सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)
Siddhanta Lesha Sangraha Hindi
श्रीमदप्पय्य दीक्षित द्वारा
स्रोत: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (उद्गम)
पृष्ठ 144, कुल 590 में से
संदर्भ में पढ़ें| ११४ | सिद्धान्तलेशसंग्रह | [ प्रथम परिच्छेद |
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तदुपरि विसृत्वरस्फीतालोक इव तत्र तत्र विशेषाभिव्यक्तिहेतुरिति पक्षे नाऽयं दोषः। अन्तःकरणवदविद्याया गत्यभावेन प्रतिबिम्बभेदानापत्तेरिति वाच्यम् , तथैवाऽवच्छेदपक्षेऽपि 'अविद्यावच्छिन्नो जीवः' इत्यभ्युपगमसम्भवात् । तत्राऽप्येकस्य जीवस्य क्वचित् प्रदेशे कर्तृत्वं प्रदेशान्तरे भोक्तृ-
अभिव्यक्तिका हेतु जलाशयके ऊपर भागमें गमनशील मेघके छिद्रोंसे निकला हुआ स्पष्ट प्रकाश विशेष है, वैसे ही इस लोक या परलोकमें गमनशील अन्तःकरण भी अविद्यामें प्रतिबिम्बभूत जीवकी अर्थात् जीवगत कर्तृत्व, भोक्तृत्व आदिकी विशेष अभिव्यक्तिका हेतु है, इसलिए इस पक्षमें समानताप्रयुक्त दोष नहीं है। कृतहानादि दोष की प्रसक्ति भी नहीं है, क्योंकि अन्तःकरणके समान अविद्याकी गति न होनेसे प्रतिबिम्बका भेद हो ही नहीं सकता। परन्तु यह शङ्का युक्त नहीं है, क्योंकि अवच्छेदपक्षमें भी उसी प्रकार अविद्यावच्छिन्न जीव है, ऐसा स्वीकार कर सकते हैं। * 'अविद्या-
* भाव यह है कि ब्रह्माण्डान्तर्गत चैतन्यभागके उपाधिके अन्तर्गत होनेसे उससे बाहरके चैतन्यका ही प्रतिबिम्ब होगा, अतः ब्रह्माण्डसे बाहर ही बिम्बभूत चैतन्यके अवस्थानकी प्रसक्ति होगी और अन्तर्यामी ब्राह्मणके साथ विरोध होगा। यदि प्रतिबिम्बपक्षमें ईश्वरकी सर्वान्तर्यामित्वप्रतिपादक श्रुतिके अनुसार लोकानुभवका परित्याग करके सम्पूर्ण चैतन्यका प्रतिबिम्ब मानकर अन्तर्यामी ब्राह्मणके सामञ्जस्यका उपपादन किया जाय, तो अनवच्छिन्न चैतन्य ईश्वर है, इस पक्षमें भी अन्तःकरणाभाववच्छिन्न चैतन्य ईश्वर है, ऐसी विवक्षा होगी। अन्तःकरणके कल्पित होनेसे चैतन्यमें अन्तःकरणावच्छिन्नके रहनेपर भी वस्तुसत् अन्तःकरणाभाव है, अतः अन्तःकरणाभाववच्छिन्न चैतन्यरूप ईश्वरका सभी विकारोंमें अवस्थान हो सकता, इससे अन्तर्यामी ब्राह्मणकी इस पक्षमें भी अनुपपत्ति नहीं है। तृप्तिदीप-प्रकरणमें अभाव भी ईश्वरकी उपाधि कहा गया है—
अन्तःकरणसाहित्यराहित्याभ्यां विशिष्यते।
उपाधिर्जीवभावस्य ब्रह्मतायाश्च नान्यथा ॥ ८५ ॥
यथा विधिरुपाधिः स्यात् प्रतिषेधस्तथा न किम् ।
सुवर्णलोहभेदेन शृङ्खलात्वं न भिद्यते ॥ ८६ ॥
अतद्व्यावृत्तिरूपेण साक्षाद्विधिमुखेन च।
वेदान्तानां प्रवृत्तिः स्याद् द्विधेत्याचार्यभाषितम् ॥ ८७ ॥
इन श्लोकोंका तात्पर्य यह है कि अन्तःकरणके साहित्य और साहित्यसे जीवभाव और ब्रह्मभावका भेद है अर्थात् जीवत्वकी उपाधि अन्तःकरणसाहित्य है और अन्तःकरणराहित्य ब्रह्मत्वकी उपाधि है। अन्य प्रकारसे इनका भेद नहीं हो सकता। भावके समान अभावके व्यावर्तक उपाधि