सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)
Siddhanta Lesha Sangraha Hindi
श्रीमदप्पय्य दीक्षित द्वारा
स्रोत: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (उद्गम)
पृष्ठ 556, कुल 590 में से
संदर्भ में पढ़ें| ५२६ | सिद्धान्तलेशसंग्रह | [ चतुर्थ परिच्छेद |
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दुःखं सुखविरोधीति तन्नाशोऽपि हि न स्वतः ।
पुमर्थः सुखमात्रं तु तथा चित्सुखदर्शने ॥ ९ ॥
चित्सुखाचार्य की दृष्टिमें दुःख सुखका विरोधी है, इसलिए दुःखका विनाश स्वतःपुरुषार्थ नहीं है, किन्तु केवल सुख ही पुरुषार्थ है ॥ ९ ॥
चित्सुखाचार्यास्तु—दुःखाभावोऽपि मुक्तौ न स्वतःपुरुषार्थः, सर्वत्र दुःखाभावस्य स्वरूपसुखाभिव्यक्तिप्रतिबन्धकाभावरूपतया सुखशेषत्वात्; सुखस्यैव स्वतःपुरुषार्थत्वम् । अन्येषां सर्वेषामपि तच्छेषत्वमिति सुखसाधनताज्ञानस्यैव प्रवर्तकत्वे सम्भवति दुःखाभावस्यापि स्वतःपुरुषार्थत्वं परिकल्प्य-
* चित्सुखाचार्य कहते हैं कि मुक्तिमें दुःखाभाव स्वयं पुरुषार्थ नहीं है, क्योंकि सभी जगह † दुःखाभाव स्वरूपसुखकी अभिव्यक्तिमें प्रतिबन्धकीभूत पदार्थका अभावरूप होनेसे सुखका ही अङ्ग है, अतः सुख ही स्वतःपुरुषार्थ है। और जितने सुखके साधन हैं, उन सबको सुखाङ्ग मान करके सुखसाधनताज्ञानको प्रवर्तक मान लेने पर दुःखाभावको भी स्वतःपुरुषार्थ मान करके दुःखाभावके साधनोंमें दुःखाभावसाधनताज्ञानरूप प्रवर्तकके संग्रह
* अविद्याकी निवृत्तिके समान दुःखकी निवृत्ति भी स्वतः पुरुषार्थ नहीं है, इसलिए ब्रह्मानन्दस्फुरणके हेतुरूपसे ही अविद्यानिवृत्ति ज्ञानसाध्य है, इस प्रकारके चित्सुखाचार्यजीके मतको कहते हैं, यह मत इन्होंने अपने तत्त्वप्रदीपिकाग्रन्थमें, चतुर्थ परिच्छेदमें निम्नलिखित पङ्क्तियोंसे बतलाया है—
'नात्र दुःखाभावः स्वतन्त्रतया पुरुषार्थः, सुखाभिव्यक्तिशेषत्वात् । न च विपरीतवृत्तिप्रसङ्गः, विकल्पासहत्वात् । किं सुखं दुःखाभावस्योत्पादकमुताभिव्यञ्जकम्, नोभयथापि ।' अर्थात् दुःखाभाव स्वतन्त्ररूपसे पुरुषार्थ नहीं है, प्रत्युत सुखाभिव्यक्तिका अङ्ग है । यदि शङ्का हो कि सुख ही दुःखाभावका अङ्ग है, इस प्रकार उलटा प्रसङ्ग क्यों नहीं आता ? नहीं, विपरीत प्रसङ्ग नहीं आ सकता है, क्योंकि विकल्पका सहन नहीं कर सकता है—क्या सुख दुःखाभावका उत्पादक है या उसका अभिव्यञ्जक है ? दोनों ही प्रकार नहीं हो सकते हैं ।
† दुःखकालमें आत्मस्वरूपभूत सुखकी अभिव्यक्ति (स्फुरण) न होनेसे दुःख सुखाभिव्यक्तिमें प्रतिबन्धक माना जाता है, इसलिए दुःखाभावकी सुखाभिव्यक्तिके लिए ही कामना होती है, सुखके समान स्वतःपुरुषार्थत्वरूपसे नहीं होती है, यह भाव है।