सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)
Siddhanta Lesha Sangraha Hindi
श्रीमदप्पय्य दीक्षित द्वारा
स्रोत: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (उद्गम)
पृष्ठ 563, कुल 590 में से
संदर्भ में पढ़ेंमुक्तिके स्वरूपका विचार ] भाषानुवादसहित ५३३
नास्ति। अज्ञाननिवृत्तौ तु चिदानन्दभेदप्रविलयात्तदापरोक्ष्यमिति तस्य विद्यासाध्यत्वमित्याहुः ॥ ४ ॥
अथ मुक्तौ भवेच्छुद्ध उतैशोऽत्र निगद्यते ।
व्यक्ता जीवैक्यवादे हि शुद्धब्रह्मैकशेषता ॥ १४ ॥
अब शङ्का होती है कि मुक्त पुरुष शुद्ध चैतन्यस्वरूप हो जाता है अथवा ईश्वररूप होता जाता है ? इस विषयमें कहते हैं कि एकजीववादमें शुद्ध चैतन्यस्वरूपसे उस जीवकी अवस्थिति व्यक्त ही है ॥१४॥
अथ विद्योदये सत्युपाधिविलयादपेतजीवभावस्य किम् ईश्वरभावापत्तिर्भवति, उत शुद्धचैतन्यमात्ररूपेणाऽवस्थानम् ? इति विवेचनीयम्। उच्यते—
एकजीववादे तदेकाज्ञानकल्पितस्य जीवेश्वरविभागादिकृत्स्नभेदप्रपञ्चस्य तद्विद्योदये विलयान्निर्विशेषचैतन्यरूपेणैवाऽवस्थानम्।
विनष्ट होनेसे उसकी अपरोक्षता हो सकती है, इसलिए उसमें विद्यासाध्यत्व हो सकता है ॥४॥
अब शङ्का होती है कि विद्याका उदय होनेपर उपाधिका विनाश होनेसे जिसका जीवभाव निवृत्त हो गया है, उस चैतन्यकी क्या ईश्वरभावापत्ति-परमेश्वररूपता-होती है या उसका शुद्ध चैतन्यमात्रसे अवस्थान होता है, इसका निर्वचन करना चाहिए ? कहते हैं—
एक जीववादमें केवल जीवके ‡ एक अज्ञानसे कल्पित जीव और ईश्वरके विभाग आदि समस्त प्रपञ्चका उस जीवकी विद्याका उदय होनेपर विनाश होनेसे निर्विशेष चैतन्यरूपसे जीवका अवस्थान होता है ।
अनादि भेद अध्यस्त है, इसलिए ब्रह्मानन्दका अपने व्यवहारमें अनुकूल साक्षी चैतन्यके साथ अभेद न होनेसे परस्पर वस्तुतः जीवोंमें अभेदके रहनेपर भी उसके अकिञ्चित्कर होनेसे दोष नहीं है, यह भाव है।
‡ जीवके एक होनेसे उसका मूलाज्ञान भी एक ही है, यह भाव है। इसलिए एक जीवके किसी भी अन्तःकरणमें तत्त्वसाक्षात्कारके उदित होनेपर अज्ञानका देव, तिर्यक्, मनुष्य आदि सम्पूर्ण स्वकार्योंके साथ उसी दम नाश हो जाता है। यदि इस विषयमें शङ्का हो कि शुक आदिके अन्तःकरणमें उत्पन्न तत्त्वज्ञानसे ही सब प्रमाताओंके संसारका समूल विलय हो जाना चाहिए, अतः इस समय संसारकी अनुवृत्ति कैसे देखी जाती है, तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि शुक आदिकी मुक्तिमें कोई प्रमाण ही नहीं है, और शुक आदिके मुक्तिप्रतिपादकवाक्य स्वार्थमें उपचरित हैं, अतः संसारकी अनुवृत्तिमें कोई हानि नहीं है; यह भाव है।