भारतकोश
सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

Siddhanta Lesha Sangraha Hindi

श्रीमदप्पय्य दीक्षित द्वारा

स्रोत: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (उद्गम)

DevanagariHindipublished590 पृष्ठ

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पृष्ठ 127

जीवेश्वरस्वरूपविचार ] भाषानुवादसहित ९७

मायोपहित ईश्वरः, अपञ्चीकृतभूतकार्यसमष्टिसूक्ष्मशरीरोपहितो हिरण्यगर्भः, पञ्चीकृतभूतकार्यसमष्टिस्थूलशरीरोपहितो विराट् पुरुष इत्यवस्थाचतुष्टयमेकस्यैव परमात्मनः। अस्मिंश्च चित्रपटस्थानीये परमात्मनि चित्रस्थानीयः स्थावरजङ्गमात्मको निखिलः प्रपञ्चः। यथा चित्रगतमनुष्याणां चित्राधारवस्त्रसदृशा वस्त्राभासा लिख्यन्ते, तथा परमात्माध्यस्तदेहिनामधिष्ठानचैतन्यसदृशाश्चिदाभासाः कल्प्यन्ते। ते च जीवनामानः संसरन्तीति। अध्यात्मं तु विश्वतैजसप्राज्ञभेदेन त्रीणि रूपाणि। तत्र सुषुप्तौ विलीने अन्तःकरणे अज्ञानमात्रसाक्षी प्राज्ञः, योऽयमिहानन्दमय उक्तः। स्वप्ने व्यष्टि-


एक ही चित्रित पटकी चार अवस्थाएँ होती हैं, वैसे ही माया और उसके कार्यरूप उपाधिसे रहित परमात्मा शुद्ध कहा जाता है, माया उपाधिसे युक्त ईश्वर, अपञ्चीकृत भूतोंके कार्यभूत समष्टि (समूह) सूक्ष्म शरीरसे उपहित * हिरण्यगर्भ और पञ्चीकृत भूतोंके कार्यभूत समष्टि स्थूल शरीरसे उपहित विराट् पुरुष कहलाता है। इस प्रकार एक ही परमात्माकी चार अवस्थाएँ हैं। इस परिस्थितिमें चित्रपटस्थानीय परमात्मामें चित्रस्थानापन्न सम्पूर्ण स्थावर और जङ्गम रूप प्रपञ्च है। जैसे—चित्रमें चित्रित मनुष्योंके चित्रके आधारभूत वस्त्रके सदृश वस्त्रोंके आभास लिखे जाते हैं, वैसे ही परमात्मामें अध्यस्त स्थूल देहके अभिमानी अहङ्कारोंके अधिष्ठानभूत—आधारभूत—चैतन्यसदृश चिदाभासोंकी कल्पना की जाती है, और वे जीव-नामधारी होकर संसारके भागी होते हैं। जीवात्मक चैतन्यके विश्व, तैजस और प्राज्ञ भेदसे तीन रूप होते हैं। उनमेंसे सुषुप्ति अवस्थामें अन्तःकरणके तिरोहित होनेपर अज्ञानमात्रका साक्षी चैतन्य—प्राज्ञ है, जो कि प्रकृतमें † आनन्दमय-


* यह शङ्का होती है कि हिरण्यगर्भ कहलानेवाला जो सूत्रात्मा है, उसीमें श्रुति और स्मृतियोंमें जीवत्वकी प्रसिद्धि है, अतः उसे ईश्वर मानना प्रमाणविरुद्ध है, परन्तु यह शङ्का युक्त नहीं है, क्योंकि समष्टि सूक्ष्म शरीरके अभिमानसे विशिष्ट सत्यलोकका स्वामी जीवरूप हिरण्यगर्भ ईश्वरसे अन्य है, ऐसा स्वीकार किया गया है। ईश्वरमें यद्यपि समष्टि सूक्ष्म शरीरका अभिमान नहीं है, तो भी समष्टिसूक्ष्मशरीरोंका नियन्ता होनेसे समष्टि सूक्ष्म उपाधिसे उपहितत्व गुणके योगसे ईश्वरका हिरण्यगर्भ और सूत्रात्माशब्दसे व्यवहार होता है। ईश्वरमें हिरण्यगर्भत्वका व्यवहार गौण है, मुख्य नहीं है। यही कारण है कि चित्रदीपमें ईश्वर और हिरण्यगर्भकी अपेक्षासे सत्यलोकके अधिपति ब्रह्माका—उन उन वादियोंसे अभिमत ईश्वरकी गणनाके अवसरमें—पृथक् उपादान किया गया है।

† प्रकृतमें अर्थात् माण्डूक्यश्रुतिमें। यहाँपर 'आनन्दभुक्' शब्दके अनन्तर 'चेतोमुखः