सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)
Siddhanta Lesha Sangraha Hindi
श्रीमदप्पय्य दीक्षित द्वारा
स्रोत: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (उद्गम)
पृष्ठ 548, कुल 590 में से
संदर्भ में पढ़ें५१८ : सिद्धान्तलेशसंग्रह [ चतुर्थ परिच्छेद
प्रथमसमयमात्रसंसर्गीभावविकारत्ववद् निवृत्तेरपि चरमसमयमात्रसंसर्गी- भावविकारत्वोपपत्तेः। अत एव यथा पूर्वं पश्चाच्च 'उत्पत्स्यते, उत्पन्नः' इति भाविभूतभावेन व्यवह्रियमाणाया उत्पत्तेः प्रथमसमयमात्रे 'उत्पद्यते' इति वर्तमानव्यवहारः, तथा पूर्वं पश्चाच्च 'निवर्तिष्यते, निवृत्तः' इति भाविभूतभावेन व्यवह्रियमाणाया निवृत्तेश्चरमसमयमात्रे 'निवर्तते, नश्यति, ध्वंसते' इति वर्तमानव्यपदेशः। निवृत्तेरनुवृत्तौ तु चिरशकलितेऽपि घटे 'इदानीं निवर्तते' इत्यादिव्यवहारः स्यात्, आख्यातानां प्रकृत्यर्थगतवर्त- मानत्वार्थाभिधायित्वात्।
प्रथम क्षणमात्रमें सम्बन्ध रखनेवाला भावविकार है, वैसे ही विनाश भी अन्तिम क्षणमात्रके साथ सम्बन्ध रखनेवाला भावभूत विकार ही है, अभावभूत नहीं है, इसीसे अर्थात् निवृत्तिको क्षणिक भावविकार माननेसे ही जैसे उत्पत्तिके पूर्वमें 'घट उत्पन्न होगा' और उत्पत्तिके पीछे 'घट उत्पन्न हुआ' इस प्रकार भावी और भूतरूपसे व्यवह्रियमाण उत्पत्तिमें केवल प्रथम समयमें ही 'उत्पन्न होता है' इस प्रकार वर्तमानव्यवहार होता है और यह उत्पत्तिके क्षणिक भावविकारमें प्रयोजक है, वैसे ही निवृत्तिके पूर्वमें और निवृत्तिके उत्तरकालमें 'निवृत्त होगा और निवृत्त हुआ' इस प्रकार भावी और भूतरूपसे व्यवह्रियमाण निवृत्तिमें भी अन्तिम समयमात्रमें 'निवृत्त होता है' 'नष्ट होता है' 'ध्वस्त होता है' इस प्रकारका वर्तमानव्यवहार क्षणिकत्वका भी साधन करता है, निवृत्ति स्थायी मानी जाय, तो चिरकालसे ध्वस्त हुए घटमें भी 'अभी घट निवृत्त होता है, ऐसा व्यवहार प्रसक्त होगा। क्योंकि जितने आख्यात हैं, वे सबके सब अपने * प्रकृत्यर्थमें रहनेवाले वर्तमानत्व आदिका ही अभिधान करते हैं।
निवृत्त्यवच्छिन्न कालमें ही रहता है, अन्यत्र नहीं रहता। उत्पत्ति और निवृत्ति आद्य और
चरम कालको छोड़कर अन्य कालमें भी यदि रहें, तो चिरकालोत्पन्न घटमें और चिरशकलित
घटमें 'उत्पन्न होता है और नष्ट होता है', ऐसा व्यवहार प्रसक्त होगा, अतः अविद्यानिवृत्ति,
जो अत्यन्त क्षणिक पदार्थ है, उसकी अनुवृत्ति मोक्षकालमें नहीं हो सकती है, अतः अनिर्मोक्षका
प्रसङ्ग नहीं है।
* प्रकृत्यर्थ अर्थात् धातुका अर्थ, उसमें रहनेवाले वर्तमानत्व, अतीतत्व, भविष्यत्त्वका
ज्ञान आख्यातसे (तिबादिसे) होता है, यह भाव है।