सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)
Siddhanta Lesha Sangraha Hindi
श्रीमदप्पय्य दीक्षित द्वारा
स्रोत: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंअविद्यानिवृत्तिके स्वरूपका विचार ] भाषानुवादसहित ५१९
ननु च. तेषां स्वाभिहितसङ्ख्याश्रयप्रकृत्यर्थकर्तृकर्मगतवर्तमानत्वाद्यर्थाभिधायकत्वम्, स्वाभिहितप्रकृत्यर्थानुकूलव्यापारगतवर्तमानत्वाद्यर्थाभिधायकत्वं वाऽस्तु । तथा च. निवृत्तिक्रियाकर्तुश्चिरचूर्णितस्य घटस्य, तद्गतनिवृत्त्यनुकूलव्यापारस्य चाऽवर्तमानत्वाद् नोक्तातिप्रसङ्ग इति चेद्; न; आद्ये उत्पन्नेऽपि घटे ‘उत्पद्यते’ इति व्यवहारापत्तेः । उत्पत्तिक्रियाकर्तुर्घटस्य वर्तमानत्वात् । द्वितीये आमवातजडीकृतकलेवरे उत्थानानुकूलयत्नवति उत्थानानुदयेऽपि ‘उत्तिष्ठति’ इति व्यवहारापत्तेः । आख्यातार्थस्य प्रकृत्यर्थभूतोत्थानानुकूलस्य यत्नरूपव्यापारस्य वर्तमानत्वात् ।
* यदि शङ्का हो कि वे आख्यात ( तिप् आदि ) अपने से अभिहित सङ्ख्याके आश्रयीभूत प्रकृत्यर्थ क्रियाके कर्ता, कर्म आदिमें रहनेवाले वर्तमानत्व आदिका अथवा अपनेसे अभिहित प्रकृत्यर्थके अनुकूल व्यापारमें रहनेवाले वर्तमानत्व आदिका अभिधान करते हैं, इसलिए निवृत्तिरूप क्रियाके कर्ता चिरकालसे चूर्णित घटमें और उसमें रहनेवाले निवृत्तिके अनुकूल व्यापारमें वर्तमानत्वके न होनेसे उक्त आपत्ति अर्थात् चिरशकलित घटको लेकर अभी घट निवृत्त होता है, इस प्रकारकी आपत्ति नहीं आ सकती है, तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि तथोक्त दो अर्थोंमें से पूर्वके अर्थमें उत्पन्न घटको लेकर घट उत्पन्न होता है, ऐसा व्यवहार प्रसक्त होगा, क्योंकि उत्पत्तिक्रूप क्रियाका कर्ता घट वर्तमान है । और दूसरे पक्षमें यह दोष होगा कि आमवातसे जिसका कलेवर अकड़ गया है, ऐसा पुरुष उठनेके अनुकूल यत्न करता है, तथापि उत्थान नहीं होता, परन्तु ‘उत्तिष्ठति’ ( उठता है ) ऐसा व्यवहार प्रसक्त होगा, क्योंकि प्रकृत्यर्थभूत उत्थानके अनुकूल यत्नरूप
* आख्यात—प्रकृत्यर्थमें रहनेवाले वर्तमानत्व आदिका बोध नहीं करते हैं, किन्तु अन्यगत वर्तमानत्व आदिके बोधक हैं, इस प्रकार आशङ्का करते हैं, तात्पर्य यह है कि स्वाभिहित—एकवचनत्व आदिरूपसे आख्यातोंसे अभिहित—जो सङ्ख्या, उस सङ्ख्याके आश्रयभूत—‘घटो निवर्तते, देवदत्तः पचति, तण्डुलाः पच्यन्ते’ इत्यादि प्रयोगोंमें प्रकृत्यर्थभूत निवृत्त्यादि क्रियाओंका कर्तृकर्मादिरूप—जो घटादि हैं, उन घटादिमें रहनेवाले वर्तमानत्व आदिका आख्यात बोध कराते हैं अथवा ‘घटो निवर्तते’ ( घट विनष्ट होता है ) इत्यादि प्रयोगोंमें आख्यातसे अभिहित प्रकृत्यर्थभूत निवृत्तिके अनुकूल जो व्यापार है उस व्यापारमें रहनेवाले वर्तमानत्व आदिका आख्यात बोधक है, परन्तु प्रकृत्यर्थगत वर्तमानत्व आदिका बोधक नहीं है।