सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)
Siddhanta Lesha Sangraha Hindi
श्रीमदप्पय्य दीक्षित द्वारा
स्रोत: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंमोक्षके प्राप्यत्व और अप्राप्यत्वका विचार ] भाषानुवादसहित ५२९
नन्वनवच्छिन्नानन्दः प्रत्यग्रूपतया नित्यमेव प्राप्तः । सत्यम्, नित्य- प्राप्तोऽपि अनवच्छिन्नानन्दस्तमावृत्य तद्विपरीतमर्थं प्रदर्शयन्त्या अविद्यया संसारदशायामसत्कल्पत्वं नीत इत्यकृतार्थताऽभूत् । निवर्तितायां च तस्यां निरस्तनिखिलानर्थविक्षेपे स्वकण्ठगतविस्मृतकनकाभरणवत् प्राप्यते इवेत्यौ- पचारिकी तस्य प्राप्तव्यतेति केचित् ।
अप्राप्तिरपि तस्याऽभूत् संसृतौ व्यावहारिकी ।
सा विद्यया निवृत्तेति मुख्यां प्राप्तिं परे जगुः ॥ ११ ॥
कुछ लोग कहते हैं कि संसारदशामें अनवच्छिन्न आनन्दकी व्यावहारिक अप्राप्ति थी वह विद्यासे निवृत्त हुई, इसलिए उसकी मुख्य प्राप्ति हो सकती है ॥११॥
यदि कोई शङ्का करे कि अनवच्छिन्न आनन्द तो प्रत्यगात्मारूप है, अतः वह † सर्वदा प्राप्त ही है, इसलिए उसकी प्राप्तिके लिए कोई प्रयत्न करनेकी आवश्यकता नहीं है ? तो यह युक्त नहीं है, क्योंकि यद्यपि वह अनवच्छिन्न आनन्द नित्य प्राप्त ही है, तथापि उस आनन्दको आवृत करके विपरीत अर्थको—दुःखात्मक संसारको—दिखलाती हुई अविद्या संसारदशामें उस आनन्दको नहींके समान बना देती है, अतः पूर्णानन्दकी अप्राप्ति भासती है । उस अविद्याकी निवृत्ति हो जानेपर सम्पूर्ण अनर्थरूप विक्षेपकी निवृत्ति हो जानेसे अपने कण्ठमें स्थित सुवर्णहारको विस्मृतिके समान ✲ उस आनन्दकी भी प्राप्ति हो जाती है, अतः आनन्दमें औपचारिक प्राप्तिविषयता है, ऐसा भी कुछ लोग कहते हैं ।
†जीवको स्वरूप होनेसे ब्रह्मानन्द नित्य प्राप्त ही है, अतः उसकी प्राप्तिके उद्देश्यसे आनन्द-प्राप्तिके साधनोंमें पुरुषकी प्रवृत्ति नहीं होनी चाहिए, यह प्रश्नका तात्पर्य है ।
✲ जैसे अपने हारके गलेमें रहते भी, उसकी विस्मृतिसे उसे इधर उधर खोजता है, यद्यपि हार प्राप्त ही है, अप्राप्त नहीं है, तथापि भ्रान्तिसे उसको अप्राप्तके समान मानता है, जब उसकी भ्रान्ति निकल जाती है कि हार तो मेरे गलेमें ही है, तब उसके प्राप्त रहनेपर भी मैंने अप्राप्त वस्तु प्राप्त की, ऐसा मानता है, बस इसी प्रकार स्वरूप आनन्दके नित्य प्राप्त होनेपर भी अनादि अविद्यासे आवृत हो जानेके कारण वह अप्राप्तके समान प्रतीत होने लगता है, उस अविद्याके निवृत्त हो जानेपर, तो निखिल अनर्थरूप विक्षेपके निकल जानेसे स्वतः आनन्दका स्फुरण हो जाता है, इसलिए अप्राप्त वस्तुकी प्राप्ति हुई, ऐसा औपचारिक व्यवहार है, यह भाव है ।