सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)
Siddhanta Lesha Sangraha Hindi
श्रीमदप्पय्य दीक्षित द्वारा
स्रोत: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (उद्गम)
पृष्ठ 129, कुल 590 में से
संदर्भ में पढ़ेंजीवेश्वरस्वरूपविचार ] भाषाऽनुवादसहितं ९९
रूपं पादचतुष्टयम् 'सोऽयमात्मा चतुष्पात्' इत्युपक्षिप्य पूर्वपूर्वपादप्रविलापनेन निष्प्रपञ्चब्रह्मात्मकतुर्यपादप्रतिपत्तिसौकर्याय स्थूलसूक्ष्मसूक्ष्मतरोपाधिसा-
'सोऽयमात्मा चतुष्पात्' (यह आत्मा चार पादवाला है) इस प्रकार विश्व, तैजस, प्राज्ञ और तुरीय अवस्था विशेषरूप चार पादोंका उपक्रम करके पूर्व-पूर्व पादोंके तिरोधानसे निष्प्रपञ्च ब्रह्मरूप चतुर्थपादके ज्ञानके सौलभ्यके लिए मात्राओंका एकत्व-चिन्तन यहाँ विवक्षित है । इसमें श्रुति है—'पादा मात्रा मात्राश्च पादाः' (पाद मात्राएँ हैं और मात्राएँ पाद हैं) इसी अर्थका प्रतिपादक गौड़पादका वचन भी है—'ओङ्कारं पादशो विद्यात् पादा मात्रा न संशयः ।' अर्थात् विश्व आदि पाद और मात्राओंके परस्पर एकत्वका अनुचिन्तन करना चाहिए, यह इस वचनका भाव है। मात्रा—अकार, उकार, और मकार। इसी रीतिसे विश्वादिपाद, वैश्वानरादि पाद और मात्राओंका एकत्वचिन्तन उन सबका निष्प्रपञ्च ब्रह्मरूप चतुर्थपादमें प्रविलापनार्थ है। इसमें यह क्रम है—विश्व, वैश्वानर और अकारके एकत्वका पहले चिन्तन करनेके अनन्तर तैजस, हिरण्यगर्भ और उकारके एकत्वका अनुचिन्तन करे, उसके बाद ईश्वर, प्राज्ञ और मकारके एकत्वका अनुचिन्तन करे। इसी चिन्ताके क्रमसे प्रविलापन करे । अकार आदि त्रिकका उकारमें, उकारादि त्रिकका मकारमें और मकार आदि त्रिकका चिन्मात्र तुरीयपादमें प्रविलापन करे। चिन्मात्रमें प्रविलापन करके वहीं चित्तको स्थिर करे। उकार-आदिमें प्रविलापन करना अर्थात् अकार आदि तीन उकारसे पृथक् नहीं है, इस प्रकार आहार्य निश्चय करना। इस प्रकार प्रतिदिन समाधि करनेवालेको ब्रह्मका साक्षात्कार होता है। और ब्रह्मसाक्षात्कारसे—ब्रह्मप्राप्तिसे—कृतकृत्यता होती है।
इसी भावको सुरेश्वराचार्यने वार्तिकमें इस रूपसे कहा है—
'अकारमात्रं विश्वः स्यादुकारस्तैजसः स्मृतः ।
प्राज्ञो मकार इत्येवं परिपश्येत् क्रमेण तु ॥४७॥
समाधिकालात् प्रागेवं विचिन्त्यातिप्रयत्नतः ।
स्थूलसूक्ष्मक्रमात् सर्वं चिदात्मनि विलापयेत् ॥४८॥
अकारं पुरुषं विश्वमुकारे प्रविलापयेत् ।
उकारं तैजसं सूक्ष्मं मकारे प्रविलापयेत् ॥४९॥
मकारं कारणं प्राज्ञं चिदात्मनि विलापयेत् ।
चिदात्माहं नित्यशुद्धबुद्धमुक्तसदद्वयः ॥५०॥
परमानन्दसन्दोहोवासुदेवोऽहमोमिति ।
ज्ञात्वा विवेचकं चित्तं तत्साक्षिणि विलापयेत् ॥५१॥
चिदात्मनि विलीनं चेत्तच्चित्तं नैव चालयेत् ।
पूर्णबोधात्मनाऽऽसीनं पूर्णाचलसमुद्रवत् ॥५२॥
एवं समाहितो योगी श्रद्धाभक्तिसमन्वितः ।
जितेन्द्रियो जितक्रोधः पश्येदात्मानमद्वयम् ॥५३॥'