भारतकोश
सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

Siddhanta Lesha Sangraha Hindi

श्रीमदप्पय्य दीक्षित द्वारा

स्रोत: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (उद्गम)

DevanagariHindipublished590 पृष्ठ

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पृष्ठ 557

मोक्षके स्वतःपुरुषार्थत्वका विचार ] भाषानुवादसहित ५२७


तत्त्साधनप्रवर्तकसङ्ग्रहाय इष्टसाधनताज्ञानस्य इच्छाविषयत्वप्रवेशेन गुरुघटितस्य प्रवर्तकत्वकल्पनायोगात् ।

न च दुःखाभाव एवं स्वतःपुरुषार्थः, तच्छेषतया सुखं काम्यमिति वैपरीत्यापत्तिः; बहुकालदुःखसाध्येऽपि क्षणिकसुखजनके निन्दितग्राम्य-


करनेके लिए इष्टसाधनताज्ञानको भी प्रवर्तक मानना पड़ेगा, यह युक्त नहीं है, क्योंकि इष्टसाधनताज्ञानमें इच्छाविषयताका प्रवेश होनेसे पूर्व प्रवर्तककी अपेक्षा इसमें गौरव है ।

※ यदि शङ्का हो कि 'दुःखाभाव ही स्वयं पुरुषार्थ है। और सुख दुःखाभावके अङ्गरूपसे ही काम्य है अर्थात् अभीष्ट है, इस प्रकार वैपरीत्यकी भी प्रसक्ति हो सकती है, तो यह युक्त नहीं है, क्योंकि † अधिककाल तक दुःखसे साध्य निन्दित अगम्यागमन आदि क्षणिक सुखके साधनोंमें अनेक मनुष्योंकी


* भाव यह है कि दुःखाभावको सुखशेष माननेसे दुःखाभावके साधन भी सुखसाधन ही गिने जायेंगे, इस अवस्थामें सुखके या दुःखाभावके साधनोंमें सर्वत्र सुखसाधनता ज्ञानको ही प्रवर्तक माननेसे काम चल सकता है । यदि सुखके समान दुःखाभाव भी स्वतःपुरुषार्थ माना जायगा, तो दुःखाभावके साधनोंमें सुखसाधनताका बाध होनेसे सुखसाधनत्वसे उनमें प्रवृत्ति नहीं होगी । यदि शङ्का हो कि दुःखाभावके साधनोंमें प्रवृत्तिके प्रति दुःखाभावसाधनता ज्ञानको प्रवर्तक मानेंगे, इसलिए उनमें भी प्रवृत्तिकी उपपत्ति हो सकती है, तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि इस प्रकार माननेसे प्रवृत्तिके कारणका अनुगम नहीं होगा । यदि शङ्का हो कि दोनोंके लिए अर्थात् सुखसाधनोंमें और दुःखाभावसाधनोंमें प्रवृत्तिकी उपपत्ति के लिए इष्टसाधनताज्ञानको ही प्रवर्तक मानो, दुःखाभाव भी सुखके समान अभीष्ट है, अतः इष्टशब्दसे उसका भी संग्रह हो सकता है, तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि प्रवृत्तिमात्रके प्रति जो तुमने इष्टसाधनताज्ञानको कारण माना है, उसमें प्रविष्ट इष्टांशमें सुखत्वजातिका अङ्गीकार करो तो कथञ्चित् लाघव हो सकता है, परन्तु इष्टांशमें सुखत्वजातिके अङ्गीकारमें किसी प्रमाणके न होनेसे उपाधि ही माननी होगी । इस परिस्थितिमें कारणतावच्छेदकप्रयुक्त गौरव ही प्रसक्त होगा, इसलिए दुःखाभावको सुखशेष मानना ही युक्त है ।

† कुछ लोग इस प्रश्नके विषयमें तर्क करते हैं कि यह शङ्का हो ही नहीं सकती, क्योंकि इस विपरीत पक्षमें दुःखाभाव साधनोंमें प्रवर्तक ज्ञानकारणतावच्छेदक शरीरमें दुःखाभावत्वरूप उपाधिका ही प्रवेश मानना पड़ेगा, इसलिए इच्छाविषयत्वरूप उपाधिके प्रवेशके समान गौरव ही है, तो यह तर्क युक्त नहीं है, क्योंकि सिद्धान्तमें सुख आत्मरूप है, इसलिए आत्माके एक होनेसे सुखत्व जाति ही नहीं हो सकती है, अतः उसमें जातित्वका असम्भव है और उसे उपाधि मानना होगा, इसलिए ग्रन्थमें उक्त शङ्का हो सकती है । इच्छाविषयत्वके समान सुखत्वं भी उपाधिरूप है, अतः सुखत्वका प्रवेश करनेपर भी कारणतावच्छेदकप्रयुक्त गौरवके समान होनेसे किसी विनिगमकके न रहनेसे वैपरीत्यकी आशङ्का हो सकती है, यह भाव है ।