सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)
Siddhanta Lesha Sangraha Hindi
श्रीमदप्पय्य दीक्षित द्वारा
स्रोत: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (उद्गम)
पृष्ठ 562, कुल 590 में से
संदर्भ में पढ़ें| ५३२ | सिद्धान्तलेशसंग्रह | [ चतुर्थ परिच्छेद |
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सत्येवेति निरतिशयसुखापरोक्ष्यस्य पुरुषार्थस्य विद्याप्राप्यत्वं युक्तमित्याहुः ।
अन्ये भूमसुखाद्भेदो जीवेऽध्यस्तोऽभवत् पुरा ।
मुक्तौ तन्नाशतः प्राहुः प्राप्तिं स्फुटसुखात्मिकाम् ॥ १३ ॥
इतर लोग कहते हैं कि संसारदशामें ब्रह्मरूप सुखसे भेद भी जीवमें अध्यस्त हुआ था, मुक्तिमें उसका नाश होनेसे सुखरूप की प्राप्ति होती है ॥१३॥
इतरे तु अस्तु व्यवहारानुकूलचैतन्याभेदमात्रमापरोक्ष्यम् । तथाऽप्यज्ञानमहिम्ना जीवभेदवच्चिदानन्दभेदोऽपि अध्यस्त इति संसारदशायां पुरुषान्तरस्य पुरुषान्तरचैतन्यापरोक्ष्यवद् अनवच्छिन्नसुखापरोक्ष्यस्यापि
उपपत्ति तत्त्वसाक्षात्कार होनेपर ही हो सकती है, इसलिए निरतिशय सुखके अपरोक्षत्वरूप पुरुषार्थमें विद्याप्राप्यत्व युक्त है।
और कुछ लोग कहते हैं कि* यद्यपि स्वव्यवहारानुकूलचैतन्यका अभेदमात्र अपरोक्षत्व भले ही हो, तथापि अज्ञानके प्रभावसे जीवके भेदके समान चिदानन्दका भेद भी अध्यस्त है, इसलिए संसारदशामें पुरुषान्तरको अन्य† पुरुषके चैतन्यका जैसे आपरोक्ष्य नहीं होता, उसके समान अनवच्छिन्न सुखका भी आपरोक्ष्य नहीं होता। और अज्ञानकी निवृत्ति होनेपर तो चिदानन्दभेदके भी
* इस मतमें स्वव्यवहारानुकूल चैतन्याभिन्नत्व ही अपरोक्षत्वका लक्षण है, इसमें अनावृतत्व अंश देने की कोई आवश्यकता नहीं है, क्योंकि उसके न रहनेपर भी कोई दोष नहीं है। यदि शङ्का हो कि घटावच्छिन्न चैतन्य की अभिव्यक्ति होनेपर घटवृत्ति गन्धका भी अपरोक्षत्व प्रसक्त होगा, अतः अनावृतत्व अंशकी आवश्यकता है, तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि धर्म आदिके साक्षीमें अध्यस्त होनेसे अनावृत साक्षीरूप चैतन्याभिन्नत्वके रहनेपर भी जैसे उनका अपरोक्षत्व नहीं माना जाता है, वैसे ही प्रकृतमें समझना चाहिए । यदि शङ्का हो कि धर्म आदि तो प्रत्यक्षके अयोग्य हैं, अतः उनका प्रत्यक्ष नहीं हो सकता, तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि इसी युक्तिके आधारपर प्रकृतमें भी चाक्षुषवृत्तिसे अभिव्यक्त चैतन्यके प्रति अनुभवके अनुरोधसे गन्धको अयोग्य मानेंगे, अतः उक्त दोषका परिहार हो सकता है, इसलिए केवल स्वव्यवहारानुकूलचैतन्याभिन्नत्वको अपरोक्षत्व माननेपर भी कोई दोष नहीं है, यह भाव है ।
† जैसे एक पुरुषको अन्य पुरुषके चैतन्यका साक्षात्कार नहीं होता है, वैसे ही संसारदशामें जीवको अनवच्छिन्न आनन्दका अपरोक्ष नहीं होता, क्योंकि जैसे जीवोंका अज्ञाननिबन्धन परस्परभेद अध्यस्त है, वैसे ही अज्ञाननिबन्धन साक्षी चैतन्य और ब्रह्मानन्दका