भारतकोश
सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

Siddhanta Lesha Sangraha Hindi

श्रीमदप्पय्य दीक्षित द्वारा

स्रोत: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (उद्गम)

DevanagariHindipublished590 पृष्ठ

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पृष्ठ 124
९४सिद्धान्तलेशसंग्रह[ प्रथम परिच्छेद

सर्ववस्तुविषयसकलप्राणिधीवासनोपाधिकस्य तस्य सर्वज्ञत्वस्य तत एव सर्वकर्तृत्वादेरप्युपपत्तेश्च। न चास्मद्बुद्धिवासनोपहितस्य कस्यचित् सार्वज्ञ्यं नाऽनुभूयते इति वाच्यम्, वासनानां परोक्षत्वेन तदुपहितस्याऽपि परोक्षत्वादिति।


अन्तर्यामी है और यह उत्पत्ति और विनाशका कारण है, इसलिए सम्पूर्ण जगत्का उपादान कारण है) इत्यादि श्रुति है। सम्पूर्ण वस्तुको विषय करनेवाली सब प्राणियोंकी धीवासनाओंसे † उपहित उस चैतन्यमें सर्वज्ञत्व और उसी श्रुतिसे सर्वकर्तृत्वकी उपपत्ति भी होती है। और हम लोगोंकी बुद्धिकी वासनाओंसे उपहित किसी चैतन्यमें सर्वज्ञत्वका अनुभव नहीं होता, यह आपत्ति नहीं है, क्योंकि वासनाओंके परोक्ष होनेसे उपहित चैतन्य भी परोक्ष है।


और सुषुप्तिमें वृत्तियोंका लय होनेसे उसका घनीभाव रहता है, इसे प्रज्ञानघन—चैतन्यघन कहते हैं, आनन्दमय है अर्थात् बिम्बभूत ब्रह्मानन्दका प्रतिबिम्ब होनेसे जीव आनन्दमय है। और यह आनन्दमय जीव सुषुप्तिकालमें अविद्यावृत्तिसे उपभोग करता है, इसलिए आनन्दभुक् भी उसे कह सकते हैं।

† आनन्दमय सर्वज्ञ है इसमें युक्ति इस ग्रन्थसे देते हैं—एक बुद्धि किसी एक वस्तुको विषय करती है और सब बुद्धियां मिलकर सभी वस्तुओंको विषय करती हैं। इस प्रकारसे सब बुद्धियाँ यदि सब वस्तुओंका अवगाहन करें, तो उन बुद्धियोंकी वासनाएँ भी सब पदार्थोंको अवश्य विषय करेंगी। इसलिए सब प्राणियोंकी बुद्धिवासनाओंसे उपहित आनन्दमयमें भी सर्ववस्तुविषयकत्व होनेसे सर्वज्ञत्व अर्थात् सिद्ध ही है, अतः आनन्दमयको सर्वज्ञ माननेमें कोई आपत्ति नहीं है। प्रकृतमें यह चिन्ता होती है कि धीवासनाओंसे उपरक्त अज्ञानसे उपहित जो ईश है, उसमें शुद्ध अज्ञान ही उपाधि है अथवा वासनासे उपरक्त, या सम्पूर्ण धीवासना अथवा प्रत्येक वासना उपाधि है, यदि प्रथम पक्षका स्वीकार किया जाय, तो ‘धीवासनाओंमें प्रतिबिम्बित चैतन्य ईश्वर है, ऐसा जो कहा गया है, उसके साथ विरोध होगा, क्योंकि केवल अज्ञान उपाधि हो तो धीवासनाको उपाधि कहना व्यर्थ ही है। और द्वितीय पक्ष भी अयुक्त है, क्योंकि अज्ञानमें रहनेवाले सत्त्वांशकी परिणामरूप सर्वविषयक वृत्तियोंसे सर्वज्ञत्वकी उपपत्ति हो सकती है, तो फिर वासनोपरक्त अज्ञानको उपाधि मानना केवल मूर्खता है। तृतीय पक्ष भी अयुक्त है, क्योंकि एक कालमें सब वृत्तियाँ नहीं हो सकती हैं। इसलिए चौथा पक्ष ही परिशेषसे बचता है, परन्तु इसमें अनुभवविरोध है, और इसी अनुभवविरोधका ‘न चा०’ इत्यादि ग्रन्थसे परिहार भी किया गया है। अर्थात् वासनाओंके परोक्ष होनेसे उन वासनाओंसे उपहित आनन्दमयकी ‘अहं सर्वज्ञः’ इस प्रकार अपरोक्षानुभूति नहीं होती है, यह भाव है।

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