भारतकोश
सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

Siddhanta Lesha Sangraha Hindi

श्रीमदप्पय्य दीक्षित द्वारा

स्रोत: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (उद्गम)

DevanagariHindipublished590 पृष्ठ

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५३४सिद्धान्तलेशसंग्रह[ चतुर्थ परिच्छेदं

अनेकजीववादेऽपि प्रतिबिम्बेशवादिनाम् ।
मुक्तस्य बिम्बसद्भावाच्छुद्धता पर्यवस्यति ॥ १५ ॥
अनेकजीववादेऽतो नाऽवच्छेदनयः शुभः ।
बद्धमुक्ताव्यवस्थानार्त्तद्देशोपाधिबन्धनात् ॥ १६ ॥

अनेकजीववादमें भी जो मायामें चैतन्यके प्रतिबिम्बको ईश्वर कहते हैं, उनके मतमें बिम्बका अस्तित्व होनेसे मुक्तकी शुद्धता ही प्रसक्त होती है । इसीसे अनेकजीववादमें अवच्छेदवाद युक्त नहीं है, क्योंकि बद्ध और मुक्त की व्यवस्था नहीं हो सकती है कारण कि तत् तत् देशवर्ती उपाधिके साथ मुक्त जीवरूप चैतन्यका सम्बन्ध है ॥१५॥१६॥

अनेकजीववादमभ्युपगम्य बद्धमुक्तव्यवस्थाङ्गीकारेऽपि यद्यपि कस्यचिद्विद्योदये तदविद्याकृतप्रपञ्चविलयेऽपि बद्धपुरुषान्तराविद्याकृतो जीवेश्वरविभागादिप्रपञ्चोऽनुवर्तते, तथाऽपि 'जीव इवेश्वरोऽपि प्रतिबिम्बविशेषः' इति पक्षे मुक्तस्य बिम्बभूतशुद्धचैतन्यरूपेणैवाऽवस्थानम् । अनेकोपाधिष्वेकस्य प्रतिबिम्बे सति एकोपाधिविलये तत्प्रतिबिम्बस्य बिम्ब-

अनेकजीववादका अङ्गीकार करके बद्ध और मुक्तकी व्यवस्थाका अङ्गीकार करनेपर भी जिस पुरुषको ज्ञानकी उत्पत्ति हुई है, उसी पुरुषके प्रति अविद्यादि समस्त प्रपञ्चका विलय होगा और अन्य बद्ध पुरुषोंकी अविद्यासे जीव तथा ईश्वर विभाग आदि प्रपञ्चकी यद्यपि अनुवृत्ति हो *सकती है, तथापि 'जीवके समान ईश्वर भी प्रतिबिम्बविशेष है' इस पक्षमें मुक्त पुरुष बिम्बभूत शुद्ध चैतन्यरूपसे ही अवस्थित रहता है । क्योंकि अनेक उपाधियोंमें एक ब्रह्म चैतन्यके प्रतिबिम्ब होनेपर एक उपाधिके विलयसे उस प्रतिबिम्बका बिम्ब-


*अर्थात् अनेक जीववादमें वक्ष्यमाण प्रकारसे जब तक सबकी मुक्ति नहीं हो जाती तब तक मुक्त पुरुषकी अन्य पुरुषनिष्ठ अविद्याकृत ईश्वरभावप्राप्ति रहती है, यह भाव है। यदि प्रकृतमें शङ्का हो कि मूल ग्रन्थमें 'यद्यपि' शब्द कहा गया है, इससे यह अर्थ होगा कि यद्यपि ईश्वरभावापत्ति हो सकती है, तथापि नहीं हो सकती है, यह कथन भी युक्त नहीं है, क्योंकि अनेकजीववादका निरुपण अनेक प्रकारोंसे उपलब्ध होता है, इसलिए सब अनेक जीववादोंमें मुक्तकी ईश्वरभावापत्ति नहीं हो सकती है, किन्तु जीवके समान ईश्वर भी प्रतिबिम्ब है, इस पक्षमें शुद्ध चैतन्यरूपसे जीवकी अवस्थिति होती है, इसी अर्थका सूचन करनेके लिए 'यद्यपि' शब्द दिया गया है, यह भाव है ।