भारतकोश
सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

Siddhanta Lesha Sangraha Hindi

श्रीमदप्पय्य दीक्षित द्वारा

स्रोत: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (उद्गम)

DevanagariHindipublished590 पृष्ठ

पृष्ठ 560, कुल 590 में से

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५३०सिद्धान्तलेशसंग्रह[ चतुर्थ परिच्छेद

अन्ये तु संसारदशायां 'नास्ति, न प्रकाशते' इति व्यवहारयोग्यत्व-रूपाज्ञानावरणप्रयुक्तस्य 'मम निरतिशयानन्दो नास्ति' इति प्रत्ययस्य सर्वसिद्धत्वात् तदालम्बनभूतः कश्चिद् ब्रह्मानन्दस्याऽभावः काल्पनिको यावदविद्यमनुवर्तते, अविद्यानिवृत्तौ च तन्मूलत्वान्निवर्तते इति 'यस्मिन् सत्यग्रिमक्षणे' इत्यादिलक्षणानुरोधेन मुख्यमेव तस्य प्राप्यत्वमित्याहुः ।

परे प्रागावृत्तत्वेन पारोक्ष्यादपुमर्थताम् ।
मुक्तौ तु तदभिन्नत्वादात्मप्राप्त्या पुमर्थताम् ॥ १२ ॥

कुछ लोग कहते हैं कि संसारदशामें अनवच्छिन्न आनन्दमें आवृत होनेके कारण परोक्ष होनेसे, पुरुषार्थ नहीं है और मुक्तिमें तो अपरोक्ष होनेसे उसकी प्राप्ति होनेके कारण वह पुरुषार्थ है ॥१२॥


कुछ लोग तो कहते हैं कि 'नास्ति, न प्रकाशते' (निरतिशय आनन्द नहीं है और उसका प्रकाश भी नहीं होता) इस प्रकारसे व्यवहारके योग्य अज्ञानरूप आवरणसे होनेवाला 'हमको निरतिशय आनन्द नहीं है' इस प्रकार ज्ञान सभीको अनुभव सिद्ध है, इसलिए उस प्रकारके विज्ञानका विषयीभूत कोई काल्पनिक ब्रह्मानन्दका अभाव अविद्याकी अवस्थिति तक † अनुवर्तमान होता है । और अविद्याकी निवृत्ति हो जानेसे अविद्यामूलक उस काल्पनिक अभावकी निवृत्ति हो जाती है, इसलिए ‡ 'यस्मिन्सत्यग्रिमक्षणे' इत्यादि अग्रिम लक्षणके अनुरोधसे ब्रह्मानन्दमें मुख्य ही प्राप्यता है ।


† 'एतस्यैवानन्दस्यान्यानि भूतानि मात्रामुपजीवन्ति' 'आनन्दं ब्रह्मणो विद्वान्' इत्यादि वेदान्तोंसे प्रतिपादित निरतिशय आनन्दका सांसारिक पुरुषोंको अनुभव नहीं होता, यह जगत्प्रसिद्ध है । इसलिए प्रत्यक्रूपसे उस आनन्दके सर्वदा रहनेपर भी उसके अभावका अनुभव होनेसे वास्तविक अभावके न होनेपर भी काल्पनिक अविद्याप्रयुक्त निरतिशय आनन्दका अभाव माना जाता है, जो आनन्दाभाव व्यवहारका आलम्बन है, और यह अभाव जब तक अविद्या रहती है, तब तक रहता है, यह तात्पर्य है ।

‡ 'यस्मिन् सति अग्रिमक्षणे यस्य सत्त्वम् यदभावे च यस्य अभावः तत् तत्साध्यम्' अर्थात् जिसके अस्तित्वमें उत्तरक्षणमें जिसका अस्तित्व हो और जिसके अभावमें जिसका अभाव हो वह उससे साध्य होता है, प्रकृतमें ज्ञानके होनेपर उत्तरक्षणमें निरतिशय आनन्दकी अस्तिता है, और ज्ञानके अभावमें उक्त आनन्दका अभाव है, अतः ज्ञानसे वह साध्य है, इसलिए निरतिशय आनन्दमें प्राप्यता मुख्य है, यह भाव है ।

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