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सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

Siddhanta Lesha Sangraha Hindi

श्रीमदप्पय्य दीक्षित द्वारा

स्रोत: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (उद्गम)

DevanagariHindipublished590 पृष्ठ

प्रथमसमयमात्रसंसर्गीभावविकारत्ववद् निवृत्तेरपि चरमसमयमात्रसंसर्गी-

५१८ : सिद्धान्तलेशसंग्रह [ चतुर्थ परिच्छेद


प्रथमसमयमात्रसंसर्गीभावविकारत्ववद् निवृत्तेरपि चरमसमयमात्रसंसर्गी- भावविकारत्वोपपत्तेः। अत एव यथा पूर्वं पश्चाच्च 'उत्पत्स्यते, उत्पन्नः' इति भाविभूतभावेन व्यवह्रियमाणाया उत्पत्तेः प्रथमसमयमात्रे 'उत्पद्यते' इति वर्तमानव्यवहारः, तथा पूर्वं पश्चाच्च 'निवर्तिष्यते, निवृत्तः' इति भाविभूतभावेन व्यवह्रियमाणाया निवृत्तेश्चरमसमयमात्रे 'निवर्तते, नश्यति, ध्वंसते' इति वर्तमानव्यपदेशः। निवृत्तेरनुवृत्तौ तु चिरशकलितेऽपि घटे 'इदानीं निवर्तते' इत्यादिव्यवहारः स्यात्, आख्यातानां प्रकृत्यर्थगतवर्त- मानत्वार्थाभिधायित्वात्।


प्रथम क्षणमात्रमें सम्बन्ध रखनेवाला भावविकार है, वैसे ही विनाश भी अन्तिम क्षणमात्रके साथ सम्बन्ध रखनेवाला भावभूत विकार ही है, अभावभूत नहीं है, इसीसे अर्थात् निवृत्तिको क्षणिक भावविकार माननेसे ही जैसे उत्पत्तिके पूर्वमें 'घट उत्पन्न होगा' और उत्पत्तिके पीछे 'घट उत्पन्न हुआ' इस प्रकार भावी और भूतरूपसे व्यवह्रियमाण उत्पत्तिमें केवल प्रथम समयमें ही 'उत्पन्न होता है' इस प्रकार वर्तमानव्यवहार होता है और यह उत्पत्तिके क्षणिक भावविकारमें प्रयोजक है, वैसे ही निवृत्तिके पूर्वमें और निवृत्तिके उत्तरकालमें 'निवृत्त होगा और निवृत्त हुआ' इस प्रकार भावी और भूतरूपसे व्यवह्रियमाण निवृत्तिमें भी अन्तिम समयमात्रमें 'निवृत्त होता है' 'नष्ट होता है' 'ध्वस्त होता है' इस प्रकारका वर्तमानव्यवहार क्षणिकत्वका भी साधन करता है, निवृत्ति स्थायी मानी जाय, तो चिरकालसे ध्वस्त हुए घटमें भी 'अभी घट निवृत्त होता है, ऐसा व्यवहार प्रसक्त होगा। क्योंकि जितने आख्यात हैं, वे सबके सब अपने * प्रकृत्यर्थमें रहनेवाले वर्तमानत्व आदिका ही अभिधान करते हैं।


निवृत्त्यवच्छिन्न कालमें ही रहता है, अन्यत्र नहीं रहता। उत्पत्ति और निवृत्ति आद्य और चरम कालको छोड़कर अन्य कालमें भी यदि रहें, तो चिरकालोत्पन्न घटमें और चिरशकलित घटमें 'उत्पन्न होता है और नष्ट होता है', ऐसा व्यवहार प्रसक्त होगा, अतः अविद्यानिवृत्ति, जो अत्यन्त क्षणिक पदार्थ है, उसकी अनुवृत्ति मोक्षकालमें नहीं हो सकती है, अतः अनिर्मोक्षका प्रसङ्ग नहीं है।
* प्रकृत्यर्थ अर्थात् धातुका अर्थ, उसमें रहनेवाले वर्तमानत्व, अतीतत्व, भविष्यत्त्वका ज्ञान आख्यातसे (तिबादिसे) होता है, यह भाव है।


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अविद्यानिवृत्तिके स्वरूपका विचार ] भाषानुवादसहित ५१९


ननु च. तेषां स्वाभिहितसङ्ख्याश्रयप्रकृत्यर्थकर्तृकर्मगतवर्तमानत्वाद्यर्थाभिधायकत्वम्, स्वाभिहितप्रकृत्यर्थानुकूलव्यापारगतवर्तमानत्वाद्यर्थाभिधायकत्वं वाऽस्तु । तथा च. निवृत्तिक्रियाकर्तुश्चिरचूर्णितस्य घटस्य, तद्गतनिवृत्त्यनुकूलव्यापारस्य चाऽवर्तमानत्वाद् नोक्तातिप्रसङ्ग इति चेद्; न; आद्ये उत्पन्नेऽपि घटे ‘उत्पद्यते’ इति व्यवहारापत्तेः । उत्पत्तिक्रियाकर्तुर्घटस्य वर्तमानत्वात् । द्वितीये आमवातजडीकृतकलेवरे उत्थानानुकूलयत्नवति उत्थानानुदयेऽपि ‘उत्तिष्ठति’ इति व्यवहारापत्तेः । आख्यातार्थस्य प्रकृत्यर्थभूतोत्थानानुकूलस्य यत्नरूपव्यापारस्य वर्तमानत्वात् ।


* यदि शङ्का हो कि वे आख्यात ( तिप् आदि ) अपने से अभिहित सङ्ख्याके आश्रयीभूत प्रकृत्यर्थ क्रियाके कर्ता, कर्म आदिमें रहनेवाले वर्तमानत्व आदिका अथवा अपनेसे अभिहित प्रकृत्यर्थके अनुकूल व्यापारमें रहनेवाले वर्तमानत्व आदिका अभिधान करते हैं, इसलिए निवृत्तिरूप क्रियाके कर्ता चिरकालसे चूर्णित घटमें और उसमें रहनेवाले निवृत्तिके अनुकूल व्यापारमें वर्तमानत्वके न होनेसे उक्त आपत्ति अर्थात् चिरशकलित घटको लेकर अभी घट निवृत्त होता है, इस प्रकारकी आपत्ति नहीं आ सकती है, तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि तथोक्त दो अर्थोंमें से पूर्वके अर्थमें उत्पन्न घटको लेकर घट उत्पन्न होता है, ऐसा व्यवहार प्रसक्त होगा, क्योंकि उत्पत्तिक्रूप क्रियाका कर्ता घट वर्तमान है । और दूसरे पक्षमें यह दोष होगा कि आमवातसे जिसका कलेवर अकड़ गया है, ऐसा पुरुष उठनेके अनुकूल यत्न करता है, तथापि उत्थान नहीं होता, परन्तु ‘उत्तिष्ठति’ ( उठता है ) ऐसा व्यवहार प्रसक्त होगा, क्योंकि प्रकृत्यर्थभूत उत्थानके अनुकूल यत्नरूप


* आख्यात—प्रकृत्यर्थमें रहनेवाले वर्तमानत्व आदिका बोध नहीं करते हैं, किन्तु अन्यगत वर्तमानत्व आदिके बोधक हैं, इस प्रकार आशङ्का करते हैं, तात्पर्य यह है कि स्वाभिहित—एकवचनत्व आदिरूपसे आख्यातोंसे अभिहित—जो सङ्ख्या, उस सङ्ख्याके आश्रयभूत—‘घटो निवर्तते, देवदत्तः पचति, तण्डुलाः पच्यन्ते’ इत्यादि प्रयोगोंमें प्रकृत्यर्थभूत निवृत्त्यादि क्रियाओंका कर्तृकर्मादिरूप—जो घटादि हैं, उन घटादिमें रहनेवाले वर्तमानत्व आदिका आख्यात बोध कराते हैं अथवा ‘घटो निवर्तते’ ( घट विनष्ट होता है ) इत्यादि प्रयोगोंमें आख्यातसे अभिहित प्रकृत्यर्थभूत निवृत्तिके अनुकूल जो व्यापार है उस व्यापारमें रहनेवाले वर्तमानत्व आदिका आख्यात बोधक है, परन्तु प्रकृत्यर्थगत वर्तमानत्व आदिका बोधक नहीं है।

५२०सिद्धान्तलेशसंग्रह[ चतुर्थ परिच्छेद

तस्मात् प्रकृत्यर्थगतमेव वर्त्तमानत्वादि आख्यातार्थ इति ध्वंसस्य स्थायित्वे चिरनिवृत्तेऽपि घटे 'निवर्तते' इति व्यवहारो दुर्वारः ।

यदि च मुद्गरादिशकलिते घटे ध्वंसो नाम कश्चिदभावस्तत्प्रतियोगिकः स्थायी भूतलाद्याश्रित उपेयते, तदा कपालमालापसरणे तदनपसरणेऽपि मणिकशरावादिकपालव्यावृत्तकपालसंस्थानविशेषादर्शने च किमिति स


व्यापार, जो कि आख्यातार्थ है, वर्त्तमान है । इससे अर्थात् किसी अर्थान्तरके न होनेसे प्रकृत्यर्थगत वर्त्तमानत्व आदि ही आख्यातार्थ है, इससे ध्वंसको स्थायी माननेमें चिरनिवृत्त घटमें 'निवर्तते' (अब निवृत्त होता है) ऐसा व्यवहार अवश्य होगा ।

* मुद्गर आदिसे घटके शकलित (खण्डित) होनेपर ध्वंस नामका घटप्रतियोगिक स्थायी और भूतलमें रहनेवाला अभाव यदि माना जाय, तो † कपालमालाके अपसरणमें और अपसरणके अभावमें मणिक, शराव आदिके कपालोंसे व्यावृत्त कपालके संस्थान विशेषका दर्शन न होनेपर भी वह ध्वंस क्यों नहीं प्रत्यक्ष देखा जाता है। यदि शङ्का हो कि कपालोंके


* जो लोग अतिरिक्त अभावरूप ध्वंसका अङ्गीकार करते हैं, वह ध्वंस क्या प्रत्यक्ष है या अनुमेय है, इस प्रकारके दो विकल्प करके क्रमशः उन विकल्पोंका अग्रिम ग्रन्थसे निरास करते हैं, यहाँ समझना चाहिए कि घटके ध्वंसके अनन्तर कपालमें जैसे घटध्वंसकी प्रतीति होती है, वैसे ही खण्डित घटके अधिकरण भूतलमें भी 'यहाँ घट ध्वस्त हुआ' इस प्रतीतिके आधारपर भूतल आदि भी घटध्वंसके अधिकरण होते हैं, ऐसा कुछ तार्किक मानते हैं, उन्हींके अनुसार यह पूर्वपक्ष है ।

† समाधानका तात्पर्य यह है कि यदि घटध्वंस भूतल आदिमें प्रत्यक्ष मानते हो, तो जहाँपर कपालोंकी कतार है, वहाँसे उस कतारको हटा देनेपर 'यहाँ घटका ध्वंस है' ऐसा प्रत्यक्ष होना चाहिए, परन्तु होता तो है नहीं, अतः ध्वंसका प्रत्यक्ष नहीं होता है, यह मानना चाहिए । यदि शङ्का हो कि घटध्वंसके प्रत्यक्षके प्रति कपालमालाका प्रत्यक्ष भी कारण है, अतः घटध्वंसका प्रत्यक्ष नहीं होता, तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि तुम्हारे कथनके अनुसार कपालमालाका अपसरण न करनेपर भी मणिक (मिट्टीका बड़ा पात्र) आदि अन्य पात्रोंसे व्यावृत्त भूतलगत कपालोंमें घटके कपालोंका असाधारण रूप गृहीत जिस कालमें नहीं हुआ उस कालमें भी घटध्वंसका प्रत्यक्ष होना चाहिए, क्योंकि कपालमालाका प्रत्यक्ष विद्यमान है, अतः ध्वंस प्रत्यक्ष है, यह मत अनादरणीय है । वस्तुतस्तु प्रध्वंसाभावके प्रत्यक्षमें इन्द्रियका सन्निकर्ष निरूपित नहीं होता, अतः प्रत्यक्ष नहीं होता, यह भाव है।

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अविद्यानिवृत्तिके स्वरूपका विचार ] भाषानुवादसहित ५२१


प्रत्यक्षो न स्यात्। कपालसंस्थानविशेषादिनाऽनुमेयो घटादिध्वंसो न प्रत्यक्ष इति चेत्, तर्हि तेन मुद्गरपातकालीनस्य उत्पत्तिवद् भावविकाररूपतया प्रतियोग्याश्रितध्वंसस्याऽनुमानं सम्भवतीति न ततः पश्चादनुवर्तमानप्रतियोग्यधिकरणाश्रिताभावरूपध्वंससिद्धिः। 'इह भूतले घटध्वंसः' इति भूतले ध्वंसाधिकरणत्वव्यवहारस्य 'इह भूतले घट उत्पन्नः' इतिवत् भावविकारयुक्तप्रतियोग्यधिकरणत्वविषयत्वोपपत्तेः। घटध्वंसानन्तरं भूतले घटाभावव्यवहारस्य घटापसरणानन्तरं तदभावव्यवहारवत् समयविशेष-


संस्थानविशेषसे घटादिध्वंस अनुमेय है, प्रत्यक्ष नहीं है, तो वह भी युक्त नहीं है, क्योंकि उसी कपालके संस्थानविशेष आदिसे उत्पत्तिके समान भावके विकाररूपसे अवस्थित मुद्गरपतनके समानकालीन प्रतियोगीमें आश्रित ध्वंसका भी अनुमान हो सकता है, इसलिए उस अनुमानसे प्रतियोगीके अधिकरणमें रहनेवाले ध्वंसरूप अभावकी सिद्धि नहीं हो सकती है ‡। 'इस भूतलमें घटका ध्वंस है' इस प्रकार जो भूतलमें ध्वंसाधिकरणत्वका व्यवहार होता है, वह तो इस भूतलमें घट उत्पन्न हुआ, इस प्रकारके व्यवहारके समान भावभूत विकारसे युक्त प्रतियोगीके अधिकरणत्वकी विषयताको लेकर भी उपपन्न हो सकता है। घटके ध्वंसके बाद् भूतलमें जो घटाभावका व्यवहार होता है * वह भी घटके अपसरणके बाद होनेवाले


‡ इस अनुमानसे भूतकालीन ध्वंसका भी अनुमान हो सकता है, इसलिए उक्त अनुमानसे ध्वंसमात्रकी सिद्धि होनेपर भी इससे तार्किकाभिमत ध्वंसके स्थायित्वकी सिद्धि नहीं हो सकती है, यह भाव है। यदि शङ्का हो कि यह भूतल घटध्वंसका आश्रय है, कपालमालाविशेष होनेसे, जो कपालमालाविशेषका अधिकरण भूतल नहीं है, वह घटध्वंसका अधिकरण नहीं है, इस प्रकारके अनुमानसे घटाश्रित ध्वंसकी सिद्धि कैसे होगी, तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि ध्वंसकी उत्पत्तिदशामें प्रतियोगीमें ही ध्वंस यद्यपि रहता है, तथापि प्रतियोगी द्वारा भूतलमें भी ध्वंस रहता है, अतः उक्त अनुमानकी विषयता भूतलाश्रित ध्वंसमें भी है।

* तात्पर्य यह है कि घटके नष्ट हो जानेपर 'इस भूतलमें घट नहीं है' इस प्रकारका व्यवहार अत्यन्ताभावका ही—जो कि अत्यन्ताभाव किसी समयविशेषमें अर्थात् भूतल आदिमें घटादिसंयोगके अभावकालमें रहता है—अवलम्बन करता है, अतः इसी क्लृप्त अत्यन्ताभावसे यथोक्त व्यवहारकी यदि उपपत्ति हो सकती है, तो फिर अतिरिक्त ध्वंसकी अङ्गीकृति निष्फल प्रतीत होती है। और 'अतोऽन्यदार्तम्' (नित्य स्वप्रकाशचैतन्यसे इतर

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५२२ सिद्धान्तलेशसंग्रहः [चतुर्थ परिच्छेद


संसर्ग्यत्यन्ताभावालम्बनतोपपत्या ध्वंसविषयत्वस्याऽकल्पनीयत्वाच्च । एवं सति घटोत्पत्तेः पूर्वं तदभावव्यवहारोऽप्यत्यन्ताभावेन चरितार्थ इति प्रागभावोऽपि न स्यादिति चेत्, सोऽपि मा भूत् । नन्वेवं 'प्रागभावाधारकालः पूर्वकालः, ध्वंसाधार उत्तरकालः' इति निर्वचनासम्भवात् काले पूर्वोत्तरादिव्यवहारः किमालम्बनस्स्यात् । घटादिषु प्रतियोगित्वादिव्यवहारवदखण्डकिञ्चिद्धर्मगोचरोऽस्तु । अभावरूपस्थायिध्वंसाभ्युपगमेऽपि तेषु ध्वंसत्वादेरखण्डस्य वक्तव्यत्वात् । न च जन्याभावत्वरूपं सखण्ड-


घटाभावव्यवहारके समान विशेषसमयमें सम्बन्ध रखनेवाले अत्यन्ताभावको ही अवलम्बन करता है, इसलिए उसको ध्वंसविषयक मानना अनुचित है । यदि इस परिस्थितिमें † शङ्का हो कि घटकी उत्पत्तिके पूर्वमें घटाभावका व्यवहार भी अत्यन्ताभावसे ही उपपन्न हो सकता है, अतः प्रागभावकी भी सिद्धि नहीं होगी, तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि प्रागभावका भी अङ्गीकार नहीं करते हैं । यदि शङ्का हो कि प्रागभाव और ध्वंस न मानें जायें, तो प्रागभावका आधारभूत काल पूर्वकाल है और ध्वंसका आधारभूत काल उत्तरकाल है, इस प्रकारसे पूर्वकाल और उत्तरकालका निर्वचन नहीं कर सकते हैं, अतः कालमें जो पूर्वत्व और उत्तरत्व आदि व्यवहार होते हैं, वे किसको आलम्बन करेंगे ? तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि जैसे घट आदिमें प्रतियोगित्व आदिका व्यवहार अखण्ड प्रतियोगित्वादि धर्मविषयक है, वैसे ही कालमें पूर्वत्वादि व्यवहार भी अखण्ड पूर्वत्वादि धर्मविषयक ही है । और अभावरूप स्थायी ध्वंसके माननेपर भी उस अभावमें ध्वंसत्व आदि अखण्ड धर्म ही मानने पड़ेंगे ‡ । यदि शङ्का हो कि 'जन्यत्वे सति अभावत्वम्' अर्थात् जन्य होकर जो अभाव हो, वह ध्वंस है, ऐसा ध्वंसका निर्वचन करनेसे ध्वंसत्व सखण्ड ही सिद्ध होता है, अखण्ड नहीं; तो यह


नश्वर है) इस श्रुतिसे पराभिमत नित्य ध्वंसका खण्डन भी हो जाता है । अतः ऐसे पदार्थोंकी कल्पना प्रमाणशून्य है ।

† घटनाशके उत्तरकालमें होनेवाले अभावव्यवहारकी सामयिक अत्यन्ताभावसे ही उपपत्ति हो सकती है, इस अवस्थामें, यह भाव है ।

‡ अर्थात् ध्वंसत्व और प्रागभावत्व आदि धर्मोंको पूर्वपक्षी भी अखण्ड धर्म ही मानता है, अतः पूर्वत्वादि धर्मोंको अखण्ड धर्म माननेमें गौरव नहीं है, यह भाव है ।

अविद्यानिवृत्तिके स्वरूपका विचार] भाषानुवादसहित ५२३

मेव ध्वंसत्वम्, ध्वंसप्रागभावरूपस्य घटस्य तद्ध्वंसत्वापत्तेः । । न च सप्तमपदार्थरूपाभावत्वं विवक्षितम्, घटस्य प्रागभावं प्रत्यपि ध्वंसत्वाभावप्रसङ्गेन घटकाले प्रागभावोत्तरकालत्वव्यवहारस्य निरालम्बनत्वापत्तेः । न च प्रतियोग्यतिरिक्तः प्रागभावध्वंसः, तथा सति तुल्यन्यायतया ध्वंसप्रागभावोऽपि प्रतियोग्यतिरिक्तः स्यादिति प्रागभावध्वंसस्यापि प्रागभावोऽन्यः, तस्यापि कश्चिद् ध्वंसः, तस्यापि प्रागभावोऽ-

भी युक्त नहीं है, क्योंकि ध्वंसप्रागभावरूप घटमें भी घटध्वंसत्वकी प्रसक्ति होगी ।

यदि शङ्का हो कि 'जन्य होकर सप्तमपदार्थरूप अभाव'* ही ध्वंसका लक्षण विवक्षित है, अतः दोष नहीं है, तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि इस लक्षणमें प्रागभावके ध्वंसरूप घटमें प्रागभावध्वंसत्वकी प्रसक्ति नहीं होगी, इसलिए घटकालमें प्रागभावोत्तरकालीनत्वका व्यवहार निरालम्बन हो जायगा । यदि शङ्का हो कि प्रागभावका ध्वंस प्रतियोगीसे अतिरिक्त ही है, तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि प्रागभावध्वंसके प्रतियोगीसे भिन्न होनेपर समानरीतिसे † ध्वंसका प्रागभाव भी प्रतियोगीसे अतिरिक्त होगा, इससे प्रागभावध्वंसका भी अन्य—दूसरा—प्रागभाव और उसका भी कोई अन्य ध्वंस, उसका भी अन्य प्रागभाव,


* जन्य होकर जो सप्तम पदार्थरूप अभाव है, वही ध्वंस नामका अभाव है, यह इसका अर्थ है । केवल सप्तम पदार्थरूप अभाव ही ध्वंस कहा जाय, तो अत्यन्ताभाव, प्रागभाव और अन्योन्याभावमें अतिव्याप्ति हो जायगी, इसलिए जन्यत्व विशेषण दिया है । यदि केवल ऐसा ही कहा जाय कि 'जो जन्य हो, वह ध्वंसाभाव है' तो घट आदिमें भी ध्वंसका लक्षण चला जायगा, इसलिए जन्य होकर जो सप्तम पदार्थरूप अभाव हो वही ध्वंस है, ऐसा लक्षण करना होगा । इसपर ध्यान देना चाहिए कि द्रव्य, गुण, कर्म, सामान्य, विशेष, समवाय और अभाव ये सात पदार्थ हैं ।

† प्रागभावके ध्वंसको अर्थात् घटादिप्रतियोगिक प्रागभावके ध्वंसको घट दिप्रतियोगीसे यदि भिन्न माना जाय, तो इसी युक्तिसे घटध्वंसका प्रागभाव भी घटरूप ध्वंसके प्रतियोगीसे भिन्न होगा । इस अवस्थामें जैसे घटप्रागभावका ध्वंस घटरूप प्रतियोगी से भिन्न है, वैसे ही घट-प्रागभावध्वंसके भी प्रागभावको घटप्रागभावसे भिन्न मानना होगा, क्योंकि ध्वंसप्रागभाव भी ध्वंसरूप प्रतियोगीसे भिन्न है, इसी प्रकार अन्य प्रागभाव और अन्य ध्वंसका भी ध्वंस और प्रागभाव प्रतियोगीसे अतिरिक्त होंगे, इसी प्रकार आगे भी परम्परामें विचार कर सकते हैं, इसलिए अनवस्था स्फुट है, यह भाव है ।

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५२४ सिद्धांतलेशसंग्रह [ चतुर्थ परिच्छेद

न्य इत्यप्रामाणिकानवधिकध्वंसप्रागभावकल्पनापत्तेः । न चान्यद् ध्वंसत्वमात्माश्रयादिशून्यं निर्वक्तुं शक्यम् । एवं प्रागभावत्वमपीत्य- न्यत्र विस्तरः ।

तस्मान्न पूर्वं प्रागभावः, न च पश्चात् ध्वंसाभावः । मध्ये परं कियत्कालमनिर्वचनीयोत्पत्तिस्थितिध्वंसरूपभावविकारवान् घटाद्यध्यासः ।

इस रूपसे अनेक अप्रामाणिक ध्वंस और प्रागभावोंकी कल्पना करनी पड़ेगी, और आत्माश्रय दोषसे शून्य अन्य ध्वंसका निर्वचन भी नहीं हो सकता है * । इसी प्रकार प्रागभावत्वका भी निर्वचन नहीं हो सकता † । इस विषयमें अधिक विचार अन्य ग्रन्थोंमें देखना चाहिए ।

इससे ‡ उत्पत्तिसे पहले प्रागभाव भी नहीं है और उत्पत्तिके पश्चात् ध्वंस भी नहीं है, परन्तु बीचकी अवस्थामें कुछ कालतक अनिर्वचनीय, उत्पत्ति, स्थिति और ध्वंसरूप भावविकारसे युक्त घटादिका अध्यास है । लोकमें घटादि


* यदि कोई कहे कि जन्याभावत्वरूप ध्वंसत्व उक्त दोषसे दुष्ट है, तो 'ध्वंसाप्रतियोगित्वे सति त्रैकालिकाभिन्नाभावत्वम्' (अर्थात् ध्वंसका अप्रतियोगी हो करके अत्यन्ताभावसे या अन्यो-न्याभावसे जो भिन्न हो वह ध्वंस है) ध्वंसका लक्षण करो, और इसमें प्रागभावको लेकर अति-व्याप्तिके वारणके लिए विशेषण दल है और अत्यन्ताभाव आदिके निरासके लिए विशेष्यदल है, तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि ध्वंसके लक्षणमें ध्वंसका प्रवेश होनेसे आत्माश्रय दोष होगा अर्थात् अपने ज्ञानमें अपनी ही अपेक्षा हुई, अतः इस लक्षणसे भी ध्वंसत्वको सखण्ड नहीं बना सकते हैं । यदि कहें कि 'प्रागभावात्यन्ताभावान्योऽन्याभावभिन्नत्वे सति अभावत्वम् ध्वंसत्वम्' अर्थात् प्रागभाव, अत्यन्ताभाव और अन्योभावसे भिन्न होकर जो अभाव हो वह ध्वंस है, तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि इस लक्षणमें प्रागभावका निवेश है, इसलिए उसके निर्वचनमें ध्वंसभिन्नत्वका निवेश करना होगा, अतः अन्योन्याश्रय होगा ।

† तात्पर्य यह है कि 'अनादित्वे सति सान्तत्वम् प्रागभावत्वम्' अर्थात् अनादि होकर जो अन्तवान् हो, उसे प्रागभाव कहते हैं, ऐसा कहा जाय, तो घटध्वंसके प्रागभावरूप घटमें अना-दित्वके न होनेसे अव्याप्ति होगी । और कदाचित् कहो कि 'प्रतियोगिजनक्त्वे सति अभावत्वम्' अर्थात् प्रतियोगीके प्रति जो जनक अभाव है, वह प्रागभाव है, तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि जनकत्वके लक्षणमें प्रविष्ट पूर्ववृत्तित्वके कार्यप्रागभाववृत्तिरूप होनेसे आत्माश्रय दोष होगा, इसलिए प्रागभावत्व भी सखण्ड धर्म नहीं हो सकता है ।

‡ अन्य प्रतिपक्षियों द्वारा स्वीकृत प्रागभाव और ध्वंसके साधक प्रमाणोंके न होनेसे यह भाव है ।

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मोक्षके स्वतःपुरुषार्थत्वका विचार] भाषानुवादसहित ५२५


एवं चाऽविद्यानिवृत्तिरपि ब्रह्मसाक्षात्कारोदयानन्तरक्षणवर्ती कश्चिद्भावविकार इति तस्या मुक्तावनुवृत्त्यभावान्न तदनिर्वच्यत्वे कश्चिद्दोष इत्यद्वैतविद्याचार्याः ॥ २ ॥

नन्वेवं क्षणिकत्वं स्यान्मुक्तेर्भ्रान्तोऽसि नह्यसौ ।
दुःखाभावः सुखं वेति पुरुषार्थत्ववर्जनात् ॥ ८ ॥

यदि शङ्का हो कि अविद्यानिवृत्तिका क्षणिकत्व माननेसे मुक्तिमें भी क्षणिकत्व प्रसक्त होगा, तो यह शङ्का केवल भ्रान्ति है, क्योंकि यह अविद्यानिवृत्ति न तो दुःखाभाव है और न सुख है, इसलिए पुरुषार्थत्वसे रहित है ॥ ८ ॥

नन्वेवमविद्यानिवृत्तेः क्षणिकत्वे मोक्षः स्थिरपुरुषार्थो न स्यादिति चेद्, भ्रान्तोऽसि । नह्यविद्यानिवृत्तिः स्वयमेव पुरुषार्थ इति तस्याः ज्ञानसाध्यत्वमुपेयते, तस्याः सुखदुःखाभावेतरत्वात् । किन्तु अखण्डानन्दावारकसंसारदुःखहेत्वविद्योच्छेदे अखण्डानन्दस्फुरणम्, संसारदुःखोच्छेदश्च भवतीति तदुपयोगितया तस्यास्तत्त्वज्ञानासाध्यत्वमुपेयते ।

ध्वंसके क्षणिक भावविकार सिद्ध होनेसे अविद्याकी निवृत्ति भी ब्रह्मसाक्षात्कारकी उत्पत्ति होनेके अनन्तरक्षणमें रहनेवाला कोई भावभूत विकार ही है। इसलिए उसकी मुक्तिमें अनुवृत्ति न होनेके कारण उसके अनिर्वचनीय होनेपर भी कोई दोष नहीं है, इस प्रकार अद्वैतविद्याचार्य कहते हैं ॥ २ ॥

*अथ शङ्का होती है कि यदि अविद्यानिवृत्ति क्षणिक मानी जाय, तो अविद्यानिवृत्तिरूप मोक्ष स्थायी पुरुषार्थ सिद्ध नहीं होगा, तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि इस विषयमें तुमको भ्रम है, कारण कि अविद्यानिवृत्ति ही स्वयं पुरुषार्थ नहीं है, इसीसे उसको ज्ञानजन्य मानते हैं, क्योंकि अविद्यानिवृत्ति न तो सुख है और न दुःखाभाव है, किन्तु अखण्ड आनन्दको आवृत्त करनेवाली और सांसारिक दुःखके हेतुभूत अविद्याका उच्छेद होनेसे अखण्ड आनन्दका प्रकाश हो जाता है और सांसारिक दुःखकी निवृत्ति हो जाती है, इसलिए अखण्डानन्दकी प्राप्ति और दुःखाभावमें उपयोगी होनेसे अज्ञाननिवृत्तिको ज्ञानसाध्य मानते हैं।


* अविद्यानिवृत्ति मोक्षके प्रति साधनभूत ज्ञानसे साध्य है, ऐसा पूर्वमें सिद्धान्ती ने उपपादन किया, इसलिए पूर्वपक्षीको यह भ्रम हुआ कि अविद्यानिवृत्ति ही मोक्ष पदार्थ है, इसलिए पूर्वपक्षीके भ्रम निवारणके लिए इस ग्रन्थसे शङ्कापूर्वक समाधान करते हैं।


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५२६सिद्धान्तलेशसंग्रह[ चतुर्थ परिच्छेद

दुःखं सुखविरोधीति तन्नाशोऽपि हि न स्वतः ।
पुमर्थः सुखमात्रं तु तथा चित्सुखदर्शने ॥ ९ ॥

चित्सुखाचार्य की दृष्टिमें दुःख सुखका विरोधी है, इसलिए दुःखका विनाश स्वतःपुरुषार्थ नहीं है, किन्तु केवल सुख ही पुरुषार्थ है ॥ ९ ॥

चित्सुखाचार्यास्तु—दुःखाभावोऽपि मुक्तौ न स्वतःपुरुषार्थः, सर्वत्र दुःखाभावस्य स्वरूपसुखाभिव्यक्तिप्रतिबन्धकाभावरूपतया सुखशेषत्वात्; सुखस्यैव स्वतःपुरुषार्थत्वम् । अन्येषां सर्वेषामपि तच्छेषत्वमिति सुखसाधनताज्ञानस्यैव प्रवर्तकत्वे सम्भवति दुःखाभावस्यापि स्वतःपुरुषार्थत्वं परिकल्प्य-


* चित्सुखाचार्य कहते हैं कि मुक्तिमें दुःखाभाव स्वयं पुरुषार्थ नहीं है, क्योंकि सभी जगह † दुःखाभाव स्वरूपसुखकी अभिव्यक्तिमें प्रतिबन्धकीभूत पदार्थका अभावरूप होनेसे सुखका ही अङ्ग है, अतः सुख ही स्वतःपुरुषार्थ है। और जितने सुखके साधन हैं, उन सबको सुखाङ्ग मान करके सुखसाधनताज्ञानको प्रवर्तक मान लेने पर दुःखाभावको भी स्वतःपुरुषार्थ मान करके दुःखाभावके साधनोंमें दुःखाभावसाधनताज्ञानरूप प्रवर्तकके संग्रह


* अविद्याकी निवृत्तिके समान दुःखकी निवृत्ति भी स्वतः पुरुषार्थ नहीं है, इसलिए ब्रह्मानन्दस्फुरणके हेतुरूपसे ही अविद्यानिवृत्ति ज्ञानसाध्य है, इस प्रकारके चित्सुखाचार्यजीके मतको कहते हैं, यह मत इन्होंने अपने तत्त्वप्रदीपिकाग्रन्थमें, चतुर्थ परिच्छेदमें निम्नलिखित पङ्क्तियोंसे बतलाया है—
'नात्र दुःखाभावः स्वतन्त्रतया पुरुषार्थः, सुखाभिव्यक्तिशेषत्वात् । न च विपरीतवृत्तिप्रसङ्गः, विकल्पासहत्वात् । किं सुखं दुःखाभावस्योत्पादकमुताभिव्यञ्जकम्, नोभयथापि ।' अर्थात् दुःखाभाव स्वतन्त्ररूपसे पुरुषार्थ नहीं है, प्रत्युत सुखाभिव्यक्तिका अङ्ग है । यदि शङ्का हो कि सुख ही दुःखाभावका अङ्ग है, इस प्रकार उलटा प्रसङ्ग क्यों नहीं आता ? नहीं, विपरीत प्रसङ्ग नहीं आ सकता है, क्योंकि विकल्पका सहन नहीं कर सकता है—क्या सुख दुःखाभावका उत्पादक है या उसका अभिव्यञ्जक है ? दोनों ही प्रकार नहीं हो सकते हैं ।

† दुःखकालमें आत्मस्वरूपभूत सुखकी अभिव्यक्ति (स्फुरण) न होनेसे दुःख सुखाभिव्यक्तिमें प्रतिबन्धक माना जाता है, इसलिए दुःखाभावकी सुखाभिव्यक्तिके लिए ही कामना होती है, सुखके समान स्वतःपुरुषार्थत्वरूपसे नहीं होती है, यह भाव है।

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मोक्षके स्वतःपुरुषार्थत्वका विचार ] भाषानुवादसहित ५२७


तत्त्साधनप्रवर्तकसङ्ग्रहाय इष्टसाधनताज्ञानस्य इच्छाविषयत्वप्रवेशेन गुरुघटितस्य प्रवर्तकत्वकल्पनायोगात् ।

न च दुःखाभाव एवं स्वतःपुरुषार्थः, तच्छेषतया सुखं काम्यमिति वैपरीत्यापत्तिः; बहुकालदुःखसाध्येऽपि क्षणिकसुखजनके निन्दितग्राम्य-


करनेके लिए इष्टसाधनताज्ञानको भी प्रवर्तक मानना पड़ेगा, यह युक्त नहीं है, क्योंकि इष्टसाधनताज्ञानमें इच्छाविषयताका प्रवेश होनेसे पूर्व प्रवर्तककी अपेक्षा इसमें गौरव है ।

※ यदि शङ्का हो कि 'दुःखाभाव ही स्वयं पुरुषार्थ है। और सुख दुःखाभावके अङ्गरूपसे ही काम्य है अर्थात् अभीष्ट है, इस प्रकार वैपरीत्यकी भी प्रसक्ति हो सकती है, तो यह युक्त नहीं है, क्योंकि † अधिककाल तक दुःखसे साध्य निन्दित अगम्यागमन आदि क्षणिक सुखके साधनोंमें अनेक मनुष्योंकी


* भाव यह है कि दुःखाभावको सुखशेष माननेसे दुःखाभावके साधन भी सुखसाधन ही गिने जायेंगे, इस अवस्थामें सुखके या दुःखाभावके साधनोंमें सर्वत्र सुखसाधनता ज्ञानको ही प्रवर्तक माननेसे काम चल सकता है । यदि सुखके समान दुःखाभाव भी स्वतःपुरुषार्थ माना जायगा, तो दुःखाभावके साधनोंमें सुखसाधनताका बाध होनेसे सुखसाधनत्वसे उनमें प्रवृत्ति नहीं होगी । यदि शङ्का हो कि दुःखाभावके साधनोंमें प्रवृत्तिके प्रति दुःखाभावसाधनता ज्ञानको प्रवर्तक मानेंगे, इसलिए उनमें भी प्रवृत्तिकी उपपत्ति हो सकती है, तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि इस प्रकार माननेसे प्रवृत्तिके कारणका अनुगम नहीं होगा । यदि शङ्का हो कि दोनोंके लिए अर्थात् सुखसाधनोंमें और दुःखाभावसाधनोंमें प्रवृत्तिकी उपपत्ति के लिए इष्टसाधनताज्ञानको ही प्रवर्तक मानो, दुःखाभाव भी सुखके समान अभीष्ट है, अतः इष्टशब्दसे उसका भी संग्रह हो सकता है, तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि प्रवृत्तिमात्रके प्रति जो तुमने इष्टसाधनताज्ञानको कारण माना है, उसमें प्रविष्ट इष्टांशमें सुखत्वजातिका अङ्गीकार करो तो कथञ्चित् लाघव हो सकता है, परन्तु इष्टांशमें सुखत्वजातिके अङ्गीकारमें किसी प्रमाणके न होनेसे उपाधि ही माननी होगी । इस परिस्थितिमें कारणतावच्छेदकप्रयुक्त गौरव ही प्रसक्त होगा, इसलिए दुःखाभावको सुखशेष मानना ही युक्त है ।

† कुछ लोग इस प्रश्नके विषयमें तर्क करते हैं कि यह शङ्का हो ही नहीं सकती, क्योंकि इस विपरीत पक्षमें दुःखाभाव साधनोंमें प्रवर्तक ज्ञानकारणतावच्छेदक शरीरमें दुःखाभावत्वरूप उपाधिका ही प्रवेश मानना पड़ेगा, इसलिए इच्छाविषयत्वरूप उपाधिके प्रवेशके समान गौरव ही है, तो यह तर्क युक्त नहीं है, क्योंकि सिद्धान्तमें सुख आत्मरूप है, इसलिए आत्माके एक होनेसे सुखत्व जाति ही नहीं हो सकती है, अतः उसमें जातित्वका असम्भव है और उसे उपाधि मानना होगा, इसलिए ग्रन्थमें उक्त शङ्का हो सकती है । इच्छाविषयत्वके समान सुखत्वं भी उपाधिरूप है, अतः सुखत्वका प्रवेश करनेपर भी कारणतावच्छेदकप्रयुक्त गौरवके समान होनेसे किसी विनिगमकके न रहनेसे वैपरीत्यकी आशङ्का हो सकती है, यह भाव है ।

५२८सिद्धान्तलेशसंग्रह[ चतुर्थ परिच्छेद

धर्मादौ प्रवृत्तिदर्शनात् । तत्र क्षणिकसुखकालीनदुःखाभावस्य पुरुषार्थत्वे तदर्थं बहुकालदुःखानुभवायोगात् । न च तत्र क्षणिकसुखस्य पुरुषार्थत्वेऽपि दोषतौल्यम् , भावरूपे सुखे उत्कर्षापकर्षयोरनुभवसिद्धत्वेन क्षणमप्यत्युत्कृष्टसुखार्थं बहुकालदुःखानुभवोपपत्तेः । दुःखाभावे चोत्कर्षापकर्षासम्भवात् । तस्मान्मुक्तौ संसारदुःखनिवृत्तिरप्यविद्यानिवृत्तिवत् सुखशेष इतयनवच्छिन्नानन्दप्राप्तिरेव स्वतःपुरुषार्थ इत्याहुः ॥ ३ ॥

प्रत्यगेव परानन्दस्तिरोभूतः स्वमोहतः ।
स्वकण्ठचामीकरवत् प्राप्तप्राप्यः स्वविद्यया ॥ १० ॥

अपने मोहसे प्रत्यग्रूप परानन्द ही तिरोभूत हुआ है अतः प्राप्त होनेपर भी भूली हुई अपनी कण्ठगत सुवर्णमालाके समान अपनी विद्यासे प्राप्य होता है ॥१०॥

प्रवृत्ति देखी जाती है । उस स्थलमें अर्थात् निन्दित उक्त प्रवृत्तिस्थलमें * क्षणिक सुखकालिक दुःखाभावमें पुरुषार्थताका यदि अङ्गीकार किया जाय, तो उसके लिए अधिककाल तक दुःखानुभव नहीं हो सकता है । यदि शङ्का हो कि निन्दित प्रवृत्तिस्थलमें क्षणिक सुख पुरुषार्थ माना जाय, तो भी दोष तो समान है ? तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि भावरूप सुखमें उत्कर्ष और अपकर्षका अनुभव होनेसे क्षणिक उत्कृष्ट सुखके लिए बहुत काल तक दुःखका अनुभव उपपन्न हो सकता है, और दुःखाभावमें उत्कर्ष और अपकर्ष नहीं हो सकते हैं † । इससे अर्थात् दुःखाभावके स्वतः पुरुषार्थ न होनेसे संसाररूप दुःखकी निवृत्ति भी अविद्यानिवृत्तिके समान सुखकी अङ्ग है, अतः अनवच्छिन्न-शुद्ध-आनन्दकी प्राप्ति ही स्वतः-पुरुषार्थ है ॥ ३ ॥


* समाधान इस अभिप्रायसे देते हैं कि सुखव्यक्ति वस्तुतः एक है, तथापि उपाधिके भेदसे सुखका भेद होनेके कारण सुखत्व जाति अक्षत है, अतः सुखको स्वतः पुरुषार्थ माननेसे कारणतावच्छेदकप्रयुक्त लाघव है । और दुखाभाव ही यदि स्वतः पुरुषार्थ होता, तो अधिक काल तक क्षणिक सुखके लिए अनेक पुरुष प्रवृत्त नहीं देखे जाते, अतः सुखको ही पुरुषार्थ मानना युक्ति-युक्त है ।
† कारण कि अभावमें उत्कर्षत्व और अपकर्षत्वरूप जाति नहीं मानी जाती है, यह भाव है ।

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मोक्षके प्राप्यत्व और अप्राप्यत्वका विचार ] भाषानुवादसहित ५२९


नन्वनवच्छिन्नानन्दः प्रत्यग्रूपतया नित्यमेव प्राप्तः । सत्यम्, नित्य- प्राप्तोऽपि अनवच्छिन्नानन्दस्तमावृत्य तद्विपरीतमर्थं प्रदर्शयन्त्या अविद्यया संसारदशायामसत्कल्पत्वं नीत इत्यकृतार्थताऽभूत् । निवर्तितायां च तस्यां निरस्तनिखिलानर्थविक्षेपे स्वकण्ठगतविस्मृतकनकाभरणवत् प्राप्यते इवेत्यौ- पचारिकी तस्य प्राप्तव्यतेति केचित् ।

अप्राप्तिरपि तस्याऽभूत् संसृतौ व्यावहारिकी ।
सा विद्यया निवृत्तेति मुख्यां प्राप्तिं परे जगुः ॥ ११ ॥

कुछ लोग कहते हैं कि संसारदशामें अनवच्छिन्न आनन्दकी व्यावहारिक अप्राप्ति थी वह विद्यासे निवृत्त हुई, इसलिए उसकी मुख्य प्राप्ति हो सकती है ॥११॥


यदि कोई शङ्का करे कि अनवच्छिन्न आनन्द तो प्रत्यगात्मारूप है, अतः वह † सर्वदा प्राप्त ही है, इसलिए उसकी प्राप्तिके लिए कोई प्रयत्न करनेकी आवश्यकता नहीं है ? तो यह युक्त नहीं है, क्योंकि यद्यपि वह अनवच्छिन्न आनन्द नित्य प्राप्त ही है, तथापि उस आनन्दको आवृत करके विपरीत अर्थको—दुःखात्मक संसारको—दिखलाती हुई अविद्या संसारदशामें उस आनन्दको नहींके समान बना देती है, अतः पूर्णानन्दकी अप्राप्ति भासती है । उस अविद्याकी निवृत्ति हो जानेपर सम्पूर्ण अनर्थरूप विक्षेपकी निवृत्ति हो जानेसे अपने कण्ठमें स्थित सुवर्णहारको विस्मृतिके समान ✲ उस आनन्दकी भी प्राप्ति हो जाती है, अतः आनन्दमें औपचारिक प्राप्तिविषयता है, ऐसा भी कुछ लोग कहते हैं ।


†जीवको स्वरूप होनेसे ब्रह्मानन्द नित्य प्राप्त ही है, अतः उसकी प्राप्तिके उद्देश्यसे आनन्द-प्राप्तिके साधनोंमें पुरुषकी प्रवृत्ति नहीं होनी चाहिए, यह प्रश्नका तात्पर्य है ।

✲ जैसे अपने हारके गलेमें रहते भी, उसकी विस्मृतिसे उसे इधर उधर खोजता है, यद्यपि हार प्राप्त ही है, अप्राप्त नहीं है, तथापि भ्रान्तिसे उसको अप्राप्तके समान मानता है, जब उसकी भ्रान्ति निकल जाती है कि हार तो मेरे गलेमें ही है, तब उसके प्राप्त रहनेपर भी मैंने अप्राप्त वस्तु प्राप्त की, ऐसा मानता है, बस इसी प्रकार स्वरूप आनन्दके नित्य प्राप्त होनेपर भी अनादि अविद्यासे आवृत हो जानेके कारण वह अप्राप्तके समान प्रतीत होने लगता है, उस अविद्याके निवृत्त हो जानेपर, तो निखिल अनर्थरूप विक्षेपके निकल जानेसे स्वतः आनन्दका स्फुरण हो जाता है, इसलिए अप्राप्त वस्तुकी प्राप्ति हुई, ऐसा औपचारिक व्यवहार है, यह भाव है ।

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५३०सिद्धान्तलेशसंग्रह[ चतुर्थ परिच्छेद

अन्ये तु संसारदशायां 'नास्ति, न प्रकाशते' इति व्यवहारयोग्यत्व-रूपाज्ञानावरणप्रयुक्तस्य 'मम निरतिशयानन्दो नास्ति' इति प्रत्ययस्य सर्वसिद्धत्वात् तदालम्बनभूतः कश्चिद् ब्रह्मानन्दस्याऽभावः काल्पनिको यावदविद्यमनुवर्तते, अविद्यानिवृत्तौ च तन्मूलत्वान्निवर्तते इति 'यस्मिन् सत्यग्रिमक्षणे' इत्यादिलक्षणानुरोधेन मुख्यमेव तस्य प्राप्यत्वमित्याहुः ।

परे प्रागावृत्तत्वेन पारोक्ष्यादपुमर्थताम् ।
मुक्तौ तु तदभिन्नत्वादात्मप्राप्त्या पुमर्थताम् ॥ १२ ॥

कुछ लोग कहते हैं कि संसारदशामें अनवच्छिन्न आनन्दमें आवृत होनेके कारण परोक्ष होनेसे, पुरुषार्थ नहीं है और मुक्तिमें तो अपरोक्ष होनेसे उसकी प्राप्ति होनेके कारण वह पुरुषार्थ है ॥१२॥


कुछ लोग तो कहते हैं कि 'नास्ति, न प्रकाशते' (निरतिशय आनन्द नहीं है और उसका प्रकाश भी नहीं होता) इस प्रकारसे व्यवहारके योग्य अज्ञानरूप आवरणसे होनेवाला 'हमको निरतिशय आनन्द नहीं है' इस प्रकार ज्ञान सभीको अनुभव सिद्ध है, इसलिए उस प्रकारके विज्ञानका विषयीभूत कोई काल्पनिक ब्रह्मानन्दका अभाव अविद्याकी अवस्थिति तक † अनुवर्तमान होता है । और अविद्याकी निवृत्ति हो जानेसे अविद्यामूलक उस काल्पनिक अभावकी निवृत्ति हो जाती है, इसलिए ‡ 'यस्मिन्सत्यग्रिमक्षणे' इत्यादि अग्रिम लक्षणके अनुरोधसे ब्रह्मानन्दमें मुख्य ही प्राप्यता है ।


† 'एतस्यैवानन्दस्यान्यानि भूतानि मात्रामुपजीवन्ति' 'आनन्दं ब्रह्मणो विद्वान्' इत्यादि वेदान्तोंसे प्रतिपादित निरतिशय आनन्दका सांसारिक पुरुषोंको अनुभव नहीं होता, यह जगत्प्रसिद्ध है । इसलिए प्रत्यक्रूपसे उस आनन्दके सर्वदा रहनेपर भी उसके अभावका अनुभव होनेसे वास्तविक अभावके न होनेपर भी काल्पनिक अविद्याप्रयुक्त निरतिशय आनन्दका अभाव माना जाता है, जो आनन्दाभाव व्यवहारका आलम्बन है, और यह अभाव जब तक अविद्या रहती है, तब तक रहता है, यह तात्पर्य है ।

‡ 'यस्मिन् सति अग्रिमक्षणे यस्य सत्त्वम् यदभावे च यस्य अभावः तत् तत्साध्यम्' अर्थात् जिसके अस्तित्वमें उत्तरक्षणमें जिसका अस्तित्व हो और जिसके अभावमें जिसका अभाव हो वह उससे साध्य होता है, प्रकृतमें ज्ञानके होनेपर उत्तरक्षणमें निरतिशय आनन्दकी अस्तिता है, और ज्ञानके अभावमें उक्त आनन्दका अभाव है, अतः ज्ञानसे वह साध्य है, इसलिए निरतिशय आनन्दमें प्राप्यता मुख्य है, यह भाव है ।

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मोक्षके प्राप्यत्व और अप्राप्यत्वका विचार ] भाषानुवादसहिते ५३१


अपरे तु अवेद्यस्याऽपुरुषार्थत्वात् संसारदशायां सदप्यनवच्छिन्नसुखस्यापरोक्ष्याभावान्न पुरुषार्थः । न च स्वरूपज्ञानेनाऽऽपरोक्ष्यं तदाऽप्यस्ति, तस्य सर्वदा स्वरूपसुखाभिन्नत्वात् । वृत्तिज्ञानेनाऽऽपरोक्ष्यं तु न मुक्तावपीति वाच्यम्, नहि स्वव्यवहारानुकूलचैतन्याभेदमात्रमापरोक्ष्यम्, घटावच्छिन्नचैतन्याभिव्यक्तौ तदभिन्नस्य घटगन्धस्याऽपि आपरोक्ष्यापत्तेः । किन्तु अनावृतार्थस्य तदभेदः । तथा चाऽनावृतत्वांशस्तत्त्वसाक्षात्कारे


※और कुछ लोग कहते हैं कि अवेद्य पुरुषार्थ नहीं होता है, अतः संसारदशामें अनवच्छिन्न सुखके रहनेपर भी आपरोक्ष्यके न रहनेसे उसमें पुरुषार्थता नहीं है । यदि शङ्का† हो कि स्वरूपज्ञानसे आपरोक्ष्य संसारदशामें भी उक्त आनन्दमें है, क्योंकि स्वरूपज्ञान सर्वदा स्वरूपसुखसे अभिन्न है, और वृत्तिज्ञानकृत अपरोक्षत्व तो मुक्तिमें भी नहीं है, तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि‡ अपने व्यवहारके अनुकूल चैतन्यका अभेद ही अपरोक्षत्व नहीं है, कारण कि यदि अभेदको ही अपरोक्षत्व माने, तो घटावच्छिन्न चैतन्यकी अभिव्यक्ति होनेपर उस चैतन्यसे अभिन्न घटके गन्धका भी अपरोक्षत्व प्रसक्त होगा, किन्तु अनावृत अर्थका अनावृत चैतन्यके साथ अभेद ही अपरोक्षत्व है । इस अवस्थामें अनवच्छिन्न सुखांशमें *अनावृतत्वांशकी


* पूर्वमतसे इस मतमें यही विशेषता है कि पूर्वमतमें ब्रह्मानन्दका स्वरूप ही पुरुषार्थ है और इस मतमें ब्रह्मानन्दका आपरोक्ष्य पुरुषार्थ है, अविद्याके विद्यासे निवृत्त हो जानेपर अपरोक्षत्व प्राप्त होता है, अतः विद्यासाधनत्वकी उपपत्ति हो सकती है, यह भाव है ।

† शङ्काका भाव यह है कि विद्यासे प्राप्त होनेवाला आनन्दापारोक्ष्य क्या स्वप्रकाश चैतन्यरूप है, अथवा वृत्तिरूप है ? दोनों ही पक्ष नहीं बन सकते, क्योंकि स्वप्रकाशरूप चैतन्य तो संसारकालमें भी है, कारण कि स्वव्यवहारानुकूलचैतन्याभिन्नत्वरूपमें पर्यवसित उक्त आपरोक्ष्यका संसारदशामें असत्त्व नहीं है । द्वितीय पक्ष—वृत्तिरूप कहेंगे, तोवह भी मुक्तिमें नहीं है, अतः उभयथा आपरोक्ष्यका असम्भव है, यह भाव है ।

‡ समाधानका तात्पर्य यह है कि स्वव्यवहारानुकूलचैतन्याभिन्नत्व । अर्थात् अपने व्यवहारमें प्रयोजक (उपयोगी) चैतन्यके साथ वस्तुका अभेद केवल अपरोक्षत्व नहीं है, क्योंकि ऐसा माननेसे घटव्यवहारमें उपयोगी घटावच्छिन्न चैतन्यकी अभिव्यक्ति होनेपर अभिव्यक्त चैतन्यके साथ अभिन्न घटवृत्ति गन्धका भी प्रत्यक्ष हो जायगा, क्योंकि उन दोनोंके अभेदमें प्रयोजक समानेदेशत्वादि विद्यमान ही है, अतः अनावृत अर्थके साथ अनावृत चैतन्यके अभेदको ही अपरोक्षत्व कहना होगा, अतः उक्त दो प्रकारके अपरोक्षत्वको लेकर दोष नहीं हो सकता है, यह भाव है ।

५३२सिद्धान्तलेशसंग्रह[ चतुर्थ परिच्छेद

सत्येवेति निरतिशयसुखापरोक्ष्यस्य पुरुषार्थस्य विद्याप्राप्यत्वं युक्तमित्याहुः ।

अन्ये भूमसुखाद्भेदो जीवेऽध्यस्तोऽभवत् पुरा ।
मुक्तौ तन्नाशतः प्राहुः प्राप्तिं स्फुटसुखात्मिकाम् ॥ १३ ॥

इतर लोग कहते हैं कि संसारदशामें ब्रह्मरूप सुखसे भेद भी जीवमें अध्यस्त हुआ था, मुक्तिमें उसका नाश होनेसे सुखरूप की प्राप्ति होती है ॥१३॥

इतरे तु अस्तु व्यवहारानुकूलचैतन्याभेदमात्रमापरोक्ष्यम् । तथाऽप्यज्ञानमहिम्ना जीवभेदवच्चिदानन्दभेदोऽपि अध्यस्त इति संसारदशायां पुरुषान्तरस्य पुरुषान्तरचैतन्यापरोक्ष्यवद् अनवच्छिन्नसुखापरोक्ष्यस्यापि


उपपत्ति तत्त्वसाक्षात्कार होनेपर ही हो सकती है, इसलिए निरतिशय सुखके अपरोक्षत्वरूप पुरुषार्थमें विद्याप्राप्यत्व युक्त है।

और कुछ लोग कहते हैं कि* यद्यपि स्वव्यवहारानुकूलचैतन्यका अभेदमात्र अपरोक्षत्व भले ही हो, तथापि अज्ञानके प्रभावसे जीवके भेदके समान चिदानन्दका भेद भी अध्यस्त है, इसलिए संसारदशामें पुरुषान्तरको अन्य† पुरुषके चैतन्यका जैसे आपरोक्ष्य नहीं होता, उसके समान अनवच्छिन्न सुखका भी आपरोक्ष्य नहीं होता। और अज्ञानकी निवृत्ति होनेपर तो चिदानन्दभेदके भी


* इस मतमें स्वव्यवहारानुकूल चैतन्याभिन्नत्व ही अपरोक्षत्वका लक्षण है, इसमें अनावृतत्व अंश देने की कोई आवश्यकता नहीं है, क्योंकि उसके न रहनेपर भी कोई दोष नहीं है। यदि शङ्का हो कि घटावच्छिन्न चैतन्य की अभिव्यक्ति होनेपर घटवृत्ति गन्धका भी अपरोक्षत्व प्रसक्त होगा, अतः अनावृतत्व अंशकी आवश्यकता है, तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि धर्म आदिके साक्षीमें अध्यस्त होनेसे अनावृत साक्षीरूप चैतन्याभिन्नत्वके रहनेपर भी जैसे उनका अपरोक्षत्व नहीं माना जाता है, वैसे ही प्रकृतमें समझना चाहिए । यदि शङ्का हो कि धर्म आदि तो प्रत्यक्षके अयोग्य हैं, अतः उनका प्रत्यक्ष नहीं हो सकता, तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि इसी युक्तिके आधारपर प्रकृतमें भी चाक्षुषवृत्तिसे अभिव्यक्त चैतन्यके प्रति अनुभवके अनुरोधसे गन्धको अयोग्य मानेंगे, अतः उक्त दोषका परिहार हो सकता है, इसलिए केवल स्वव्यवहारानुकूलचैतन्याभिन्नत्वको अपरोक्षत्व माननेपर भी कोई दोष नहीं है, यह भाव है ।

† जैसे एक पुरुषको अन्य पुरुषके चैतन्यका साक्षात्कार नहीं होता है, वैसे ही संसारदशामें जीवको अनवच्छिन्न आनन्दका अपरोक्ष नहीं होता, क्योंकि जैसे जीवोंका अज्ञाननिबन्धन परस्परभेद अध्यस्त है, वैसे ही अज्ञाननिबन्धन साक्षी चैतन्य और ब्रह्मानन्दका

मुक्तिके स्वरूपका विचार ] भाषानुवादसहित ५३३


नास्ति। अज्ञाननिवृत्तौ तु चिदानन्दभेदप्रविलयात्तदापरोक्ष्यमिति तस्य विद्यासाध्यत्वमित्याहुः ॥ ४ ॥

अथ मुक्तौ भवेच्छुद्ध उतैशोऽत्र निगद्यते ।
व्यक्ता जीवैक्यवादे हि शुद्धब्रह्मैकशेषता ॥ १४ ॥

अब शङ्का होती है कि मुक्त पुरुष शुद्ध चैतन्यस्वरूप हो जाता है अथवा ईश्वररूप होता जाता है ? इस विषयमें कहते हैं कि एकजीववादमें शुद्ध चैतन्यस्वरूपसे उस जीवकी अवस्थिति व्यक्त ही है ॥१४॥

अथ विद्योदये सत्युपाधिविलयादपेतजीवभावस्य किम् ईश्वरभावापत्तिर्भवति, उत शुद्धचैतन्यमात्ररूपेणाऽवस्थानम् ? इति विवेचनीयम्। उच्यते—
एकजीववादे तदेकाज्ञानकल्पितस्य जीवेश्वरविभागादिकृत्स्नभेदप्रपञ्चस्य तद्विद्योदये विलयान्निर्विशेषचैतन्यरूपेणैवाऽवस्थानम्।

विनष्ट होनेसे उसकी अपरोक्षता हो सकती है, इसलिए उसमें विद्यासाध्यत्व हो सकता है ॥४॥

अब शङ्का होती है कि विद्याका उदय होनेपर उपाधिका विनाश होनेसे जिसका जीवभाव निवृत्त हो गया है, उस चैतन्यकी क्या ईश्वरभावापत्ति-परमेश्वररूपता-होती है या उसका शुद्ध चैतन्यमात्रसे अवस्थान होता है, इसका निर्वचन करना चाहिए ? कहते हैं—

एक जीववादमें केवल जीवके ‡ एक अज्ञानसे कल्पित जीव और ईश्वरके विभाग आदि समस्त प्रपञ्चका उस जीवकी विद्याका उदय होनेपर विनाश होनेसे निर्विशेष चैतन्यरूपसे जीवका अवस्थान होता है ।


अनादि भेद अध्यस्त है, इसलिए ब्रह्मानन्दका अपने व्यवहारमें अनुकूल साक्षी चैतन्यके साथ अभेद न होनेसे परस्पर वस्तुतः जीवोंमें अभेदके रहनेपर भी उसके अकिञ्चित्कर होनेसे दोष नहीं है, यह भाव है।

‡ जीवके एक होनेसे उसका मूलाज्ञान भी एक ही है, यह भाव है। इसलिए एक जीवके किसी भी अन्तःकरणमें तत्त्वसाक्षात्कारके उदित होनेपर अज्ञानका देव, तिर्यक्, मनुष्य आदि सम्पूर्ण स्वकार्योंके साथ उसी दम नाश हो जाता है। यदि इस विषयमें शङ्का हो कि शुक आदिके अन्तःकरणमें उत्पन्न तत्त्वज्ञानसे ही सब प्रमाताओंके संसारका समूल विलय हो जाना चाहिए, अतः इस समय संसारकी अनुवृत्ति कैसे देखी जाती है, तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि शुक आदिकी मुक्तिमें कोई प्रमाण ही नहीं है, और शुक आदिके मुक्तिप्रतिपादकवाक्य स्वार्थमें उपचरित हैं, अतः संसारकी अनुवृत्तिमें कोई हानि नहीं है; यह भाव है।

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५३४सिद्धान्तलेशसंग्रह[ चतुर्थ परिच्छेदं

अनेकजीववादेऽपि प्रतिबिम्बेशवादिनाम् ।
मुक्तस्य बिम्बसद्भावाच्छुद्धता पर्यवस्यति ॥ १५ ॥
अनेकजीववादेऽतो नाऽवच्छेदनयः शुभः ।
बद्धमुक्ताव्यवस्थानार्त्तद्देशोपाधिबन्धनात् ॥ १६ ॥

अनेकजीववादमें भी जो मायामें चैतन्यके प्रतिबिम्बको ईश्वर कहते हैं, उनके मतमें बिम्बका अस्तित्व होनेसे मुक्तकी शुद्धता ही प्रसक्त होती है । इसीसे अनेकजीववादमें अवच्छेदवाद युक्त नहीं है, क्योंकि बद्ध और मुक्त की व्यवस्था नहीं हो सकती है कारण कि तत् तत् देशवर्ती उपाधिके साथ मुक्त जीवरूप चैतन्यका सम्बन्ध है ॥१५॥१६॥

अनेकजीववादमभ्युपगम्य बद्धमुक्तव्यवस्थाङ्गीकारेऽपि यद्यपि कस्यचिद्विद्योदये तदविद्याकृतप्रपञ्चविलयेऽपि बद्धपुरुषान्तराविद्याकृतो जीवेश्वरविभागादिप्रपञ्चोऽनुवर्तते, तथाऽपि 'जीव इवेश्वरोऽपि प्रतिबिम्बविशेषः' इति पक्षे मुक्तस्य बिम्बभूतशुद्धचैतन्यरूपेणैवाऽवस्थानम् । अनेकोपाधिष्वेकस्य प्रतिबिम्बे सति एकोपाधिविलये तत्प्रतिबिम्बस्य बिम्ब-

अनेकजीववादका अङ्गीकार करके बद्ध और मुक्तकी व्यवस्थाका अङ्गीकार करनेपर भी जिस पुरुषको ज्ञानकी उत्पत्ति हुई है, उसी पुरुषके प्रति अविद्यादि समस्त प्रपञ्चका विलय होगा और अन्य बद्ध पुरुषोंकी अविद्यासे जीव तथा ईश्वर विभाग आदि प्रपञ्चकी यद्यपि अनुवृत्ति हो *सकती है, तथापि 'जीवके समान ईश्वर भी प्रतिबिम्बविशेष है' इस पक्षमें मुक्त पुरुष बिम्बभूत शुद्ध चैतन्यरूपसे ही अवस्थित रहता है । क्योंकि अनेक उपाधियोंमें एक ब्रह्म चैतन्यके प्रतिबिम्ब होनेपर एक उपाधिके विलयसे उस प्रतिबिम्बका बिम्ब-


*अर्थात् अनेक जीववादमें वक्ष्यमाण प्रकारसे जब तक सबकी मुक्ति नहीं हो जाती तब तक मुक्त पुरुषकी अन्य पुरुषनिष्ठ अविद्याकृत ईश्वरभावप्राप्ति रहती है, यह भाव है। यदि प्रकृतमें शङ्का हो कि मूल ग्रन्थमें 'यद्यपि' शब्द कहा गया है, इससे यह अर्थ होगा कि यद्यपि ईश्वरभावापत्ति हो सकती है, तथापि नहीं हो सकती है, यह कथन भी युक्त नहीं है, क्योंकि अनेकजीववादका निरुपण अनेक प्रकारोंसे उपलब्ध होता है, इसलिए सब अनेक जीववादोंमें मुक्तकी ईश्वरभावापत्ति नहीं हो सकती है, किन्तु जीवके समान ईश्वर भी प्रतिबिम्ब है, इस पक्षमें शुद्ध चैतन्यरूपसे जीवकी अवस्थिति होती है, इसी अर्थका सूचन करनेके लिए 'यद्यपि' शब्द दिया गया है, यह भाव है ।

मुक्तिके स्वरूपका विचार ] · भाषानुवादसहित ५३५

भावेनैवाऽवस्थानौचित्येन प्रतिबिम्बान्तरत्वापत्यसम्भवात् । तत्सम्भवे कदाचिज्जीवरूपप्रतिबिम्बान्तरत्वापत्तेरपि दुर्वारत्त्वेनाऽवच्छेदपक्ष इव मुक्तस्य पुनर्वन्धापत्तेः । अत एवाऽनेकजीववादे अवच्छेदपक्षो नाऽऽद्रियते । यदवच्छेदेन मुक्तिस्तदवच्छेदेनाऽन्तःकरणान्तरसंसर्गे पुनरपि बन्धापत्तेः ।

बिम्बेशवादे मुक्तः प्राक् सर्वजीवविमोचनात् ।
ईशो भूत्वा ततः शुद्धे स्वभावे व्यवतिष्ठते ॥ १७ ॥

बिम्ब चैतन्य ईश्वर है, इस पक्षमें जब तक सब जीवों की मुक्ति नहीं होती तब तक मुक्त जीव ईश्वर रहकर फिर सब जीवोंके मुक्त होनेपर शुद्धस्वभाव ब्रह्म हो जाता है ॥१७॥


भावसे अवस्थान उचित है, अतः प्रतिबिम्बान्तरभावकी आपत्ति नहीं हो सकती है। यदि उसका प्रतिबिम्बान्तरभाव माना जाय, तो किसी समय उसका जीवरूप प्रतिबिम्बान्तरभाव भी प्रसक्त हो सकता है, इसलिए अवच्छेद पक्षके समान मुक्त पुरुषको पुनः बन्धकी आपत्ति हो सकती है। इसीलिए अनेक जीववादमें अवच्छेद पक्षका अङ्गीकार नहीं किया जाता है, क्योंकि यदवच्छेदेन मुक्ति हुई हो, तदवच्छेदेन अन्तःकरणान्तरका सम्बन्ध होनेपर फिर भी बन्धकी ‡ आपत्ति हो सकती है ।


‡ पूर्ण चैतन्यमें जिस चैतन्यप्रदेशसे मुक्ति हो, उस प्रदेशमें चैतन्यके साथ अन्य उपाधिका सम्बन्ध होनेपर फिर बन्धकी आपत्ति हो सकती है, यह भाव है। चैतन्यप्रदेशसे मुक्तका ग्रहण करना चाहिए ।

इस विषयमें एक विचार करना चाहिए कि चैतन्य तो स्वतः नित्यमुक्त है, वह जब अनादि अविद्यादि उपाधिसे युक्त होता है, तब उसमें जीवत्व या बन्धकी सम्भावना हो सकती है, यह वस्तुस्थिति है, इस अवस्था में मुक्तिके पूर्वमें जिस उपाधिपरतन्त्रचैतन्यप्रदेशमें बन्ध था, उसमें फिर बन्धकी आपत्ति नहीं हो सकती है, क्योंकि मुक्तिकालमें उस उपाधिकी निवृत्ति हो जानेसे उपाधिपरतन्त्र बन्धाश्रय चैतन्यकी भी निवृत्ति हो ही जाती है। और शुद्ध मुक्त चैतन्यमें भी बन्धका आपादन नहीं कर सकते हैं, क्योंकि उसमें बद्ध जीवान्तरकी उपाधिके संसर्गसे जीवान्तरत्वकी आपत्ति आ सकती है, तथापि जो बद्ध मुक्तिको प्राप्त हुआ है, उसमें पुनः बन्धकी प्रसक्ति नहीं हो सकती है, अतः उसमें बन्धकी आपत्ति होती है, यह कहना असङ्गत है, किञ्च, मुक्त चैतन्यका अन्य अन्तःकरणके साथ संसर्ग होनेसे उससे जीवान्तरत्वकी आपत्ति होनेपर भी 'जो मैं पूर्वमें संसारी होकर मुक्त था, वही मैं पुनः संसारको प्राप्त हुआ' इस प्रकारका अनुसन्धान (प्रत्यभिज्ञा) नहीं हो सकती है, क्योंकि मुक्त जीव और बद्ध जीवकी एक उपाधि नहीं है। इसलिए जीवान्तरत्वकी प्राप्ति जो मूलमें दी गई है, वह अकिञ्चित्कर है। इसी प्रकार पूर्वोक्त प्रतिबिम्बरूप जीवान्तरत्वकी भी प्रसक्ति नहीं हो सकती है।

५३६ सिद्धान्तलेशसंग्रह [चतुर्थः परिच्छेदः

'प्रतिबिम्बो जीवः, बिम्बस्थानीय ईश्वरः, उभयानुस्यूतं शुद्धं चैतन्यम्' इति पक्षे तु मुक्तस्य यावत्सर्वमुक्तिसर्वज्ञत्वसर्वकर्तृत्वसर्वेश्वर-त्वसत्यकामत्वादिगुणपरमेश्वरभावापत्तिरिष्यते । यथा अनेकेषु दर्पणेषु एकस्य मुखस्य प्रतिबिम्बे सति एकदर्पणापनये तत्प्रतिबिम्बो बिम्बभावे-नाऽवतिष्ठते, न तु मुखमात्ररूपेण, तदानीमपि दर्पणान्तरसन्निधानप्रयुक्तस्य मुखे बिम्बत्वस्याऽनपायात्, तथैकस्य ब्रह्मचैतन्यस्याऽनेकेषूपाधिषु प्रति-बिम्बे सति, एकस्मिन् प्रतिबिम्बे विद्योदये तेन तदुपाधिविलये तत्प्रति-बिम्बस्य बिम्बभावेनाऽनवस्थानावश्यम्भावात् । न च मुक्तस्याऽविद्याऽ-भावात् सत्यकामतादिगुणविशिष्टसर्वेश्वरत्वानुपपत्तिः । तदविद्याऽभावे-

  • अविद्यामें चैतन्यका प्रतिबिम्ब जीव है, बिम्बस्थानीय चैतन्य ईश्वर है और उभयमें अनुस्यूत चैतन्य शुद्ध चैतन्य है, इस पक्षमें तो मुक्त पुरुषकी, जब तक कि सब जीव मुक्त न हों, तब तक सर्वज्ञत्व, सर्वकर्तृत्व, सर्वेश्वरत्व, सत्यकामत्व आदि गुणोंसे विभूषित ईश्वरके साथ तादात्म्यरूपसे अवस्थिति मानी जाती है । जैसे अनेक दर्पणोंमें एक मुखके प्रतिबिम्बित होनेपर उनमें से एक दर्पणके हटानेपर उसमें पड़ा हुआ प्रतिबिम्ब बिम्बरूपसे अवस्थित रहता है, मुखमात्रसे अवस्थित नहीं रहता, क्योंकि एक दर्पणके हटानेपर भी अन्य दर्पणके सन्निधानप्रयुक्त बिम्बत्व मुखमें विद्यमान है, वैसे ही एक ब्रह्म-चैतन्यके अनेक उपाधियोंमें प्रतिबिम्बित होनेपर एक प्रतिबिम्बमें विद्याके उदित होनेपर उससे उस उपाधिके विलीन होनेके कारण उसमें पड़े हुए प्रतिबिम्बकी भी बिम्बरूपसे अवश्य अवस्थिति होगी । यदि शङ्का हो कि उक्त पुरुषको अविद्याका अभाव होनेसे सत्यकामत्व आदि गुणोंसे युक्त सर्वेश्वरत्वकी अनुपपत्ति हो जायगी, तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि ॐ उस कालमें मुक्त पुरुषकी

  • यदि शङ्का हो कि अनेक जीववादमें प्रतिबिम्बेश्वरपक्षमें मुक्तको ईश्वरभावापत्ति नहीं हो सकती है और अवच्छेद पक्षमें तो मुक्ति ही नहीं है, तो फिर ईश्वरभावापत्ति किस पक्षमें होगी ? तो इस शङ्काका उत्तर इस ग्रन्थसे देते हैं ।
  • प्रकृत ग्रन्थमें अविद्याके नानात्वव्यवहारसे अनेक अविद्याओंमें प्रतिबिम्बित अनेक जीव हैं और अन्तःकरण तो उनमें रहनेवाले कर्तृत्व आदिकी उपाधि है, यह सूचित किया गया है, इसलिए मुक्त पुरुषका ऐश्वर्य अविद्याप्रयुक्त है, ऐसा स्वीकार करनेसे परमार्थरूपसे एकरूप ही सर्वदा मुक्ति है, अतः ब्रह्मसूत्रके तृतीयाध्यायके अन्तिम अधिकरणके साथ विरोध नहीं है, यह भाव है ।

मुक्तके स्वरूपका विचार ] भाषाअनुवादसहित ५३७


पि तदानीं बद्धपुरुषान्तराविद्यासत्त्वात् । नहीश्वरस्येश्वरत्वं सत्यकामा-
दिगुणवैशिष्ट्यं च स्वाविद्याकृतम्, तस्य निरञ्जनत्वात्, किन्तु बद्धपुरुषा-
विद्याकृतमेव तत्सर्वमेष्टव्यम् ।

न च विद्यान्तरफलैः साम्यं मोहपरिक्षयात् ।
तेषु भोगस्य साम्येऽपि जगद्व्यापारवर्जनात् ॥ १८ ॥

सगुण उपासनाओंके फलोंके साथ मुक्तिका साम्य भी नहीं है, साम्य होनेपर भी जगद्व्यापार उसमें नहीं है ॥ १८ ॥

न च 'यथाक्रतुरस्मिन् लोके पुरुषो भवति तथेतः प्रेत्य भवति' 'तं यथा यथोपासते' इत्यादिश्रुतिषु सगुणोपासकानामपीश्वरसायुज्यश्रवणाद् मुक्तेः सगुणविद्याफलाविशेषापत्तिः । सगुणोपासकानामखण्डसाक्षात्कारा-


अविद्या नहीं है, तथापि बद्ध पुरुषान्तरकी अविद्या विद्यमान है। और * ईश्वरका ईश्वरत्व है, और सत्यकामत्वादिवैशिष्ट्य अपने आश्रित अविद्या-से जन्य नहीं हैं, क्योंकि ईश्वर तो निरञ्जन अर्थात् सम्पूर्ण दोषोंसे रहित है, किन्तु बद्धपुरुषकी अविद्यासे ही उसमें ईश्वरत्व आदि हैं, यह समझना चाहिए।

यदि शङ्का हो कि 'यथाक्रतुरस्मिन् लोके०' ( जिस गुणसे युक्त ब्रह्मकी इस लोकमें पुरुष उपासना करता है उसी गुणसे युक्त ब्रह्मको मरणके बाद प्राप्त करता है ) 'तं यथा यथोपासते' ( उस ईश्वरकी जिन जिन गुणोंसे युक्ततया उपासना करता है, वह उस गुणसे विशिष्टको प्राप्त करता है ) इत्यादि श्रुतियोंमें सगुण उपासककी भी ईश्वरसायुज्यरूप मुक्ति सुनी जाती है, अतः मुक्ति भी


* इसमें यदि किसीको शङ्का हो कि जीवकी संसारिता जैसे अपनी अविद्यासे होती है, वैसे ही ईश्वरकी ईश्वरता भी उसकी उपाधिसे ही होगी, इसलिए मुक्त पुरुषमें उपाधिके न रहनेसे ऐश्वर्य नहीं हो सकता, इस शंकाका इस ग्रन्थसे उत्तर देते हैं—तात्पर्य यह है कि ईश्वरकी उपाधि क्या अविद्या है या अविद्याभिन्न माया है ? द्वितीय पक्ष युक्त नहीं है, क्योंकि अविद्यामें बिम्बभूत चैतन्यमें जीवाश्रित अविद्यासे ही ऐश्वर्य हो सकता है, तो फिर अतिरिक्त मायारूप उपाधिकी कल्पना व्यर्थ ही है और तत्तत् जीवगत तत्त्वज्ञानसे तत्तत् अविद्याकी निवृत्ति होगी, इस क्रमसे सब जीवोंकी मुक्तिके बाद भी मायाका निवर्तक न होनेसे उस समयमें भी माया अवश्य रहेगी। 'मम माया दुरत्यया' इत्यादि एकवचनान्त निर्देश जातिके अभिप्रायसे है, अतः अविद्याके नानात्वपक्षमें दोष नहीं है, प्रथम पक्ष भी युक्त नहीं है, क्योंकि ईश्वरका ऐश्वर्य स्वाविद्याकृत नहीं है, यह भाव है।

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