सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)
Siddhanta Lesha Sangraha Hindi
श्रीमदप्पय्य दीक्षित द्वारा
स्रोत: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (उद्गम)
| ९६ | सिद्धान्तलेशसंग्रह | [ प्रथम परिच्छेद |
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यदा हि जाग्रदादिषु भोगप्रदस्य कर्मणः क्षये निद्रारूपेण विलीनमन्तःकरणं पुनर्भोगप्रदकर्मवशात् प्रबोधे घनीभवति, तदा तदुपाधिको जीवः विज्ञानमय इत्युच्यते। स एव पूर्वं सुषुप्तिसमये विलीनावस्थोपाधिकः सन्नानन्दमय इत्युच्यते। स एव माण्डूक्ये ‘सुषुप्तस्थानः’ इत्यादिना दर्शित इति। एवं सति तस्य सर्वेश्वरत्वादिवचनं कथं सङ्गच्छताम् ?
इत्थम्, सन्त्यधिदैवतमध्यात्मं च परमात्मनः सविशेषाणि त्रीणि त्रीणि रूपाणि। तत्राऽधिदैवतं त्रीणि शुद्धचैतन्यं चेति चत्वारि रूपाणि चित्रपट-दृष्टान्तेन चित्रदीपे समर्थितानि। यथा स्वतश्शुभ्रः पटो धौतः, अन्नलिप्तो घट्टितः, मष्यादिविकारयुक्तो लाञ्छितः, वर्णपूरितो रञ्जितः, इत्यवस्थाचतुष्टयमेकस्यैव चित्रपटस्य, तथा परमात्मा मायातत्कार्योपाधिरहितः शुद्धः,
जीव ही है, ऐसा कहा गया है। और जब जाग्रत् आदि अवस्थाओंमें भोग-प्रद कर्मका विनाश होनेपर निद्रारूपसे तिरोहित अन्तःकरण फिर भोग देनेवाले कर्मके बलसे प्रबोध अवस्थामें स्थूलरूपताको प्राप्त होता है, तब उस अन्तःकरणरूप उपाधिसे युक्त जीव ‘विज्ञानमय’ शब्दसे कहा जाता है। यही जीव पहले निद्राके समयमें विलीनावस्थोपाधिक (जिसकी उपाधिकी अवस्था विलीन है) होता हुआ ‘आनन्दमय’ शब्दसे कहा जाता है। और इसीका माण्डूक्य उपनिषत्में ‘सुषुप्तस्थानः’ इत्यादिसे परिचय कराया गया है। यदि आनन्दमय जीव ही है, तो ‘एष सर्वेश्वरः’ इत्यादि वाक्यशेषके साथ, जो जीवमें ईश्वरत्वका प्रतिपादन करता है, विरोध होगा अर्थात् उपक्रम-वाक्यकी उपसंहारवाक्यके साथ सङ्गति कैसे होगी ?
इस प्रकार उसकी सङ्गति होगी। [ भाव यह है कि यद्यपि सुषुप्तिकालिक जीवरूप आनन्दमय चैतन्य ईश्वररूप नहीं है, तो भी ईश्वरके साथ अभेदकी विवक्षा करके उक्त उपक्रम और उपसंहारकी सङ्गति होगी इसीको दिखलाते हैं— ] परमात्माके अधिदैव और अध्यात्म सविशेष तीन-तीन रूप हैं। उनमें से देवतात्मक तीन रूप और चौथा शुद्ध चैतन्य, इस प्रकार चार रूपोंका चित्रित वस्त्रके दृष्टान्तसे चित्रदीपमें समर्थन किया गया है—जैसे स्वाभाविक शुभ्र वस्त्र धौत कहलाता है, अन्न आदिसे लिप्त घट्टित कहा जाता है, स्याही आदिसे संयुक्त लाञ्छित कहा जाता है, वर्णोंसे रंगा हुआ रञ्जित कहा जाता है, इस प्रकार
जीवेश्वरस्वरूपविचार ] भाषानुवादसहित ९७
मायोपहित ईश्वरः, अपञ्चीकृतभूतकार्यसमष्टिसूक्ष्मशरीरोपहितो हिरण्यगर्भः, पञ्चीकृतभूतकार्यसमष्टिस्थूलशरीरोपहितो विराट् पुरुष इत्यवस्थाचतुष्टयमेकस्यैव परमात्मनः। अस्मिंश्च चित्रपटस्थानीये परमात्मनि चित्रस्थानीयः स्थावरजङ्गमात्मको निखिलः प्रपञ्चः। यथा चित्रगतमनुष्याणां चित्राधारवस्त्रसदृशा वस्त्राभासा लिख्यन्ते, तथा परमात्माध्यस्तदेहिनामधिष्ठानचैतन्यसदृशाश्चिदाभासाः कल्प्यन्ते। ते च जीवनामानः संसरन्तीति। अध्यात्मं तु विश्वतैजसप्राज्ञभेदेन त्रीणि रूपाणि। तत्र सुषुप्तौ विलीने अन्तःकरणे अज्ञानमात्रसाक्षी प्राज्ञः, योऽयमिहानन्दमय उक्तः। स्वप्ने व्यष्टि-
एक ही चित्रित पटकी चार अवस्थाएँ होती हैं, वैसे ही माया और उसके कार्यरूप उपाधिसे रहित परमात्मा शुद्ध कहा जाता है, माया उपाधिसे युक्त ईश्वर, अपञ्चीकृत भूतोंके कार्यभूत समष्टि (समूह) सूक्ष्म शरीरसे उपहित * हिरण्यगर्भ और पञ्चीकृत भूतोंके कार्यभूत समष्टि स्थूल शरीरसे उपहित विराट् पुरुष कहलाता है। इस प्रकार एक ही परमात्माकी चार अवस्थाएँ हैं। इस परिस्थितिमें चित्रपटस्थानीय परमात्मामें चित्रस्थानापन्न सम्पूर्ण स्थावर और जङ्गम रूप प्रपञ्च है। जैसे—चित्रमें चित्रित मनुष्योंके चित्रके आधारभूत वस्त्रके सदृश वस्त्रोंके आभास लिखे जाते हैं, वैसे ही परमात्मामें अध्यस्त स्थूल देहके अभिमानी अहङ्कारोंके अधिष्ठानभूत—आधारभूत—चैतन्यसदृश चिदाभासोंकी कल्पना की जाती है, और वे जीव-नामधारी होकर संसारके भागी होते हैं। जीवात्मक चैतन्यके विश्व, तैजस और प्राज्ञ भेदसे तीन रूप होते हैं। उनमेंसे सुषुप्ति अवस्थामें अन्तःकरणके तिरोहित होनेपर अज्ञानमात्रका साक्षी चैतन्य—प्राज्ञ है, जो कि प्रकृतमें † आनन्दमय-
* यह शङ्का होती है कि हिरण्यगर्भ कहलानेवाला जो सूत्रात्मा है, उसीमें श्रुति और स्मृतियोंमें जीवत्वकी प्रसिद्धि है, अतः उसे ईश्वर मानना प्रमाणविरुद्ध है, परन्तु यह शङ्का युक्त नहीं है, क्योंकि समष्टि सूक्ष्म शरीरके अभिमानसे विशिष्ट सत्यलोकका स्वामी जीवरूप हिरण्यगर्भ ईश्वरसे अन्य है, ऐसा स्वीकार किया गया है। ईश्वरमें यद्यपि समष्टि सूक्ष्म शरीरका अभिमान नहीं है, तो भी समष्टिसूक्ष्मशरीरोंका नियन्ता होनेसे समष्टि सूक्ष्म उपाधिसे उपहितत्व गुणके योगसे ईश्वरका हिरण्यगर्भ और सूत्रात्माशब्दसे व्यवहार होता है। ईश्वरमें हिरण्यगर्भत्वका व्यवहार गौण है, मुख्य नहीं है। यही कारण है कि चित्रदीपमें ईश्वर और हिरण्यगर्भकी अपेक्षासे सत्यलोकके अधिपति ब्रह्माका—उन उन वादियोंसे अभिमत ईश्वरकी गणनाके अवसरमें—पृथक् उपादान किया गया है।
† प्रकृतमें अर्थात् माण्डूक्यश्रुतिमें। यहाँपर 'आनन्दभुक्' शब्दके अनन्तर 'चेतोमुखः
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सूक्ष्मशरीराभिमानी तैजसः । जागरे व्यष्टिस्थूलशरीराभिमानी विश्वः । तत्र माण्डूक्यश्रुतिरहमनुभवे प्रकाशमानस्याऽऽत्मनो विश्वतैजसप्राज्ञतुर्यावस्थाभेद-
शब्दसे कहा गया है । स्वप्नमें परिच्छिन्न (अल्प) सूक्ष्म शरीरका अभिमानी चैतन्य—तैजस है और जाग्रदवस्थामें परिच्छिन्न स्थूलशरीरका अभिमानी चैतन्य—विश्व है । इस रीतिसे पादकल्पनाके युक्त होनेपर माण्डूक्य उपनिषत्की श्रुतिने 'अहम्' अनुभवमें प्रकाशित होनेवाले आत्माके *
प्राज्ञस्तृतीयः पादः' ऐसा वाक्यशेष कहा गया है, अतः यह ज्ञात होता है, यह भाव है । चेतोमुखशब्दका अर्थ है—चेतांसि सुखानि यस्य सः चेतोमुखः अर्थात् चित्प्रतिविम्बसे युक्त हैं अविद्यावृत्तिरूप सुषुप्तिकालीन आनन्दके अनुभवके साधन जिसके, ऐसा तृतीय पाद प्राज्ञ है । सुषुप्तिकालमें भी सुखका अनुभव होता है, क्योंकि उठनेके बाद 'मैं सुखसे सोया था' यह स्मरण होता है । यदि सुखका अनुभव न होता, तो यह स्मरण कैसे होता, कारण कि अनुभवके विना स्मरण नहीं हो सकता, यह रहस्य है ।
* इस श्रुतिमें पादशब्दका अर्थ है—पद्यते—अवगम्यते ब्रह्मात्मैक्यम्, एभिः इति पादाः अर्थात् जिनके द्वारा ब्रह्म और आत्माका ऐक्य जाना जाता है, वे पादशब्दसे कहे जाते हैं । इसी व्युत्पत्तिका अङ्गीकार करके श्रौतपादकल्पनाका प्रयोजन भी 'पूर्वपूर्वं' इत्यादिग्रन्थसे बतलाया गया है । अभिप्राय यह है कि 'सोयमात्मा चतुष्पात्' इस वाक्यसे जीवके चार पादोंका उपक्रम करके 'जागरितस्थानो वैश्वानरः प्रथमः पादः' इत्यादिसे प्रथम पाद कहा गया है । यहाँपर जीवपादोंका उपक्रम होनेसे 'विश्वः प्रथमः पादः' ऐसा कहना चाहिए, परन्तु वैश्वानरशब्दके वाच्य विराद् पुरुषरूप ईश्वरमें प्रथमपादत्वका कथन विश्वमें वैश्वानरका अन्तर्भाव सूचन करता है । द्वितीयपादके बोधक वाक्यमें 'स्वप्नस्थानस्तैजसो द्वितीयः पादः' ऐसा कहा गया है, यहाँ सूक्ष्म उपाधिकी समानता होनेसे हिरण्यगर्भका तैजसमें अन्तर्भाव होता है, कारण कि 'वैश्वानरः प्रथमः पादः' ऐसा उपक्रम है । 'सुषुप्तस्थान एकीभूत आत्मा' यह तृतीय पादका प्रतिपादक, जो पूर्व वाक्य है, इसमें भी तृतीय पादरूपसे कहे गये प्राज्ञशब्दित आनन्दमयमें सूक्ष्मतर उपाधिकी समानतासे ईश्वरका अन्तर्भाव विवक्षित है । इसलिए 'एष-सर्वेश्वरः' इत्यादि वाक्यशेषके आनन्दमय और ईश्वरकी परस्पर अभेदविवक्षामें प्रवृत्त होनेसे अनुपपत्ति नहीं है । तुरीयपादका प्रतिपादक वाक्य है—'अदृष्टमव्यवहार्यमग्राह्यमलक्षणमचिन्त्यमव्यपदेश्यमेकात्मप्रत्ययसारं प्रपञ्चोपशमं शिवमद्वैतं चतुर्थं मन्यन्ते' ( इन्द्रियोंका अविषय, व्यवहारका अविषय, कर्मेन्द्रियोंका अविषय, असाधारण धर्मोंसे शून्य, शुष्कतर्कसे अगम्य, शब्दशक्तिका अविषय, स्वगतभेदसे रहित, सब देहोंमें व्याप्त, चिद्रूप, आनन्दरूप, प्रपञ्चाभावरूप, शुद्ध और अद्वैत—विश्व, तैजस, और प्राज्ञरूप तीन पादोंकी अपेक्षा—चतुर्थ-पाद है, ऐसा मानते हैं—चिन्तन करते हैं ) इसमें विश्व, तैजस और प्राज्ञलक्षण पादोंमें वैश्वानर, हिरण्यगर्भ और ईश्वरका जो अन्तर्भाव कहा गया है, वह—उनके परस्पर एकत्वका अनुचिन्तन करनेके लिए है । इसी प्रकार विश्व आदि पादोंका और ओंकारके अवयवभूत
जीवेश्वरस्वरूपविचार ] भाषाऽनुवादसहितं ९९
रूपं पादचतुष्टयम् 'सोऽयमात्मा चतुष्पात्' इत्युपक्षिप्य पूर्वपूर्वपादप्रविलापनेन निष्प्रपञ्चब्रह्मात्मकतुर्यपादप्रतिपत्तिसौकर्याय स्थूलसूक्ष्मसूक्ष्मतरोपाधिसा-
'सोऽयमात्मा चतुष्पात्' (यह आत्मा चार पादवाला है) इस प्रकार विश्व, तैजस, प्राज्ञ और तुरीय अवस्था विशेषरूप चार पादोंका उपक्रम करके पूर्व-पूर्व पादोंके तिरोधानसे निष्प्रपञ्च ब्रह्मरूप चतुर्थपादके ज्ञानके सौलभ्यके लिए मात्राओंका एकत्व-चिन्तन यहाँ विवक्षित है । इसमें श्रुति है—'पादा मात्रा मात्राश्च पादाः' (पाद मात्राएँ हैं और मात्राएँ पाद हैं) इसी अर्थका प्रतिपादक गौड़पादका वचन भी है—'ओङ्कारं पादशो विद्यात् पादा मात्रा न संशयः ।' अर्थात् विश्व आदि पाद और मात्राओंके परस्पर एकत्वका अनुचिन्तन करना चाहिए, यह इस वचनका भाव है। मात्रा—अकार, उकार, और मकार। इसी रीतिसे विश्वादिपाद, वैश्वानरादि पाद और मात्राओंका एकत्वचिन्तन उन सबका निष्प्रपञ्च ब्रह्मरूप चतुर्थपादमें प्रविलापनार्थ है। इसमें यह क्रम है—विश्व, वैश्वानर और अकारके एकत्वका पहले चिन्तन करनेके अनन्तर तैजस, हिरण्यगर्भ और उकारके एकत्वका अनुचिन्तन करे, उसके बाद ईश्वर, प्राज्ञ और मकारके एकत्वका अनुचिन्तन करे। इसी चिन्ताके क्रमसे प्रविलापन करे । अकार आदि त्रिकका उकारमें, उकारादि त्रिकका मकारमें और मकार आदि त्रिकका चिन्मात्र तुरीयपादमें प्रविलापन करे। चिन्मात्रमें प्रविलापन करके वहीं चित्तको स्थिर करे। उकार-आदिमें प्रविलापन करना अर्थात् अकार आदि तीन उकारसे पृथक् नहीं है, इस प्रकार आहार्य निश्चय करना। इस प्रकार प्रतिदिन समाधि करनेवालेको ब्रह्मका साक्षात्कार होता है। और ब्रह्मसाक्षात्कारसे—ब्रह्मप्राप्तिसे—कृतकृत्यता होती है।
इसी भावको सुरेश्वराचार्यने वार्तिकमें इस रूपसे कहा है—
'अकारमात्रं विश्वः स्यादुकारस्तैजसः स्मृतः ।
प्राज्ञो मकार इत्येवं परिपश्येत् क्रमेण तु ॥४७॥
समाधिकालात् प्रागेवं विचिन्त्यातिप्रयत्नतः ।
स्थूलसूक्ष्मक्रमात् सर्वं चिदात्मनि विलापयेत् ॥४८॥
अकारं पुरुषं विश्वमुकारे प्रविलापयेत् ।
उकारं तैजसं सूक्ष्मं मकारे प्रविलापयेत् ॥४९॥
मकारं कारणं प्राज्ञं चिदात्मनि विलापयेत् ।
चिदात्माहं नित्यशुद्धबुद्धमुक्तसदद्वयः ॥५०॥
परमानन्दसन्दोहोवासुदेवोऽहमोमिति ।
ज्ञात्वा विवेचकं चित्तं तत्साक्षिणि विलापयेत् ॥५१॥
चिदात्मनि विलीनं चेत्तच्चित्तं नैव चालयेत् ।
पूर्णबोधात्मनाऽऽसीनं पूर्णाचलसमुद्रवत् ॥५२॥
एवं समाहितो योगी श्रद्धाभक्तिसमन्वितः ।
जितेन्द्रियो जितक्रोधः पश्येदात्मानमद्वयम् ॥५३॥'
:१०.० सिद्धान्तलेशसंग्रह [ प्रथम परिच्छेद
म्यात् विराडादीन् विश्वादिष्वन्तर्भाव्य 'जागरितस्थानो बहिःप्रज्ञः' इत्यादिना विश्वादिपादान् न्यरूपयत् । अतः प्राज्ञशब्दिते आनन्दमये अव्याकृतस्येश्वरस्याऽन्तर्भावं विवक्षित्वा तस्य सर्वेश्वरत्वादितद्धर्मवचनमिति । इत्थमेव भगवत्पादैर्गौडपादीयविवरणे व्याख्यातम् ।
मायाच्छन्ने चिदाभासः कूटस्थे व्यावहारिकः ॥
तस्मिन्निद्रावृते तादृक् जीवोऽन्यः प्रातिभासिकः ३८ ॥
जीवस्त्रिधैवं दृग्दृश्यविवेके प्रतिपादितः ॥
इत्येते दर्शिताः पक्षाः प्रतिबिम्बेशवादिनाम् ॥ ३९ ॥
अन्तःकरणावच्छिन्न कूटस्थ चैतन्य पारमार्थिक जीव है, मायावृत कूटस्थमें (मायामें कल्पित अन्तःकरणमें ) जो चित्का आभास है, वह व्यावहारिक जीव है और निद्रासे आवृत व्यावहारिक जीवमें कल्पित चिदाभास प्रातिभासिक है, इस प्रकार त्रिविध जीव का दृग्दृश्यविवेकमें प्रतिपादन किया गया है, इस रीतिसे ईश्वरको प्रतिबिम्बरूप माननेवालोंके पक्ष दिखलाये गये हैं ॥३८॥३९॥
स्थूल, सूक्ष्म और सूक्ष्मतर उपाधिकी समानतासे विराड् आदिका विश्व आदिमें अन्तर्भाव करके 'जागरितस्थानो बहिःप्रज्ञः' (जाग्रदवस्थाका अभिमानी बहिःप्रज्ञ है) इत्यादिसे विश्व आदि पादोंका निरूपण किया है। इससे प्राज्ञशब्दसे कहे जानेवाले आनन्दमयमें अव्याकृत * ईश्वरके अन्तर्भावकी विवक्षाकरके उसमें (आनन्दमयमें) सर्वेश्वरत्व आदि ईश्वरके धर्मोंका कथन है। भगवान् शङ्करने गौड़पादीय-विवरणमें भी ऐसा ही व्याख्यान किया है।
* यद्यपि अव्याकृत शब्दका अर्थ है—अनभिव्यक्त जगत्, तथापि लक्षणावृत्तिसे अनेक स्थलोंमें वह ईश्वरार्थक भी प्रसिद्ध है, अतः यहाँ अव्याकृतशब्द ईश्वरके अर्थमें आया है । इस ग्रन्थमें विश्व आदि पादोंका पूर्व-पूर्वमें प्रविलापन करनेसे निष्प्रपञ्च ब्रह्मका ज्ञान अत्यन्त सुलभ कहा गया है । यद्यपि श्रवण आदि अन्य ब्रह्मज्ञानके साधन हैं, तो भी मन्दबुद्धिवाले संन्यासीको अथवा प्रखर-बुद्धिमान् होते हुए भी जिसको न्याय-व्युत्पादक कुशल आचार्य नहीं मिला है, ऐसे संन्यासीको साङ्ख्यमार्ग द्वारा तत्त्वप्रतिपत्ति नहीं हो सकती है, इसलिए उक्त पुरुषोंको अनायास ब्रह्मज्ञानके साधनरूपसे बुद्धिपूर्वक प्रविलापन क्रमसे माण्डूक्य आदि ग्रन्थमें समाधिका विधान है, इसीलिए ध्यानदीपमें विद्यारण्यस्वामीजीने भी कहा है—
'अत्यन्तबुद्धिमान्द्याद्वा सामग्र्या वाप्यसम्भवात् ।
यो विचारं न लभते ब्रह्मोपासीत सोऽनिशम् ॥' ५४ ध्या० दीप ॥
| जीवईश्वरस्वरूपविचार ] | भाषानुवादसहित |
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दृग्दृश्यविवेके तु चित्रदीपव्युत्पादितं कूटस्थं जीवकोटावन्तर्भाव्य चित्रैविध्यप्रक्रियैवाऽऽलम्बितेति विशेषः ।
तत्र ह्युक्तं जलाशयतरङ्गबुद्बुदन्यायेनोपर्युपरि कल्पनाद् जीवः त्रिविधः— पारमार्थिकः, व्यावहारिकः, प्रातिभासिकश्चेति । तत्राऽवच्छिन्नः पारमार्थिकः
विद्यारण्यस्वामीजीने दृग्दृश्यविवेकमें तो—चित्रदीपप्रकरणमें व्युत्पादित कूटस्थका जीवकोटिमें अन्तर्भाव करके—चैतन्यकी त्रिविधप्रक्रियाका ही अवलम्बन किया है, यह विशेष है ।
दृग्दृश्यविवेकमें जलाशयके तरङ्ग और बुद्बुदके दृष्टान्तसे * ऊपर ऊपरकी कल्पनासे जीवके तीन भेद कहे गये हैं—पारमार्थिक, व्यावहारिक और प्रातिभासिक । तीन जीवोंमें से अवच्छिन्न अर्थात् स्थूल और सूक्ष्म दो शरीरोंसे अवच्छिन्न कूटस्थ आत्मा—पारमार्थिक जीव है । उस अवच्छिन्न जीवमें
अर्थात् बुद्धिकी मन्दतासे अथवा सामग्रीके अभावसे जो विचार नहीं कर सकता, वह प्रतिदिन ब्रह्मकी उपासना करे, यह भाव है । अतः मूलमें भी 'प्रतिपत्तिसौकर्याय' यही कहा गया है यह ध्यान रखना चाहिए ।
* जलाशय, तरङ्ग और बुद्बुदके दृष्टान्तका सारांश यह है—जैसे समुद्र आदि जलाशयमें तरङ्ग ऊपर रहती हैं और उनके ऊपर बुद्बुद रहते हैं, यह प्रसिद्ध है, इसी प्रकार कूटस्थके ऊपर व्यावहारिक अन्तःकरणमें प्रतिबिम्बरूप सम्पूर्ण व्यवहारकालमें अनुगत व्यावहारिक जीवकी कल्पना की जाती है और उसके ऊपर स्वप्नकालमें वासनामय प्रातिभासिक रथ आदिके समान वासनामय अन्तःकरणमें प्रतिबिम्बरूप प्रातिभासिक जीवकी कल्पना की जाती है । इस विषयमें दृग्दृश्यविवेकके निम्न लिखित श्लोक हैं, जिनका भाव भी मूल ग्रन्थके अनुसार ही है—
'अवच्छिन्नः चिदाभासस्तृतीयः स्वप्नकल्पितः ।
विज्ञेयस्त्रिविधो जीवस्तत्राद्यः पारमार्थिकः ॥३२॥
अवच्छेदः कल्पितः स्यात् अवच्छेद्यन्तु वास्तवम् ।
तस्मिन् जीवत्वमारोपात् ब्रह्मत्वन्तु स्वभावतः ॥३३॥
अवच्छिन्नस्य जीवस्य पूर्णेन ब्रह्मणैकताम् ।
तत्त्वमस्यादिवाक्यानि जगुर्नितरजीवयोः ॥३४॥
ब्रह्मण्यवस्थिता माया विक्षेपशक्तिरूपिणी ।
आवृत्याखण्डतां तस्मिन् जगज्जीवौ प्रकल्पयेत् ॥३५॥
जीवो धीस्थचिदाभासो जगत् स्यात् भूतभौतिकम् ।
अनादिकालमारभ्य मोक्षात् पूर्वमिदं द्वयम् ॥३६॥'
| १०२ | सिद्धान्तलेशसंग्रह | [ प्रथम परिच्छेद |
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जीवः । तस्मिन्नवच्छेदकस्य कल्पितत्वेऽपि अवच्छेद्यस्य तस्याऽकल्पितत्वेन ब्रह्मणोऽभिन्नत्वात् । तमावृत्य स्थितायां मायायां कल्पितेऽन्तःकरणे चिदाभासोऽन्तःकरणतादात्म्यापत्त्या 'अहम्' इत्यभिमन्यमानो व्यावहारिकः, तस्य मायिकत्वेऽपि यावद्व्यवहारमनुवृत्तेः । स्वप्ने तमप्यावृत्य स्थितया मायावस्थाभेदरूपया निद्रया कल्पिते स्वप्नदेहादावहमभिमानी प्रातिभासिकः । स्वप्नप्रपञ्चेन सह तद्द्रष्टुर्जीवस्यापि प्रबोधे निवृत्तेरिति । एवमेते प्रतिबिम्बेश्वरवादिनां पक्षभेदा दर्शिताः ।
अविद्यायां चिदाभासो जीवो बिम्बचिदीश्वरः ।
स्वातन्त्र्याद्युपपत्तेरित्याहुर्विवरणानुगाः ॥ ४० ॥
विवरणके अनुसारियोंका कहना है कि अविद्यामें चैतन्य का आभास जीव है और बिम्बस्थानापन्न चैतन्य ईश्वर है, क्योंकि उसमें स्वातन्त्र्य आदिकी उपपत्ति है ॥४०॥
विशेषणीभूत स्थूल और सूक्ष्म शरीरोंके कल्पित होनेपर भी विशेष्यभूत चैतन्यके स्वतः सत्य होनेसे उसका (जीवका) ब्रह्मके साथ अभेद हो सकता है । कूटस्थ आत्माको आवृत करके अविद्याके स्थित होनेपर कूटस्थ आत्मामें कल्पित अन्तःकरणमें—अन्तःकरणके तादात्म्यसे 'अहम्' (मैं) इस प्रकारका अभिमान करनेवाला—चिदाभास व्यावहारिक जीव है। यद्यपि वह मायिक है, तो भी व्यवहारपर्यन्त उसकी अनुवृत्ति होती है। [ कोई लोग शङ्का करते हैं कि व्यावहारिक जीव है ही नहीं, परन्तु यह शङ्का युक्त नहीं है, क्योंकि 'अहं कर्ता भोक्ता' इत्यादि अनुभवसे वह सिद्ध है। कर्तृत्व, भोक्तृत्व आदि धर्म जीवसे अन्यत्र—अन्तःकरणमें नहीं रह सकते, क्योंकि चिदाभासशून्य अन्तःकरणमें चेतनधर्मत्वसे प्रसिद्ध कर्तृत्व आदि नहीं रह सकते । पारमार्थिक जीव भी कर्तृत्वका आश्रय नहीं है, क्योंकि वह कूटस्थ है, यह भाव है ] स्वप्नावस्थामें व्यावहारिक जीवका भी आवरण करके स्थित मायावस्थाविशेष निद्रासे कल्पित स्वप्नके शरीर आदिमें 'अहम्' अभिमान करनेवाला जीव प्रातिभासिक है, क्योंकि जागरणावस्थामें स्वप्नप्रपञ्चके साथ ही साथ स्वप्नद्रष्टा जीवकी भी निवृत्ति होती है । इस प्रकार प्रतिबिम्बको ईश्वर कहनेवालोंके पक्षोंका दिग्दर्शन कराया गया है ।
जीवेश्वरस्वरूपविचार ] भाषानुवादसहित १०३
विवरणानुसारिणस्त्वाहुः—
‘विभेदजनकेऽज्ञाने नाशमात्यन्तिकं गते ।
आत्मनो ब्रह्मणो भेदमसन्तं कः करिष्यति ॥’
इति स्मृत्यैकस्यैवाऽज्ञानस्य जीवेश्वरविभागोपाधित्वप्रतिपादनात् बिम्बप्रतिबिम्बभावेन जीवेश्वरयोर्विभागः, नोभयोरपि प्रतिबिम्बभावेन ।
विवरणके अनुयायी कहते हैं कि विभेदजनक अज्ञानका—जीव और ईश्वरके अवस्थानमें हेतुभूत अज्ञानका—आत्यन्तिक नाश * होनेपर जीवात्माका और परमात्माका (ब्रह्मका) असत्—अनिर्वचनीय भेद कौन करेगा अर्थात् कोई नहीं करेगा। इस प्रकारकी स्मृतिसे एक ही अज्ञान जीव और ईश्वरकी उपाधि कहा गया है, अतएव बिम्ब और प्रतिबिम्बरूपसे जीव और ईश्वरका विभाग है † । इन दोनोंका प्रतिबिम्बरूपसे विभाग नहीं है, क्योंकि दो
* आत्यन्तिकनाश—समूल अज्ञानका विनाश । यद्यपि अज्ञानका सुषुप्ति या प्रलयमें कार्य-कारणका अभेद होनेसे कार्यका नाश होनेसे कार्यात्मना अज्ञानका विनाश है, परन्तु वह आत्यन्तिक विनाश नहीं है, क्योंकि स्वरूपतः उसकी स्थिति है, अन्यथा पुनरुत्थानकी अनुपपत्ति होगी । तत्त्वज्ञानसे होनेवाला अज्ञाननाश स्वरूपसे ही होता है, अतः वह आत्यन्तिक विनाश है, इसी अभिप्रायसे अज्ञाननाशमें आत्यन्तिक विशेषण दिया गया है । अथवा जीवन्मुक्तिम आवरण अंशका नाश होनेपर भी अज्ञानके विक्षेपांशके रहनेसे आत्यन्तिक नाश नहीं है, परन्तु विदेहमुक्तिमें ही है, इसी अभिप्रायसे आत्यन्तिक विशेषण दिया गया है, यह भी कुछ लोग कहते हैं ।
† यहाँ शङ्का होती है कि ‘विभेदजनकेऽज्ञाने०’ इस श्रुतिके अनुसार ईशको बिम्ब और जीवको प्रतिबिम्ब माननेमें दोनोंको प्रतिबिम्ब माननेवाली ‘जीवेशावाभा०’ इस श्रुतिके साथ विरोध होगा । इसपर विवरणानुयायी कहते हैं कि प्रतिबिम्बत्वके समान बिम्बत्वके भी फलित होनेसे आभासशब्दसे बिम्ब और प्रतिबिम्ब दोनोंका ग्रहण हो सकता है, अतः विरोध नहीं है । यदि शङ्का की जाय कि प्रतिबिम्बत्वसे युक्त मुख आदिमें ही आभासशब्दका व्यवहार होता है, बिम्बत्वविशिष्ट मुखमें आभास-शब्दका व्यवहार नहीं होता, अतः आभासशब्दका मुख्य अर्थ बिम्ब नहीं हो सकता, इसलिए आभासशब्दकी बिम्बमें लक्षणा माननी पड़ेगी, तो यह शङ्का नहीं हो सकती, क्योंकि एक बार उच्चरित आभासशब्दका मुख्यवृत्तिसे प्रतिबिम्ब अर्थ और गौणीवृत्तिसे बिम्ब अर्थ नहीं हो सकता । यदि कहिये कि अजहल्लक्षणा मानकर आभासशब्दके दोनों अर्थ मानेंगे, सो भी युक्त नहीं है, क्योंकि जब दोनोंको अर्थात् जीव और ईश्वरको प्रतिबिम्ब मानकर ही विभाग हो सकता है तब फिर, लक्षणाके झगड़ेमें पड़नेकी आवश्यकता ही क्या है ? इसपर विवरणानुसार उत्तर है कि श्रुतिके अनुसार भी जीव और ईश्वरका विभाग केवल प्रतिबिम्बरूपसे नहीं हो सकता, सूर्यके समान
| १०४ | सिद्धान्तलेशसंग्रह | [ प्रथम परिच्छेद |
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उपाधिद्वयमन्तरेणोभयोः प्रतिबिम्बत्वायोगात् । तत्राऽपि प्रतिबिम्बो जीवः । बिम्बस्थानीय ईश्वरः । तथा सत्येव लौकिकबिम्बप्रतिबिम्बदृष्टान्तेन स्वातन्त्र्यमीश्वरस्य, तत्पारतन्त्र्यं जीवस्य च युज्यते ।
'प्रतिबिम्बगताः पश्यन्नृजुवक्रादिविक्रियाः ।
पुमान् क्रीडेद्यथा ब्रह्म तथा जीवस्थविक्रियाः ॥'
इति कल्पतरूक्तरीत्या 'लोकवत्तु लीलाकैवल्यम्' ( उ० मी० अ० २ पा० १ सू० ३३ ) इति सूत्रमपि सङ्गच्छते । अज्ञानप्रतिबिम्बितस्य जीव-
उपाधियोंके बिना दो प्रतिबिम्ब हो ही नहीं सकते । उनमें भी ( बिम्ब और प्रतिबिम्ब दोनोंमें भी ) प्रतिबिम्बस्थानापन्न जीव है और बिम्बस्थानीय ईश्वर है । बिम्बचैतन्यके ईश्वर होनेसे ही लौकिक बिम्ब और प्रतिबिम्बके दृष्टान्तसे ईश्वरमें स्वातन्त्र्य और जीवमें ईश्वरका पारतन्त्र्य संगत होता है ‡ ।
'प्रतिबिम्बगताः०' (जैसे लोकमें कोई पुरुष दर्पणमें पड़े हुए अपने प्रतिबिम्बके ऋजु और वक्र आदि भावोंको बिम्बरूप अपनेसे हुए देखकर खेलता है, वैसे ही ब्रह्म भी जीवस्थ प्राणियोंके कर्मानुसार स्वप्रयुक्त भावोंको देखकर खेलता है ) इस प्रकार कल्पतरुमें कही गई रीतिसे * 'लोकवत्तु लीलाकैवल्यम्' यह सूत्र भी सङ्गत होता है । जैसे सर्वत्र व्याप्त सूर्यके किरणोंका
- बिम्बभूत चैतन्यके एक होनेसे उपाधिकी भिन्नताके बिना प्रतिबिम्बका भेद नहीं हो सकता । माया और अविद्या दो उपाधियां हैं, यह भी नहीं कह सकते, क्योंकि मूलप्रकृतिके मायात्व और अविद्यात्वके लक्षणभेदसे भिन्न होनेपर भी प्रतिबिम्बद्वयसे अपेक्षित दो उपाधियोंका कहींपर प्रतिपादन नहीं किया गया है और मायाका स्वरूपतः भेद भी सिद्धान्तविरुद्ध है, अतः आभासशब्द लक्षणावृत्तिसे बिम्ब प्रतिबिम्ब उभयपरक ही है ।
‡ 'एष सर्वेश्वरः' इत्यादि श्रुतिसे ईश्वरमें स्वातन्त्र्य सिद्ध है और 'एष ह्येव साधु कर्म कारयति' इत्यादि श्रुतिसे जीवमें पारतन्त्र्य सिद्ध है ।
* 'लोकवत्तु लीलाकैवल्यम्'—किसी प्रकारके प्रयोजनके बिना सृष्टि आदिमें प्रवृत्ति रूप ईश्वरकी जो क्रिया है, वह केवल लीला ही है, जैसे लोकमें सब साधनोंसे सम्पन्न पुरुषकी क्रीड़ा किसी प्रयोजनविशेषके लिए नहीं होती, वैसे ही आप्तकाम ईश्वरकी भी प्रयोजनके बिना स्वभावतः ही सृष्टिमें प्रवृत्ति उपपन्न है । लोकमें अत्यन्त सुखका उद्रेक होनेसे हँसना, गाना आदि प्रयोजनके बिना ही होने लगता है और दुःखके उद्रेकसे रोना आदि स्वभावतः हुआ करता है, अतः हँसने या रोनेमें लोकमें कारण पूछा जाता है, परन्तु प्रयोजन नहीं पूछा जाता, यह 'लोकवत्तु' इत्यादि सूत्रका भाव है ।
जीवेश्वरस्वरूपविचार ] भाषानुवादसहित १०५
स्याऽन्तःकरणरूपोऽज्ञानपरिणामभेदो विशेषाभिव्यक्तिस्थानं सर्वतः प्रसृतस्य सवितृप्रकाशस्य दर्पण इव। अतस्तस्य तदुपाधिकत्वव्यवहारोऽपि। नैतावताऽज्ञानोपाधिपरित्यागः, अन्तःकरणोपाधिपरिच्छिन्नस्यैव चैतन्यस्य जीवत्वे योगिनः कायव्यूहाधिष्ठानत्वानुपपत्तेः।
न च योगप्रभावाद्योगिनोऽन्तःकरणं कायव्यूहाभिव्यक्तियोग्यं वैपुल्यं प्राप्नोतीति तदवच्छिन्नस्य कायव्यूहाधिष्ठानत्वं युज्यते इति वाच्यम्, 'प्रदीपवदावेशस्तथा हि दर्शयति' (उ० मी० अ० ४ पा० ४ सू० १५) इति
अभिव्यक्तिस्थान दर्पण है, वैसे ही अज्ञानमें प्रतिबिम्बित जीवका विशेष अभिव्यक्ति-स्थान अज्ञानका परिणामरूप अन्तःकरण है। भाव यह है कि अविद्यामें प्रतिबिम्बित सुषुप्तिसाधारण चैतन्यरूपकी प्रमातृत्व, कर्तृत्व आदि विशेषरूपसे अभिव्यक्ति—उपलब्धिका स्थान (उपाधि) अन्तःकरण है। कर्तृत्व आदि धर्मोंके केवल अज्ञानके परिणाम न होनेसे उनकी उपाधिमात्रतासे जीवमें कर्तृत्व आदिका लाभ नहीं हो सकता, किन्तु कर्तृत्व आदि धर्मवाले अन्तःकरणके तादात्म्यके अध्याससे ही जीवमें कर्तृत्व आदिका लाभ हो सकता है, अतः अन्तःकरणमें जीवकी उपाधिकताका वर्णन किया गया है। अन्तःकरण विशेष उपलब्धिका स्थान है, ऐसा स्वीकार करनेसे जीवमें अन्तःकरणोपाधिकताका व्यवहार भी है, अर्थात् 'कार्योपाधिरयं जीवः' इत्यादि श्रुतिमें और भाष्यमें, यह रहस्य है। श्रुतिमें कार्योपाधिकताके विशेषणमात्रसे अज्ञानोपाधिकताके निराकरणका परित्याग नहीं है, क्योंकि अन्तःकरणरूप उपाधिसे परिच्छिन्न चैतन्यको जीव माननेपर योगियोंमें एककालीन अनेक शरीरोंकी नियन्तृताकी उपपत्ति नहीं होगी।
योगके प्रभावसे योगीका अन्तःकरण कायव्यूहमें—देहसमूहमें—अभिव्यक्तिके योग्य व्यापकता प्राप्त करता है, अतः उस अन्तःकरणसे अवच्छिन्न चिदात्मा भी कायव्यूहका प्रेरक हो सकता है ? ऐसी शङ्का नहीं करनी चाहिए, क्योंकि 'प्रदीपवदावेशस्तथा हि दर्शयति' * इस शास्त्रोपान्त्याधिकरणके अर्थात्
* प्रदीपवदावेशस्तथा हि दर्शयति' इस सूत्रका अर्थ इस प्रकार है—जैसे एक ही प्रदीपका अनेक बत्तियोंमें प्रवेश है, वैसे ही एक ही योगीका योगके प्रभावसे अनेक शरीरोंमें आवेश—प्रवेश होता है। यद्यपि पूर्व दीपका और बत्तियोंमें प्रविष्ट अन्य दीपोंका परस्पर
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| १०६ | सिद्धान्तलेशसंग्रह | [ प्रथम परिच्छेद |
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शास्त्रोपान्त्याधिकरणभाष्यादिषु कायव्यूहे प्रतिदेहमन्तःकरणस्य चक्षुरादिवत् भिन्नस्यैव योगप्रभावात् सृष्टेरुपवर्णनात् । प्रतिबिम्बे बिम्बात् भेदमात्रस्याऽध्यस्तत्वेन स्वरूपेण तस्य सत्यत्वान्न प्रतिबिम्बरूपजीवस्य मुक्त्यन्वयासम्भव
ब्रह्ममीमांसाशास्त्रके अन्तिम अधिकरणके पहले अधिकरणके भाष्य आदिमें कायव्यूहमें योगके प्रभावसे प्रत्येक शरीरमें चक्षु आदिके समान पृथक्-पृथक् अन्तःकरणकी उत्पत्तिका वर्णन किया गया है † । प्रतिबिम्बमें बिम्बसे जो भेद है * वही कल्पित है, इससे स्वरूपतः उसके सत्य होनेसे
भेद है और योगीका सब देहोंमें अभेद ही है इस प्रकार दृष्टान्त और दाष्ट्रान्तमें वैषम्य है, तथापि दीपत्वजातिके अभेदका व्यक्तियोंमें आरोप करके दृष्टान्त और दार्ष्टान्तिककी उपपत्ति करनी चाहिए । एक योगीकी अनेकताको श्रुति भी दिखलाती है—'स एकधा भवति त्रिधा भवति पञ्चधा सप्तधा' ( वह योगी एक प्रकारका, तीन प्रकारका, पांच प्रकारका और सात प्रकारका अर्थात् अनेक प्रकारका हो सकता है )। एक ही समयमें अनेक शरीरोंमें योगीके अवस्थानके बिना अनेकत्व उपपन्न नहीं हो सकता ।
† यदि एक ही अन्तःकरणकी कार्यव्यूहमें अभिव्यक्तिके योग्य विपुलता मान ली जाय, तो उक्त भाष्यके साथ अवश्य विरोध होगा । यद्यपि भाष्य आदिका यह तात्पर्य कहना उचित है कि योगीका पूर्वसिद्ध अन्तःकरण ही—योगके प्रभावसे विपुलता प्राप्त कर स्वावच्छिन्न चैतन्यरूप योगीके कायव्यूहमें—भोग आदि कराता है । योगप्रभावसे अनेक अन्तःकरण उत्पन्न होते हैं, ऐसा तात्पर्य मानना ठीक नहीं है, क्योंकि अनेकविध अन्तःकरणोंकी सृष्टि माननेमें कल्पनागौरव और असत्कार्यवादका प्रसङ्ग आता है और हिरण्यगर्भ आदिका ब्रह्माण्डव्यापी जो समष्टि अन्तःकरण है, वह भी योगप्रभावसे ही है, भाष्यमें जो अन्तःकरणकी सृष्टिका प्रतिपादन है, वह परकीय मतके अभिप्रायसे है, ऐसा समझना चाहिए, क्योंकि 'एपैव च योगशास्त्रेषु' इत्यादि भाष्यमें यह अर्थ स्पष्ट है, तथापि शास्त्रोपान्त्याधिकरणके यथाश्रुत भाष्यके अभिप्रायसे यह दूषण दिया गया है, ऐसा समझना चाहिए ।
* इस ग्रन्थसे—चित्रदीपमें जो प्रतिबिम्ब चैतन्यरूप जीवके स्वरूपतः मिथ्या होनेसे त्रिकालावाधित ब्रह्मके साथ उस जीवकी एकता नहीं हो सकती, इसलिए चैतन्यके चार भेद करके ऐक्यनिर्वाहके लिए जीव और ईश्वरसे विलक्षण कूटस्थ चैतन्य माना गया है, और दृग्दृश्यविवेकमें प्रतिबिम्बको मिथ्या मानकर युक्तिसे अन्वयके लिए जो पारमार्थिक जीवकी कल्पनाकी गई है—उसका परिहार किया जाता है । अर्थात् प्रमाणके न होनेसे प्रतिबिम्ब जीवसे अतिरिक्त अन्य जीव—कूटस्थ या व्यावहारिक जीवसे अन्य प्रातिभासिक जीव नहीं है, यह भाव है, कुछ लोग शङ्का करते हैं कि व्यावहारिक जीव स्वप्नकालमें आवृत्त रहता है, अतः स्वप्नसमयके व्यवहारकी अनुपपत्ति ही प्रातिभासिक जीवकी कल्पना करती है । नहीं अनुपपत्ति
जीवेश्वरस्वरूपविचार ] भाषानुवादसहित १०७
इति न तदतिरेकेण मुक्त्यन्वयायाऽवच्छिन्नरूपजीवान्तरं वा प्रतिबिम्बजीवा-
तिरिक्तं जीवेश्वरविलक्षणं कूटस्थशब्दितं चैतन्यान्तरं वा कल्पनीयम् ।
'अविनाशी वा अरेऽयमात्मा' इति श्रवणं जीवस्य तदुपाधिनिवृत्तौ
प्रतिबिम्बरूप जीवका मुक्तिमें अन्वयका संभव नहीं है यह नहीं कह
सकते, इससे प्रतिबिम्बरूप जीवसे पृथक् मुक्तिमें सम्बन्ध होनेके लिए
अवच्छिन्नरूप अन्य जीवकी या प्रतिबिम्ब जीवसे अतिरिक्त जीव और
ईश्वरसे विलक्षण कूटस्थ शब्दसे कहे जानेवाले भिन्न चैतन्यकी कल्पना नहीं
करनी चाहिए । $\dagger$ 'अविनाशी वा अरे०' ( अरे मैत्रेयि ! यह आत्मा अवि-
नाशी है ) इत्यादि श्रुति जीवकी उपाधिका विनाश होनेसे प्रतिबिम्बभावका
नहीं है, जीवचैतन्यमें आवरण नहीं होता है, इसका आगे साक्षिनिरूपणमें वर्णन करेंगे, इससे
स्वप्नमें भी जीवचैतन्यसे ही व्यवहारकी उपपत्ति होगी । 'जिस मैंने स्वप्नमें श्रीकृष्णको देखा था,
वही मैं जागकर उस कृष्णका स्मरण करता हूं' इस प्रकारकी प्रतीतिसे जाग्रत् और स्वप्नके द्रष्टाका
अभेद ही भासता है । इसीलिए प्रातिभासिक जीवकी कल्पना निर्दुष्ट नहीं है ।
$\dagger$ 'अन्धेवानु विनश्यति', 'अविनाशी वा अरेऽयमात्मा' इत्यादि वाक्योंसे प्रकृत
विज्ञानघन आत्मामें विनाशित्व और अविनाशित्वरूप विरुद्ध धर्मोंका प्रतिपादन किया गया है, परन्तु
इनका एकमें समावेश नहीं हो सकता, इसलिए विनाशी प्रतिबिम्बसे भिन्न विनाशरहित कूटस्थ
चैतन्यकी सिद्धि होती है, यह जो कहा गया है, वह भी असङ्गत है, क्योंकि अविद्या-
प्रतिबिम्ब चैतन्यरूप जीवमें ही प्रतिबिम्बत्वरूप विशेषणांशके नाशके अभिप्रायसे विनाशित्वका
प्रतिपादन है और चैतन्यांश विशेष्य अंशके अभिप्रायसे अविनाशित्वका प्रतिपादन है,
इस प्रकारकी व्यवस्थासे भी विनाशित्व और अविनाशित्वका व्यवहार हो सकता है ऐसी
अवस्थामें गौरवदोषसे दूषित धर्मिभेदकी कल्पना नहीं करनी चाहिए । यहांपर शङ्का
होती है कि अविद्यामें प्रतिबिम्ब चैतन्य जीव है, अविद्यामें बिम्बभूत चैतन्य ईश्वर है और बिम्ब
एवं प्रतिबिम्बमें अनुगत चैतन्य शुद्ध चैतन्य है । इस विवरणपक्षमें चैतन्यके चार भेद
माननेवालोंने कूटस्थका जो अङ्गीकार किया है, उसका किसमें अन्तर्भाव होता है ? जीवमें
या शुद्ध चैतन्यमें तो उसका अन्तर्भाव हो नहीं सकता, क्योंकि ये दोनों किसीके प्रति उपादान
नहीं हैं और कूटस्थ तो स्थूलसूक्ष्म शरीरके प्रति उपादान माना गया है, अतः उनमें कूटस्थका
अन्तर्भाव नहीं हो सकता । ईश्वरमें भी उसका अन्तर्भाव नहीं हो सकता, क्योंकि कूटस्थका
देहादि विक्षेपोंमें अवस्थान है और ईश्वरकी ऐसी अवस्थितिमें कोई प्रमाण नहीं है । परन्तु
यह शङ्का युक्त नहीं है, क्योंकि कूटस्थका जीव या शुद्ध चैतन्यमें अन्तर्भाव न होनेपर भी
ईश्वरमें अन्तर्भाव हो सकता है, क्योंकि वही ईश्वररूप चैतन्य चेतनात्मक और अचेतनात्मक
समस्त प्रपञ्चका उपादान है और देहविकारोंमें उसका अवस्थान भी है, अतः कूटस्थ चैतन्य-
का ईश्वरसे भेद मानना प्रामाणिक नहीं है ।
१०८ | सिद्धान्तलेशसंग्रह | [ प्रथम परिच्छेद
प्रतिबिम्बभावापगमेऽपि स्वरूपं न विनश्यतीत्येतत्परम्, न तदतिरिक्तकूटस्थनामकचैतन्यान्तरपरम् । जीवोपाधिना अन्तःकरणादिनाऽवच्छिन्नं चैतन्यं बिम्बभूत ईश्वर एव । 'यो विज्ञाने तिष्ठन्' इत्यादिश्रुत्या ईश्वरस्यैव जीवसन्निधानेन तदन्तर्यामिभावेन विकारान्तरावस्थानश्रवणादिति ।
घटसंवृतमित्यादिश्रुतिस्मृतिसमाश्रयात् ।
अन्येऽन्तःकरणेनावच्छिन्नं जीवं वभाषिरे ॥ ४१ ॥
कुछ लोग 'घटसंवृतम्' इत्यादि श्रुति और स्मृतिके आधारपर अन्तःकरणसे अवच्छिन्न चैतन्य जीव है, ऐसा कहते हैं ॥४१॥
अन्ये तु—रूपानुपहितप्रतिबिम्बो न युक्तः सुतरां नीरूपे । गगन-
अपगम होनेपर भी जीवका स्वरूप नष्ट नहीं होता, यह बोध कराती है । जीवसे अतिरिक्त कूटस्थ चैतन्यका बोध नहीं कराती । जीवकी उपाधि—अन्तःकरण आदिसे अवच्छिन्न बिम्बभूत चैतन्य ही ईश्वर है, क्योंकि * 'यो विज्ञाने तिष्ठन्' ( जो विज्ञानमें रहता हुआ ) इत्यादि श्रुतिसे जीवके सन्निधानसे उसके अन्तर्यामी रूपसे विकारोंके भीतर ईश्वरके ही अवस्थानका श्रवण है ।
कुछ लोग अवच्छिन्न पक्षको ही रुचिकर मानते हैं, क्योंकि रूपरहित पदार्थका प्रतिबिम्ब नहीं हो सकता, नीरूप अन्तःकरण आदिमें चैतन्यका प्रतिबिम्ब होना सुतरां असम्भव है । [ भाव यह है कि पूर्व ग्रन्थसे मतभेदके साथ
* इसमें आदिशब्दसे 'विज्ञानादन्तरो यं विज्ञानं न वेद यस्य विज्ञानं शरीरं यो विज्ञानमन्तरो यमयति' इत्यादि वाक्यका ग्रहण है । यहांपर विज्ञानशब्दका अर्थ है—जीव अर्थात् जो जीवके अन्दर रहकर जीवका अभ्यन्तर है, जिसको जीव नहीं जानता है, जिसका जीव शरीर है और जो जीवका नियमन करता है । इससे ईश्वरमें जीव आदिकी नियन्तृता स्पष्टरूपसे भासती है, और जैसे दूरस्थ राजा प्रजाका नियन्त्रण करता है, वह वैसे नियन्त्रण नहीं करता, किन्तु जीवके सान्निध्यसे ही नियन्त्रण करता है, यह भाव है । यह अन्तर्यामिब्राह्मण स्मृतिका भी उपलक्षण है, इससे—
'ईश्वरः सर्वभूतानां हृद्देशेऽर्जुन तिष्ठति ।
भ्रामयन् सर्वभूतानि यन्त्रारूढानि मायया ॥' [ गीता १८ श्लोक ६१ ]
इस स्मृतिका ग्रहण होता है—हे अर्जुन, शरीररूपी यन्त्रमें आरूढ होकर प्राणियोंको अपनी मायासे भ्रमण कराता हुआ सम्पूर्ण भूतोंके हृद्देशमें ईश्वर रहता है । इससे ईश्वरमें मायाप्रयुक्त नियन्तृत्व है, यह ज्ञात होता है ।
जीवेश्वरस्वरूपविचार ] भाषानुवादसहित १०९
प्रतिबिम्बोदाहरणमप्ययुक्तम् , गगनाभोगव्यापिनि सवितृकिरणमण्डले सलिले प्रतिबिम्बिते गगनप्रतिबिम्बत्वव्यवहारस्य भ्रममात्रमूलकत्वात् ।
प्रतिबिम्बवादियोंके मतमें जीव और ईश्वरका विभाग दिखलाया गया है, इस ग्रन्थसे प्रतिबिम्बको न माननेवालोंके मतसे जीव और ईश्वरका विभाग दिखलाया जाता है। जो लोग चैतन्यका प्रतिबिम्ब नहीं मानते हैं, उनका मत है कि लोकमें जिनके प्रतिबिम्ब देखे जाते हैं वे सबके-सब रूपवान् होते हैं, जल आदिमें प्रतिबिम्बित चन्द्र आदिमें रूपवत्ताकी उपलब्धि प्रत्यक्ष ही है और जो स्वतः रूपवान् नहीं हैं, जैसे वायु आदि, उनका प्रतिबिम्ब कहींपर भी नहीं होता है। और कदाचित् अरूपवान्का गगनादिके दृष्टान्तसे प्रतिबिम्ब मान भी लिया जाय, तो भी प्रतिबिम्ब जिस स्थलमें होता है उसमें रूप अवश्य ही रहना चाहिए, क्योंकि अरूपी गगनका रूपवान् जल आदिमें ही प्रतिबिम्ब है, अतः उन प्रतिबिम्बवादियोंका पक्ष श्रद्धेय नहीं हो सकता है, यह रहस्य है । ] पूर्व ग्रन्थोंमें नीरूप गगनके जो प्रतिबिम्बका दृष्टान्त दिया गया है, वह भी अत्यन्त युक्तिशून्य है, कारण कि गगनके महाविस्तारमें व्याप्त सूर्य-किरणमण्डलके जलमें प्रतिबिम्बित होनेपर गगनके प्रतिबिम्बकी प्रतीति केवल भ्रममूलक है, अर्थात् जल आदिमें गगनका प्रतिबिम्ब नहीं होता है किन्तु गगनमें व्याप्त सूर्यके किरणोंका ही प्रतिबिम्ब होता है, परन्तु लोग भ्रमसे व्यवहार करते हैं कि गगनका प्रतिबिम्ब है * ।
* इसमें विचारणीय अंश है कि जैसे बाहर 'आकाश नील है' यह व्यवहार होता है, वैसे ही कूप, तडाग इत्यादिमें भी 'नील आकाश और विशाल गगन' ऐसा व्यवहार सभी करते हैं, परन्तु इस व्यवहारको सत्य नहीं मान सकते, इसलिए कूप आदिमें दृश्यमान आकाश प्रतिबिम्बरूप है, ऐसा मानना होगा। इस परिस्थितिमें गगनका, जो नीरूप है, प्रतिबिम्ब नहीं है, ऐसा अपलाप नहीं कर सकते । नीरूपका प्रतिबिम्ब होता ही नहीं, ऐसा नहीं कहना चाहिए, क्योंकि रूप, संख्या और परिमाणका प्रतिबिम्ब देखा जाता है। यदि शङ्का हो कि नीरूप द्रव्यका प्रतिबिम्ब नहीं होता है, तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि वेदान्त-सिद्धान्तमें द्रव्य और गुणकी परिभाषा ही नहीं है, यदि कथञ्चित् मान लिया जाय कि द्रव्य, गुण आदिकी परिभाषा है, तो भी गगनका प्रतिबिम्ब होता है, इसलिए रूपोपहित द्रव्यका प्रतिबिम्ब होता है, ऐसे नियमका स्वीकार करेंगे। उपहितत्व वस्तुगत स्वगतरूपसे होना चाहिए, या आरोपित रूपसे होना चाहिए। अतः आरोपितरूपवाले आकाशका प्रतिबिम्ब हो सकता है, इसमें कोई बाधक नहीं है। यदि शङ्का की जाय कि जलमें आलोकके प्रतिबिम्ब-से ही निर्वाह हो सकता है, फिर गगनके प्रतिबिम्बमें गौरव है, नहीं, क्योंकि आलोकके
| ११० | सिद्धान्तलेशसंग्रह | [ प्रथम परिच्छेद |
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ध्वनौ वर्णप्रतिबिम्बत्ववादोऽप्ययुक्तः, व्यञ्जकतया सन्निधानमात्रेण ध्वनिधर्माणांमुदात्तादिस्वराणां वर्णेष्कारोपोपपत्तेः ध्वनेर्वर्णप्रतिबिम्बग्राहित्वकल्पनाया निष्प्रमाणकत्वात् ।
प्रतिध्वनिरपि न पूर्वशब्दप्रतिबिम्बः, पञ्चीकरणप्रक्रियया पटहपयो-
ध्वनि वर्णोंका प्रतिबिम्ब है, यह वाद भी युक्त नहीं है, क्योंकि ध्वनिके, जो सन्निधिमात्रसे वर्णोंका व्यञ्जक है, धर्मभूत उदात्त आदि स्वरोंके वर्णोंमें आरोपमात्रसे उपपत्ति हो सकती है, तो फिर ध्वनिमें वर्णप्रतिबिम्बकी ग्राहिता है, इस प्रकारकी कल्पना प्रमाणशून्य है। [ भाव यह है कि ह्रस्वत्व, दीर्घत्व आदि जो धर्म हैं, वे वस्तुतः ध्वनिके ही हैं; परन्तु उनका वर्णोंमें (अकार आदिमें ) आरोप किया जाता है, उनका आरोप तभी हो सकता है, जब ध्वनिको वर्णोंका प्रतिबिम्ब माना जाय। प्रतिबिम्बके स्वीकार करनेसे जैसे दर्पणमें रहनेवाला मालिन्य प्रतिबिम्ब द्वारा मुखमें आरोपित होता है, वैसे ही ध्वनिमें रहनेवाले ह्रस्वत्व आदिका प्रतिबिम्ब द्वारा बिम्बभूत वर्णोंमें आरोप होगा, इस परिस्थितिमें नीरूप ध्वनिमें नीरूप वर्णोंका प्रतिबिम्ब मानना ही पड़ेगा, इस प्रणालीसे नीरूप अन्तःकरणमें नीरूप आत्माका प्रतिबिम्ब क्यों न माना जाय, इसका समाधान इस रीतिसे दिया गया है कि वर्णोंका प्रतिबिम्ब माननेकी कोई आवश्यकता नहीं है, परन्तु व्यञ्जक ध्वनिके सामीप्यमात्रसे ध्वनिमें रहनेवाले ह्रस्वत्व आदिका वर्णोंमें आरोप होता है, जैसे जपाकुसुमके सामीप्यसे रक्तत्वका स्फटिकमें आरोप होता है, अतः वर्णप्रतिबिम्बका स्वीकार न करनेसे इस दृष्टान्तसे अन्तःकरणमें आत्मप्रतिबिम्बका अभ्युपगम नहीं हो सकता ]।
* प्रतिध्वनि भी पूर्वशब्दका प्रतिबिम्ब नहीं है, क्योंकि पञ्ची-
प्रतिबिम्बमें गगनप्रतिबिम्बत्वं भ्रम माननेपर भी उस भ्रमके विषयीभूत गगनप्रतिबिम्बको अनिर्वचनीय मानना होगा, अतः गौरव समान ही है और अनुभवानुसारी गौरव दोषावह नहीं होता, इसलिए रूपवान्का ही प्रतिबिम्ब होता है, इस नियममें गगनमें व्यभिचार दुर्वार है। तथापि चैतन्यका प्रतिबिम्ब नहीं होता है, क्योंकि नीरूप अन्तःकरण प्रतिबिम्बकी उपाधि नहीं हो सकती है, यह रहस्य है।
* भाव यह है कि पटह आदि वायसे उत्पन्न शब्दस्थलमें पाषाणविशेष आदिके समीपवर्ती आकाशप्रदेशमें प्रतिध्वनि सुनी जाती है। वह पूर्व शब्दका प्रतिबिम्ब है, मुख्य ध्वनि
जीवेश्वरस्वरूपविचार ] भाषानुवादसहित १११
निधिप्रभृतिशब्दानां क्षितिसलिलादिशब्दत्वेन प्रतिध्वनेरेवाकाशशब्दत्वेन तस्यान्यशब्दप्रतिबिम्बत्वायोगात् । वर्णरूपप्रतिशब्दोऽपि न पूर्ववर्णप्रतिबिम्बः। वर्णाभिव्यञ्जकध्वनिनिमित्तकप्रतिध्वनेर्मूलध्वनिवदेव वर्णाभिव्यञ्जकत्वेनोपपत्तेः। तस्मात् घटाकाशवदन्तःकरणावच्छिन्नं चैतन्यं जीवः। तदनवच्छिन्नम् ईश्वरः।
न चैवमण्डान्तर्वर्तिनश्चैतन्यस्य तत्तदन्तःकरणोपाधिभिः सर्वात्मना जीव-
करणकी प्रक्रियासे पटह (वाद्यविशेष), समुद्र आदिशब्द पृथ्वी और जल आदिके शब्द हैं, वैसे ही प्रतिध्वनि भी आकाशका ही शब्द है, इसलिए उसे अन्य शब्दका प्रतिबिम्ब मानना युक्तियुक्त नहीं है। वर्णरूपशब्द भी प्रतिध्वनिके समान पूर्व वर्णका प्रतिबिम्ब नहीं है, क्योंकि वर्णकी अभिव्यञ्जक ध्वनिसे उत्पन्न होनेवाली प्रतिध्वनि भी मूलध्वनिके समान वर्णकी अभिव्यञ्जक है, ऐसा माननेसे ही उपपत्ति हो सकती है † । इससे—नीरूप चैतन्यके प्रतिबिम्ब न होनेसे यही स्वीकार करना चाहिए कि घटाकाशके समान अन्तःकरणावच्छिन्न चैतन्य ही जीव है और उपाधिसे अनवच्छिन्न चैतन्य ईश्वर है ।
संसारान्तर्वर्ती चैतन्यका तत्तत् अन्तःकरणरूप उपाधियोंसे सर्वात्मना जीवभावसे अवच्छेद है अर्थात् संसारान्तर्वर्ती समग्र चैतन्य अन्तःकरणरूप उपाधियोंसे
नहीं है, क्योंकि उसका उत्पादक कोई नहीं है, इस परिस्थितिमें जैसे नीरूप ध्वनि नीरूप आकाशमें प्रतिबिम्बित होती है, वैसे ही नीरूप चैतन्य नीरूप अन्तःकरणमें क्यों प्रतिबिम्बित नहीं होता ? नहीं, यह दृष्टान्त युक्त नहीं है अर्थात् नीरूप आकाशमें नीरूप ध्वनिका प्रतिबिम्ब नहीं है, किन्तु वह शब्दान्तर ही है और उसका उत्पादक आकाश है और निमित्त कारण है—पूर्व शब्द । प्रतिध्वनिके प्रतिबिम्बरूप होनेपर आकाशगुण वह नहीं हो सकती, कारण कि बिम्ब और प्रतिबिम्बके भेदपक्षमें प्रतिध्वनिरूप प्रतिबिम्बके प्रातिभासिक होनेसे उसमें व्यावहारिकगुणत्वकी उपपत्ति नहीं हो सकती है और बिम्ब प्रतिबिम्बके अभेद पक्षमें प्रतिध्वनिरूप प्रतिबिम्बके बिम्बभूत पृथ्वी आदि शब्दकी अपेक्षासे भेद न होनेके कारण उसमें आकाशगुणत्वकी उपपत्ति भी नहीं हो सकती है, यह भाव है ।
† तात्पर्य यह है कि कण्ठ, तालु आदि वर्णके व्यञ्जक नहीं हैं, परन्तु कण्ठ आदिके अभिघातसे उत्पन्न ध्वनि ही उसकी अभिव्यञ्जक है, इसलिए जैसे मूलध्वनि वर्णकी व्यञ्जक है, वैसे ही प्रतिवर्णकी अभिव्यक्तिमें उत्पन्न प्रतिध्वनि ही वर्णकी व्यञ्जक है, अतः प्रतिवर्ण भी प्रतिबिम्ब रूप नहीं है, इसलिए इस दृष्टान्तसे भी चैतन्यके प्रतिबिम्बका प्रतिपादन नहीं कर सकते हैं ।
११२ सिद्धान्तलेशसंग्रह - [ प्रथम परिच्छेद
भावेनावच्छेदात् तदवच्छेदरहितचैतन्यरूपस्येश्वरस्याऽण्डाद् बहिरेव सत्त्वं स्यादिति ‘यो विज्ञाने तिष्ठन्’ इत्यादावन्तर्यामिभावेन विकारान्तर- वस्थानश्रवणं विरुध्येत । प्रतिबिम्बपक्षे तु जलगतस्वाभाविकाकाशे सत्येव प्रतिबिम्बाकाशदर्शनात् एकत्र द्विगुणीकृत्य वृत्तिरुपपद्यते इति वाच्यम् । यतः प्रतिबिम्बपक्षेऽप्युपाधावनन्तर्गतस्यैव चैतन्यस्य तत्र प्रतिबिम्बो वाच्यः, न तु जलचन्द्रन्यायेन कृत्स्नप्रतिबिम्बः । तदन्तर्गतभागस्य तत्र प्रतिबिम्बासम्भवात् । नहि मेघावच्छिन्नस्याऽऽकाशस्याऽऽलोकस्य वा जले प्रतिबिम्बवत् जलान्तर्गतस्याऽपि तत्र प्रतिबिम्बो दृश्यते । न वा मुखादीनां बहिःस्थितिसमये इव जलान्तर्निमज्जनेऽपि प्रतिबिम्बोऽस्ति । अतो जलप्रति-
अवच्छिन्न होनेसे जीवभावापन्न ही है, अतः अन्तःकरणरूप उपाधिसे रहित ईश्वररूप चैतन्यका ब्रह्माण्डसे अन्यत्र ही अवस्थान प्राप्त होगा, इस परिस्थितिमें ‘यो विज्ञाने तिष्ठन्’ (जो जीवमें रहता हुआ) इत्यादि श्रुतिमें अन्तर्यामिभावसे ईश्वरका विकारोंके अन्दर जो अवस्थानका श्रवण है, वह विरुद्ध होगा, इसलिए अवच्छेदवाद मानना युक्त नहीं है, प्रत्युत प्रतिबिम्ब पक्ष ही मानना युक्त है, क्योंकि प्रतिबिम्ब पक्षमें तो जलके अन्दर वस्तुतः स्वाभाविक आकाशके रहते ही आकाशप्रतिबिम्ब देखा जाता है, इसलिए प्रकृतमें भी एक ही उपाधिमें प्रतिबिम्बभूत जीवभावसे और तत्तत् उपाधिके अन्तर्यामिभावसे वृत्ति—अवस्थिति उपपन्न हो सकती है, अतः अवच्छेदवाद अयुक्त है । इस प्रकारकी यदि कोई शङ्का करे, तो वह युक्त नहीं है, क्योंकि प्रतिबिम्ब पक्षमें भी उसी चैतन्यका उपाधिमें प्रतिबिम्ब मानना चाहिए, जिसका उपाधिमें अवस्थान नहीं है अर्थात् जो चैतन्य उपाधिके अन्तर्गत नहीं है । जलचन्द्रके दृष्टान्तसे सम्पूर्णका प्रतिबिम्ब नहीं मानना चाहिए । उपाधिके अन्तर्गत भागका उस उपाधिमें प्रतिबिम्ब नहीं हो सकता है, क्योंकि मेघावच्छिन्न आकाश अथवा आलोकका जैसे जलमें प्रतिबिम्ब होता है, वैसे जलान्तर्गत आकाशका या आलोकका जलमें प्रतिबिम्ब नहीं देखा जाता है। अथवा जलसे बाहर जब मुखकी अवस्थिति रहती है, तब जैसे मुखका जलमें प्रतिबिम्ब होता है, वैसे जलके भीतर मज्जन समयमें उस जलमें मुखका प्रतिबिम्ब नहीं देखा जाता है, इससे—अर्थात् कथित दृष्टान्तोंसे यह सिद्ध हुआ कि उपाधिमें अनन्तर्गत
जीवेश्वरस्वरूपविचार ] भाषानुवादसहित ११३
बिम्बं प्रति मेघाकाशादेरिवान्तःकरणाद्युपाधिप्रतिबिम्बं प्रति तदनन्तर्गतस्यैव बिम्बत्वं स्यादिति बिम्बभूतस्य विकारान्तरवस्थानायोगात् ईश्वरे अन्तर्यामिब्राह्मणाञ्जसस्याऽभावस्तुल्यः ।
एतेनाऽवच्छिन्नस्य जीवत्वे कर्तृभोक्तृसमययोस्तत्र तत्राऽन्तःकरणावच्छेद्यचैतन्यप्रदेशस्य भिन्नत्वात् कृतहानाकृताभ्यागमप्रसङ्ग इति निरस्तम् ।
प्रतिबिम्बपक्षेऽपि स्वानन्तर्गतस्य स्वसंनिहितस्य चैतन्यप्रदेशस्याऽन्तःकरणे प्रतिबिम्बस्य वक्तव्यतया तत्र तत्राऽन्तःकरणगमने बिम्बभेदात् तत्प्रतिबिम्बस्याऽपि भेदावश्यम्भावेन दोषतौल्यात् । न च 'अन्तःकरणप्रतिबिम्बो जीवः' इति पक्षे दोषतौल्येऽपि 'अविद्याप्रतिबिम्बो जीवः' । तस्य च तत्र तत्र गत्वरमन्तःकरणं जलाशयव्यापिनो महामेघमण्डलप्रतिबिम्बस्य
का ही उस उपाधिमें प्रतिबिम्ब होता है । इससे जलप्रतिबिम्बके प्रति जैसे मेघाकाश आदिमें बिम्बत्व है, वैसे ही अन्तःकरण आदि उपाधियोंमें रहनेवाले प्रतिबिम्बके प्रति अन्तःकरण आदिमें अनन्तर्भूत चैतन्यमें * बिम्बत्व होगा, इसलिए बिम्बभूत चैतन्यके विकारके अन्दर अवस्थानका अयोग होनेसे प्रतिबिम्बपक्षमें भी 'यो विज्ञाने तिष्ठन्' इत्यादि अन्तर्यामिब्राह्मणकी असमञ्जसता तुल्य ही है * ।
इससे अवच्छिन्न चैतन्यके जीवत्वपक्षमें कर्म करने और उसके फल भोगनेके समयमें पृथ्वी और स्वर्ग आदिमें अन्तःकरणावच्छिन्न चैतन्य प्रदेशके भिन्न होनेपर भी कृतहान या अकृताभ्यागम रूप दोषका प्रसङ्ग—निरस्त हुआ ।
क्योंकि प्रतिबिम्बपक्षमें भी उपाधिमें अनन्तर्गत और उपाधिके सन्निहित चैतन्य प्रदेशका ही अन्तःकरणमें प्रतिबिम्ब होता है, ऐसा कहना होगा, इसलिए उस-उस स्थलमें अन्तःकरणके गमनमें बिम्बके भेदसे उसके प्रतिबिम्बका भेद भी अवश्यम्भावी है, अतः पूर्वोक्त कृतहान और अकृतका अभ्यागमरूप दोष समान ही है । शङ्का होती है कि अन्तःकरणमें चैतन्यका प्रतिबिम्ब जीव है, इस पक्षमें दोषकी समानता रहनेपर भी (हम) अविद्यामें चित्के प्रतिबिम्ब को जीव मानते हैं । जैसे तत्तत् जलाशयोंमें व्यास महा मेघमण्डलके प्रतिबिम्बकी
* अर्थात् लोकमें यही अनुभव होता है कि उपाधिकुक्षिमें अप्रविष्टका ही प्रतिबिम्ब देखा जाता है, उपाधिकुक्षिमें प्रविष्टका प्रतिबिम्ब नहीं देखा जाता, यह भाव है ।
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| ११४ | सिद्धान्तलेशसंग्रह | [ प्रथम परिच्छेद |
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तदुपरि विसृत्वरस्फीतालोक इव तत्र तत्र विशेषाभिव्यक्तिहेतुरिति पक्षे नाऽयं दोषः। अन्तःकरणवदविद्याया गत्यभावेन प्रतिबिम्बभेदानापत्तेरिति वाच्यम् , तथैवाऽवच्छेदपक्षेऽपि 'अविद्यावच्छिन्नो जीवः' इत्यभ्युपगमसम्भवात् । तत्राऽप्येकस्य जीवस्य क्वचित् प्रदेशे कर्तृत्वं प्रदेशान्तरे भोक्तृ-
अभिव्यक्तिका हेतु जलाशयके ऊपर भागमें गमनशील मेघके छिद्रोंसे निकला हुआ स्पष्ट प्रकाश विशेष है, वैसे ही इस लोक या परलोकमें गमनशील अन्तःकरण भी अविद्यामें प्रतिबिम्बभूत जीवकी अर्थात् जीवगत कर्तृत्व, भोक्तृत्व आदिकी विशेष अभिव्यक्तिका हेतु है, इसलिए इस पक्षमें समानताप्रयुक्त दोष नहीं है। कृतहानादि दोष की प्रसक्ति भी नहीं है, क्योंकि अन्तःकरणके समान अविद्याकी गति न होनेसे प्रतिबिम्बका भेद हो ही नहीं सकता। परन्तु यह शङ्का युक्त नहीं है, क्योंकि अवच्छेदपक्षमें भी उसी प्रकार अविद्यावच्छिन्न जीव है, ऐसा स्वीकार कर सकते हैं। * 'अविद्या-
* भाव यह है कि ब्रह्माण्डान्तर्गत चैतन्यभागके उपाधिके अन्तर्गत होनेसे उससे बाहरके चैतन्यका ही प्रतिबिम्ब होगा, अतः ब्रह्माण्डसे बाहर ही बिम्बभूत चैतन्यके अवस्थानकी प्रसक्ति होगी और अन्तर्यामी ब्राह्मणके साथ विरोध होगा। यदि प्रतिबिम्बपक्षमें ईश्वरकी सर्वान्तर्यामित्वप्रतिपादक श्रुतिके अनुसार लोकानुभवका परित्याग करके सम्पूर्ण चैतन्यका प्रतिबिम्ब मानकर अन्तर्यामी ब्राह्मणके सामञ्जस्यका उपपादन किया जाय, तो अनवच्छिन्न चैतन्य ईश्वर है, इस पक्षमें भी अन्तःकरणाभाववच्छिन्न चैतन्य ईश्वर है, ऐसी विवक्षा होगी। अन्तःकरणके कल्पित होनेसे चैतन्यमें अन्तःकरणावच्छिन्नके रहनेपर भी वस्तुसत् अन्तःकरणाभाव है, अतः अन्तःकरणाभाववच्छिन्न चैतन्यरूप ईश्वरका सभी विकारोंमें अवस्थान हो सकता, इससे अन्तर्यामी ब्राह्मणकी इस पक्षमें भी अनुपपत्ति नहीं है। तृप्तिदीप-प्रकरणमें अभाव भी ईश्वरकी उपाधि कहा गया है—
अन्तःकरणसाहित्यराहित्याभ्यां विशिष्यते।
उपाधिर्जीवभावस्य ब्रह्मतायाश्च नान्यथा ॥ ८५ ॥
यथा विधिरुपाधिः स्यात् प्रतिषेधस्तथा न किम् ।
सुवर्णलोहभेदेन शृङ्खलात्वं न भिद्यते ॥ ८६ ॥
अतद्व्यावृत्तिरूपेण साक्षाद्विधिमुखेन च।
वेदान्तानां प्रवृत्तिः स्याद् द्विधेत्याचार्यभाषितम् ॥ ८७ ॥
इन श्लोकोंका तात्पर्य यह है कि अन्तःकरणके साहित्य और साहित्यसे जीवभाव और ब्रह्मभावका भेद है अर्थात् जीवत्वकी उपाधि अन्तःकरणसाहित्य है और अन्तःकरणराहित्य ब्रह्मत्वकी उपाधि है। अन्य प्रकारसे इनका भेद नहीं हो सकता। भावके समान अभावके व्यावर्तक उपाधि
जीवेश्वरस्वरूपविचार ] भाषाअनुवादसहितं ११५
त्वमित्येवं कृतहानादिदोषापनुत्तये वस्तुतो जीवैक्यस्य शरणीकरणीयत्वेन तन्न्यायादन्तःकरणोपाधिपक्षेऽपि वस्तुतश्चैतन्यैक्यस्य तदवच्छेदकोपाध्यैक्यस्य च तन्नत्वाभ्युपगमेन तद्दोषनिराकरणसम्भवाच्च । न चाऽवच्छेदपक्षे 'यथा ह्ययं ज्योतिरात्मा विवस्वानपो भिन्ना बहुधैकोऽनुगच्छन् । उपाधिना
प्रतिबिम्बो जीवः' इस पक्षमें भी ब्राह्मण आदि शरीरगत अन्तःकरणसे अवच्छिन्न प्रदेशमें कर्तृत्व और देव आदि शरीरगत अन्तःकरणसे अवच्छिन्न प्रदेशमें भोक्तृता है, इस प्रकार प्रदेश-भेद होनेपर भी कृतहान आदि दोषका निराकरण करनेके लिए अगत्या प्रतिबिम्बवादियोंको एकजीववादपक्षका अङ्गीकार करना होगा, अतः इसी न्यायके आधारपर अन्तःकरणोपाधिपक्षमें भी (अन्तःकरणावच्छिन्न चैतन्य जीव है, इस पक्षमें भी अन्तःकरणसे अवच्छिन्न चैतन्य-प्रदेशके भिन्न होनेपर भी ) वास्तवमें चैतन्यकी एकता और चैतन्यकी अवच्छेदक उपाधिकी एकताको प्रयोजक माननेसे कृतहान आदि दोषोंका निराकरण भी * हो सकता है । परन्तु अवच्छेदपक्षमें—'यथा ह्ययं ज्योतिरात्मा०'
होनेमें कोई विशेष नहीं है । जैसे सुवर्ण और लोहके भेदसे शृङ्खलात्वमें कोई विशेषता नहीं होती, वैसे ही भावाभावके व्यावर्तकत्वमें विशेषता नहीं है । वेदान्तोंकी अतद्व्यावृत्ति और विधिमुखसे द्विधा प्रवृत्ति होती है, ऐसा आचार्योंका सम्मत पक्ष है। अतद्व्यावृत्ति—तत् शब्दसे ब्रह्मका परिग्रह होता है, अतत् शब्दसे ब्रह्मभिन्न अन्तःकरण आदिका, उनकी व्यावृत्तिरूपसे ब्रह्मका बोध होता है और बुद्धिका साक्षी, मनका साक्षी, इस प्रकार विधिमुखसे भी ब्रह्मका बोध होता है । इस परिस्थितिमें प्रतिबिम्ब और अवच्छेद दोनों वादोंमें अन्तर्यामी ब्राह्मणकी उपपत्ति और अनुपपत्तिके समान होनेपर 'सुतरां नीरूपे' इत्यादिसे नीरूप अन्तःकरण आदिमें चैतन्यके प्रतिबिम्बके असंभवका प्रतिपादन होनेसे अवच्छेदपक्ष ही आदरणीय है, प्रतिबिम्बपक्ष आदरणीय नहीं है।
* तात्पर्य यह है कि वस्तुतः चैतन्य यदि एक है, तो अन्य जीव द्वारा किये गये कर्मोंके फलका भोग अन्यको होगा, यह आपत्ति देना युक्त नहीं है, क्योंकि अवच्छेदवादियोंके मतमें एक अन्तःकरणसे अवच्छिन्न चैतन्य एक जीव है और अन्य अन्तःकरणसे अवच्छिन्न अन्य जीव है इस प्रकारका अभ्युपगम होनेसे अन्तःकरणोंके भिन्न-भिन्न होनेसे जीवान्तर-कृत कर्मोंका जीवान्तरोंसे भोग नहीं हो सकता है, इसी रहस्यको ग्रन्थकारने ( तदवच्छेदकोपाधि ) इस शब्दसे प्रकट किया है। इस अवच्छेदपक्षमें पूर्वकथनानुसार अन्तःकरणके अभावसे युक्त चैतन्य—अन्तःकरणाभावावच्छिन्न चैतन्य—ईश्वर है अथवा 'कारणोपाधिरीश्वरः' इस श्रुतिके अनुरोधसे अविद्यावच्छिन्न चैतन्य ईश्वर है, ऐसा समझना चाहिए ।