भारतकोश
सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

Siddhanta Lesha Sangraha Hindi

श्रीमदप्पय्य दीक्षित द्वारा

स्रोत: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (उद्गम)

DevanagariHindipublished590 पृष्ठ

पृष्ठ 554, कुल 590 में से

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पृष्ठ 554

५२४ सिद्धांतलेशसंग्रह [ चतुर्थ परिच्छेद

न्य इत्यप्रामाणिकानवधिकध्वंसप्रागभावकल्पनापत्तेः । न चान्यद् ध्वंसत्वमात्माश्रयादिशून्यं निर्वक्तुं शक्यम् । एवं प्रागभावत्वमपीत्य- न्यत्र विस्तरः ।

तस्मान्न पूर्वं प्रागभावः, न च पश्चात् ध्वंसाभावः । मध्ये परं कियत्कालमनिर्वचनीयोत्पत्तिस्थितिध्वंसरूपभावविकारवान् घटाद्यध्यासः ।

इस रूपसे अनेक अप्रामाणिक ध्वंस और प्रागभावोंकी कल्पना करनी पड़ेगी, और आत्माश्रय दोषसे शून्य अन्य ध्वंसका निर्वचन भी नहीं हो सकता है * । इसी प्रकार प्रागभावत्वका भी निर्वचन नहीं हो सकता † । इस विषयमें अधिक विचार अन्य ग्रन्थोंमें देखना चाहिए ।

इससे ‡ उत्पत्तिसे पहले प्रागभाव भी नहीं है और उत्पत्तिके पश्चात् ध्वंस भी नहीं है, परन्तु बीचकी अवस्थामें कुछ कालतक अनिर्वचनीय, उत्पत्ति, स्थिति और ध्वंसरूप भावविकारसे युक्त घटादिका अध्यास है । लोकमें घटादि


* यदि कोई कहे कि जन्याभावत्वरूप ध्वंसत्व उक्त दोषसे दुष्ट है, तो 'ध्वंसाप्रतियोगित्वे सति त्रैकालिकाभिन्नाभावत्वम्' (अर्थात् ध्वंसका अप्रतियोगी हो करके अत्यन्ताभावसे या अन्यो-न्याभावसे जो भिन्न हो वह ध्वंस है) ध्वंसका लक्षण करो, और इसमें प्रागभावको लेकर अति-व्याप्तिके वारणके लिए विशेषण दल है और अत्यन्ताभाव आदिके निरासके लिए विशेष्यदल है, तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि ध्वंसके लक्षणमें ध्वंसका प्रवेश होनेसे आत्माश्रय दोष होगा अर्थात् अपने ज्ञानमें अपनी ही अपेक्षा हुई, अतः इस लक्षणसे भी ध्वंसत्वको सखण्ड नहीं बना सकते हैं । यदि कहें कि 'प्रागभावात्यन्ताभावान्योऽन्याभावभिन्नत्वे सति अभावत्वम् ध्वंसत्वम्' अर्थात् प्रागभाव, अत्यन्ताभाव और अन्योभावसे भिन्न होकर जो अभाव हो वह ध्वंस है, तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि इस लक्षणमें प्रागभावका निवेश है, इसलिए उसके निर्वचनमें ध्वंसभिन्नत्वका निवेश करना होगा, अतः अन्योन्याश्रय होगा ।

† तात्पर्य यह है कि 'अनादित्वे सति सान्तत्वम् प्रागभावत्वम्' अर्थात् अनादि होकर जो अन्तवान् हो, उसे प्रागभाव कहते हैं, ऐसा कहा जाय, तो घटध्वंसके प्रागभावरूप घटमें अना-दित्वके न होनेसे अव्याप्ति होगी । और कदाचित् कहो कि 'प्रतियोगिजनक्त्वे सति अभावत्वम्' अर्थात् प्रतियोगीके प्रति जो जनक अभाव है, वह प्रागभाव है, तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि जनकत्वके लक्षणमें प्रविष्ट पूर्ववृत्तित्वके कार्यप्रागभाववृत्तिरूप होनेसे आत्माश्रय दोष होगा, इसलिए प्रागभावत्व भी सखण्ड धर्म नहीं हो सकता है ।

‡ अन्य प्रतिपक्षियों द्वारा स्वीकृत प्रागभाव और ध्वंसके साधक प्रमाणोंके न होनेसे यह भाव है ।

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