सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)
Siddhanta Lesha Sangraha Hindi
श्रीमदप्पय्य दीक्षित द्वारा
स्रोत: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (उद्गम)
पृष्ठ 128, कुल 590 में से
संदर्भ में पढ़ें| ९८ | सिद्धान्तलेशसंग्रह | [ प्रथम परिच्छेद |
|---|
सूक्ष्मशरीराभिमानी तैजसः । जागरे व्यष्टिस्थूलशरीराभिमानी विश्वः । तत्र माण्डूक्यश्रुतिरहमनुभवे प्रकाशमानस्याऽऽत्मनो विश्वतैजसप्राज्ञतुर्यावस्थाभेद-
शब्दसे कहा गया है । स्वप्नमें परिच्छिन्न (अल्प) सूक्ष्म शरीरका अभिमानी चैतन्य—तैजस है और जाग्रदवस्थामें परिच्छिन्न स्थूलशरीरका अभिमानी चैतन्य—विश्व है । इस रीतिसे पादकल्पनाके युक्त होनेपर माण्डूक्य उपनिषत्की श्रुतिने 'अहम्' अनुभवमें प्रकाशित होनेवाले आत्माके *
प्राज्ञस्तृतीयः पादः' ऐसा वाक्यशेष कहा गया है, अतः यह ज्ञात होता है, यह भाव है । चेतोमुखशब्दका अर्थ है—चेतांसि सुखानि यस्य सः चेतोमुखः अर्थात् चित्प्रतिविम्बसे युक्त हैं अविद्यावृत्तिरूप सुषुप्तिकालीन आनन्दके अनुभवके साधन जिसके, ऐसा तृतीय पाद प्राज्ञ है । सुषुप्तिकालमें भी सुखका अनुभव होता है, क्योंकि उठनेके बाद 'मैं सुखसे सोया था' यह स्मरण होता है । यदि सुखका अनुभव न होता, तो यह स्मरण कैसे होता, कारण कि अनुभवके विना स्मरण नहीं हो सकता, यह रहस्य है ।
* इस श्रुतिमें पादशब्दका अर्थ है—पद्यते—अवगम्यते ब्रह्मात्मैक्यम्, एभिः इति पादाः अर्थात् जिनके द्वारा ब्रह्म और आत्माका ऐक्य जाना जाता है, वे पादशब्दसे कहे जाते हैं । इसी व्युत्पत्तिका अङ्गीकार करके श्रौतपादकल्पनाका प्रयोजन भी 'पूर्वपूर्वं' इत्यादिग्रन्थसे बतलाया गया है । अभिप्राय यह है कि 'सोयमात्मा चतुष्पात्' इस वाक्यसे जीवके चार पादोंका उपक्रम करके 'जागरितस्थानो वैश्वानरः प्रथमः पादः' इत्यादिसे प्रथम पाद कहा गया है । यहाँपर जीवपादोंका उपक्रम होनेसे 'विश्वः प्रथमः पादः' ऐसा कहना चाहिए, परन्तु वैश्वानरशब्दके वाच्य विराद् पुरुषरूप ईश्वरमें प्रथमपादत्वका कथन विश्वमें वैश्वानरका अन्तर्भाव सूचन करता है । द्वितीयपादके बोधक वाक्यमें 'स्वप्नस्थानस्तैजसो द्वितीयः पादः' ऐसा कहा गया है, यहाँ सूक्ष्म उपाधिकी समानता होनेसे हिरण्यगर्भका तैजसमें अन्तर्भाव होता है, कारण कि 'वैश्वानरः प्रथमः पादः' ऐसा उपक्रम है । 'सुषुप्तस्थान एकीभूत आत्मा' यह तृतीय पादका प्रतिपादक, जो पूर्व वाक्य है, इसमें भी तृतीय पादरूपसे कहे गये प्राज्ञशब्दित आनन्दमयमें सूक्ष्मतर उपाधिकी समानतासे ईश्वरका अन्तर्भाव विवक्षित है । इसलिए 'एष-सर्वेश्वरः' इत्यादि वाक्यशेषके आनन्दमय और ईश्वरकी परस्पर अभेदविवक्षामें प्रवृत्त होनेसे अनुपपत्ति नहीं है । तुरीयपादका प्रतिपादक वाक्य है—'अदृष्टमव्यवहार्यमग्राह्यमलक्षणमचिन्त्यमव्यपदेश्यमेकात्मप्रत्ययसारं प्रपञ्चोपशमं शिवमद्वैतं चतुर्थं मन्यन्ते' ( इन्द्रियोंका अविषय, व्यवहारका अविषय, कर्मेन्द्रियोंका अविषय, असाधारण धर्मोंसे शून्य, शुष्कतर्कसे अगम्य, शब्दशक्तिका अविषय, स्वगतभेदसे रहित, सब देहोंमें व्याप्त, चिद्रूप, आनन्दरूप, प्रपञ्चाभावरूप, शुद्ध और अद्वैत—विश्व, तैजस, और प्राज्ञरूप तीन पादोंकी अपेक्षा—चतुर्थ-पाद है, ऐसा मानते हैं—चिन्तन करते हैं ) इसमें विश्व, तैजस और प्राज्ञलक्षण पादोंमें वैश्वानर, हिरण्यगर्भ और ईश्वरका जो अन्तर्भाव कहा गया है, वह—उनके परस्पर एकत्वका अनुचिन्तन करनेके लिए है । इसी प्रकार विश्व आदि पादोंका और ओंकारके अवयवभूत