सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)
Siddhanta Lesha Sangraha Hindi
श्रीमदप्पय्य दीक्षित द्वारा
स्रोत: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (उद्गम)
| ७६ | सिद्धान्तलेशसंग्रह | [ प्रथम परिच्छेद |
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सद्रूपेण ब्रह्मणा विवर्तमानेन जडेनाऽज्ञानेन परिणामिना चाऽभेदः; 'सन् घटः, जडो घटः' इति सामानाधिकरण्यानुभवात् ।
न च 'तदनन्यत्वमारम्भणशब्दादिभ्यः' ( उ० मी० अ० २ पा० १ अधि० ६ सू० १४ ) इति सूत्रे 'अनन्यत्वं व्यतिरेकेणाऽभावः' 'न खल्व-नन्यत्वमित्यभेदं ब्रूमः, किन्तु ? भेदं व्यासेधामः' इति भाष्यभामतीनि-बन्धनाभ्यां प्रपञ्चस्य ब्रह्माभेदनिषेधादभेदाभ्युपगमे अपसिद्धान्त इति वाच्यम्, तयोर्ब्रह्मरूपधर्मिसमानसत्त्वाकाभेदनिषेधे तात्पर्येण शुक्तिरजत-योरिव प्रातीतिकाभेदाभ्युपगमेऽपि विरोधाभावादिति ।
हो, वही उपादान है। सद्रूप विवर्तमान ब्रह्मके साथ तथा परिणामी जडरूप अज्ञानके साथ प्रपञ्चका अभेद भासता है, क्योंकि 'सन् घटः' और 'जडो घटः' अर्थात् घटमें सत्ताका और जड़ताका अनुभव होता है।
अब शङ्का होती है कि * 'तदनन्यत्वमारम्भणशब्दादिभ्यः' इस सूत्रमें अनन्यत्वका अर्थ है—'कारणसे पृथक् कार्यका न रहना' 'अनन्यत्वशब्दका अर्थ हम अभेद नहीं करते हैं, परन्तु भेदका निषेध करते हैं' इस प्रकार भाष्य और भामती ग्रन्थसे ब्रह्म और प्रपञ्चके अभेदका निषेध किया गया है, अतः यदि प्रपञ्च और ब्रह्मका परस्पर अभेद माना जाय, तो अपसिद्धान्त होगा, परन्तु यह शङ्का युक्त नहीं है, क्योंकि उन निबन्धोंका ब्रह्मरूपधर्मीके समान-सत्तावाले अभेदके निषेधमें तात्पर्य है, अर्थात् पारमार्थिक अभेदके निषेधमें अभिप्राय है, अत एव जैसे शुक्ति और रजतमें प्रातीतिक अभेदके स्वीकारमें विरोध नहीं है, वैसे ही प्रकृतमें भी प्रातीतिक अभेदके स्वीकरणमें कोई विरोध नहीं है।
* इस सूत्रका अर्थ है—तदनन्यत्वम्—तयोः—कार्यकारणयोः अनन्यत्वम्—उन कार्य और कारणका अनन्यत्व है, क्योंकि आरम्भण आदि श्रुतियाँ, इस अर्थका प्रतिपादन करती हैं। आरम्भणशब्दसे 'वाचारम्भण' श्रुति ली जाती है और आदि शब्दसे 'आत्मैवेदं सर्वम्' 'नेह नानास्ति किञ्चन' इत्यादि श्रुतियोंका संग्रह करना चाहिए। भाव यह हुआ कि कार्य और कारण तत्त्वान्तर माने जायँ, तो जगत्कारण ब्रह्ममें सर्वात्मत्वकी प्रतिपादिका श्रुतियाँ विरुद्ध होंगी। अतः अनन्यत्व मानना चाहिए।
मायाकी कारणताका विचार ] भाषानुवादसहित ७७
ब्रह्ममात्रमुपादानं माया तु द्वारकारणम् ।
मृच्छ्लक्ष्णतावत् संक्षेपशारीरककृतां नये ॥ २५ ॥
संक्षेपशारीरककारके मतमें केवल ब्रह्म जगत्के प्रति उपादान है और माया तो जैसे घट आदिके प्रति मृत्तिकाका श्लक्ष्णत्व द्वार कारण है, वैसे ही द्वार कारण है ॥ २५ ॥
**सङ्क्षेपशारीरककृतस्तु—**ब्रह्मैवोपादानम् । कूटस्थस्य स्वतः कारणत्वानुपपत्तेः माया द्वारकारणम् । अकारणमपि द्वारं कार्येऽनुगच्छति ।
ब्रह्म ही जगत्का उपादान कारण है, माया उपादान कारण नहीं है, ऐसा संक्षेपशारीरककार कहते हैं, कूटस्थ ब्रह्ममें स्वतः कारणताकी उपपत्ति नहीं हो सकती, अतः माया द्वार कारण है । [ भाव यह है कि यदि मायाके बिना ही ब्रह्म जगत्के प्रति उपादान कारण हो, तो माया व्यर्थ होगी और ब्रह्म स्वयं परिणामी होगा, इस परिस्थितिमें परिणामवादियोंके मतमें परिणाम और परिणामीका परस्पर वस्तुसत् अभेद होनेसे परिणामके जन्म आदि विकारोंसे ब्रह्म भी विकृत होगा, और इसे स्वीकार नहीं कर सकते हैं, क्योंकि 'न जायते' ( आत्मा उत्पन्न नहीं होता ) इस प्रकार अनेक श्रुतियोंके साथ
* संक्षेपशारीरककार कूटस्थ ब्रह्मको जगत्के प्रति उपादान मानते हैं, इसके सविशेष दृढ़ीकरणमें उन्हींके दो श्लोक देते हैं—
उपादनता चेतनस्याऽपि दृष्टा यथा स्वप्नसर्गे विचित्रे प्रतीचः ।
यथा चोर्णनाभस्य सूत्रेषु पुंसां यथा केशलोमादिसृष्टौ च दृष्टा ॥
[ संक्षेपशा० १ अ० श्लो० ५४५ ]
अज्ञानतज्जघटना चिदधिक्रियायाम् द्वारं परं भवति नाधिकृतत्वमस्याः ।
नाचेतनस्य घटतेऽधिकृतिः कदाचित् कर्तृत्वशक्तिविरहादिति वक्ष्यते हि ॥
[ संक्षेपशा० १ अ० श्लो० ५५५ ]
**अर्थात्—**जैसे विचित्र स्वप्नसृष्टिमें निद्रासे तिरस्कृत—अभिभूत है करणसमुदाय जिसका ऐसा प्रत्यगात्मा उपादान है, और जैसे ऊर्णनाभ उसके सूत्रोंके प्रति उपादान है अथवा जैसे केश, लोम आदिमें पुरुष उपादान है, वैसे ही कूटस्थ चेतन भी उपादान है । अविद्या और उसके कार्यका अध्यास ब्रह्मकी अधिकारितामें अर्थात् जगत्के प्रति ब्रह्ममें उपादानत्वके सम्पादनमें निमित्तमात्र है, क्योंकि अचेतनकी अध्यासमें अधिकारिता नहीं है, कारण कि उसमें कर्तृत्वशक्तिका अभाव है, ऐसा कहेंगे । और ५५३ के 'अनधिकारिणि शुद्धचिदात्मके' इत्यादिमें भी 'माया ब्रह्मकी अधिकारिताकी सम्पादिका है' ऐसा कहा गया है । इससे स्पष्ट रीतिसे ज्ञात होता है कि संक्षेपशारीरककारने मूलोक्त विषयका अत्यन्त विस्तारसे अपने ग्रन्थमें विवेचन किया है ।
७८ सिद्धान्तलेशसंग्रहं [ प्रथम परिच्छेदे
मृद इव तद्गतश्लक्ष्णत्वादेरपि घटे अनुगमनदर्शनादित्याहुः ।
ब्रह्मैव जीवाश्रितयाऽविद्यया विषयीकृतम् ।
वाचस्पतिमते हेतुर्माया तु सहकारिणी ॥ २६ ॥
वाचस्पतिमिश्रके मतमें जीवाश्रित अविद्यासे विषयीकृत ब्रह्म ही जगत्के प्रति उपादान है और माया तो सहकारी कारण है ॥ २६ ॥
विरोध होगा, कारण कि उन श्रुतियों द्वारा ब्रह्ममें नित्यत्व, अविकारित्व आदिका प्रतिपादन किया गया है। अतः मायाके द्वारा ही ब्रह्म कारण है, ऐसा कहना चाहिए, अतः माया व्यर्थ भी नहीं है। जैसे घटादिके प्रति मृद् आदिके उपादान होनेपर भी मृत्तिकामें रहनेवाला श्लक्ष्णत्व आदि संस्कार द्वारकारण हैं, क्योंकि जब तक मृत्तिकाका संस्कार न किया जाय, तब तक मृत्तिकामें घटादिकी उपादानता नहीं घट सकती है, वैसे ही कूटस्थ चैतन्यरूप ब्रह्ममें आरोपित माया उसमें (ब्रह्ममें) जगत्प्रकृतित्वका सम्पादन करके सहकारिकारण बन जाती है। मायामें उपादानत्वकी प्रतिपादिका 'मायांन्तु प्रकृतिं विद्यात्' इत्यादि श्रुतिके साथ विरोध भी नहीं है, क्योंकि उन श्रुतियोंका तात्पर्य यह है कि माया ही ब्रह्ममें प्रकृतित्वका निर्वाह करती है, अतः उसमें प्रकृतित्वका केवल उपचार है। इसीलिए मायामें शक्तित्वका व्यवहार होता है—'पराऽस्य शक्तिर्विविधैव श्रूयते' (इस ब्रह्मकी अनेक परा शक्तियाँ हैं) और मृत्तिकामें रहनेवाली शक्तिमें घटादिके प्रति उपादानता लोकमें नहीं देखी जाती है। अतः माया और ब्रह्म दोनोंमें उपादानता नहीं है। इस मतमें परिणामी उपादान कोई नहीं, होगा यदि ब्रह्ममें वैसी उपादानता मानी जाय, तो सैकड़ों श्रुतियोंके साथ विरोध होगा, इसलिए वाचस्पतिमतके समान चित्में अध्यस्तमाया-विषयीकृत ब्रह्मका प्रपञ्च विवर्त है, यही इस मतमें मानना होगा, संक्षेप-शारीरकमें कहींपर मायामें परिणामित्वका कथन किया गया है, वह अन्य मतोंके अभिप्रायसे किया गया है, यह ध्यानमें रखना चाहिए]। अकारण भी द्वार-कार्यमें अनुस्यूत होता है। जैसे कि मृत्तिकाके समान मृत्तिकामें रहनेवाले श्लक्ष्णत्व आदिका भी घटमें अनुगम होता है, यह देखा जाता है। अतः मायाकी जड़ताका घटादिमें भान होता है।
मायाकी कारणताका विचार ] भाषानुवादसहित ७९
वाचस्पतिमिश्रास्तु--जीवाश्रितमायाविषयीकृतं ब्रह्म'स्वत एव जाड्याश्रयप्रपञ्चाकारेण विवर्तमानतयोपादानमिति माया सहकारिमात्रम्, न कार्यानुगतं द्वारकारणमित्याहुः ।
वाचस्पतिमिश्र, कहते हैं कि जीवकी आश्रित मायासे विषयीकृत ब्रह्म ही स्वयं जाड्यका आश्रयीभूत अर्थात् जड़ प्रपञ्चके आकारसे विवर्तमानरूपसे उपादान है, अतः माया सहकारी कारण ही है। कार्यानुगत द्वारकारण नहीं है * ।
• वाचस्पतिमिश्रके उक्त मतमें एक विचार उपस्थित होता है कि अक्षरब्राह्मणमें आकाशशब्दसे कहलनेवाली मायाका अक्षरशब्दसे वाच्य नित्य चैतन्य रूप ब्रह्म ही आश्रय माना गया है, इसलिए उसका (मायाका) जीव आश्रय है, यह कहना अत्यन्त विरुद्धसा ज्ञात होता है और 'मायिनं तु महेश्वरम्' (महेश्वरको मायाका आश्रय जानो) इत्यादि प्रत्यक्ष श्रुतियाँ मायाके ब्रह्माश्रितत्वमें प्रमाण हैं जीवाश्रितत्वमें प्रमाण नहीं, अतः उभयथा यह मत असङ्गत है, दूसरी बात यह है कि जीवके मायाश्रय होनेपर जीवमें जगदुपादानत्वका प्रसङ्ग आवेगा ब्रह्ममें नहीं आवेगा। अपि च यदि माया ब्रह्मकी उपाधि न हो, तो ब्रह्म नियन्ता भी कैसे होगा? इसपर वाचस्पतिमिश्रके अनुयायियोंका कहना है कि जीवाश्रितत्वपदसे जीवत्वविशिष्ट चैतन्याश्रितत्व विवक्षित नहीं है, परन्तु अक्षरब्राह्मणके अनुरोधसे चैतन्याश्रितत्व ही विवक्षित है। और मायापदसे वेदनीय अविद्याकी चैतन्यवृत्तिमें जीवत्वका अवच्छेदकरूपसे भान होता है, अतः मायामें जीवाश्रितत्वका कथन है और 'निरवद्यं निरञ्जनम्' इत्यादि श्रुतिसे ब्रह्मके निर्गुणत्वका ज्ञान होनेसे उसे अविद्याश्रय मानना विरुद्ध ही है 'मायिनं तु महेश्वरम्' इत्यादि श्रुतिका माया और ब्रह्मका परस्पर विषयविषयीभावरूप सम्बन्धके बोध करनेमें तात्पर्य है। प्रपञ्चका उपादान जीव होगा, यह आपत्ति भी वन्ध्यापुत्रके समान मिथ्या है, क्योंकि समस्त प्रपञ्च जीवाश्रितमायाविषयीकृत ब्रह्मका विवर्त है, ऐसा स्वीकार करनेसे जीवमें जगत्की उपादानकारणताकी प्रसक्ति नहीं होगी। ब्रह्ममें वस्तुतः उपाधिका सम्पर्क न होनेपर भी सर्वनियन्तृत्व आदिकी—जीवकी अविद्यासे विषयीकृत ब्रह्मके विवर्त रूपसे—ब्रह्मधर्मसे कल्पना की जाती है, इसलिए जीवाविद्याविषयीकृत ब्रह्म ही प्रपञ्चाकारसे विवर्त मान होता है, इसमें कोई दोष नहीं है।
आरम्भणाधिकरणके भाष्यमें 'मूलकारणमेव······नटवत्सर्वव्यवहारास्पदत्वं प्रतिपद्यते' नटके दृष्टान्तसे वाचस्पतिमिश्रका यह मत ज्ञात होता है, इसीलिए कल्पतरुमें कहा गया है कि-
स्वाश्रया नटवद् ब्रह्म कारणं शङ्करोऽब्रवीत् ।
जीवभ्रान्तिनिमित्तं तद् बभाषे भामतीपतिः ॥
अज्ञातं नटवद् ब्रह्म कारणं शङ्करोऽब्रवीत् ।
जीवाज्ञानं जगद्बीजं जगौ वाचस्पतिस्तथा ॥
अर्थात् जैसे द्रष्टाओंसे अविज्ञात है रूप जिसका ऐसा नट उन-उन अभिनयोंको, जो वस्तुतः सत्य नहीं है, प्राप्त होता है, वैसे ही जीवों द्वारा अज्ञातस्वरूप ब्रह्म ही असत्य
८० | सिद्धान्तलेशसंग्रह | [ प्रथम परिच्छेद
अपूर्वानपरं ब्रह्म नोपादानं जगत्स्थितेः ।
माया तु मुख्योपादानमिति मुक्तावलीकृतः ॥ २७ ॥
कार्य्य कारणसे रहित ब्रह्म जगत्के प्रति उपादान नहीं हो सकता है, इसलिए माया ही मुख्य कारण है, ऐसा सिद्धान्त मुक्तावलीकार कहते हैं ॥ २७ ॥
सिद्धान्तमुक्तावलीकृतस्तु—मायाशक्तिरेवोपादानं न ब्रह्म ‘तदेतद् ब्रह्मापूर्वमनपरमवाह्यम्’ ‘न तस्य कार्यं करणं च विद्यते’ इत्यादिश्रुतेः जगदुपादानमायाधिष्ठानत्वेन उपचारादुपादानम्, तादृशमेवोपादानत्वं लक्षणे विवक्षितमित्याहुः ॥ ५ ॥
मायाशक्ति ही उपादान है ब्रह्म उपादान नहीं है, क्योंकि ‘तदेतत् ०’ (प्रकृत बुद्धि आदिका साक्षीरूप ब्रह्म कारण नहीं है, कार्य नहीं है और वाह्य नहीं है) ‘न तस्य०’ (उसका अर्थात् ब्रह्मका कोई कारण और कार्य नहीं है) इत्यादि श्रुतियोंसे ब्रह्ममें उपादानताका निषेध किया गया है । और ब्रह्ममें जो उपादानताका व्यवहार होता है, वह तो केवल जगत्की उपादान मायाके अधिष्ठान होनेसे औपचारिक व्यवहार होता है । इसीलिए जगदुपादानमायाधिष्ठानत्व ही उपादानत्व लक्षणमें अर्थात् ब्रह्मके लक्षणमें विवक्षित है, ऐसा सिद्धान्त-मुक्तावलीकार कहते हैं * ॥ ५ ॥
वियदादिकी आकारताको प्राप्त होता है और उसके द्वारा व्यवहारकी विषयताको प्राप्त होता है, इस दृष्टान्तसे भामतीकारका मत शङ्कराचार्यके अनुकूल है, ऐसा प्रतीत होता है [ पृ० ४७१ कल्पतरु निर्णय० मु० ] और 'न ह्यचेतनं चेतना...’ से लेकर 'तस्माज्जीवाधिकरणाप्यविद्या निमित्ततया विषयतया चेश्वरमाश्रयते इतीश्वराश्रयेत्युच्यते, न त्वाधारतया, विद्यास्वभावे ब्रह्मणि तदनुपपत्तेरिति' भाव यह है कि जीवमें रहनेवाली अविद्या निमित्त और विषय रूपसे ईश्वरको आश्रय करती है, अतः ईश्वराश्रय माया कही जाती है, वस्तुतः आधाररूपसे ईश्वराश्रय है नहीं, क्योंकि जिसका विद्यास्वभाव है, उसमें अविद्या कैसे रह सकती है [ कल्पतरुसहित भाम० पृ० ३७८ निर्णय-सागर मु० ] इससे स्पष्ट ज्ञात होता है कि मूलोक्त वाचस्पतिमिश्रका पक्ष भामती ग्रन्थमें स्पष्ट ही है ।
* इसी भावको सिद्धान्तमुक्तावलीकार श्रीप्रकाशानन्दस्वामीजी निम्न लिखित पंक्तियोंसे प्रकट करते हैं—
ब्रह्माज्ञानात् जगज्जन्म ब्रह्मणोऽकारणत्वतः ।
अधिष्ठानत्वमात्रेण कारणं ब्रह्म गीयते ॥३८॥
दृश्यत्वाद्यनुमानसिद्धानिर्वचनीयस्य जगतः अनाद्यनिर्वचनीया अविद्यैव कारणम्, न ब्रह्म, तस्य कूटस्थस्य कार्यकारणविलक्षणत्वात्, 'तदेतद् ब्रह्मापूर्वमनपरमनन्तरमवाह्यम्' 'अयमात्मा .
जीवेश्वरस्वरूपविचार ] भाषानुवादसहित ८१
क ईश्वरोऽथ को जीवः ? प्रकटार्थकृतो विदुः ।
ईशं मायाचिदाभासं जीवमाविद्यकं च तम् ॥ २८ ॥
अनादिर्विश्वप्रकृतिर्माया चिन्मात्रसंश्रया ।
तदेकदेशोऽविद्या तु विक्षेपावरणान्विता ॥ २९ ॥
ईश्वर कौन है और जीव कौन है ? इस प्रकारकी विप्रतिपत्तिमें प्रकटार्थकार कहते हैं कि मायामें चैतन्यका जो आभास है, वह ईश्वर है और अविद्यामें चैतन्यका जो आभास है, वह जीव है । अनादि विश्वकी प्रकृति और चिन्मात्रमें रहनेवाली माया है और उस मायाका आवरण-विक्षेपशक्तियुक्त एकदेश अविद्या है ॥ २८ ॥ २९ ॥
अथ क ईश्वरः को वा जीवः ? अत्रोक्तं प्रकटार्थविवरणे—
[ पूर्वग्रन्थमें जगत्के उपादान ईश्वरका और ‘जीवाश्रित माया’ इस वाक्यमें जीवका कथन हुआ है, अतः प्रसङ्गसे या उपोद्घात सङ्गतिसे ईश्वर और जीवके स्वरूपका निर्णय करनेके लिए प्रश्न करते हैं— ] ईश्वर कौन है और जीव कौन है ? अर्थात् ईश्वर और जीवका क्या लक्षण है । इस परिस्थितिमें प्रकटार्थ-
ब्रह्म सर्वानुभूः' इति श्रुतेः । कथं तर्हि ब्रह्मणो जगत्कारणत्वं श्रुतौ प्रसिद्धम् ? जगत्कारणाधिष्ठानत्वेन कारणत्वोपचारात् । ब्रह्मकारणश्रुतेरन्यार्थत्वाच्च—'एकमेवाद्वितीयमिति श्रुतेः अद्वितीयत्वं तावद् ब्रह्मणः सिद्धं तत्कथं सम्भाव्यतामिति कार्यकारणयोः अभेदस्तावल्लोकप्रसिद्धः······ अज्ञानं कारणमिति अविदितत्वाच्च । साथ ही साथ इनका सारांश भी सुन लीजिए—ब्रह्माज्ञानसे अर्थात् अज्ञानसे ही जगत्की उत्पत्ति होती है, क्योंकि ब्रह्म अविकारी होनेसे कारण नहीं हो सकता, यदि ब्रह्ममें कारणत्वव्यवहार होता है, तो केवल जगत्की उपादान मायाके आश्रय होनेसे होता है, वस्तुतः किसी प्रकारका कारणत्व उसमें है ही नहीं । इसलिए ‘विमत अनिर्वचनीय है, दृश्यत्व होनेसे, इत्यादि दृश्यत्वहेतुसे अनुमानसे सिद्ध अनिर्वचनीय जगत्की अनादि अनिर्वचनीय अविद्या ही कारण है, ब्रह्म नहीं, क्योंकि ‘तदेतद् ब्रह्मापूर्वम्०’ ( अज्ञान आदिका विषय जगत् ब्रह्म ही है अर्थात् जगत्का स्वरूप ब्रह्मसे अन्य नहीं है, वह ब्रह्म कारण और कार्य रहित है, तथा अव्याकृताननुगत है.) इत्यादि श्रुतियोंसे कूटस्थ ब्रह्ममें कारणत्वका निषेध किया गया है । कहींपर श्रुतिमें ब्रह्मकी जगत्कारणता जो प्रसिद्ध है, वह जगत्कारण मायाके अधिष्ठान होनेसे उपचारमात्रसे है और ब्रह्ममें कारणत्वप्रतिपादक श्रुतिका प्रयोजन ‘ब्रह्म कारण है’ इस अर्थका प्रतिपादन करना नहीं है, परन्तु अन्य है अर्थात् ‘एकमेवाद्वितीयम्’ ( एक ही अद्वितीय ब्रह्म है ) इत्यादि श्रुतिसे ‘ब्रह्म अद्वितीय है’ ऐसा सिद्ध होता है । परन्तु इसका सम्भव कैसे हो सकता है, इस प्रकार असम्भावनाके प्राप्त होनेपर लोकप्रसिद्ध कार्यकारणके अभेदके अनुसार उक्त असम्भावनाकी निवृत्ति करना ही कारणत्वबोधक श्रुतिका तात्पर्य है, अतः अज्ञान ही कारण है ।
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८२ सिद्धान्तलेशसंग्रह [ प्रथम परिच्छेद
अनादिरनिर्व्वाच्या भूतप्रकृतिश्चिन्मात्रसम्बन्धिनी माया । तस्यां चित्प्रतिबिम्ब ईश्वरः, तस्या एव परिच्छिन्नानन्तप्रदेशेष्वावरणविक्षेपशक्तिमत्सु अविद्याभिधानेषु चित्प्रतिबिम्बो जीव इति ।
विवरणमें कहा गया है—अनादि, अनिर्वचनीय, * सर्व भूतोंकी प्रकृति और चिन्मात्रमें रहनेवाली जो माया है, उस मायामें चैतन्यका जो प्रतिबिम्ब है, वह ईश्वर है और उसी मायाके अविद्या नामक आवरण और विक्षेपशक्तिवाले जो परिच्छिन्न अनन्त प्रदेश हैं, उनमें चैतन्यका प्रतिबिम्ब जीव है ।
* यहाँ अनिर्वचनीयशब्दसे मायाकी सत्यताका निराकरण किया गया है, अन्यथा जैसे सांख्य प्रकृतिको सत्य मानते हैं; वैसे ही किसीको यह शङ्का हो सकती है कि 'माया' वेदान्तमतमें भी सत्य है। माया अनिर्वचनीय है, इसमें भी युक्तियोंका अनुसन्धान करना चाहिए, माया ब्रह्मसे वस्तुतः भिन्न भी नहीं है, क्योंकि ब्रह्मभिन्न सम्पूर्ण प्रपञ्चके मिथ्या होनेसे उसका भेद वास्तविक हो ही नहीं सकता। ब्रह्मसे माया अभिन्न भी नहीं है, क्योंकि चैतन्य और जड़ एक कैसे हो सकते हैं, भिन्ना-भिन्न अर्थात् ब्रह्मसे भिन्न भी है और अभिन्न भी है, ऐसा नहीं कह सकते, कारण कि परस्पर विरुद्ध भिन्नत्व और अभिन्नत्व धर्म एक मायामें कैसे रहेंगे। माया सत् भी नहीं है, द्वैतापत्ति होनेसे अद्वैत श्रुतिके साथ विरोध होगा, असत् भी वह नहीं कही जा सकती, क्योंकि जगत्की प्रकृति वह कैसे होगी, अर्थात् असत् पदार्थ किसी भी वस्तुके प्रति उपादान या निमित्त कारण नहीं हो सकता है। मायाको सदसत् नहीं कह सकते, पूर्वके समान सत्त्व और असत्त्व, जो परस्पर तेज और अन्धकारके समान विरुद्ध हैं, एकमें कदापि नहीं रह सकते। इसी प्रकार मायाको सावयव नहीं कह सकते, क्योंकि ऐसा स्वीकार करनेसे मायामें सादित्वका प्रसङ्ग होगा और सुतरां उसके प्रतिबिम्बभूत ईश्वरमें भी सादित्वकी प्रसक्ति होगी, और मायाके सादि माननेसे उसकी कारण और माया माननी पड़ेगी, निरवयव भी नहीं मान सकते हैं, क्योंकि जो निरवयव पदार्थ है, वह भी किसीका उपादान कारण या प्रकृति नहीं हो सकता।
निरवयव और सावयवरूप नहीं कह सकते, क्योंकि सावयत्व और निरवयवत्वके एक स्थलमें रहनेमें विरोध है। इससे सभी प्रकारसे मायाका निर्वचन करना असम्भव होनेके कारण परिशेषात् उसे अनिर्वचनीय ही मानना चाहिए।
मूलमें प्रदेशशब्दमें परिच्छिन्नत्व विशेषण देनेसे उसमें प्रतिबिम्ब जीव भी परिच्छिन्न है, यह लाभ होता है। इसीलिए अनेक स्थलोंमें भाष्यमें भी जीवका परिच्छिन्नत्व कथन सङ्गत होता है—जैसे 'सर्वत्र प्रसिद्धोपदेशात्' इस सूत्रके भाष्यमें जीवनिरूपणमें अर्थात् सूत्रस्थ शारीरपदके निर्वचनमें 'शारीर इति शरीरे भव इत्यर्थः । ननु ईश्वरोऽपि शरीरे भवति, सत्यं शरीरे भवति, न तु शरीर एव भवति' इत्यादिसे जीवमें परिच्छिन्नत्वका व्यपदेश भली भाँति किया गया है। यद्यपि अनादि होनेसे मायामें अनन्त प्रदेश नहीं हो सकते है, तथापि मायाके आवरणशक्ति और विक्षेपशक्तिसे युक्त होनेसे उसके आधारपर मायाके अनेक प्रदेश बतलाये-
जीवेश्वरस्वरूपविचारं ] भाषांनुवादसहित ८३
उक्ता तत्त्वविवेके तु शुद्धसत्त्वमयी स्फुटा ।
माया रजस्तमोऽवरस्ताऽविद्या, शेषं तु पूर्ववत् ॥ ३० ॥
तत्त्वविवेकमें तो शुद्धसत्त्वप्रधान मूलप्रकृति माया कही गई है तथा रज और तमसे तिरस्कृत मूलप्रकृति अविद्या कही गई है, शेष पूर्वके समान है ॥ ३० ॥
तत्त्वविवेके तु—त्रिगुणात्मिकाया मूलप्रकृतेः 'जीवेशावाभासेन करोति माया चाऽविद्या च स्वयमेव भवति' इति श्रुतिसिद्धौ द्वौ रूपभेदौ । रजस्तमोऽनभिभूतशुद्धसत्त्वप्रधाना माया, तदभिभूतमलिनसत्त्वा अविद्येति मायाऽविद्याभेदं परिकल्प्य, मायाप्रतिबिम्ब ईश्वरः, अविद्याप्रतिबिम्बो जीव इत्युक्तम् ।
त्रिगुणात्मिका अर्थात् सत्त्व, रज और तम इन तीन गुणोंकी साम्यावस्था-रूप मूल प्रकृतिके माया और अविद्या दो स्वरूप 'जीवेशावाभासेन करोति'० ( जीव और ईशको आभाससे करती है माया और अविद्या स्वयं होती है ) इत्यादि श्रुतिसे सिद्ध हैं । उनमें रज और तमसे तिरस्कृत न होकर जो मुख्य-रूपसे शुद्धसत्त्वप्रधान है वह माया है । जो रज और तमसे अभिभूत होकर मलिनसत्त्वप्रधान है, वह अविद्या है, इस प्रकार माया और अविद्याके भेदकी कल्पना करके मायामें प्रतिबिम्बित चैतन्य ईश्वर और अविद्यामें प्रतिबिम्बित चैतन्य जीव है, ऐसा तत्त्वविवेकमें * कहा गया है ।
गये हैं । आवरणशक्ति—ब्रह्म चैतन्यको आवृत्त करनेवाली मायाकी शक्ति और आवरण—'ब्रह्म नहीं है, ब्रह्म प्रकाशित नहीं होता' इस प्रकारके व्यवहारकी योग्यता । विक्षेपशक्ति—तत्तज्जीवोंमें रहनेवाले असाधारण दुःखोंके अनुकूल मायाकी शक्ति । भाष्यकार अविद्याको जीवकी उपाधि मानते हैं वह भी प्रदेशोंके अभिप्रायसे है अर्थात् उन उन स्थलोंमें आया हुआ अविद्याशब्द प्रदेशार्थक है ।
* तत्त्वविवेकशब्दसे विद्यारण्यस्वामीकृत पञ्चदशीका प्रथमप्रकरण ही अभिप्रेत है, क्योंकि पञ्चदशीके आरम्भमें तत्त्वविवेकप्रकरण है । किसी-किसीका मत है कि पञ्चदशीमें आये हुए सभी प्रकरणोंके कर्त्ता श्रीविद्यारण्यस्वामी नहीं हैं प्रत्युत भिन्न-भिन्न हैं, कुछ कालके बाद कर्त्ताओंके नामका ठीक-ठीक स्मरण न होनेके कारण उन सब प्रकरणोंको मिलाकर एक ग्रन्थ विद्यारण्यस्वामीजीके नामसे प्रसिद्ध हुआ, इसीलिए सिद्धान्तलेशमें उन उन प्रकरणोंका पृथक्-पृथक्रूपसे उद्धरण किया है अन्यथा 'पञ्चदशीमें ऐसा प्रतिपादन किया है' ऐसा ग्रन्थकार क्यों नहीं लिखते, परन्तु इस बातका विवेचन इतिहासके यथार्थवेत्ताओंके ऊपर छोड़कर हम प्रकृत अर्थकी पुष्टिके
८४ | सिद्धान्तलेशसंग्रह | [ प्रथम परिच्छेद
विक्षेपशक्तिप्राधान्यात् मायेशोपाधिरुच्यते ।
अविद्याऽऽवरणोत्कर्षात् जीवस्येत्यपि कश्चन ॥ ३१ ॥
विक्षेपशक्तिकी प्रधानतासे मूलप्रकृति-मायाशब्दसे कहलानेवाली ईश्वरकी उपाधि कही जाती है और आवरणशक्तिकी प्रधानतासे अविद्याशब्दसे वाच्य मूलप्रकृति जीवकी उपाधि कही जाती है, ऐसा भी कोई लोग कहते हैं ॥ ३१ ॥
एकैव मूलप्रकृतिर्विक्षेपप्राधान्येन मायाशब्दितेश्वरोपाधिः, आवरण- प्राधान्येनाविद्याऽज्ञानशब्दिता जीवोपाधिः । अत एव तस्या जीवेश्वर- साधारणचिन्मात्रसम्बन्धित्वेऽपि जीवस्यैव ‘अज्ञोऽस्मि’ इत्यज्ञानसम्बन्धा- नुभवः, नेश्वरस्येति जीवेश्वरविभागः क्वचिदुपपादितः ।
एक ही मूलप्रकृति विक्षेप अंशकी प्रधानतासे मायाशब्दसे वाच्य होकर ईश्वरकी उपाधि होती है और आवरण अंशकी प्रधानतासे अविद्या होकर अर्थात् अज्ञानसे वाच्य होकर जीवकी उपाधि होती है । इसी लिए—जीवके ही आवरणशक्तिमदुपाधिसे उक्त होनेके कारण मूल प्रकृतिका जीव और ईश्वर साधारण चिन्मात्रके साथ सम्बन्ध होनेपर भी ‘अज्ञोऽस्मि’ ( मैं अज्ञानी हूँ ) इस प्रकार जीवको ही अज्ञानके संसर्गका अनुभव होता है, ईश्वरको* नहीं होता है, क्योंकि आवरणशक्ति ईश्वर भी अंशमें प्रविष्ट नहीं है । इसलिए जीव और ईश्वरकी उपाधिके एक होनेपर भी सर्वज्ञत्व और असर्वज्ञत्वधर्मोंसे जो उनमें वैलक्षण्य है, उसकी अनुपपत्ति नहीं है । इस प्रकार भी जीव और ईश्वरका कहींपर विभाग बतलाया गया है ।
लिए उक्त प्रकरणके कुछ वचन उद्धृत करते हैं—उसमें माया और अविद्याका भेद इस तरह कहा गया है—
सत्त्वशुद्धयविशुद्धिभ्यां मायाविद्ये च ते मते ।
मायाविम्बो वशीकृत्य तां स्यात् सर्वज्ञ ईश्वरः ॥ १६ ॥
अविद्यावशगस्त्वन्यस्तद्वैचित्र्यादनेकधा ॥ १७ ॥
सत्त्वकी शुद्धि और अशुद्धिसे प्रकृतिके माया और अविद्या दो भेद हैं, उस मायामें प्रति- फलित चिदात्मा मायाको अधीन करके सर्वज्ञ ईश्वर होता है और अविद्यामें प्रतिबिम्ब- रूपसे स्थित परतन्त्र अन्य चिदात्मा जीव है, उक्त वचनोंका यह भाव है । [ पंच० तत्त्व० पृ० १२ निर्ण० मु० ] ।
* यहाँपर भी ‘अत एव’ शब्दका सम्बन्ध करना चाहिए । इसलिए आवरणशक्तिका ईश्वरकी उपाधिकुक्षिमें सम्बन्ध न होनेसे अज्ञानका सम्पर्क ईश्वरमें नहीं होगा, यह भाव है ।
जीवेश्वरस्वरूपविचार ] भाषानुवादसहित ८५
कार्योपाधिर्भवेज्जीवः कारणोपाधिरीश्वरः ।
प्रतिबिम्बोऽत्र सङ्क्षेपशारीरककृतां नये ॥ ३२ ॥
संक्षेपशारीरककारके मतमें अविद्यामें चैतन्यका प्रतिबिम्ब ईश्वर है और अन्तःकरणमें चैतन्यका प्रतिबिम्ब जीव है ॥ ३२ ॥
सङ्क्षेपशारीरके तु—कार्योपाधिरयं जीवः कारणोपाधिरीश्वरः । इति श्रुतिमनुसृत्याऽविद्यायां चित्प्रतिबिम्ब ईश्वरः, अन्तःकरणे चित्प्रतिबिम्बो जीवः । न चाऽन्तःकरणरूपेण द्रव्येण घटेनाऽऽकाशस्येव चैतन्यस्याऽवच्छेदसम्भवात् तदवच्छिन्नमेव चैतन्यं जीवोऽस्त्विति वाच्यम्, इह
संक्षेपशारीरकमें तो कहा गया है कि 'कार्योपाधिरयं जीवः कारणोपाधिरीश्वरः' (कार्योपाधिक—अन्तःकरणोपाधिक जीव है और मायोपाधिक ईश्वर है) इस श्रुतिके आधारपर अविद्यामें चैतन्यका प्रतिबिम्ब ईश्वर है और अन्तःकरणमें चैतन्यका प्रतिबिम्ब जीव है ❊। शङ्का होती है कि जैसे आकाशका घटरूप द्रव्यसे परिच्छेद होता है, वैसे ही अन्तःकरणरूप द्रव्यसे चैतन्यका परिच्छेद
❊ इस विषयमें थोड़ा विचारणीय है—'जीवेशावाभासेन करोति' इत्यादि श्रुतिके साथ इस मतका विरोध है, क्योंकि इस श्रुतिसे जीवमें कारणोपाधिकता प्रतीत होती है, इसपर कहा जाता है—'जीवेशावाभासेन' इस पूर्ण भागसे जीव और ईश्वर दोनोंका प्रतिबिम्बभाव प्रतीत होता है, जहां बिम्ब एक ही होगा उस स्थलमें उपाधिके भेदके बिना वह नहीं हो सकता है, कारण कि सूर्य आदिके प्रतिबिम्बस्थलमें उपाधिकी भिन्नताके बिना भेद नहीं देखा जाता है, इसलिए उक्त श्रुतिसे प्रतिबिम्बरूप जीव और ईश्वरमें क्रमसे माया और अविद्या शब्दोंसे उपाधि समर्पित होती है। इस श्रुतिमें मायाशब्द मायाका कार्य अन्तःकरणरूप अर्थका बोधक है। 'माया चाविद्या च स्वयमेव भवति' इस वाक्यशेषकी उपपत्ति भी—माया-शब्दसे कहलानेवाले अन्तःकरण और मूल प्रकृतिमें मुख्य अभेदके न होनेपर भी प्रकृति विकृतिभावप्रयुक्त अभेदके सम्भव होनेसे—हो सकती है।
कृतहान—किये गये कर्मोंकी निष्फलता, भाव यह है कि ब्राह्मण आदि शरीरोंमें रहनेवाले अन्तःकरणसे अवच्छिन्न चैतन्यप्रदेश ही इस लोकके कर्मोंका कर्ता है और अन्य लोकमें देव आदिगत अन्तःकरणावच्छिन्न चैतन्य प्रदेश, जो कि किसी कर्मका कर्ता नहीं है, भोक्ता होगा, इसलिए उसका भोग किसी पूर्वोपार्जित कर्मका फल नहीं हो सकता है, अतः कृतकर्मका हान स्पष्ट होगा, यदि अन्तःकरणावच्छिन्न चैतन्य प्रदेशको जीव माना जाय, तो अकृताभ्यागम—जिसने कर्म किया उसको भोगप्राप्ति नहीं होगी और जिसने कर्म नहीं किया उसको भोग प्राप्ति होगी। अर्थात् देवादिशरीरके अन्तःकरणसे युक्त चैतन्य किसी कर्मका कर्ता नहीं है तो भी फलका भोक्ता है और मनुष्य आदि शरीरगत अन्तःकरणसे युक्त चैतन्य कर्मका कर्ता है, तो भी फलका भोक्ता नहीं हो सकता, ये दोनों दोष अन्तःकरणावच्छिन्न चैतन्यके जीव माननेमें होंगे
८६ | सिद्धान्तलेशसंग्रह | [ प्रथम परिच्छेद
परत्र च जीवभावेनावच्छेद्यचैतन्यप्रदेशस्य भेदेन कृतहानाकृताभ्यागमप्रसङ्गात् । प्रतिबिम्बस्तूपाधेर्गतागतयोरवच्छेद्यवन्न भिद्यते इति प्रतिबिम्बपक्षे नायं दोष इत्युक्तम् ।
एवमुक्तेष्वेतेषु जीवेश्वरयोः प्रतिबिम्बविशेषत्वपक्षेषु यत् बिम्बस्थानीयं ब्रह्म तत् मुक्तप्राप्यं शुद्धचैतन्यम् ।
घटाभ्रवारिणोर्व्योम्नः प्रतिबिम्बाविवात्मनः ।
बुद्धितद्वासनाभासौ जीवेशौ, बुद्धयुपाधिकः ॥ ३३ ॥
कूटस्थः शुद्धचित् ब्रह्म चित्रदीपे चतुर्विधम् ।
कूटस्थे कल्पितो जीवः शुद्धे ब्रह्मणि चेश्वरः ।
अहं ब्रह्मेति बाधायामैक्यमित्यपि तन्मतम् ॥ ३४ ॥
घटके जल और मेघके जलमें जैसे आकाशके प्रतिबिम्ब हैं, वैसे ही बुद्धि—अन्तःकरण और उसकी वासनाओंमें चैतन्यके आभास क्रमशः जीव और ईश हैं, बुद्धयुपाधिक—स्थूल सूक्ष्म शरीरोंमें अधिष्ठानरूपसे वर्तमान कूटस्थ चैतन्य है अर्थात् कूटके अयोग्धनके समान निश्चलरूपसे रहनेवाला चैतन्य है और सब उपाधियोंसे रहित शुद्ध चैतन्य ब्रह्म है, इस प्रकार चैतन्यके चार भेद चित्रदीपमें हैं। और कूटस्थमें कल्पित जीव है, शुद्धब्रह्ममें कल्पित ईश्वर है और 'अहं ब्रह्मास्मि' ( मैं ब्रह्म हूं ) यह बाधमें सामानाधिकरण्य है, यह भी उसका मत है ॥३३॥३४॥
हो सकता है, तो अन्तःकरणावच्छिन्न चैतन्य ही जीव हो, अन्तःकरणमें प्रतिबिम्बित चैतन्यको जीव क्यों माना जाता है ? नहीं यह शङ्का युक्त नहीं है, क्योंकि इस लोकमें और परलोकमें अन्तःकरणसे अवच्छिन्न प्रदेशका भेद होनेसे कृतहान और अकृताभ्यागमका प्रसङ्ग आवेगा । प्रतिबिम्ब तो उपाधिके गमनमें या आगमनमें भी भिन्न नहीं होता है, इसलिए यह दोष प्रतिबिम्ब पक्षमें नहीं है ।
[ जैसे चन्द्र आदि प्रतिबिम्बसे युक्त जलपात्रोंमें से एकके विनाश होनेपर उसमें वृत्तिरूपसे प्रकाशित प्रतिबिम्बका बिम्बके साथ एकीभाव देखा जाता है, अन्य प्रतिबिम्बका एकीभाव नहीं देखा जाता, इसी प्रकार प्रतिबिम्बरूप जीवका भी विदेहकैवल्य समयमें बिम्बभूत शुद्ध ब्रह्मके साथ एकीभाव होगा प्रतिबिम्बभूत ईश्वरके साथ नहीं होगा, क्योंकि प्रत्यक्ष विरोध है, इस प्रकार आशङ्का करके
इस मतमें माया और अविद्या पर्याय है, विशुद्धसत्त्व माया है और अविशुद्धसत्त्व अविद्या है यह भेद नहीं है, इससे मायाका मायाकार्य अन्तःकरण अर्थ करनेमें और अविद्याको ईशकी उपाधि माननेमें कोई हानि नहीं है यह भाव है ।
जीवेश्वरस्वरूपविचार ] भाषानुवादसहित ८७
चित्रदीपे—'जीव ईशो विशुद्धा चित्' इति त्रैविध्यप्रक्रियां विहाय यथा घटावच्छिन्नाकाशो घटाकाशः, तदाश्रिते जले प्रतिबिम्बितस्साभ्रनक्षत्रो जलाकाशः, अनवच्छिन्नो महाकाशः, महाकाशमध्यवर्तिनि मेघमण्डले दृष्टिलक्षणकार्यानुमेयेषु जलरूपतदवयवेषु तुषाराकारेषु प्रतिबिम्बितो मेघाकाशः' इति वस्तुत एकस्याप्याकाशस्य चातुर्विध्यम्, तथा स्थूलसूक्ष्मदेहद्वयस्याऽधिष्ठानतया वर्तमानं तदवच्छिन्नं चैतन्यं कूटवन्निर्विकारत्वेन स्थितं कूटस्थम्, तत्र कल्पितेऽन्तःकरणे प्रतिबिम्बितं चैतन्यं संसारयोगी जीवः, अनवच्छिन्नं चैतन्यं ब्रह्म, तदाश्रिते मायातमसि स्थितासु सर्वप्राणिनां धीवासनासु प्रतिबिम्बितं चैतन्यमीश्वरः इति चैतन्यस्य चातुर्विध्यं परिकल्प्य अन्तःकरणधीवासनोपरक्ताज्ञानोपाधिभेदेन जीवेश्वरविभागो दर्शितः ।
इष्टापत्तिसे परिहार करते हैं—'एवम्' इत्यादिसे ] इस प्रकारसे जीव और ईश्वरके विषयमें कहे गये इन प्रतिबिम्बविशेष पक्षोंमें जो बिम्बस्थानीय शुद्ध चैतन्य ब्रह्म है, वही मुक्तों द्वारा प्राप्य है ।
चित्रदीपमें 'जीव ईशो विशुद्धा चित्' (जीव, ईश और शुद्ध चेतन) इस प्रकार चैतन्यके तीन भेदोंकी प्रक्रियाको छोड़कर—जैसे घटरूप उपाधिसे युक्त आकाश—घटाकाश है, उस घटस्थ आकाशमें आश्रित जलमें प्रतिबिम्बित बादल और नक्षत्रोंके सहित जो आकाश है—वह जलाकाश है, घट आदि उपाधिसे रहित आकाश—महाकाश है और महाकाशके मध्यवर्ती मेघमण्डलमें वृष्टिरूप कार्यसे अनुमित जलरूप तुषाराकार मेघमण्डलके अवयवोंमें प्रतिबिम्बित आकाश मेघाकाश है, इस प्रकार वस्तुस्थितिमें एक ही आकाशके चार भेद हैं, वैसे ही स्थूल और सूक्ष्म दो शरीरोंमें अधिष्ठानरूपसे वर्तमान दो देहोंसे अवच्छिन्न (युक्त) चैतन्य कूटके—लोहघनके—समान निर्विकाररूपसे स्थित कूटस्थ चैतन्य है, उस कूटस्थ चैतन्यमें कल्पित अन्तःकरणमें प्रतिबिम्बित चैतन्य—सांसारिक जीव चैतन्य है, समस्त उपाधिसे रहित अर्थात् अनवच्छिन्न चैतन्य—ब्रह्मचैतन्य है और ब्रह्मके आश्रित मायारूप तममें विद्यमान सब प्राणियोंकी धीवासनाओंमें (धी उनका नाम है जो अन्तःकरण जाग्रत् और स्वप्न दो अवस्थाओंमें स्थूलरूपसे अनुगत हैं और उन अन्तःकरणोंकी सुषुप्तिकालीन सूक्ष्मावस्थाको वासना कहते हैं) प्रतिबिम्बित चैतन्य—ईश्वरचैतन्य है,—इस रीतिसे चैतन्यके चार विभाग करके अन्तःकरण और
८८ | सिद्धान्तलेशसंग्रह | [ प्रथम परिच्छेद
अयं चापरस्तदभिहितो विशेषः—चतुर्विधेषु चैतन्येषु जीवः 'अहम्' इति प्रकाशमानः कूटस्थे अविद्यातिरोहितासङ्गानन्दरूपविशेषांशे शुक्तौ रूप्यवदध्यस्तः । अत एवेदन्त्व-रजतत्वयोरिवाऽधिष्ठानसामान्यांशाध्यस्त-विशेषांशरूपयोः स्वयन्त्वाहन्त्वयोः सह प्रकाशः 'स्वयमहं करोमि' इत्यादौ ।
धीवासनोपरक्त अज्ञानरूप दो उपाधियोंके भेदसे जीव और ईश्वरका विभाग बतलाया गया है * ।
इस विषयमें चित्रदीपमें कहा गया यह अन्य विशेष है अर्थात् इसमें पूर्व ग्रन्थसे चैतन्यका चातुर्विध्य विशेष दिखलाया उसकी अपेक्षा अन्य प्रतिबिम्ब मिथ्यात्वरूप विशेष है, यह भाव है। चार प्रकारके चैतन्योंमेंसे 'अहम्' (मैं) इस प्रकारसे प्रकाशमान जो जीव है, वह अविद्यासे आच्छादित हुए हैं असङ्ग और आनन्दरूप विशेष अंश जिसके, ऐसे कूटस्थ चैतन्यमें—शुक्तिमें रजतके समान—अध्यस्त है, इसीलिए अर्थात् अहमर्थके कूटस्थमें अध्यस्त
* पञ्चदशीके चित्रदीपप्रकरणमें इस अभिप्रायके सूचक निम्नलिखित श्लोक हैं—
कूटस्थो ब्रह्म जीवेशावित्येवं चिच्चतुर्विधा ।
घटाकाशमहाकाशौ जलाकाशाभ्रखे यथा ॥१८॥
घटावच्छिन्नखे नीरं यत्तत्र प्रतिबिम्बितः ।
साभ्रनक्षत्र आकाशो जलाकाश उदीर्यते ॥१९॥
महाकाशस्य मध्ये यन्मेघमण्डलमीक्ष्यते ।
प्रतिबिम्बतया तत्र मेघाकाशो जले स्थितः ॥२०॥
मेघांशरूपमुदकं तुषाराकारसंस्थितम् ।
तत्र खप्रतिबिम्बोऽयं नीरत्वादनुमीयते ॥२१॥
अधिष्ठानतया देहद्वयावच्छिन्नचेतनः ।
कूटवन्निर्विकारेण स्थितः कूटस्थ उच्यते ॥ २२ ॥
कूटस्थे कल्पिता बुद्धिस्तत्र चित्प्रतिबिम्बकः ।
प्राणानां धारणाज्जीवः संसारेण स युज्यते ॥ २३ ॥
जलव्योम्ना घटाकाशो यथा सर्वस्तिरोहितः ।
तथा जीवेन कूटस्थः सोऽन्योन्याध्यास उच्यते ॥ २४ ॥
इन श्लोकोंका भाव मूल ग्रन्थसे व्यक्त है, केवल अन्तिम श्लोकका सार यह है कि यदि कूटस्थ चेतन है, तो उसका अनुभव क्यों नहीं होता है? इसका उत्तर है कि जैसे जलाकाशसे घटाकाश तिरोहित हो जाता है, वैसे ही जीवसे तिरोहित हो जानेके कारण कूटस्थका अनुभव नहीं होता है, और इसीको अन्योन्याध्यास कहते हैं ।
जीवेश्वरस्वरूपविचार ] भाषानुवादसहित ८९
अहन्त्वं ह्यध्यस्तविशेषांशरूपम्, पुरुषान्तरस्य पुरुषान्तरे 'अहम्' इति व्यवहाराभावेन व्यावृत्तत्वात् । स्वयन्त्वं चान्यत्वप्रतियोग्यधिष्ठानसामान्यांशरूपम् । 'स्वयं देवदत्तो गच्छति' इति पुरुषान्तरेऽपि व्यवहारेणाऽनुवृत्तत्वात् , एवं परस्पराध्यासादेव कूटस्थजीवयोरविवेको लौकिकानाम् ।
होनेसे ही जैसे 'इदं रजतम्' ( यह रजत है ) इसमें इदन्त्व और रजतत्वका, जो क्रमशः अधिष्ठानसामान्य अंश और अध्यस्तविशेष अंश हैं, साथ-साथ प्रकाश होता है, वैसे ही स्वयन्त्व और अहन्त्वका साथ-साथ प्रकाश होता है—'स्वयमहं करोमि' ( मैं स्वयं करता हूँ ) इत्यादिमें । *प्रकृतमें अहन्त्व अध्यस्तविशेष अंश है, क्योंकि अन्य पुरुषका अन्य पुरुषमें 'अहम्' इस प्रकारका व्यवहार नहीं होता, इसलिए व्यावृत्त है । और स्वयन्त्व तो अन्यत्वका विरोधी है और अधिष्ठानसामान्य अंश है, क्योंकि 'स्वयं देवदत्तः गच्छति' ( देवदत्त स्वयं जाता है ) इस प्रकार अन्य पुरुषमें भी स्वयन्त्वका व्यवहार होनेसे वह अनुवृत्त है । ऐसा होनेपर—अहमर्थ जीवके शुक्तिमें रूप्यके समान कूटस्थमें अध्यस्त होनेपर—परस्पर अभेदके अध्याससे ही कूटस्थ और जीवका लोकमें अन्योन्य अभेद भासता है ।
- कूटस्थके असङ्गत्व, आनन्दत्व और पूर्णत्व आदि विशेषधर्म अविद्याके प्रभावसे प्रतीत नहीं होते, यह हम मानते हैं, परन्तु जैसे शुक्तिका इदन्त्व अंश प्रकाशित होता है, वैसे अधिष्ठानका सामान्य अंश प्रकाशित नहीं होता । किंच, जैसे 'इदं रजतम्' इत्यादिमें अधिष्ठानके सामान्य अंशका और आरोपित विशेष अंशका साथ-साथ प्रकाश होता है, वैसे प्रकृतमें अहंवरूप विशेष अंश और सामान्य अंशका प्रकाश नहीं होता किन्तु अहमर्थ विशेषका ही प्रकाश होता है इसलिए कूटस्थमें 'अहम्' का शुक्तिमें रूप्यके समान अध्यास है, यह कहना असङ्गत है, इसपर 'अत एव' इत्यादिसे कहते हैं । यद्यपि कूटस्थका सामान्य अंश कूटस्थत्व होना चाहिए, तथापि शास्त्रीय-प्रमाणके अनुसार 'स्वयन्त्व' ही उसका सामान्य अंश है, ऐसा माननेके लिए हमें बाध्य होना पड़ता है, इसलिए अहमर्थके—जीवके—आरोपकालमें स्वयन्त्वका साथ-साथ प्रकाश होता है, किं बहुना स्वयन्त्वके कूटस्थ चैतन्यरूप होनेसे आरोप-पूर्वकालमें भी उसका भान होता है । यद्यपि स्वयन्त्व और कूटस्थ एक ही है, तथापि 'राहोः शिरः' ( राहुका माथा ) के समान यहाँ भेदकी कल्पना करके धर्मधर्मिभावकी उपपत्ति करनी चाहिए । अतः स्वयन्त्वसामान्यरूपसे कूटस्थका सर्वदा प्रकाश होनेसे अहमर्थ ( जीव ) रूप चिदाभासके अध्यासका अधिष्ठान कूटस्थ उपपन्न हुआ । पुरुषान्तरमें 'मैं' शब्दका व्यवहार न होनेसे उसमें 'अहन्त्व' की व्यावृत्तिका अवगम होता है, अतः अहन्त्व विशेष अंश है । स्वयम् और अन्य शब्द एकार्थक नहीं हैं, परन्तु पुरुषान्तरमें स्वयंशब्दका व्यवहार होता है, इसलिए उसे सामान्यांश माननेमें कोई हरकत नहीं
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| ९० | सिद्धान्तलेशसंग्रह | [ प्रथम परिच्छेद |
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विवेकस्तु तयोर्बृहदारण्यके—'प्रज्ञानघन एवैतेभ्यो भूतेभ्यः समुत्थाय तान्येवानु विनश्यति' इति जीवाभिप्रायेणोपाधिविनाशानुपविनाशप्रति-
[ 'इदं रजतम्' (यह रजत है ) इत्यादि भ्रमस्थलमें 'यह शुक्ति है' इस प्रकारके विशेष परिज्ञानसे 'इदं रजतम्' इससे प्रतीत सामान्य और विशेष पदार्थोंमें शुक्तित्व और रजतत्वरूप विरुद्ध धर्मोंका निश्चय होनेसे उनका भेद माना जाता है, परन्तु प्रकृतमें जीव और कूटस्थका भेद कैसे अवगत हो सकता है ? यदि भेदका परिज्ञान न हो, तो 'स्वयमहम्' ( मैं स्वयम् ) इस प्रकार सामान्यविशेषभावसे प्रतीयमान जीव और कूटस्थका सत्यस्थलीय रजत और इदमर्थके समान वस्तुतः एकत्वापत्ति होनेसे अहमर्थ-जीवकी स्वयंशब्दार्थ-कूटस्थमें कल्पना नहीं हो सकती, इस प्रकारकी आशङ्का करके श्रुतिसे उनका भेद दिखलाते हैं ]—बृहदारण्यकमें जीव और ईश्वरका भेदानुभव तो 'प्रज्ञानघन एवैतेभ्यो भूतेभ्यः समुत्थाय०' (प्रज्ञानरूप आत्मा ही देहादिरूपसे परिणत सन्निहित उपाधिरूप भूतोंसे समुत्थानकर—उपाधिभूत बुद्धि आदिकी उत्पत्तिसे उत्पत्तियुक्त होकर—तत्त्वज्ञानसे उन उपाधियोंका विनाश होनेपर उन्हीं भूतोंमें लीन हो जाता है) इत्यादि श्रुतिसे जीवके अभिप्रायसे ही अर्थात् जीवका ही उपाधिके विनाशके अनन्तर विनाशप्रतिपादन
है—जैसे इदन्त्व शुक्तिमें रहता है, वैसे ही पट आदिमें भी रहता है। इस विशेष पक्षके संग्राहक निम्न लिखित श्लोक हैं—
'अविद्यावृतकूटस्थे देहद्वययुता चितिः ।
शुक्तौ रूप्यवदध्यस्ता विक्षेपाध्यास एव हि ॥३३॥
आरोपितस्य दृष्टान्ते रूप्यं नाम यथा तथा ।
कूटस्थाध्यस्तविक्षेपनामाहमिति निश्चयः ॥३६॥
इदमंशं स्वतः पश्यन् रूप्यमित्यभिमन्यते ।
तथा स्वं च स्वतः पश्यन्नहमित्यभिमन्यते ॥३७॥
इदन्त्वरूप्यते भिन्ने स्वत्वाहमन्ते तथेष्यताम् ।
सामान्यं च विशेषश्च ह्युभयत्रापि गम्यते ॥३८॥
देवदत्तः स्वयं गच्छेत्त्वं वीक्षस्व स्वयं तथा ।
अहं स्वयं न शक्नोमीत्येवं लोके प्रयुज्यते ॥३९॥' [पञ्च० चित्रदी०]
इन श्लोकोंके आधारपर ही 'अयञ्चापरस्तदभिहितो विशेषः' इत्यादिसे विशेष बात कही गई है, और जो मूलमें विशेष कहा है, वही इन श्लोकोंका अर्थ है, अतः श्लोकोंका अनुवाद नहीं किया गया।
जीवेश्वरस्वरूपविचार ] भाषानुवादसहित ९१
पादनेन, 'अविनाशी वा अरेऽयमात्मा' इति कूटस्थाभिप्रायेणाऽविनाशप्रतिपादनेन च स्पष्टः । अहमर्थस्य जीवस्य विनाशित्वे कथमविनाशिब्रह्माभेदः । नेदमभेदे सामानाधिकरण्यम् , किन्तु बाधायाम् । यथा 'यः स्थाणुरेष पुमान्'
किया गया है, इससे और 'अविनाशी वा अरे०' (हे मैत्रेयि ! यह आत्मा अविनाशी है) इत्यादि श्रुतिसे कूटस्थ आत्माके अविनाशित्वका प्रतिपादन करनेसे स्पष्ट ही है *। यहांपर शङ्का होती है कि यदि श्रुतिसे वह विनाशी सिद्ध हो तो उसका—अहमर्थ जीवका—अविनाशी ब्रह्मके साथ अभेद कैसे होगा ? यह शङ्का युक्त नहीं है, क्योंकि अविनाशी ब्रह्म और जीवका सामानाधिकरण्य अभेद अर्थमें नहीं है, † परन्तु बाध अर्थमें सामानाधिकरण्य है—जैसे
* भाव यह है कि यद्यपि 'अयमात्मा प्रज्ञानघनः' इत्यादि श्रुतिसे ज्ञात होता है कि चिदेकरस आत्मा ही उपाधिके उद्भवके पश्चात् उत्पन्न होता है और उपाधिके नाशके अनन्तर नष्ट होता है, अतः उपाधिकी उत्पत्ति और विनाशसे पृथक् ही चिदात्माकी उत्पत्ति और विनाशका प्रतिपादन है, क्योंकि अनुशव्दका प्रयोग है, तथापि चिदात्माकी उत्पत्ति और विनाश स्वभावसिद्ध है, ऐसा नहीं कह सकते; क्योंकि 'अविनाशी वा अरेऽयमात्मा०' ( हे मैत्रेयि, यह आत्मा अविनाशी है) इस श्रुतिसे विज्ञानघन आत्माके अविनाशका प्रतिपादन है। इसलिए उत्पत्ति-विनाशवान् चैतन्य प्रतिबिम्बरूप जीवके तादात्म्यके आधारपर विनाश आदि वचनकी उपपत्ति करनी चाहिए। इससे भ्रमस्थलमें रजत और इदमर्थमें जैसे विनाशित्व और अविनाशित्वरूप विरुद्ध धर्मके निश्चयसे भेदम्रह होता है, वैसे ही प्रकृतमें भी विनाशित्व और अविनाशित्वरूप विरुद्ध धर्मके निश्चयसे ही जीव और कूटस्थके भेदका परिज्ञान होता है।
† इसका यह भाव है 'सोऽयम् नरेन्द्रः' (वह यह नरेन्द्र है) इत्यादि समानाधिकरण वाक्यका जैसे अभेद अर्थ प्रतीत होता है—कलकत्तेमें जिस नरेन्द्रको देखा था वही यह है, अतः कलकत्तेके नरेन्द्र और इस नरेन्द्रका भेद नहीं है किन्तु अभेद ही है, वैसे 'यः स्थाणुः स पुरुषः' ( जो स्थाणु था वह पुरुष है ) इस समानाधिकरण वाक्यसे अभेद—प्रतीत नहीं होता, क्योंकि स्थाणु और पुरुषका अभेद कभी नहीं घट सकता, इसलिए यहाँपर वाच्यार्थ है—बाध, अर्थात् उक्त वाक्यसे—जिस आधारभूत पुरुषमें स्थाणुत्वकी कल्पना की गई है, उसमें स्थाणुतादात्म्य नहीं है—इस प्रकार बाधरूप वाक्यार्थ देखा जाता है। इसलिए 'यः स्थाणुः स पुरुषः' इस वाक्यसे 'वस्तुतः स्थाणुतादात्म्याभाववानयं पुरुषः' ( वस्तुतः पुरुष स्थाणु-तादात्म्यका आधार नहीं है ) यह बोध होता है। इस बोधसे पुरुषमें स्थाणुरूप निश्चयके सहित आरोप निवृत्त होता है। इसी रीतिसे 'अहं ब्रह्मास्मि' (मैं ब्रह्म हूँ) अहमर्थ (जीव) तादात्म्यसे शून्य 'मैं ब्रह्म हूँ' यह ज्ञान होता है और इस ज्ञानसे 'मैं कर्त्ता हूँ' इत्यादि आरोप—सम्पूर्ण कर्तृत्व आदि धर्मोंसे विशिष्ट जीवरूप अपने विषयोंके साथ निवृत्त होता है। आरोपित अहमर्थकी निवृत्ति होनेपर जो जीवका कूटस्थसत्यस्वरूप स्वरूप है वह पूर्ण ब्रह्मरूपसे रहता है, इसलिए श्रुत्यन्तरके साथ विरोध नहीं है ॥
९२ सिद्धान्तलेशसंग्रह [ प्रथम परिच्छेद
इति पुरुषत्वबोधेन स्थाणुत्वबुद्धिर्निवर्त्यते । एवम् 'अहं ब्रह्मास्मि' इति कूटस्थब्रह्मस्वरूपत्वबोधेनाऽध्यस्ताहमर्थरूपत्वं निवर्त्यते ।
'योऽयं स्थाणुः पुमानेष पुन्धिया स्थाणुधीरिव ।
ब्रह्माऽस्मीति धियाऽशेषा ह्यहम्बुद्धिर्निवर्त्तते ॥'
इति नैष्कर्म्यसिद्धिवचनात् । यदि च विवरणाद्युक्तरीत्या दृढ़मभेदे सामानाधिकरण्यम्, तदा जीववाचिनोऽहंशब्दस्य लक्षणया कूटस्थपरत्व-मस्तु । तस्याऽनध्यस्तस्य ब्रह्माभेदे योग्यत्वात् ।
'जो स्थाणु है, वह पुरुष है, इस प्रकार स्थाणुमें पुरुषत्वके ‡ बोधनसे स्थाणु-त्वका ज्ञान निवृत्त होता है, वैसे ही 'मैं ब्रह्म हूं' इस प्रकार जीवमें ब्रह्मस्वरूपत्वके बोधसे अध्यस्त अहमर्थरूपताकी—जीवरूपताकी—निवृत्ति होती है ।
'योऽयं स्थाणुः०' ( जैसे मन्द अन्धकारमें 'जिसे स्थाणु [ पुरुषाकार खड़ा हुआ सूखा वृक्ष विशेष ] समझा था यह तो पुरुष है, इस प्रकारके महाजनके वाक्यसे उत्पन्न हुई पुरुषविषयक बुद्धिसे अर्थात् 'यह पुरुष ही है स्थाणु नहीं' इस प्रकारकी बुद्धिसे 'यह स्थाणु है' इस प्रकारकी बुद्धि आरोपित स्थाणु तादात्म्य के साथ निवृत्त होती है, वैसे ही 'मैं ब्रह्म हूँ' इस वाक्यसे उत्पन्न बुद्धिसे—अहमर्थभूत जीवके तादात्म्यसे शून्य केवल ब्रह्मरूप ही मैं हूँ, इस प्रकारकी अहंबुद्धिसे—'मैं करता हूँ' इत्यादि सम्पूर्ण बुद्धि आरोपित अहमर्थके साथ निवृत्त होती है ) ऐसा नैष्कर्म्यसिद्धिका ※ वचन भी है । यदि विवरण आदिके कथना-नुसार 'अहं ब्रह्मास्मि' ( मैं ब्रह्म हूँ ) यह सामानाधिकरण्य अभेदमें माना जाय, तो जीववाचक अहंशब्दका लक्षणावृत्तिसे कूटस्थ चैतन्य ही अर्थ मानना होगा, क्योंकि उसीकी अनध्यस्त ब्रह्मके अभेदमें योग्यता है ।
‡ पुरुषत्वपदसे कल्पितस्थाणुतादात्म्याभाववत्त्व विवक्षित है, क्योंकि बाधक ही वाक्यार्थ माना गया है, यह भाव है ।
※ नैष्कर्म्यसिद्धिमें सुरेश्वराचार्यका यह वचन है, इसलिए बाधको वाक्यार्थ माननेमें कोई हानि नहीं है। इस श्लोकमें 'हि' शब्द इस अर्थका सूचन करता है—महावाक्यार्थके ठीक-ठीक परिज्ञानसे सम्पूर्ण अनर्थकी निवृत्ति होती है, यह अनुभवी पुरुषोंके अनुभवसे सिद्ध है ।
† समानाधिकरण वाक्योंका यह स्वभाव है कि उनका अर्थ मुख्यतः अभेद ही होता है, और विवरण आदिमें ऐसे समानाधिकरण वाक्योंकी अभेदार्थकता ही मानी गई है । वाक्यवृत्तिमें भगवत्पादशङ्कराचार्यजी महाराजने भी 'तादात्म्यमात्रं वाक्यार्थस्तयोरेव पदार्थयोः' इस श्लोकसे
जीवेश्वरस्वरूपविचार ] भाषानुवादसहित ९३
यस्तु मेघाकाशतुल्यो धीवासनाप्रतिविम्ब ईश्वर उक्तः, सोऽयं 'सुषुप्तस्थान एकीभूतः प्रज्ञानघन एवानन्दमयो ह्यानन्दभुक्' इति माण्डूक्यश्रुतिसिद्धः सौषुप्तानन्दमयः, तत्रैव तदनन्तरम् 'एष सर्वेश्वर एष सर्वज्ञ एषोऽन्तर्याम्येष योनिः सर्वस्य प्रभवाप्ययौ हि भूतानाम्' इति श्रुतेः ।
* और मेघाकाशके समान धीवासनाओंमें प्रतिबिम्ब चैतन्य ईश्वर है, ऐसा जो कहा गया है, वह 'सुषुप्तस्थान एकीभूतः' ( सुषुप्तस्थान—सुषुप्त है स्थान जिसका, ऐसा एकीभूत और प्रज्ञानघन—जीव ही आनन्दमय और आनन्दभोक्ता है ) इस माण्डूक्यश्रुतिसे सिद्ध सुषुप्तिकालीन आनन्दमय है, क्योंकि वहींपर उसके बाद 'एष सर्वेश्वरः०' ( यही सर्वेश्वर, सर्वज्ञ और
'तत्त्वमसि' महावाक्यमें तत् और त्वंकः तादात्म्यशब्दसे कहे जानेवाला अभेद ही वाक्यार्थ माना है, इसलिए वार्तिककारके वचनानुसार 'अहं ब्रह्मास्मि' इत्यादि स्थलमें वाक्यका वाक्यार्थकत्व केवल प्रौढिवाद ही है, इसलिए 'अहं ब्रह्मास्मि' इत्यादिमें अभेदको ही वाक्यार्थ मानना चाहिए । इस परिस्थितिमें विनाशी जीव और अविनाशी ब्रह्मका अभेद नहीं हो सकता है, इसलिए पूर्वमतमें अस्वरस है, अतः 'यदि च' शब्दसे विवरणका मत कहते हैं ।
* यहाँ तुशब्द अवधारणार्थक है अर्थात् पूर्वमें जो ईश्वर कहा गया है, वह श्रुतिमें उक्त आनन्दमय ही है, उससे अन्य नहीं है, यह भाव है । 'सुषुप्तस्थान' इत्यादि श्रुतिका स्पष्ट अर्थ यह है—सुषुप्तं स्थानं यस्य सः—सुषुप्तस्थानः अर्थात् जिसका सुषुप्ति स्थान है । जाग्रदवस्थामें अन्तःकरणके साथ तादात्म्यका अध्यास होनेसे विज्ञानमयत्व, मनोमयत्व और मन्तृत्व आदि रूप जीवके धर्म हैं, देहमें 'मैं स्थूल हूँ' इत्यादि अध्याससे स्थूलत्व, कृशत्व, ब्राह्मणत्व आदि रूप धर्म हैं, तथा चक्षु आदिमें 'मैं काना हूँ' इत्यादिके अध्याससे काणत्व आदि धर्म हैं, इसी प्रकार आकाश आदि बाह्य पदार्थोंमें अध्याससे होनेवाले श्रुतिद्वारा प्रतिपादित आकाशगत्व आदि धर्म हैं और सुषुप्तिमें तो बुद्धि आदिका विलय होनेसे समस्त संसारकी भ्रान्तिका अभाव होनेसे उक्त सभी प्रकारके स्वरूप लीन होते हैं, अतः इसी अभिप्रायसे श्रुतिमें एकीभूत कहा गया है, इसीसे इस अर्थका संग्राहक श्लोक उपलब्ध होता है—
'विज्ञानमयमुख्यैर्यो रूपैर्युक्तः पुराऽधुना ।
स लयेनैकतां प्राप्तो बहुत्तण्डुलपिष्टवत् ॥' [ प० ब्रह्मानन्द श्लो० ६९ ]
सुषुप्तिके पूर्वमें विज्ञानमय आदि स्वरूपोंसे जो युक्त था वह सुषुप्तिमें उन रूपोंके विनाशसे अनेक तण्डुलोंका पिष्ट जैसे एकरूप हो जाता है, वैसे ही एकरूप हो गया । प्रज्ञान चैतन्य है । जागरणमें वृत्तियोंके अनेक होनेसे जीवका चैतन्य उस समयमें शिथिल हो जाता है,
| ९४ | सिद्धान्तलेशसंग्रह | [ प्रथम परिच्छेद |
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सर्ववस्तुविषयसकलप्राणिधीवासनोपाधिकस्य तस्य सर्वज्ञत्वस्य तत एव सर्वकर्तृत्वादेरप्युपपत्तेश्च। न चास्मद्बुद्धिवासनोपहितस्य कस्यचित् सार्वज्ञ्यं नाऽनुभूयते इति वाच्यम्, वासनानां परोक्षत्वेन तदुपहितस्याऽपि परोक्षत्वादिति।
अन्तर्यामी है और यह उत्पत्ति और विनाशका कारण है, इसलिए सम्पूर्ण जगत्का उपादान कारण है) इत्यादि श्रुति है। सम्पूर्ण वस्तुको विषय करनेवाली सब प्राणियोंकी धीवासनाओंसे † उपहित उस चैतन्यमें सर्वज्ञत्व और उसी श्रुतिसे सर्वकर्तृत्वकी उपपत्ति भी होती है। और हम लोगोंकी बुद्धिकी वासनाओंसे उपहित किसी चैतन्यमें सर्वज्ञत्वका अनुभव नहीं होता, यह आपत्ति नहीं है, क्योंकि वासनाओंके परोक्ष होनेसे उपहित चैतन्य भी परोक्ष है।
और सुषुप्तिमें वृत्तियोंका लय होनेसे उसका घनीभाव रहता है, इसे प्रज्ञानघन—चैतन्यघन कहते हैं, आनन्दमय है अर्थात् बिम्बभूत ब्रह्मानन्दका प्रतिबिम्ब होनेसे जीव आनन्दमय है। और यह आनन्दमय जीव सुषुप्तिकालमें अविद्यावृत्तिसे उपभोग करता है, इसलिए आनन्दभुक् भी उसे कह सकते हैं।
† आनन्दमय सर्वज्ञ है इसमें युक्ति इस ग्रन्थसे देते हैं—एक बुद्धि किसी एक वस्तुको विषय करती है और सब बुद्धियां मिलकर सभी वस्तुओंको विषय करती हैं। इस प्रकारसे सब बुद्धियाँ यदि सब वस्तुओंका अवगाहन करें, तो उन बुद्धियोंकी वासनाएँ भी सब पदार्थोंको अवश्य विषय करेंगी। इसलिए सब प्राणियोंकी बुद्धिवासनाओंसे उपहित आनन्दमयमें भी सर्ववस्तुविषयकत्व होनेसे सर्वज्ञत्व अर्थात् सिद्ध ही है, अतः आनन्दमयको सर्वज्ञ माननेमें कोई आपत्ति नहीं है। प्रकृतमें यह चिन्ता होती है कि धीवासनाओंसे उपरक्त अज्ञानसे उपहित जो ईश है, उसमें शुद्ध अज्ञान ही उपाधि है अथवा वासनासे उपरक्त, या सम्पूर्ण धीवासना अथवा प्रत्येक वासना उपाधि है, यदि प्रथम पक्षका स्वीकार किया जाय, तो ‘धीवासनाओंमें प्रतिबिम्बित चैतन्य ईश्वर है, ऐसा जो कहा गया है, उसके साथ विरोध होगा, क्योंकि केवल अज्ञान उपाधि हो तो धीवासनाको उपाधि कहना व्यर्थ ही है। और द्वितीय पक्ष भी अयुक्त है, क्योंकि अज्ञानमें रहनेवाले सत्त्वांशकी परिणामरूप सर्वविषयक वृत्तियोंसे सर्वज्ञत्वकी उपपत्ति हो सकती है, तो फिर वासनोपरक्त अज्ञानको उपाधि मानना केवल मूर्खता है। तृतीय पक्ष भी अयुक्त है, क्योंकि एक कालमें सब वृत्तियाँ नहीं हो सकती हैं। इसलिए चौथा पक्ष ही परिशेषसे बचता है, परन्तु इसमें अनुभवविरोध है, और इसी अनुभवविरोधका ‘न चा०’ इत्यादि ग्रन्थसे परिहार भी किया गया है। अर्थात् वासनाओंके परोक्ष होनेसे उन वासनाओंसे उपहित आनन्दमयकी ‘अहं सर्वज्ञः’ इस प्रकार अपरोक्षानुभूति नहीं होती है, यह भाव है।
जीवेश्वरस्वरूपविचार ] भाषानुवादसहित ९५
ब्रह्मानन्दे विराडादिसमष्टिव्यष्ट्युपाधितः ।
षोढा चिदानन्दमयव्यष्टिर्जीव इतीरितम् ॥ ३५ ॥
शुद्धलाञ्छितापूर्णवर्णचित्रपटोपमाः ।
ब्रह्मेशसूत्रवैराजाः पराभाससमोऽसुभृत् ॥
चित्रदीपे चित्रपटन्यायेनेत्थं निरूपिताः ॥ ३६ ॥
विराट्सूत्राक्षराण्यादौ विभज्य प्रणवाक्षरैः ।
विलाप्य गौडपादीये तुरीयात्माऽवशेषितः ॥ ३७ ॥
ब्रह्मानन्द (प्रकरण) में विराद् आदि समष्टि और व्यष्टिरूप उपाधिके भेदसे चैतन्यके छः भेद हैं व्यष्टि आनन्दमय जीव है, ऐसा कहा गया है । चित्रदीपमें—चित्रपटके दृष्टान्तसे अर्थात् जैसे शुद्ध, लाञ्छित, अङ्कित और वर्णसे पूरित इस प्रकारसे वस्त्रके चार भेद होते हैं, वैसे ही ब्रह्म, ईश, सूत्र और विराट् ये चैतन्यके चार भेद हैं और जीव ब्रह्मके आभासके समान है, ऐसा निरूपण किया गया है । पहले विराट्, सूत्र और अक्षरका विभाग करके 'ओम्के' अ, उ और म्—इन तीन अक्षरोंके साथ उनका प्रविलापन करके तुरीय आत्माका गौडपादकी कारिकाओंके विवरणमें अवशेष बतलाया है ॥३५॥३६॥३७॥
ब्रह्मानन्दे तु सुषुप्तिसंयोगात् माण्डूक्त्योक्त आनन्दमयो जीव इत्युक्तम् ।
ब्रह्मानन्दमें * तो माण्डूक्यमें कहा गया आनन्दमय सुषुप्तिके संयोगसे
* पञ्चदशीमें ब्रह्मानन्दके योगानन्दप्रकरणमें इस अर्थके संग्राहक निम्न लिखित श्लोक हैं—
'स आनन्दमयः सुप्तौ य विज्ञानमयात्मताम् ।
गत्वा स्वप्नं प्रबोधं वा प्राप्नोति स्थानभेदतः ॥' [पञ्च०प्र० यो० श्लो० ९०]
और पञ्चदशीके चित्रदीपप्रकरणमें चैतन्यके चार भेद चित्रपटके दृष्टान्तसे बतलाये गये हैं—
'यथा चित्रपटे दृष्टमवस्थानां चतुष्टयम् ।
परमात्मनि विज्ञेयं तथाऽवस्थाचतुष्टयम् ॥१॥
यथा धौतो घटितश्च लाञ्छितो रञ्जितः पटः ।
चिदन्तर्यामी सूत्रात्मा विराट् चाऽऽत्मा तथेर्यते ॥२॥
स्वतः शुद्धोऽत्र धौतःस्याद्धटितोऽन्नविलेपनात् ।
मष्याकारैर्लाञ्छितः स्याद्रञ्जितो वर्णपूरणात् ॥३॥
स्वतश्चिदन्तर्यामी तु मायावी सूक्ष्मसृष्टितः ।
सूत्रात्मा स्थूलसृष्ट्यैव विराडित्युच्यते परः ॥४॥
इन सभी श्लोकोंका भाव मूलमें ग्रन्थकारने स्पष्टरूपसे लिखा है । इसलिए पुनरुक्ति नहीं करते हैं ।