भारतकोश
सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

Siddhanta Lesha Sangraha Hindi

श्रीमदप्पय्य दीक्षित द्वारा

स्रोत: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (उद्गम)

DevanagariHindipublished590 पृष्ठ

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पृष्ठ 565

मुक्तिके स्वरूपका विचार ] · भाषानुवादसहित ५३५

भावेनैवाऽवस्थानौचित्येन प्रतिबिम्बान्तरत्वापत्यसम्भवात् । तत्सम्भवे कदाचिज्जीवरूपप्रतिबिम्बान्तरत्वापत्तेरपि दुर्वारत्त्वेनाऽवच्छेदपक्ष इव मुक्तस्य पुनर्वन्धापत्तेः । अत एवाऽनेकजीववादे अवच्छेदपक्षो नाऽऽद्रियते । यदवच्छेदेन मुक्तिस्तदवच्छेदेनाऽन्तःकरणान्तरसंसर्गे पुनरपि बन्धापत्तेः ।

बिम्बेशवादे मुक्तः प्राक् सर्वजीवविमोचनात् ।
ईशो भूत्वा ततः शुद्धे स्वभावे व्यवतिष्ठते ॥ १७ ॥

बिम्ब चैतन्य ईश्वर है, इस पक्षमें जब तक सब जीवों की मुक्ति नहीं होती तब तक मुक्त जीव ईश्वर रहकर फिर सब जीवोंके मुक्त होनेपर शुद्धस्वभाव ब्रह्म हो जाता है ॥१७॥


भावसे अवस्थान उचित है, अतः प्रतिबिम्बान्तरभावकी आपत्ति नहीं हो सकती है। यदि उसका प्रतिबिम्बान्तरभाव माना जाय, तो किसी समय उसका जीवरूप प्रतिबिम्बान्तरभाव भी प्रसक्त हो सकता है, इसलिए अवच्छेद पक्षके समान मुक्त पुरुषको पुनः बन्धकी आपत्ति हो सकती है। इसीलिए अनेक जीववादमें अवच्छेद पक्षका अङ्गीकार नहीं किया जाता है, क्योंकि यदवच्छेदेन मुक्ति हुई हो, तदवच्छेदेन अन्तःकरणान्तरका सम्बन्ध होनेपर फिर भी बन्धकी ‡ आपत्ति हो सकती है ।


‡ पूर्ण चैतन्यमें जिस चैतन्यप्रदेशसे मुक्ति हो, उस प्रदेशमें चैतन्यके साथ अन्य उपाधिका सम्बन्ध होनेपर फिर बन्धकी आपत्ति हो सकती है, यह भाव है। चैतन्यप्रदेशसे मुक्तका ग्रहण करना चाहिए ।

इस विषयमें एक विचार करना चाहिए कि चैतन्य तो स्वतः नित्यमुक्त है, वह जब अनादि अविद्यादि उपाधिसे युक्त होता है, तब उसमें जीवत्व या बन्धकी सम्भावना हो सकती है, यह वस्तुस्थिति है, इस अवस्था में मुक्तिके पूर्वमें जिस उपाधिपरतन्त्रचैतन्यप्रदेशमें बन्ध था, उसमें फिर बन्धकी आपत्ति नहीं हो सकती है, क्योंकि मुक्तिकालमें उस उपाधिकी निवृत्ति हो जानेसे उपाधिपरतन्त्र बन्धाश्रय चैतन्यकी भी निवृत्ति हो ही जाती है। और शुद्ध मुक्त चैतन्यमें भी बन्धका आपादन नहीं कर सकते हैं, क्योंकि उसमें बद्ध जीवान्तरकी उपाधिके संसर्गसे जीवान्तरत्वकी आपत्ति आ सकती है, तथापि जो बद्ध मुक्तिको प्राप्त हुआ है, उसमें पुनः बन्धकी प्रसक्ति नहीं हो सकती है, अतः उसमें बन्धकी आपत्ति होती है, यह कहना असङ्गत है, किञ्च, मुक्त चैतन्यका अन्य अन्तःकरणके साथ संसर्ग होनेसे उससे जीवान्तरत्वकी आपत्ति होनेपर भी 'जो मैं पूर्वमें संसारी होकर मुक्त था, वही मैं पुनः संसारको प्राप्त हुआ' इस प्रकारका अनुसन्धान (प्रत्यभिज्ञा) नहीं हो सकती है, क्योंकि मुक्त जीव और बद्ध जीवकी एक उपाधि नहीं है। इसलिए जीवान्तरत्वकी प्राप्ति जो मूलमें दी गई है, वह अकिञ्चित्कर है। इसी प्रकार पूर्वोक्त प्रतिबिम्बरूप जीवान्तरत्वकी भी प्रसक्ति नहीं हो सकती है।