सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)
Siddhanta Lesha Sangraha Hindi
श्रीमदप्पय्य दीक्षित द्वारा
स्रोत: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंअविद्यानिवृत्तिके स्वरूपका विचार] भाषानुवादसहित ५२३
मेव ध्वंसत्वम्, ध्वंसप्रागभावरूपस्य घटस्य तद्ध्वंसत्वापत्तेः । । न च सप्तमपदार्थरूपाभावत्वं विवक्षितम्, घटस्य प्रागभावं प्रत्यपि ध्वंसत्वाभावप्रसङ्गेन घटकाले प्रागभावोत्तरकालत्वव्यवहारस्य निरालम्बनत्वापत्तेः । न च प्रतियोग्यतिरिक्तः प्रागभावध्वंसः, तथा सति तुल्यन्यायतया ध्वंसप्रागभावोऽपि प्रतियोग्यतिरिक्तः स्यादिति प्रागभावध्वंसस्यापि प्रागभावोऽन्यः, तस्यापि कश्चिद् ध्वंसः, तस्यापि प्रागभावोऽ-
भी युक्त नहीं है, क्योंकि ध्वंसप्रागभावरूप घटमें भी घटध्वंसत्वकी प्रसक्ति होगी ।
यदि शङ्का हो कि 'जन्य होकर सप्तमपदार्थरूप अभाव'* ही ध्वंसका लक्षण विवक्षित है, अतः दोष नहीं है, तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि इस लक्षणमें प्रागभावके ध्वंसरूप घटमें प्रागभावध्वंसत्वकी प्रसक्ति नहीं होगी, इसलिए घटकालमें प्रागभावोत्तरकालीनत्वका व्यवहार निरालम्बन हो जायगा । यदि शङ्का हो कि प्रागभावका ध्वंस प्रतियोगीसे अतिरिक्त ही है, तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि प्रागभावध्वंसके प्रतियोगीसे भिन्न होनेपर समानरीतिसे † ध्वंसका प्रागभाव भी प्रतियोगीसे अतिरिक्त होगा, इससे प्रागभावध्वंसका भी अन्य—दूसरा—प्रागभाव और उसका भी कोई अन्य ध्वंस, उसका भी अन्य प्रागभाव,
* जन्य होकर जो सप्तम पदार्थरूप अभाव है, वही ध्वंस नामका अभाव है, यह इसका अर्थ है । केवल सप्तम पदार्थरूप अभाव ही ध्वंस कहा जाय, तो अत्यन्ताभाव, प्रागभाव और अन्योन्याभावमें अतिव्याप्ति हो जायगी, इसलिए जन्यत्व विशेषण दिया है । यदि केवल ऐसा ही कहा जाय कि 'जो जन्य हो, वह ध्वंसाभाव है' तो घट आदिमें भी ध्वंसका लक्षण चला जायगा, इसलिए जन्य होकर जो सप्तम पदार्थरूप अभाव हो वही ध्वंस है, ऐसा लक्षण करना होगा । इसपर ध्यान देना चाहिए कि द्रव्य, गुण, कर्म, सामान्य, विशेष, समवाय और अभाव ये सात पदार्थ हैं ।
† प्रागभावके ध्वंसको अर्थात् घटादिप्रतियोगिक प्रागभावके ध्वंसको घट दिप्रतियोगीसे यदि भिन्न माना जाय, तो इसी युक्तिसे घटध्वंसका प्रागभाव भी घटरूप ध्वंसके प्रतियोगीसे भिन्न होगा । इस अवस्थामें जैसे घटप्रागभावका ध्वंस घटरूप प्रतियोगी से भिन्न है, वैसे ही घट-प्रागभावध्वंसके भी प्रागभावको घटप्रागभावसे भिन्न मानना होगा, क्योंकि ध्वंसप्रागभाव भी ध्वंसरूप प्रतियोगीसे भिन्न है, इसी प्रकार अन्य प्रागभाव और अन्य ध्वंसका भी ध्वंस और प्रागभाव प्रतियोगीसे अतिरिक्त होंगे, इसी प्रकार आगे भी परम्परामें विचार कर सकते हैं, इसलिए अनवस्था स्फुट है, यह भाव है ।