भारतकोश
सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

Siddhanta Lesha Sangraha Hindi

श्रीमदप्पय्य दीक्षित द्वारा

स्रोत: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (उद्गम)

DevanagariHindipublished590 पृष्ठ

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पृष्ठ 126
९६सिद्धान्तलेशसंग्रह[ प्रथम परिच्छेद

यदा हि जाग्रदादिषु भोगप्रदस्य कर्मणः क्षये निद्रारूपेण विलीनमन्तःकरणं पुनर्भोगप्रदकर्मवशात् प्रबोधे घनीभवति, तदा तदुपाधिको जीवः विज्ञानमय इत्युच्यते। स एव पूर्वं सुषुप्तिसमये विलीनावस्थोपाधिकः सन्नानन्दमय इत्युच्यते। स एव माण्डूक्ये ‘सुषुप्तस्थानः’ इत्यादिना दर्शित इति। एवं सति तस्य सर्वेश्वरत्वादिवचनं कथं सङ्गच्छताम् ?

इत्थम्, सन्त्यधिदैवतमध्यात्मं च परमात्मनः सविशेषाणि त्रीणि त्रीणि रूपाणि। तत्राऽधिदैवतं त्रीणि शुद्धचैतन्यं चेति चत्वारि रूपाणि चित्रपट-दृष्टान्तेन चित्रदीपे समर्थितानि। यथा स्वतश्शुभ्रः पटो धौतः, अन्नलिप्तो घट्टितः, मष्यादिविकारयुक्तो लाञ्छितः, वर्णपूरितो रञ्जितः, इत्यवस्थाचतुष्टयमेकस्यैव चित्रपटस्य, तथा परमात्मा मायातत्कार्योपाधिरहितः शुद्धः,


जीव ही है, ऐसा कहा गया है। और जब जाग्रत् आदि अवस्थाओंमें भोग-प्रद कर्मका विनाश होनेपर निद्रारूपसे तिरोहित अन्तःकरण फिर भोग देनेवाले कर्मके बलसे प्रबोध अवस्थामें स्थूलरूपताको प्राप्त होता है, तब उस अन्तःकरणरूप उपाधिसे युक्त जीव ‘विज्ञानमय’ शब्दसे कहा जाता है। यही जीव पहले निद्राके समयमें विलीनावस्थोपाधिक (जिसकी उपाधिकी अवस्था विलीन है) होता हुआ ‘आनन्दमय’ शब्दसे कहा जाता है। और इसीका माण्डूक्य उपनिषत्में ‘सुषुप्तस्थानः’ इत्यादिसे परिचय कराया गया है। यदि आनन्दमय जीव ही है, तो ‘एष सर्वेश्वरः’ इत्यादि वाक्यशेषके साथ, जो जीवमें ईश्वरत्वका प्रतिपादन करता है, विरोध होगा अर्थात् उपक्रम-वाक्यकी उपसंहारवाक्यके साथ सङ्गति कैसे होगी ?

इस प्रकार उसकी सङ्गति होगी। [ भाव यह है कि यद्यपि सुषुप्तिकालिक जीवरूप आनन्दमय चैतन्य ईश्वररूप नहीं है, तो भी ईश्वरके साथ अभेदकी विवक्षा करके उक्त उपक्रम और उपसंहारकी सङ्गति होगी इसीको दिखलाते हैं— ] परमात्माके अधिदैव और अध्यात्म सविशेष तीन-तीन रूप हैं। उनमें से देवतात्मक तीन रूप और चौथा शुद्ध चैतन्य, इस प्रकार चार रूपोंका चित्रित वस्त्रके दृष्टान्तसे चित्रदीपमें समर्थन किया गया है—जैसे स्वाभाविक शुभ्र वस्त्र धौत कहलाता है, अन्न आदिसे लिप्त घट्टित कहा जाता है, स्याही आदिसे संयुक्त लाञ्छित कहा जाता है, वर्णोंसे रंगा हुआ रञ्जित कहा जाता है, इस प्रकार