यद्यपि वह मायिक है, तो भी व्यवहारपर्यन्त उसकी अनुवृत्ति होती है। [ कोई लोग शङ्का करते हैं कि व्यावहारिक जीव है ही नहीं, परन्तु यह शङ्का युक्त नहीं है, क्योंकि 'अहं कर्ता भोक्ता' इत्यादि अनुभवसे वह सिद्ध है। कर्तृत्व, भोक्तृत्व आदि धर्म जीवसे अन्यत्र—अन्तःकरणमें नहीं रह सकते, क्योंकि चिदाभासशून्य अन्तःकरणमें चेतनधर्मत्वसे प्रसिद्ध कर्तृत्व आदि नहीं रह सकते । पारमार्थिक जीव भी कर्तृत्वका आश्रय नहीं है, क्योंकि वह कूटस्थ है, यह भाव है ] स्वप्नावस्थामें व्यावहारिक जीवका भी आवरण करके स्थित मायावस्थाविशेष निद्रासे कल्पित स्वप्नके शरीर आदिमें 'अहम्' अभिमान करनेवाला जीव प्रातिभासिक है, क्योंकि जागरणावस्थामें स्वप्नप्रपञ्चके साथ ही साथ स्वप्नद्रष्टा जीवकी भी निवृत्ति होती है । इस प्रकार प्रतिबिम्बको ईश्वर कहनेवालोंके पक्षोंका दिग्दर्शन कराया गया है ।

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जीवेश्वरस्वरूपविचार ] भाषानुवादसहित १०३


विवरणानुसारिणस्त्वाहुः— ‘विभेदजनकेऽज्ञाने नाशमात्यन्तिकं गते ।
आत्मनो ब्रह्मणो भेदमसन्तं कः करिष्यति ॥’
इति स्मृत्यैकस्यैवाऽज्ञानस्य जीवेश्वरविभागोपाधित्वप्रतिपादनात् बिम्बप्रतिबिम्बभावेन जीवेश्वरयोर्विभागः, नोभयोरपि प्रतिबिम्बभावेन ।

विवरणके अनुयायी कहते हैं कि विभेदजनक अज्ञानका—जीव और ईश्वरके अवस्थानमें हेतुभूत अज्ञानका—आत्यन्तिक नाश * होनेपर जीवात्माका और परमात्माका (ब्रह्मका) असत्—अनिर्वचनीय भेद कौन करेगा अर्थात् कोई नहीं करेगा। इस प्रकारकी स्मृतिसे एक ही अज्ञान जीव और ईश्वरकी उपाधि कहा गया है, अतएव बिम्ब और प्रतिबिम्बरूपसे जीव और ईश्वरका विभाग है † । इन दोनोंका प्रतिबिम्बरूपसे विभाग नहीं है, क्योंकि दो


* आत्यन्तिकनाश—समूल अज्ञानका विनाश । यद्यपि अज्ञानका सुषुप्ति या प्रलयमें कार्य-कारणका अभेद होनेसे कार्यका नाश होनेसे कार्यात्मना अज्ञानका विनाश है, परन्तु वह आत्यन्तिक विनाश नहीं है, क्योंकि स्वरूपतः उसकी स्थिति है, अन्यथा पुनरुत्थानकी अनुपपत्ति होगी । तत्त्वज्ञानसे होनेवाला अज्ञाननाश स्वरूपसे ही होता है, अतः वह आत्यन्तिक विनाश है, इसी अभिप्रायसे अज्ञाननाशमें आत्यन्तिक विशेषण दिया गया है । अथवा जीवन्मुक्तिम आवरण अंशका नाश होनेपर भी अज्ञानके विक्षेपांशके रहनेसे आत्यन्तिक नाश नहीं है, परन्तु विदेहमुक्तिमें ही है, इसी अभिप्रायसे आत्यन्तिक विशेषण दिया गया है, यह भी कुछ लोग कहते हैं ।

† यहाँ शङ्का होती है कि ‘विभेदजनकेऽज्ञाने०’ इस श्रुतिके अनुसार ईशको बिम्ब और जीवको प्रतिबिम्ब माननेमें दोनोंको प्रतिबिम्ब माननेवाली ‘जीवेशावाभा०’ इस श्रुतिके साथ विरोध होगा । इसपर विवरणानुयायी कहते हैं कि प्रतिबिम्बत्वके समान बिम्बत्वके भी फलित होनेसे आभासशब्दसे बिम्ब और प्रतिबिम्ब दोनोंका ग्रहण हो सकता है, अतः विरोध नहीं है । यदि शङ्का की जाय कि प्रतिबिम्बत्वसे युक्त मुख आदिमें ही आभासशब्दका व्यवहार होता है, बिम्बत्वविशिष्ट मुखमें आभास-शब्दका व्यवहार नहीं होता, अतः आभासशब्दका मुख्य अर्थ बिम्ब नहीं हो सकता, इसलिए आभासशब्दकी बिम्बमें लक्षणा माननी पड़ेगी, तो यह शङ्का नहीं हो सकती, क्योंकि एक बार उच्चरित आभासशब्दका मुख्यवृत्तिसे प्रतिबिम्ब अर्थ और गौणीवृत्तिसे बिम्ब अर्थ नहीं हो सकता । यदि कहिये कि अजहल्लक्षणा मानकर आभासशब्दके दोनों अर्थ मानेंगे, सो भी युक्त नहीं है, क्योंकि जब दोनोंको अर्थात् जीव और ईश्वरको प्रतिबिम्ब मानकर ही विभाग हो सकता है तब फिर, लक्षणाके झगड़ेमें पड़नेकी आवश्यकता ही क्या है ? इसपर विवरणानुसार उत्तर है कि श्रुतिके अनुसार भी जीव और ईश्वरका विभाग केवल प्रतिबिम्बरूपसे नहीं हो सकता, सूर्यके समान

१०४सिद्धान्तलेशसंग्रह[ प्रथम परिच्छेद

उपाधिद्वयमन्तरेणोभयोः प्रतिबिम्बत्वायोगात् । तत्राऽपि प्रतिबिम्बो जीवः । बिम्बस्थानीय ईश्वरः । तथा सत्येव लौकिकबिम्बप्रतिबिम्बदृष्टान्तेन स्वातन्त्र्यमीश्वरस्य, तत्पारतन्त्र्यं जीवस्य च युज्यते ।

'प्रतिबिम्बगताः पश्यन्नृजुवक्रादिविक्रियाः ।
पुमान् क्रीडेद्यथा ब्रह्म तथा जीवस्थविक्रियाः ॥'

इति कल्पतरूक्तरीत्या 'लोकवत्तु लीलाकैवल्यम्' ( उ० मी० अ० २ पा० १ सू० ३३ ) इति सूत्रमपि सङ्गच्छते । अज्ञानप्रतिबिम्बितस्य जीव-


उपाधियोंके बिना दो प्रतिबिम्ब हो ही नहीं सकते । उनमें भी ( बिम्ब और प्रतिबिम्ब दोनोंमें भी ) प्रतिबिम्बस्थानापन्न जीव है और बिम्बस्थानीय ईश्वर है । बिम्बचैतन्यके ईश्वर होनेसे ही लौकिक बिम्ब और प्रतिबिम्बके दृष्टान्तसे ईश्वरमें स्वातन्त्र्य और जीवमें ईश्वरका पारतन्त्र्य संगत होता है ‡ ।

'प्रतिबिम्बगताः०' (जैसे लोकमें कोई पुरुष दर्पणमें पड़े हुए अपने प्रतिबिम्बके ऋजु और वक्र आदि भावोंको बिम्बरूप अपनेसे हुए देखकर खेलता है, वैसे ही ब्रह्म भी जीवस्थ प्राणियोंके कर्मानुसार स्वप्रयुक्त भावोंको देखकर खेलता है ) इस प्रकार कल्पतरुमें कही गई रीतिसे * 'लोकवत्तु लीलाकैवल्यम्' यह सूत्र भी सङ्गत होता है । जैसे सर्वत्र व्याप्त सूर्यके किरणोंका


  • बिम्बभूत चैतन्यके एक होनेसे उपाधिकी भिन्नताके बिना प्रतिबिम्बका भेद नहीं हो सकता । माया और अविद्या दो उपाधियां हैं, यह भी नहीं कह सकते, क्योंकि मूलप्रकृतिके मायात्व और अविद्यात्वके लक्षणभेदसे भिन्न होनेपर भी प्रतिबिम्बद्वयसे अपेक्षित दो उपाधियोंका कहींपर प्रतिपादन नहीं किया गया है और मायाका स्वरूपतः भेद भी सिद्धान्तविरुद्ध है, अतः आभासशब्द लक्षणावृत्तिसे बिम्ब प्रतिबिम्ब उभयपरक ही है ।

‡ 'एष सर्वेश्वरः' इत्यादि श्रुतिसे ईश्वरमें स्वातन्त्र्य सिद्ध है और 'एष ह्येव साधु कर्म कारयति' इत्यादि श्रुतिसे जीवमें पारतन्त्र्य सिद्ध है ।

* 'लोकवत्तु लीलाकैवल्यम्'—किसी प्रकारके प्रयोजनके बिना सृष्टि आदिमें प्रवृत्ति रूप ईश्वरकी जो क्रिया है, वह केवल लीला ही है, जैसे लोकमें सब साधनोंसे सम्पन्न पुरुषकी क्रीड़ा किसी प्रयोजनविशेषके लिए नहीं होती, वैसे ही आप्तकाम ईश्वरकी भी प्रयोजनके बिना स्वभावतः ही सृष्टिमें प्रवृत्ति उपपन्न है । लोकमें अत्यन्त सुखका उद्रेक होनेसे हँसना, गाना आदि प्रयोजनके बिना ही होने लगता है और दुःखके उद्रेकसे रोना आदि स्वभावतः हुआ करता है, अतः हँसने या रोनेमें लोकमें कारण पूछा जाता है, परन्तु प्रयोजन नहीं पूछा जाता, यह 'लोकवत्तु' इत्यादि सूत्रका भाव है ।


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जीवेश्वरस्वरूपविचार ] भाषानुवादसहित १०५


स्याऽन्तःकरणरूपोऽज्ञानपरिणामभेदो विशेषाभिव्यक्तिस्थानं सर्वतः प्रसृतस्य सवितृप्रकाशस्य दर्पण इव। अतस्तस्य तदुपाधिकत्वव्यवहारोऽपि। नैतावताऽज्ञानोपाधिपरित्यागः, अन्तःकरणोपाधिपरिच्छिन्नस्यैव चैतन्यस्य जीवत्वे योगिनः कायव्यूहाधिष्ठानत्वानुपपत्तेः।

न च योगप्रभावाद्योगिनोऽन्तःकरणं कायव्यूहाभिव्यक्तियोग्यं वैपुल्यं प्राप्नोतीति तदवच्छिन्नस्य कायव्यूहाधिष्ठानत्वं युज्यते इति वाच्यम्, 'प्रदीपवदावेशस्तथा हि दर्शयति' (उ० मी० अ० ४ पा० ४ सू० १५) इति


अभिव्यक्तिस्थान दर्पण है, वैसे ही अज्ञानमें प्रतिबिम्बित जीवका विशेष अभिव्यक्ति-स्थान अज्ञानका परिणामरूप अन्तःकरण है। भाव यह है कि अविद्यामें प्रतिबिम्बित सुषुप्तिसाधारण चैतन्यरूपकी प्रमातृत्व, कर्तृत्व आदि विशेषरूपसे अभिव्यक्ति—उपलब्धिका स्थान (उपाधि) अन्तःकरण है। कर्तृत्व आदि धर्मोंके केवल अज्ञानके परिणाम न होनेसे उनकी उपाधिमात्रतासे जीवमें कर्तृत्व आदिका लाभ नहीं हो सकता, किन्तु कर्तृत्व आदि धर्मवाले अन्तःकरणके तादात्म्यके अध्याससे ही जीवमें कर्तृत्व आदिका लाभ हो सकता है, अतः अन्तःकरणमें जीवकी उपाधिकताका वर्णन किया गया है। अन्तःकरण विशेष उपलब्धिका स्थान है, ऐसा स्वीकार करनेसे जीवमें अन्तःकरणोपाधिकताका व्यवहार भी है, अर्थात् 'कार्योपाधिरयं जीवः' इत्यादि श्रुतिमें और भाष्यमें, यह रहस्य है। श्रुतिमें कार्योपाधिकताके विशेषणमात्रसे अज्ञानोपाधिकताके निराकरणका परित्याग नहीं है, क्योंकि अन्तःकरणरूप उपाधिसे परिच्छिन्न चैतन्यको जीव माननेपर योगियोंमें एककालीन अनेक शरीरोंकी नियन्तृताकी उपपत्ति नहीं होगी।

योगके प्रभावसे योगीका अन्तःकरण कायव्यूहमें—देहसमूहमें—अभिव्यक्तिके योग्य व्यापकता प्राप्त करता है, अतः उस अन्तःकरणसे अवच्छिन्न चिदात्मा भी कायव्यूहका प्रेरक हो सकता है ? ऐसी शङ्का नहीं करनी चाहिए, क्योंकि 'प्रदीपवदावेशस्तथा हि दर्शयति' * इस शास्त्रोपान्त्याधिकरणके अर्थात्


* प्रदीपवदावेशस्तथा हि दर्शयति' इस सूत्रका अर्थ इस प्रकार है—जैसे एक ही प्रदीपका अनेक बत्तियोंमें प्रवेश है, वैसे ही एक ही योगीका योगके प्रभावसे अनेक शरीरोंमें आवेश—प्रवेश होता है। यद्यपि पूर्व दीपका और बत्तियोंमें प्रविष्ट अन्य दीपोंका परस्पर

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१०६सिद्धान्तलेशसंग्रह[ प्रथम परिच्छेद

शास्त्रोपान्त्याधिकरणभाष्यादिषु कायव्यूहे प्रतिदेहमन्तःकरणस्य चक्षुरादिवत् भिन्नस्यैव योगप्रभावात् सृष्टेरुपवर्णनात् । प्रतिबिम्बे बिम्बात् भेदमात्रस्याऽध्यस्तत्वेन स्वरूपेण तस्य सत्यत्वान्न प्रतिबिम्बरूपजीवस्य मुक्त्यन्वयासम्भव

ब्रह्ममीमांसाशास्त्रके अन्तिम अधिकरणके पहले अधिकरणके भाष्य आदिमें कायव्यूहमें योगके प्रभावसे प्रत्येक शरीरमें चक्षु आदिके समान पृथक्-पृथक् अन्तःकरणकी उत्पत्तिका वर्णन किया गया है † । प्रतिबिम्बमें बिम्बसे जो भेद है * वही कल्पित है, इससे स्वरूपतः उसके सत्य होनेसे


भेद है और योगीका सब देहोंमें अभेद ही है इस प्रकार दृष्टान्त और दाष्ट्रान्तमें वैषम्य है, तथापि दीपत्वजातिके अभेदका व्यक्तियोंमें आरोप करके दृष्टान्त और दार्ष्टान्तिककी उपपत्ति करनी चाहिए । एक योगीकी अनेकताको श्रुति भी दिखलाती है—'स एकधा भवति त्रिधा भवति पञ्चधा सप्तधा' ( वह योगी एक प्रकारका, तीन प्रकारका, पांच प्रकारका और सात प्रकारका अर्थात् अनेक प्रकारका हो सकता है )। एक ही समयमें अनेक शरीरोंमें योगीके अवस्थानके बिना अनेकत्व उपपन्न नहीं हो सकता ।

† यदि एक ही अन्तःकरणकी कार्यव्यूहमें अभिव्यक्तिके योग्य विपुलता मान ली जाय, तो उक्त भाष्यके साथ अवश्य विरोध होगा । यद्यपि भाष्य आदिका यह तात्पर्य कहना उचित है कि योगीका पूर्वसिद्ध अन्तःकरण ही—योगके प्रभावसे विपुलता प्राप्त कर स्वावच्छिन्न चैतन्यरूप योगीके कायव्यूहमें—भोग आदि कराता है । योगप्रभावसे अनेक अन्तःकरण उत्पन्न होते हैं, ऐसा तात्पर्य मानना ठीक नहीं है, क्योंकि अनेकविध अन्तःकरणोंकी सृष्टि माननेमें कल्पनागौरव और असत्कार्यवादका प्रसङ्ग आता है और हिरण्यगर्भ आदिका ब्रह्माण्डव्यापी जो समष्टि अन्तःकरण है, वह भी योगप्रभावसे ही है, भाष्यमें जो अन्तःकरणकी सृष्टिका प्रतिपादन है, वह परकीय मतके अभिप्रायसे है, ऐसा समझना चाहिए, क्योंकि 'एपैव च योगशास्त्रेषु' इत्यादि भाष्यमें यह अर्थ स्पष्ट है, तथापि शास्त्रोपान्त्याधिकरणके यथाश्रुत भाष्यके अभिप्रायसे यह दूषण दिया गया है, ऐसा समझना चाहिए ।

* इस ग्रन्थसे—चित्रदीपमें जो प्रतिबिम्ब चैतन्यरूप जीवके स्वरूपतः मिथ्या होनेसे त्रिकालावाधित ब्रह्मके साथ उस जीवकी एकता नहीं हो सकती, इसलिए चैतन्यके चार भेद करके ऐक्यनिर्वाहके लिए जीव और ईश्वरसे विलक्षण कूटस्थ चैतन्य माना गया है, और दृग्दृश्यविवेकमें प्रतिबिम्बको मिथ्या मानकर युक्तिसे अन्वयके लिए जो पारमार्थिक जीवकी कल्पनाकी गई है—उसका परिहार किया जाता है । अर्थात् प्रमाणके न होनेसे प्रतिबिम्ब जीवसे अतिरिक्त अन्य जीव—कूटस्थ या व्यावहारिक जीवसे अन्य प्रातिभासिक जीव नहीं है, यह भाव है, कुछ लोग शङ्का करते हैं कि व्यावहारिक जीव स्वप्नकालमें आवृत्त रहता है, अतः स्वप्नसमयके व्यवहारकी अनुपपत्ति ही प्रातिभासिक जीवकी कल्पना करती है । नहीं अनुपपत्ति

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