भारतकोश
सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

Siddhanta Lesha Sangraha Hindi

श्रीमदप्पय्य दीक्षित द्वारा

स्रोत: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (उद्गम)

DevanagariHindipublished590 पृष्ठ

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पृष्ठ 555

मोक्षके स्वतःपुरुषार्थत्वका विचार] भाषानुवादसहित ५२५


एवं चाऽविद्यानिवृत्तिरपि ब्रह्मसाक्षात्कारोदयानन्तरक्षणवर्ती कश्चिद्भावविकार इति तस्या मुक्तावनुवृत्त्यभावान्न तदनिर्वच्यत्वे कश्चिद्दोष इत्यद्वैतविद्याचार्याः ॥ २ ॥

नन्वेवं क्षणिकत्वं स्यान्मुक्तेर्भ्रान्तोऽसि नह्यसौ ।
दुःखाभावः सुखं वेति पुरुषार्थत्ववर्जनात् ॥ ८ ॥

यदि शङ्का हो कि अविद्यानिवृत्तिका क्षणिकत्व माननेसे मुक्तिमें भी क्षणिकत्व प्रसक्त होगा, तो यह शङ्का केवल भ्रान्ति है, क्योंकि यह अविद्यानिवृत्ति न तो दुःखाभाव है और न सुख है, इसलिए पुरुषार्थत्वसे रहित है ॥ ८ ॥

नन्वेवमविद्यानिवृत्तेः क्षणिकत्वे मोक्षः स्थिरपुरुषार्थो न स्यादिति चेद्, भ्रान्तोऽसि । नह्यविद्यानिवृत्तिः स्वयमेव पुरुषार्थ इति तस्याः ज्ञानसाध्यत्वमुपेयते, तस्याः सुखदुःखाभावेतरत्वात् । किन्तु अखण्डानन्दावारकसंसारदुःखहेत्वविद्योच्छेदे अखण्डानन्दस्फुरणम्, संसारदुःखोच्छेदश्च भवतीति तदुपयोगितया तस्यास्तत्त्वज्ञानासाध्यत्वमुपेयते ।

ध्वंसके क्षणिक भावविकार सिद्ध होनेसे अविद्याकी निवृत्ति भी ब्रह्मसाक्षात्कारकी उत्पत्ति होनेके अनन्तरक्षणमें रहनेवाला कोई भावभूत विकार ही है। इसलिए उसकी मुक्तिमें अनुवृत्ति न होनेके कारण उसके अनिर्वचनीय होनेपर भी कोई दोष नहीं है, इस प्रकार अद्वैतविद्याचार्य कहते हैं ॥ २ ॥

*अथ शङ्का होती है कि यदि अविद्यानिवृत्ति क्षणिक मानी जाय, तो अविद्यानिवृत्तिरूप मोक्ष स्थायी पुरुषार्थ सिद्ध नहीं होगा, तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि इस विषयमें तुमको भ्रम है, कारण कि अविद्यानिवृत्ति ही स्वयं पुरुषार्थ नहीं है, इसीसे उसको ज्ञानजन्य मानते हैं, क्योंकि अविद्यानिवृत्ति न तो सुख है और न दुःखाभाव है, किन्तु अखण्ड आनन्दको आवृत्त करनेवाली और सांसारिक दुःखके हेतुभूत अविद्याका उच्छेद होनेसे अखण्ड आनन्दका प्रकाश हो जाता है और सांसारिक दुःखकी निवृत्ति हो जाती है, इसलिए अखण्डानन्दकी प्राप्ति और दुःखाभावमें उपयोगी होनेसे अज्ञाननिवृत्तिको ज्ञानसाध्य मानते हैं।


* अविद्यानिवृत्ति मोक्षके प्रति साधनभूत ज्ञानसे साध्य है, ऐसा पूर्वमें सिद्धान्ती ने उपपादन किया, इसलिए पूर्वपक्षीको यह भ्रम हुआ कि अविद्यानिवृत्ति ही मोक्ष पदार्थ है, इसलिए पूर्वपक्षीके भ्रम निवारणके लिए इस ग्रन्थसे शङ्कापूर्वक समाधान करते हैं।


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