सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)
Siddhanta Lesha Sangraha Hindi
श्रीमदप्पय्य दीक्षित द्वारा
स्रोत: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (उद्गम)
पृष्ठ 558, कुल 590 में से
संदर्भ में पढ़ें| ५२८ | सिद्धान्तलेशसंग्रह | [ चतुर्थ परिच्छेद |
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धर्मादौ प्रवृत्तिदर्शनात् । तत्र क्षणिकसुखकालीनदुःखाभावस्य पुरुषार्थत्वे तदर्थं बहुकालदुःखानुभवायोगात् । न च तत्र क्षणिकसुखस्य पुरुषार्थत्वेऽपि दोषतौल्यम् , भावरूपे सुखे उत्कर्षापकर्षयोरनुभवसिद्धत्वेन क्षणमप्यत्युत्कृष्टसुखार्थं बहुकालदुःखानुभवोपपत्तेः । दुःखाभावे चोत्कर्षापकर्षासम्भवात् । तस्मान्मुक्तौ संसारदुःखनिवृत्तिरप्यविद्यानिवृत्तिवत् सुखशेष इतयनवच्छिन्नानन्दप्राप्तिरेव स्वतःपुरुषार्थ इत्याहुः ॥ ३ ॥
प्रत्यगेव परानन्दस्तिरोभूतः स्वमोहतः ।
स्वकण्ठचामीकरवत् प्राप्तप्राप्यः स्वविद्यया ॥ १० ॥
अपने मोहसे प्रत्यग्रूप परानन्द ही तिरोभूत हुआ है अतः प्राप्त होनेपर भी भूली हुई अपनी कण्ठगत सुवर्णमालाके समान अपनी विद्यासे प्राप्य होता है ॥१०॥
प्रवृत्ति देखी जाती है । उस स्थलमें अर्थात् निन्दित उक्त प्रवृत्तिस्थलमें * क्षणिक सुखकालिक दुःखाभावमें पुरुषार्थताका यदि अङ्गीकार किया जाय, तो उसके लिए अधिककाल तक दुःखानुभव नहीं हो सकता है । यदि शङ्का हो कि निन्दित प्रवृत्तिस्थलमें क्षणिक सुख पुरुषार्थ माना जाय, तो भी दोष तो समान है ? तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि भावरूप सुखमें उत्कर्ष और अपकर्षका अनुभव होनेसे क्षणिक उत्कृष्ट सुखके लिए बहुत काल तक दुःखका अनुभव उपपन्न हो सकता है, और दुःखाभावमें उत्कर्ष और अपकर्ष नहीं हो सकते हैं † । इससे अर्थात् दुःखाभावके स्वतः पुरुषार्थ न होनेसे संसाररूप दुःखकी निवृत्ति भी अविद्यानिवृत्तिके समान सुखकी अङ्ग है, अतः अनवच्छिन्न-शुद्ध-आनन्दकी प्राप्ति ही स्वतः-पुरुषार्थ है ॥ ३ ॥
* समाधान इस अभिप्रायसे देते हैं कि सुखव्यक्ति वस्तुतः एक है, तथापि उपाधिके भेदसे सुखका भेद होनेके कारण सुखत्व जाति अक्षत है, अतः सुखको स्वतः पुरुषार्थ माननेसे कारणतावच्छेदकप्रयुक्त लाघव है । और दुखाभाव ही यदि स्वतः पुरुषार्थ होता, तो अधिक काल तक क्षणिक सुखके लिए अनेक पुरुष प्रवृत्त नहीं देखे जाते, अतः सुखको ही पुरुषार्थ मानना युक्ति-युक्त है ।
† कारण कि अभावमें उत्कर्षत्व और अपकर्षत्वरूप जाति नहीं मानी जाती है, यह भाव है ।