भारतकोश
सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

Siddhanta Lesha Sangraha Hindi

श्रीमदप्पय्य दीक्षित द्वारा

स्रोत: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (उद्गम)

DevanagariHindipublished590 पृष्ठ

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पृष्ठ 125

जीवेश्वरस्वरूपविचार ] भाषानुवादसहित ९५


ब्रह्मानन्दे विराडादिसमष्टिव्यष्ट्युपाधितः ।
षोढा चिदानन्दमयव्यष्टिर्जीव इतीरितम् ॥ ३५ ॥
शुद्धलाञ्छितापूर्णवर्णचित्रपटोपमाः ।
ब्रह्मेशसूत्रवैराजाः पराभाससमोऽसुभृत् ॥
चित्रदीपे चित्रपटन्यायेनेत्थं निरूपिताः ॥ ३६ ॥
विराट्सूत्राक्षराण्यादौ विभज्य प्रणवाक्षरैः ।
विलाप्य गौडपादीये तुरीयात्माऽवशेषितः ॥ ३७ ॥

ब्रह्मानन्द (प्रकरण) में विराद् आदि समष्टि और व्यष्टिरूप उपाधिके भेदसे चैतन्यके छः भेद हैं व्यष्टि आनन्दमय जीव है, ऐसा कहा गया है । चित्रदीपमें—चित्रपटके दृष्टान्तसे अर्थात् जैसे शुद्ध, लाञ्छित, अङ्कित और वर्णसे पूरित इस प्रकारसे वस्त्रके चार भेद होते हैं, वैसे ही ब्रह्म, ईश, सूत्र और विराट् ये चैतन्यके चार भेद हैं और जीव ब्रह्मके आभासके समान है, ऐसा निरूपण किया गया है । पहले विराट्, सूत्र और अक्षरका विभाग करके 'ओम्के' अ, उ और म्—इन तीन अक्षरोंके साथ उनका प्रविलापन करके तुरीय आत्माका गौडपादकी कारिकाओंके विवरणमें अवशेष बतलाया है ॥३५॥३६॥३७॥

ब्रह्मानन्दे तु सुषुप्तिसंयोगात् माण्डूक्त्योक्त आनन्दमयो जीव इत्युक्तम् ।

ब्रह्मानन्दमें * तो माण्डूक्यमें कहा गया आनन्दमय सुषुप्तिके संयोगसे


* पञ्चदशीमें ब्रह्मानन्दके योगानन्दप्रकरणमें इस अर्थके संग्राहक निम्न लिखित श्लोक हैं—

'स आनन्दमयः सुप्तौ य विज्ञानमयात्मताम् ।
गत्वा स्वप्नं प्रबोधं वा प्राप्नोति स्थानभेदतः ॥' [पञ्च०प्र० यो० श्लो० ९०]

और पञ्चदशीके चित्रदीपप्रकरणमें चैतन्यके चार भेद चित्रपटके दृष्टान्तसे बतलाये गये हैं—

'यथा चित्रपटे दृष्टमवस्थानां चतुष्टयम् ।
परमात्मनि विज्ञेयं तथाऽवस्थाचतुष्टयम् ॥१॥
यथा धौतो घटितश्च लाञ्छितो रञ्जितः पटः ।
चिदन्तर्यामी सूत्रात्मा विराट् चाऽऽत्मा तथेर्यते ॥२॥
स्वतः शुद्धोऽत्र धौतःस्याद्धटितोऽन्नविलेपनात् ।
मष्याकारैर्लाञ्छितः स्याद्रञ्जितो वर्णपूरणात् ॥३॥
स्वतश्चिदन्तर्यामी तु मायावी सूक्ष्मसृष्टितः ।
सूत्रात्मा स्थूलसृष्ट्यैव विराडित्युच्यते परः ॥४॥

इन सभी श्लोकोंका भाव मूलमें ग्रन्थकारने स्पष्टरूपसे लिखा है । इसलिए पुनरुक्ति नहीं करते हैं ।

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