सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)
Siddhanta Lesha Sangraha Hindi
श्रीमदप्पय्य दीक्षित द्वारा
स्रोत: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंमोक्षके प्राप्यत्व और अप्राप्यत्वका विचार ] भाषानुवादसहिते ५३१
अपरे तु अवेद्यस्याऽपुरुषार्थत्वात् संसारदशायां सदप्यनवच्छिन्नसुखस्यापरोक्ष्याभावान्न पुरुषार्थः । न च स्वरूपज्ञानेनाऽऽपरोक्ष्यं तदाऽप्यस्ति, तस्य सर्वदा स्वरूपसुखाभिन्नत्वात् । वृत्तिज्ञानेनाऽऽपरोक्ष्यं तु न मुक्तावपीति वाच्यम्, नहि स्वव्यवहारानुकूलचैतन्याभेदमात्रमापरोक्ष्यम्, घटावच्छिन्नचैतन्याभिव्यक्तौ तदभिन्नस्य घटगन्धस्याऽपि आपरोक्ष्यापत्तेः । किन्तु अनावृतार्थस्य तदभेदः । तथा चाऽनावृतत्वांशस्तत्त्वसाक्षात्कारे
※और कुछ लोग कहते हैं कि अवेद्य पुरुषार्थ नहीं होता है, अतः संसारदशामें अनवच्छिन्न सुखके रहनेपर भी आपरोक्ष्यके न रहनेसे उसमें पुरुषार्थता नहीं है । यदि शङ्का† हो कि स्वरूपज्ञानसे आपरोक्ष्य संसारदशामें भी उक्त आनन्दमें है, क्योंकि स्वरूपज्ञान सर्वदा स्वरूपसुखसे अभिन्न है, और वृत्तिज्ञानकृत अपरोक्षत्व तो मुक्तिमें भी नहीं है, तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि‡ अपने व्यवहारके अनुकूल चैतन्यका अभेद ही अपरोक्षत्व नहीं है, कारण कि यदि अभेदको ही अपरोक्षत्व माने, तो घटावच्छिन्न चैतन्यकी अभिव्यक्ति होनेपर उस चैतन्यसे अभिन्न घटके गन्धका भी अपरोक्षत्व प्रसक्त होगा, किन्तु अनावृत अर्थका अनावृत चैतन्यके साथ अभेद ही अपरोक्षत्व है । इस अवस्थामें अनवच्छिन्न सुखांशमें *अनावृतत्वांशकी
* पूर्वमतसे इस मतमें यही विशेषता है कि पूर्वमतमें ब्रह्मानन्दका स्वरूप ही पुरुषार्थ है और इस मतमें ब्रह्मानन्दका आपरोक्ष्य पुरुषार्थ है, अविद्याके विद्यासे निवृत्त हो जानेपर अपरोक्षत्व प्राप्त होता है, अतः विद्यासाधनत्वकी उपपत्ति हो सकती है, यह भाव है ।
† शङ्काका भाव यह है कि विद्यासे प्राप्त होनेवाला आनन्दापारोक्ष्य क्या स्वप्रकाश चैतन्यरूप है, अथवा वृत्तिरूप है ? दोनों ही पक्ष नहीं बन सकते, क्योंकि स्वप्रकाशरूप चैतन्य तो संसारकालमें भी है, कारण कि स्वव्यवहारानुकूलचैतन्याभिन्नत्वरूपमें पर्यवसित उक्त आपरोक्ष्यका संसारदशामें असत्त्व नहीं है । द्वितीय पक्ष—वृत्तिरूप कहेंगे, तोवह भी मुक्तिमें नहीं है, अतः उभयथा आपरोक्ष्यका असम्भव है, यह भाव है ।
‡ समाधानका तात्पर्य यह है कि स्वव्यवहारानुकूलचैतन्याभिन्नत्व । अर्थात् अपने व्यवहारमें प्रयोजक (उपयोगी) चैतन्यके साथ वस्तुका अभेद केवल अपरोक्षत्व नहीं है, क्योंकि ऐसा माननेसे घटव्यवहारमें उपयोगी घटावच्छिन्न चैतन्यकी अभिव्यक्ति होनेपर अभिव्यक्त चैतन्यके साथ अभिन्न घटवृत्ति गन्धका भी प्रत्यक्ष हो जायगा, क्योंकि उन दोनोंके अभेदमें प्रयोजक समानेदेशत्वादि विद्यमान ही है, अतः अनावृत अर्थके साथ अनावृत चैतन्यके अभेदको ही अपरोक्षत्व कहना होगा, अतः उक्त दो प्रकारके अपरोक्षत्वको लेकर दोष नहीं हो सकता है, यह भाव है ।