सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)
Siddhanta Lesha Sangraha Hindi
श्रीमदप्पय्य दीक्षित द्वारा
स्रोत: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (उद्गम)
| ११४ | सिद्धान्तलेशसंग्रह | [ प्रथम परिच्छेद |
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तदुपरि विसृत्वरस्फीतालोक इव तत्र तत्र विशेषाभिव्यक्तिहेतुरिति पक्षे नाऽयं दोषः। अन्तःकरणवदविद्याया गत्यभावेन प्रतिबिम्बभेदानापत्तेरिति वाच्यम् , तथैवाऽवच्छेदपक्षेऽपि 'अविद्यावच्छिन्नो जीवः' इत्यभ्युपगमसम्भवात् । तत्राऽप्येकस्य जीवस्य क्वचित् प्रदेशे कर्तृत्वं प्रदेशान्तरे भोक्तृ-
अभिव्यक्तिका हेतु जलाशयके ऊपर भागमें गमनशील मेघके छिद्रोंसे निकला हुआ स्पष्ट प्रकाश विशेष है, वैसे ही इस लोक या परलोकमें गमनशील अन्तःकरण भी अविद्यामें प्रतिबिम्बभूत जीवकी अर्थात् जीवगत कर्तृत्व, भोक्तृत्व आदिकी विशेष अभिव्यक्तिका हेतु है, इसलिए इस पक्षमें समानताप्रयुक्त दोष नहीं है। कृतहानादि दोष की प्रसक्ति भी नहीं है, क्योंकि अन्तःकरणके समान अविद्याकी गति न होनेसे प्रतिबिम्बका भेद हो ही नहीं सकता। परन्तु यह शङ्का युक्त नहीं है, क्योंकि अवच्छेदपक्षमें भी उसी प्रकार अविद्यावच्छिन्न जीव है, ऐसा स्वीकार कर सकते हैं। * 'अविद्या-
* भाव यह है कि ब्रह्माण्डान्तर्गत चैतन्यभागके उपाधिके अन्तर्गत होनेसे उससे बाहरके चैतन्यका ही प्रतिबिम्ब होगा, अतः ब्रह्माण्डसे बाहर ही बिम्बभूत चैतन्यके अवस्थानकी प्रसक्ति होगी और अन्तर्यामी ब्राह्मणके साथ विरोध होगा। यदि प्रतिबिम्बपक्षमें ईश्वरकी सर्वान्तर्यामित्वप्रतिपादक श्रुतिके अनुसार लोकानुभवका परित्याग करके सम्पूर्ण चैतन्यका प्रतिबिम्ब मानकर अन्तर्यामी ब्राह्मणके सामञ्जस्यका उपपादन किया जाय, तो अनवच्छिन्न चैतन्य ईश्वर है, इस पक्षमें भी अन्तःकरणाभाववच्छिन्न चैतन्य ईश्वर है, ऐसी विवक्षा होगी। अन्तःकरणके कल्पित होनेसे चैतन्यमें अन्तःकरणावच्छिन्नके रहनेपर भी वस्तुसत् अन्तःकरणाभाव है, अतः अन्तःकरणाभाववच्छिन्न चैतन्यरूप ईश्वरका सभी विकारोंमें अवस्थान हो सकता, इससे अन्तर्यामी ब्राह्मणकी इस पक्षमें भी अनुपपत्ति नहीं है। तृप्तिदीप-प्रकरणमें अभाव भी ईश्वरकी उपाधि कहा गया है—
अन्तःकरणसाहित्यराहित्याभ्यां विशिष्यते।
उपाधिर्जीवभावस्य ब्रह्मतायाश्च नान्यथा ॥ ८५ ॥
यथा विधिरुपाधिः स्यात् प्रतिषेधस्तथा न किम् ।
सुवर्णलोहभेदेन शृङ्खलात्वं न भिद्यते ॥ ८६ ॥
अतद्व्यावृत्तिरूपेण साक्षाद्विधिमुखेन च।
वेदान्तानां प्रवृत्तिः स्याद् द्विधेत्याचार्यभाषितम् ॥ ८७ ॥
इन श्लोकोंका तात्पर्य यह है कि अन्तःकरणके साहित्य और साहित्यसे जीवभाव और ब्रह्मभावका भेद है अर्थात् जीवत्वकी उपाधि अन्तःकरणसाहित्य है और अन्तःकरणराहित्य ब्रह्मत्वकी उपाधि है। अन्य प्रकारसे इनका भेद नहीं हो सकता। भावके समान अभावके व्यावर्तक उपाधि
जीवेश्वरस्वरूपविचार ] भाषाअनुवादसहितं ११५
त्वमित्येवं कृतहानादिदोषापनुत्तये वस्तुतो जीवैक्यस्य शरणीकरणीयत्वेन तन्न्यायादन्तःकरणोपाधिपक्षेऽपि वस्तुतश्चैतन्यैक्यस्य तदवच्छेदकोपाध्यैक्यस्य च तन्नत्वाभ्युपगमेन तद्दोषनिराकरणसम्भवाच्च । न चाऽवच्छेदपक्षे 'यथा ह्ययं ज्योतिरात्मा विवस्वानपो भिन्ना बहुधैकोऽनुगच्छन् । उपाधिना
प्रतिबिम्बो जीवः' इस पक्षमें भी ब्राह्मण आदि शरीरगत अन्तःकरणसे अवच्छिन्न प्रदेशमें कर्तृत्व और देव आदि शरीरगत अन्तःकरणसे अवच्छिन्न प्रदेशमें भोक्तृता है, इस प्रकार प्रदेश-भेद होनेपर भी कृतहान आदि दोषका निराकरण करनेके लिए अगत्या प्रतिबिम्बवादियोंको एकजीववादपक्षका अङ्गीकार करना होगा, अतः इसी न्यायके आधारपर अन्तःकरणोपाधिपक्षमें भी (अन्तःकरणावच्छिन्न चैतन्य जीव है, इस पक्षमें भी अन्तःकरणसे अवच्छिन्न चैतन्य-प्रदेशके भिन्न होनेपर भी ) वास्तवमें चैतन्यकी एकता और चैतन्यकी अवच्छेदक उपाधिकी एकताको प्रयोजक माननेसे कृतहान आदि दोषोंका निराकरण भी * हो सकता है । परन्तु अवच्छेदपक्षमें—'यथा ह्ययं ज्योतिरात्मा०'
होनेमें कोई विशेष नहीं है । जैसे सुवर्ण और लोहके भेदसे शृङ्खलात्वमें कोई विशेषता नहीं होती, वैसे ही भावाभावके व्यावर्तकत्वमें विशेषता नहीं है । वेदान्तोंकी अतद्व्यावृत्ति और विधिमुखसे द्विधा प्रवृत्ति होती है, ऐसा आचार्योंका सम्मत पक्ष है। अतद्व्यावृत्ति—तत् शब्दसे ब्रह्मका परिग्रह होता है, अतत् शब्दसे ब्रह्मभिन्न अन्तःकरण आदिका, उनकी व्यावृत्तिरूपसे ब्रह्मका बोध होता है और बुद्धिका साक्षी, मनका साक्षी, इस प्रकार विधिमुखसे भी ब्रह्मका बोध होता है । इस परिस्थितिमें प्रतिबिम्ब और अवच्छेद दोनों वादोंमें अन्तर्यामी ब्राह्मणकी उपपत्ति और अनुपपत्तिके समान होनेपर 'सुतरां नीरूपे' इत्यादिसे नीरूप अन्तःकरण आदिमें चैतन्यके प्रतिबिम्बके असंभवका प्रतिपादन होनेसे अवच्छेदपक्ष ही आदरणीय है, प्रतिबिम्बपक्ष आदरणीय नहीं है।
* तात्पर्य यह है कि वस्तुतः चैतन्य यदि एक है, तो अन्य जीव द्वारा किये गये कर्मोंके फलका भोग अन्यको होगा, यह आपत्ति देना युक्त नहीं है, क्योंकि अवच्छेदवादियोंके मतमें एक अन्तःकरणसे अवच्छिन्न चैतन्य एक जीव है और अन्य अन्तःकरणसे अवच्छिन्न अन्य जीव है इस प्रकारका अभ्युपगम होनेसे अन्तःकरणोंके भिन्न-भिन्न होनेसे जीवान्तर-कृत कर्मोंका जीवान्तरोंसे भोग नहीं हो सकता है, इसी रहस्यको ग्रन्थकारने ( तदवच्छेदकोपाधि ) इस शब्दसे प्रकट किया है। इस अवच्छेदपक्षमें पूर्वकथनानुसार अन्तःकरणके अभावसे युक्त चैतन्य—अन्तःकरणाभावावच्छिन्न चैतन्य—ईश्वर है अथवा 'कारणोपाधिरीश्वरः' इस श्रुतिके अनुरोधसे अविद्यावच्छिन्न चैतन्य ईश्वर है, ऐसा समझना चाहिए ।
११६ | सिद्धान्तलेशसंग्रह | [ प्रथम परिच्छेद
क्रियते भेदरूपो देवः क्षेतेष्वेवमजोऽयमात्मा' 'अत एव चोपमा सूर्यकादिवत्' (उ० मी० अ० ३ पा० २ सू० १८) इति श्रुतिसूत्राभ्यां विरोधः । 'अम्बुवदग्रहणात्तु न तथात्वम्' (उ० मी० अ० ३ पा० २ सू० १९)
(जैसे प्रकाशस्वरूप एक सूर्य अनेक जलपात्रोंमें प्रतिबिम्बित होकर अनेकरूप होता है, वैसे ही स्वप्रकाश यह नित्य आत्मा स्वतः एक होनेपर भी उपाधियोंमें प्रतिबिम्बित होकर अनेकरूप होता है * ) इत्यादि श्रुतिके साथ और 'अत एव चोपमा सूर्यकादिवत्' †इस सूत्रके साथ विरोध है ? नहीं, विरोध नहीं है, क्योंकि उदाहृत सूत्रके अनन्तर पठित 'अम्बुवदग्रहणात्तु न तथात्वम्' ‡
* इत्यादिमें आदिशब्दसे 'एक एव तु भूतात्मा भूते भूते व्यवस्थितः, एकधा बहुधा चैव दृश्यते जलचन्द्रवत्' 'रूपं रूपं प्रतिरूपो बभूव' 'जीवेशावाभासेन करोति' इत्यादि प्रतिबिम्बबोधक श्रुतियोंका भी ग्रहण करना चाहिए । प्रथम श्रुतिका अर्थ है—एक ही भूतात्मा जलमें प्रतिबिम्बित चन्द्रके समान सभी उपाधियोंमें प्रतिबिम्बरूपसे अवस्थित होकर अनेकसा दीखता है। द्वितीय श्रुतिका अर्थ है—प्रत्येक उपाधिमें आत्माका प्रतिरूप—प्रतिबिम्ब है। तृतीयाका अर्थ है—माया जीव और ईशको आभाससे—प्रतिबिम्बसे—करती है। अनेक स्थलोंमें प्रतिरूपशब्द प्रतिबिम्बरूप अर्थमें प्रयुक्त हुआ है। 'पुरुषका प्रतिरूप है' अर्थात् पुरुषका प्रतिबिम्ब है। इसलिए श्रुतियोंके साथ विरोध होनेसे अवच्छेदवाद अयुक्त है, यह पूर्वपक्षीका भाव है।
† 'अत एव चोपमा सूर्यकादिवत्' इस सूत्रका अर्थ है-चूँकि आत्मा स्वभावतः एक अद्वितीय है, श्रुतियोंमें उसकी अनेकता औपाधिकरूपसे कही गई है। इसीलिए उसकी औपाधिक अनेकरूपतामें जल आदिमें प्रतिबिम्बित सूर्य आदि दृष्टान्तरूपसे श्रुतियोंमें गृहीत हैं। अर्थात् जैसे सूर्य के एक होनेपर भी जल आदिमें उसके प्रतिबिम्बित होनेसे वह अनेकविध होता है, वैसे ही चैतन्यके स्वतः एक होनेपर भी अन्तःकरण आदिमें उसका प्रतिबिम्ब पड़नेसे वह अनेकविध होता है, यह भाव है।
‡ तात्पर्य यह है कि श्रुतिमें स्थित प्रतिरूपशब्द प्रतिबिम्बवाचक नहीं है, क्योंकि 'वायुर्यथैको भुवनं प्रविष्टो रूपं रूपं प्रतिरूपो बभूव' इसमें पठित प्रतिरूपशब्दका प्रतिबिम्ब अर्थ नहीं हो सकता । अतः सूर्य आदिके प्रतिबिम्बदृष्टान्तकी स्वरसतासे ही चैतन्यका प्रतिबिम्ब कहना चाहिए, परन्तु यह भी नहीं हो सकता है, कारण कि सूत्रकारने स्वयं ही 'अम्बुवदग्रहणात्तु न तथात्वम्' इस सूत्रसे उसका निराकरण किया है। सूत्रके दृष्टान्तभागके अर्थका ही मूलमें 'यथा' इत्यादिसे विवरण किया है, तथापि संगृहीत अर्थ यह है—जल आदिके समान अत्यन्त स्वच्छ और रूपवान् उपाधिका ग्रहण न होनेसे सूर्य आदिके समान चैतन्यका प्रतिबिम्ब नहीं हो सकता, यद्यपि अन्तःकरण उपाधि है, तथापि वह रूपवान् और आत्मासे विप्रकृष्ट नहीं है, जैसे कि सूर्यसे विप्रकृष्ट जल है। इसपर शङ्का होती है कि यदि सूर्यका दृष्टान्त उक्त रीतिसे
जीवेश्वरस्वरूपविचार ] भाषानुवादसहित ११७
इत्युदाहृतसूत्रानन्तरसूत्रेण यथा सूर्यस्य रूपवतः प्रतिबिम्बोदययोग्यं ततो विप्रकृष्टदेशं रूपवज्जलं गृह्यते, नैवं सर्वगतस्याऽऽत्मनः प्रतिबिम्बोदययोग्यं किञ्चिदस्ति ततो विप्रकृष्टमिति प्रतिबिम्वासम्भवमुक्त्वा 'वृद्धिह्रासभाक्त्वमन्तर्भावादुभयसामञ्जस्यादेवम्' (उ० मी० अ० ३ पा० २ सू० २०) इति तदनन्तरसूत्रेण यथा जलप्रतिबिम्बितः सूर्यो जलवृद्धौ वर्धते इव, जलह्रासे ह्रसतीव, जलचलने चलतीवेति तस्याऽऽध्यासिकं जलानुरोधिवृद्धिह्रासादिभाक्त्वम्, तथा आत्मनोऽन्तःकरणादिनाऽवच्छेदेन उपाध्यन्त-
सूत्रसे—'जैसे रूपवान् सूर्यके प्रतिबिम्बके योग्य स्वच्छ और सूर्यसे दूरदेशमें रहनेवाला रूपवान् जल उपलब्ध होता है, वैसे सर्वगत आत्माके प्रतिबिम्बके योग्य और आत्मासे दूरदेशवर्ती कोई वस्तु उपलब्ध नहीं होती' इस प्रकार प्रतिबिम्बका असम्भव कहकर 'वृद्धिह्रासभाक्त्वम्' इत्यादि अनन्तर पठित सूत्रसे—'जैसे जलमें प्रतिबिम्बित सूर्य जलकी वृद्धि होनेपर बढ़ता-सा है, जलके कम होनेपर छोटा-सा होता है और जलके चलनेसे जलप्रतिबिम्बित सूर्य मानो चलता है, इस प्रकार सूर्यमें जलके सम्बन्धसे आध्यासिक वृद्धि और ह्रास आदिकी प्रतीति होती है, वैसे ही चिदात्माके अन्तःकरण आदिसे अवच्छिन्न होनेके कारण (उसके) बुद्धि आदि उपाधिमें
नहीं घट सकता है, तो श्रुतिमें कहे गये 'जलचन्द्रवत्' या 'जलसूर्यवत्' इत्यादि दृष्टान्तोंकी असङ्गति होगी, नहीं, असङ्गति नहीं होगी, कारण कि यद्यपि दृष्टान्त और दार्ष्टान्तिकका प्रतिबिम्बितत्वरूपसे साम्य नहीं है, तथापि वृद्धि, ह्रास आदिसे अन्य सादृश्य होनेसे दृष्टान्तकी उपपत्ति-सङ्गति हो सकती है। इसी उपपत्तिका मूलमें 'वृद्धिह्रासभाक्त्वमन्तर्भावादुभयसामञ्जस्यम्' इस सूत्रसे उल्लेख किया गया है। यद्यपि मूलमें ही सूत्रका अर्थ किया गया है, तथापि विशेषरूपसे स्फुट होनेके लिए फिर सुन लीजिये—विशाल जलसमुदायमें यदि सूर्यका प्रतिबिम्ब पड़े, तो वह बहुत बड़ा दीखता है, क्षुद्रपात्रस्थित जलमें प्रतिबिम्बित सूर्य क्षुद्रसा भासता है, जलके हिलनेसे सूर्यका भी हिलना-चलना मालूम होता है, वैसे ही आत्मा भी अन्तःकरण आदिसे अवच्छिन्न है, अतः उसकी अन्तःकरण आदिके अभ्यन्तर सत्ता है, इसलिए हाथी आदि विशालकाय जीवोंके अन्तःकरण आदि उपाधियोंके विशाल होनेसे आत्मा विशाल मालूम होता है और मच्छर आदि क्षुद्र जीवोंके छोटे अन्तःकरणमें वह छोटा मालूम होता है अर्थात् ह्रासित आत्मा ज्ञात होता है। अन्तःकरण आदिके गतिमान् होनेसे वह चलता-सा मालूम होता है। वस्तुतः न तो वह बड़ा है, न छोटा है और न चलता है। इसीलिए 'ध्यायतीव, लेलायतीव' (बुद्धिके ध्यान करनेपर आत्मा मानो ध्यान करता है, चलनेपर मानो आत्मा भी चलता है, ऐसा प्रतीत होता है)। अतः दृष्टान्त और दार्ष्टान्तिककी इसी रूपसे सङ्गति है, इसलिए दृष्टान्त-वाक्य अनुपपन्न नहीं हैं और उनका तात्पर्य प्रतिबिम्बवादमें नहीं है।
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र्भावादाध्यासिकं तदनुरोधिवृद्धिह्रासादिभाक्त्वमित्येवं दृष्टान्तदार्ष्टान्तिकयोस्सामञ्जस्यादविरोध इति स्वयं सूत्रकृतैवाऽवच्छेदपक्षे तयोस्तात्पर्यकथनात् । ‘घटसंवृतमाकाशं नीयमाने यथा घटे । घटो नीयेत नाकाशं तद्वज्जीवो नभोपमः ॥’ ‘अंशो नानाव्यपदेशात्’ ( उ० मी० अ० २ पा० ३ सू० ४३ ) इति श्रुतिसूत्राभ्यामवच्छेदपक्षस्यैव परिग्रहाच्च । तस्मात् सर्वगतस्य चैतन्यस्याऽन्तःकरणादिनाऽवच्छेदोऽवश्यम्भावीति आवश्यकत्वात् ‘अवच्छिन्नो जीवः’ इति पक्षं रोचयन्ते ॥
अन्तर्भूत होनेसे उसमें अन्तःकरणप्रयुक्त आध्यासिक वृद्धि और ह्रास आदिकी प्रतीति होती है, इस प्रकार दृष्टान्त और दार्ष्टान्तिकका सामञ्जस्य होनेसे विरोध नहीं है—ऐसा स्वयं सूत्रकारने ही ‘यथा ह्ययं’ और ‘अत एव चोपमा’ इत्यादि प्रतिबिम्बबोधक श्रुति और सूत्रका अवच्छेदपक्षमें तात्पर्य कहा है । अवच्छेदपक्षमें श्रुति आदिके विरोधका केवल अभाव ही नहीं है, प्रत्युत श्रुति और सूत्रका आनुकूल्य भी है—‘घटसंवृतम्०’ (जैसे घटके ले जानेपर घटावच्छिन्न आकाश नहीं ले जाया जाता किन्तु केवल घट ही ले जाया जाता है, वैसे ही जीव भी आकाशके तुल्य है अर्थात् जीव भी अवच्छिन्न चैतन्यरूप है और उसकी उपाधिका ही गमन होता है ) इस श्रुतिसे और * ‘अंशो नानाव्यपदेशात्’ इस सूत्रसे भी अवच्छेदपक्षका ही लाभ होता है । इससे अर्थात् प्रतिबिम्बपक्षमें दोष होनेसे और अवच्छेदपक्षमें किसी प्रकारका दोष न होनेसे सर्वगत चैतन्यका अन्तःकरण आदि उपाधियोंसे अवच्छेद अवश्य ही होगा, अतः अन्तःकरणावच्छिन्न चैतन्यको † जीव मानना ही अत्यन्त आवश्यक है ।
* ‘अंशो नानाव्यपदेशात्’—अंशः—जीव ईश्वरका अंश है, किससे? इससे कि नानाव्यपदेशात्—‘य आत्मानमन्तरो यमयति’ (जो आत्माका—जीवका अभ्यन्तर नियमन करता है ) इत्यादि श्रुतियोंमें नियम्यनियामकरूपसे जीव और ईश्वरका भेद कहा गया है । प्रकृतमें अंशशब्दका अर्थ अवयव या एकदेश नहीं है, परन्तु घटाकाशके समान अन्तःकरणावच्छिन्नत्वरूप है, मुख्य अंशत्व विवक्षित नहीं है, क्योंकि ब्रह्म निरवयव है, अतः उसका मुख्य अंश नहीं हो सकता ।
† यह उपलक्षण है, अर्थात् अविद्यावच्छिन्न चैतन्य ईश्वर है, ऐसा भी जानना चाहिए, क्योंकि ‘कार्योपाधिरयं जीवः कारणोपाधिरीश्वरः’ ऐसी श्रुति पूर्वमें कही जा चुकी है । ‘जीवेशावा-
जीवेश्वरस्वरूपविचार ] भाषानुवादसहित ११९
कौन्तेय इव राधेयो जीवः स्वाविद्यया परः ।
नाऽभासो नाऽप्यवच्छिन्न इत्याहुरपरे बुधाः ॥४२॥
जैसे कौन्तेय ही राधेय है, वैसे ही परमात्मा ही अपनी अविद्यासे जीवभावापन्न होता है, न प्रतिबिम्ब है और न अवच्छिन्न है, ऐसा भी कुछ लोग कहते हैं ॥४२॥
अपरे तु न प्रतिबिम्बः, नाऽप्यवच्छिन्नो जीवः । किन्तु कौन्तेयस्यैव राधेयत्ववदविकृतस्य ब्रह्मण एव अविद्यया जीवभावः । व्याध-कुलसंवर्धितराजकुमारदृष्टान्तेन 'ब्रह्मैव स्वाविद्यया संसरति, स्वविद्यया मुच्यते' इति बृहदारण्यकभाष्ये प्रतिपादनात् ।
कुछ लोग कहते हैं कि प्रतिबिम्ब जीव नहीं है और अवच्छिन्न भी जीव नहीं है, किन्तु जैसे कुन्तीके ही पुत्र कर्णमें राधेयत्व ( दासीपुत्रत्व ) का व्यवहार होता है, वैसे ही अविकृत ब्रह्ममें ही अविद्यासे जीवभावका व्यवहार होता है, क्योंकि बृहदारण्यकभाष्यमें—व्याधकुलसंवर्धितराजकुमारके दृष्टान्तसे * 'ब्रह्म ही अपनी अविद्यासे संसारका भागी होता है और अपनी विद्यासे मुक्त होता है, ऐसा—प्रतिपादन किया गया है । और 'राजसूनो०'
भावेन करोति' इत्यादि श्रुतिमें आभासशब्दका अर्थ अवच्छिन्न है, प्रतिबिम्ब अर्थ नहीं है, यह कहा जा चुका है । 'माया च अविद्या च स्वयमेव भवति' इसमें माया शब्दार्थ है—'कार्योपाधिरयं जीवः' इस श्रुतिके अनुसार अन्तःकरण । मायापदसे गृहीत अन्तःकरणमें माया-शब्दका प्रयोग इसलिए है कि यह प्रकृतिका विकार है । अनवच्छिन्नचैतन्य ईश्वर है, ऐसा जो कहा गया है, वह चित्रदीपके आधारपर और अन्तःकरणाभावावच्छिन्नचैतन्य ईश्वर है, यह सम्भवमात्रसे कहा गया है, तात्पर्यसे नहीं कहा गया है, अन्यथा 'कारणोपाधिरिश्वरः' इस श्रुतिके साथ विरोध होगा । अनवच्छिन्नको ईश्वर माननेपर किसी उपाधिके न रहनेसे ईश्वर सर्वज्ञ कैसे होगा ? इस प्रश्नका उत्तर उन्हींसे पूछना चाहिए । इसीलिए वाक्यवृत्तिमें भगवान् शङ्कराचार्यने 'मायोपाधिर्जगद्योनिः सर्वज्ञत्वादिलक्षणः' ( माया उपाधिसे युक्त ईश्वरके सर्वज्ञत्व आदि लक्षण हैं ) ऐसा कहा है ।
* दृष्टान्तका तात्पर्य यह है—राजकुलमें उत्पन्न हुआ कोई राजकुमार किसी कारणवश छोटी अवस्थासे ही व्याधके कुलमें रहा और अपनेको राजकुमार नहीं समझता था किन्तु मैं व्याधका अर्थात् एक निकृष्ट जातिका पुत्र हूँ ऐसा जानता था, इसी कारणसे कदाचित् यह अत्यन्त शूर या विजयी होनेपर भी लोकमें अपनी निकृष्ट जातीयताप्रयुक्त अपमानका अनुभव करता रहा, इस दशामें उसके वंशका परिज्ञान रखनेवाले किसीने उससे कहा कि तुम राजपुत्र हो व्याधके पुत्र नहीं हो, इससे-अपनी उत्कृष्ट जातिके स्मरणसे-हीन जातिप्रयुक्त अपमान आदिको भूलकर यह उत्तम जातिके सुखका जैसे अनुभव करने लगा, वैसे ही ब्रह्म भी अनादि अविद्याके प्रभावसे अपने स्वतः सिद्ध, नित्य और आनन्दरूप स्वभावको भूलकर जीवभावको प्राप्त हुआ है। और तज्जन्य
| १२० | सिद्धान्तलेशसंग्रह | [ प्रथम परिच्छेद |
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राजसूनोः स्मृतिप्राप्तौ व्याधभावो निवर्तते ।
यथैवमात्मनोऽज्ञस्य तत्त्वमस्यादिवाक्यतः ।
इति वार्तिकोक्तेश्च ।
एवं च स्वाविद्यया जीवभावमापन्नस्यैव ब्रह्मण सर्वप्रपञ्चकल्पकत्वात् ईश्वरोऽपि सह सर्वज्ञत्वादिधर्मैः स्वप्नोपलब्धदेवतावज्जीवकल्पित इत्याचक्षते ॥ ६ ॥
एको जीव उताऽनेकस्तत्राऽनुपदवादिनः ।
एकं देहं च तस्यैकमन्यत्स्वप्नसमं विदुः ॥४३॥
एक जीव है या अनेक जीव हैं, इस विप्रतिपत्तिमें अनुपद्वादी (पूर्वोक्त आचार्योंमेंसे कुछ लोग ) कहते हैं कि एक ही जीव है और उसका शरीर भी एक है अन्य सब स्वप्नमें देखे जानेवाले पदार्थोंके समान प्रातिभासिकमात्र हैं ॥४३॥
जैसे व्याधके कुलमें बढ़ा हुआ राजकुमार अपनी राजकुमारताकी स्मृतिसे व्याधभावसे निवृत्त होता है, वैसे ही अज्ञ आत्माकी 'तत्त्वमसि' आदि वाक्यसे होनेवाली स्मृतिसे अज्ञानता निवृत्त होती है, इस प्रकार वार्तिकका वचन भी है।
बृहदारण्यकभाष्य और वार्तिकके पर्यालोचनसे प्रतिबिम्बादिभावसे रहित पूर्ण ब्रह्ममें ही जीवभावकी सिद्धि है, अतः अपनी अविद्यासे जीवभावापन्न ब्रह्म ही सभी प्रपञ्चकी कल्पना करनेवाला होनेसे सर्वज्ञत्व आदि धर्मोंसे युक्त ईश्वर भी—स्वप्नमें उपलब्ध देवताके समान † जीव द्वारा—कल्पित है ॥६॥
अनेक कष्टोंको भोगता है। किसी समयमें गुरुद्वारा या शास्त्रसे जब उसको ज्ञान हो जाता है कि 'मैं जीव नहीं हूँ परन्तु सच्चिदानन्द ब्रह्म ही हूँ' तब जीवभावको भूल कर वह अपने सत्य-स्वरूपका अनुभव करता है ।
† स्वप्न देखनेवाला पुरुष—जीव जैसे स्वयं ही स्वप्नमें अपनेसे भिन्न सर्वज्ञत्व आदि धर्मोंसे युक्त किसी देवताकी कल्पना करता है और उसकी अहर्निश पूजा करता है, और उसकी उपासनासे अभ्युदय फल प्राप्त करता है, वैसे ही जागरणमें भी ईश्वर कल्पित है, यह दृष्टान्तका भाव है ।
जीवेश्वरस्वरूपविचार ] भाषानुवादसहित १२१
अथायं जीव एकः, उताऽनेकः ? अनुपदोक्तपक्षावलम्बिनः केचिदाहुः—
एको जीवः, तेन चैकमेव शरीरं सजीवम् । अन्यानि स्वप्नदृष्टशरीराणीव निर्जीवानि । तदज्ञानकल्पितं सर्वं जगत्, तस्य स्वप्नदर्शनवद्यावदविद्यं सर्वो व्यवहारः । बद्धमुक्तव्यवस्थाऽपि नास्ति, जीवस्यैकत्वात् । शुकमुक्तादिकमपि स्वाप्नपुरुषान्तरमुक्तादिकमिव कल्पितम् । अत्र च सम्भावितसकलशङ्कापङ्कप्रक्षालनं स्वप्नदृष्टान्तसलिलधारयैव कर्तव्यमिति ।
अत्र सन्देह होता है कि जीव एक है या अनेक हैं ? इस विषयमें अनुपदोक्त (ब्रह्म ही अपनी अविद्यासे संसारी होता है और अपनी विद्यासे मुक्त होता है, इस ग्रन्थसे कहे गये) पक्षका अनुसरण करनेवाले कुछ लोग कहते हैं—
जीव एक ही है [ ब्रह्म एक है और उसमें अवच्छेदवाद या प्रतिबिम्बवादका स्वीकार नहीं है, अतः जीवका भेद नहीं हो सकता है, यह भाव है ] । इससे एक ही शरीर जीवसे युक्त है और अन्य जितने शरीर हैं; वे सबके सब स्वप्नमें देखे जानेवाले शरीरोंके समान निर्जीव हैं । यह समस्त जगत् जीवके अज्ञानमात्रसे कल्पित है । जैसे जब तक निद्राकी निवृत्ति नहीं होती है, तभी तक स्वप्न देखा जाता है, वैसे ही जब तक जीवकी अविद्याका विनाश नहीं होता, तभी तक जीवके सब व्यवहार होते हैं । [ इस एक जीववादमें पूर्वपक्ष होता है कि यदि अज्ञानसे स्वप्नव्यवहारके समान यह समस्त जगत्का व्यवहार कल्पित है, तो जैसे स्वप्नव्यवहार एकदम नष्ट हो जाता है, वैसे ही जगत्का व्यवहार एकदम नष्ट हो जाना चाहिए, फिर विद्याकी स्वीकृति व्यर्थ है, इसपर इस ग्रन्थसे यह कहा गया है कि विद्या व्यर्थ नहीं है, क्योंकि जैसे कारणान्तरसे निद्रा आदिका क्षय होनेपर स्वप्नकी निवृत्ति होती है, वैसे ही ज्ञानसे अज्ञानान्धकारके निवृत्त होनेपर ही नाश होता है, समस्त संसारका विद्याके उदयके बिना अज्ञानका नाश नहीं होता और अज्ञानके नाशके बिना इस प्रपञ्चात्मक व्यवहारका लोप नहीं होता । अतः विद्या निरर्थक नहीं है ] इस पक्षमें बद्ध या मुक्तकी व्यवस्था भी नहीं हैं, क्योंकि जीव एक ही है । शुक आदिकी जो मुक्ति सुनी जाती है, वह भी स्वप्नकालिक अन्य पुरुषकी मुक्ति आदिके समान कल्पित ही है । तात्पर्य यह है
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| १२२ | सिद्धान्तलेशसंग्रह | [ प्रथम परिच्छेद |
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सूत्रमेकं परं जीवपदाभासान् परान् परे ।
कुछ लोग यह कहते हैं कि एक सूत्रात्मा हिरण्यगर्भ मुख्य जीव है और अन्य सभी जीव जीवाभास हैं ॥
अन्ये त्वस्मिन्नेकशरीरैकजीववादे मनःप्रत्ययमलभमानाः 'अधिकं तु भेदनिर्देशात्' ( उ० मी० अ० २ पा० १ सू० २२ ) 'लोकवत्तु लीलाकैवल्यम्' ( उ० मी० अ० २ पा० १ सू० ३३ ) इत्यादिसूत्रैर्जीवाधिक ईश्वर एव जगतः स्रष्टा, न जीवः । तस्याऽऽप्तकामत्वेन प्रयोजनाभावेऽपि केवलं लीलयैव जगतः सृष्टिरित्यादि प्रतिपादयद्भिर्विरोधं च मन्यमाना हिरण्यगर्भ एको ब्रह्मप्रतिबिम्बो मुख्यो जीवः । अन्ये तु तत्प्रतिबिम्ब-
कि जैसे स्वप्नसे उठा हुआ पुरुष स्वप्नभ्रमसे सिद्ध अन्य पुरुषकी मुक्तिको अन्यके प्रति कहता है, वैसे ही जीवके भ्रमात्मक ज्ञानसे सिद्ध शुक आदिकी मुक्ति श्रवण आदिमें पुरुषोंकी प्रवृत्तिके लिए कही गई है । इस एक जीव-वादमें सम्भावित सम्पूर्ण शङ्कारूप कीचड़का प्रक्षालन स्वप्नदृष्टान्तरूप जल-धारासे ही करना चाहिए—जैसे कोई शङ्का करे कि यदि जीव एक ही है, तो विद्याके उपदेशक अन्यका अभाव होनेसे ज्ञान नहीं होगा और जीव तथा ईश्वरके विभक्त न होनेसे जीवका ईश्वरोपासना आदि व्यवहार भी नहीं होगा, ऐसी आशङ्का करके कहते हैं—'अत्र च' इत्यादिसे । जैसे स्वप्नदशामें स्वप्न देखनेवाला किसीको ईश्वर और किसीको गुरु मानकर उपासना करता है और उससे विद्या प्राप्त करता है, वैसे ही प्रकृतमें भी होगा, यह भाव है ।
कुछ लोग एकजीववादमें सन्तुष्ट न होकर अर्थात् प्रामाण्यनिश्चय न प्राप्त कर 'अधिकं तु भेदनिर्देशात्' 'लोकवत्तु लीलाकैवल्यम्' इत्यादि सूत्रोंके आधारपर जीवसे अन्य ईश्वर ही जगत्का स्रष्टा है, जीव स्रष्टा नहीं है, यद्यपि ईश्वरको कोई अभिलाषा नहीं है, क्योंकि वह आप्तकाम है, इसलिए जगत्के सर्जनमें उसका कोई प्रयोजन नहीं है, तथापि 'केवल लीला से ही जगत्की सृष्टि करता है' इत्यादि प्रतिपादन करनेवालोंके साथ जीवको सृष्टिकर्ता माननेमें विरोध मानते हुए ब्रह्मका प्रतिबिम्बभूत हिरण्यगर्भ ही एक मुख्य जीव है । हिरण्यगर्भसे अन्य इन्द्रादि तो हिरण्यगर्भके प्रतिबिम्बभूत
जीवईश्वरस्वरूपविचार ] भाषानुवादसहित १२३
भूताश्चित्रपटलेखितमनुष्यदेहार्पितपटाभासकल्पाः जीवाभासाः संसारादि- भाज इति सविशेषानेकशरीरैकजीववादमातिष्ठन्ते ।
योगीव कायव्यूहेषु जीवोऽन्य इति चापरे ॥ ४४ ॥
जैसे शरीरोंके समूहमें एक ही योगी अपना अधिकार रखता है, वैसे ही हिरण्य- गर्भसे अन्य एक मुख्य जीव है [ और वही सब शरीरों में अधिकार रखता है ] ॥४४॥
अपरे तु हिरण्यगर्भस्य प्रतिकल्पं भेदेन कस्य हिरण्यगर्भस्य मुख्यं . जीवत्वमित्यत्र नियामकं नास्तीति मन्यमाना एक एव जीवोऽविशेषेण सर्वं शरीरमधितिष्ठति ।
चित्रके पटमें लिखित मनुष्यके देहमें अर्पित पटाभासके समान संसार आदि भोगनेवाले जीवाभास हैं, इस प्रकार सजीव हैं अनेक शरीर जिस एक जीववादमें, ऐसे जीवैक्यवादका अङ्गीकार करते हैं ।
प्रत्येक कल्पमें हिरण्यगर्भका भेद होनेसे किस हिरण्यगर्भको मुख्य जीव मानना, इसमें नियामक—प्रमाण—नहीं है अर्थात् अमुक कल्पका हिरण्यगर्भ ही मुख्य जीव है, अमुक कल्पका नहीं, ऐसा माननेमें कोई विनिगमक ( एकतर पक्षपातिनी युक्ति ) नहीं है, विनिगमकके विना यदि हिरण्यगर्भको मुख्य जीव माना जाय, तो अविशेषात् सभी कल्पके हिरण्यगर्भ मुख्य जीव होंगे । तस्मात् पूर्वोक्त पक्षसे भी एकजीववाद सिद्ध नहीं होगा, यह भाव है । इसलिए एक ही जीव मुख्य और अमुख्य विभागके विना सब शरीरोंमें अपने भोगके लिए अधिष्ठित है, ऐसा मानते हुए अविशेषानेकशरीरैकजीववादका* ही कुछ लोग स्वीकार करते हैं । [ भाव यह है कि अविद्यामें चैतन्यप्रतिबिम्ब जीव एक है, क्योंकि अविद्या एक है, वही जीव सब शरीरोंमें स्वभोगके लिए अधिष्ठित है, अविद्यामें ब्रह्मप्रतिबिम्ब हिरण्यगर्भशरीरमें अधिष्ठित है, और हिरण्यगर्भका प्रतिबिम्ब जीवाभास इतर शरीरोंमें अधिष्ठित है, यह युक्त नहीं है, क्योंकि इतर जीवोंके हिरण्यगर्भ-प्रतिबिम्ब होनेमें कोई प्रमाण नहीं है, यही 'एक एव' इसमें उक्त एवकारका अर्थ है ] ।
* अविशेषेण अधिष्ठितानि अनेकशरीराणि यस्मिन् एकजीववादे सः अविशेषानेक- शरीरैकजीववादस्तम्, अर्थात् जीवके मुख्य और अमुख्य विभागके विना अधिष्ठित हैं अनेक शरीर जिसमें ऐसा अनेकजीववाद, यह भाव है ।
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न चैवं शरीरावयवभेद इव शरीरभेदेऽपि परस्परसुखाद्यनुसन्धानप्रसङ्गः । जन्मान्तरीयसुखाद्यनुसन्धानादर्शनेन शरीरभेदस्य तदननुसन्धानप्रयोजकत्वक्लृप्तेः ।
योगिनस्तु कायव्यूहसुखाद्यनुसन्धानं व्यवहितार्थग्रहणवद्योगप्रभाव-निबन्धनमिति न तदुदाहरणमिति अविशेषानेकशरीरैकजीववादं रोचयन्ते ।
यदि सब शरीरोंमें एक ही जीव है तो शरीरके अवयवभेदके समान शरीरका भेद होनेपर भी परस्परके सुखादिका अनुसन्धान होना चाहिए अर्थात् जैसे हाथ, पैर, मस्तक आदि अनेक अवयवोंमें अधिकार रखनेवाले एक ही देवदत्तमें यह अनुभव देखा जाता है कि 'मेरे मस्तकमें वेदना है और पैरोंमें सुख है', वैसे ही यदि एक जीव सभी शरीरोंमें अधिष्ठित है, तो उसे यह अनुभव होना चाहिए कि देवदत्तके शरीरमें मुझे सुख है और यज्ञदत्तके शरीरमें दुःख है, परन्तु यह अनुभव नहीं होता, इसलिए एकजीववाद असङ्गत है । इस प्रकार यदि शङ्का हो, तो वह युक्त नहीं है, क्योंकि [ यद्यपि पूर्वजन्मके शरीरमें अधिकार रखनेवाला जीव और इस जन्मके शरीरमें अधिकार रखनेवाला जीव एक ही है, तो भी जन्मान्तरीय सुख आदिका अनुसन्धान इस शरीरमें नहीं देखा जाता, इससे सुख आदिके अनुसन्धानके अभावमें शरीरभेदको हेतु मानना चाहिए, अतः उक्त दोष नहीं है ।
अनेक शरीरोंमें योगीको जो सुख आदिका अनुसन्धान होता है, वह तो व्यवहित अर्थके ज्ञानके समान योगप्रभावसे होता है, अतः उसे उदाहरणरूपसे नहीं दे सकते हैं; [ तात्पर्य यह है कि योगी अपने विलक्षण प्रभावसे अनेक शरीरोंको धारण करता है और उन सब शरीरोंमें से किसीमें सुख और किसीमें दुःखका अनुभव करता है, शरीर-भेदको यदि अननुभवके प्रति हेतु माना जायगा, तो उसे भिन्न-भिन्न शरीरमें सुख दुःखका अनुभव नहीं होना चाहिए, अतः उक्त नियममें ( सुखादिके अननुसन्धानमें शरीरभेद कारण है, इसमें) व्यभिचार होगा, नहीं व्यभिचार नहीं होगा, क्योंकि योगी जैसे सुदूर भूतकालीन पदार्थका और सुदूर भविष्यत्कालीन अर्थका, ( जिन्हें हम अपने चर्मचक्षुओंसे सर्वथा नहीं देख सकते हैं) योगप्रभावसे ज्ञान कर लेते हैं, वैसे ही योगप्रभावसे अनेक शरीरोंमें सुख और दुःखका अनुभव कर लेते हैं, अतः
जीवेश्वरस्वरूपविचार ] भाषानुवादसहित १२५
बद्धमुक्तव्यवस्थार्थमन्तःकरणभेदतः ।
जीवभेदं परे प्राहुः, व्यवस्था चाऽत्र कीदृशी ॥ ४५ ॥
बद्ध और मुक्त की व्यवस्थाके लिए अन्तःकरणके भेदसे जीवोंका भेद है, ऐसा भी कोई लोग कहते हैं । इस अनेकजीववादमें बद्ध और मुक्तकी व्यवस्था कैसी है ?॥४५॥
इतरे त्वत्रापि बद्धमुक्तव्यवस्थाऽभावस्य तुल्यत्वेन 'तद्यो यो देवानां प्रत्यबुध्यत स एव तदभवत्' इत्यादिश्रुतेः 'प्रतिषेधादिति चेन्न
योगीके दृष्टान्तसे कथित नियममें व्यभिचार नहीं है अर्थात् सुख आदिके अनुसन्धानमें योगप्रभावसे असहकृत शरीरभेदको प्रयोजक मानेंगे, योगीका शरीरभेद है, परन्तु वे योगप्रभावसे असहकृत नहीं हैं किन्तु सहकृत हैं अतः व्यभिचार नहीं है ] ।
कुछ लोग इस मतसे सन्तुष्ट न हो अन्तःकरण आदिको जीवकी उपाधि मानकर, अनेकजीववादका आश्रय करके बद्ध और मुक्तकी व्यवस्था करते हैं, क्योंकि पूर्वके समान इस मतमें भी बद्ध और मुक्तकी व्यवस्थाका अभाव समान होनेसे 'तद्यो यो देवानां०' ( देवोंमें से जिस देवने आत्माका साक्षात्कार किया, वही ब्रह्मरूप हो गया इत्यादि विद्वान्में मुक्तत्व और अविद्वान्में बद्धत्वका प्रतिपादन करनेवाली श्रुति और 'प्रतिषेधादिति चेन्न शारीरात्'*
* 'प्रतिषेधादिति चेन्न शारीरात्' इस सूत्रका यह अर्थ है—'न तस्य प्राणा उत्क्रामन्ति' (उस ब्रह्मवेत्ताके प्राणोंका उत्क्रमण नहीं होता ) इस काण्वशाखाकी श्रुतिसे ब्रह्मतत्त्ववेत्ताके प्राणोंका उत्क्रमण निषिद्ध होनेसे उसकी गति और उत्क्रान्ति नहीं होती है, यह नहीं कहना चाहिए, क्योंकि बृहदारण्यकमें 'न तस्मात् प्राणा उत्क्रामन्ति' (उससे प्राणोंका उत्क्रमण नहीं होता है) यह श्रुति ब्रह्मवेत्ताके शारीरका—जीवका—उपक्रम करके सुनी जाती है । इससे जीवसे प्राणोत्क्रमणका निषेध है शरीरसे नहीं अर्थात् विद्वान्के प्राणोंका भी शरीरसे उत्क्रमण होता है, इसलिए 'न तस्य' इत्यादि काण्वके श्रुतिका भी यही अर्थ करना चाहिए कि विद्वान्के प्राण जीवसे उत्क्रमण नहीं करते हैं, परन्तु उसके साथ-साथ ब्रह्मलोकमें जाते हैं। यह पूर्वपक्षसूत्र है ।
अनेकजीववादमें भी—'ब्रह्म ही अपनी अविद्यासे संसारी होता है और अपनी विद्यासे मुक्त होता है', ऐसा वृहदारण्यकभाष्यमें प्रतिपादन होनेसे विरोध समान ही है, ऐसा नहीं कहना चाहिए, क्योंकि उस भाष्यका यह तात्पर्य है कि ब्रह्म ही अनेक अन्तःकरणरूपसे परिणत अपनी अविद्यासे अनेकजीवभावको प्राप्त करके संसारी होता है और अपनी विद्यासे क्रमशः मुक्त होता है । यदि कोई कहे कि श्रुति-स्मृतिके ठीक-ठीक पर्यालोचनसे उनका तात्पर्य अनेकजीववादमें नहीं ज्ञात होता है, अतः अनेकजीववाद असङ्गत है, नहीं, असङ्गत नहीं है, क्योंकि तुल्ययुक्त्या उन
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शरीरात्' (उ० मी० अ० ४ पा० २ सू० १२) इत्यधिकरणे बद्धमुक्तत्व-प्रतिपादकभाष्यस्य च नाऽऽञ्जस्यमित्यपरितुष्यन्तोऽन्तःकरणादीनां जीवोपाधित्वाभ्युपगमेनाऽनेकजीववादमाश्रित्य बद्धमुक्तव्यवस्थां प्रतिपद्यन्ते ।
प्रतिजीवमविद्यांशा भिन्ना ब्रह्मावृत्तिक्षमाः ।
तन्नाशक्रमतो मुक्तिव्यवस्था कैश्चिदीर्यते ॥ ४६ ॥
कोई लोग कहते हैं कि प्रत्येक जीवमें अविद्याके अंश भिन्न-भिन्न हैं और वे ब्रह्मका आवरण करनेमें समर्थ हैं और उनके नाशक्रमसे मुक्तिकी व्यवस्था है ॥४६॥
तेषु केचिदेवमाहुः—यद्यपि शुद्धब्रह्माश्रयविषयमेकमेवाऽज्ञानम्, तन्नाश एव च मोक्षः, तथापि जीवन्मुक्तावज्ञानलेशानुवृत्त्यभ्युपगमेनाऽज्ञानस्य सांशत्वात् तदेव क्वचिदुपाधौ ब्रह्मावगमोत्पत्तौ अंशेन निवर्तते, उपाध्यन्तरेषु यथापूर्वमंशान्तरैरनुवर्तते इति ।
इस अधिकरणमें बद्धत्व और मुक्तत्वका प्रतिपादन करनेवाले भाष्यके साथ सामञ्जस्य नहीं है अर्थात् उक्त श्रुति और भाष्यकी अनुपपत्ति है ।
उन अनेकजीववादियोंमें से कुछ लोग यह कहते हैं कि यद्यपि शुद्ध ब्रह्मका आश्रय और उसको विषय करनेवाला अज्ञान एक ही है, और उसके नाश होनेसे ही मोक्ष होता हैं † तथापि जीवन्मुक्तिमें अज्ञानके विक्षेपांशकी अनुवृत्तिका स्वीकार होनेसे अज्ञान सांश है, इससे जिस उपाधिमें (जीवरूप अधिकरणमें) ब्रह्मज्ञानकी उत्पत्ति होगी, उसी स्थलमें अंशतः अज्ञानकी निवृत्ति होगी और अन्य स्थलमें पूर्ववत् अन्य अंशोंसे अज्ञानकी अनुवृत्ति होगी ।
उन श्रुतियों और स्मृतियोंका एकजीववादमें भी तात्पर्य नहीं है, ऐसा कह सकते हैं। यह भी नहीं कह सकते हैं कि अविद्याके एक होनेसे तदवच्छिन्न जीव एक है, क्योंकि कथित श्रुति और स्मृतिके आधारपर अविद्याका अनेकविधत्व भी सम्भव है और एकत्वका प्रतिपादन करनेवाली श्रुतियोंका तात्पर्य जातिके अभिप्रायसे भी लगा सकते हैं अर्थात् अविद्यात्व जातिके एक होनेसे अविद्या एक है, ऐसा कहा गया है । कदाचित् अविद्याको एक माना जाय, तो भी 'कार्योपाधिरयं जीवः' इत्यादि उदाहृत पूर्वकी श्रुतिके बलसे नाना अन्तःकरण ही जीवकी उपाधियाँ हैं, ऐसा भी स्वीकार कर सकते हैं, अतः अनेकजीववादमें विरोध नहीं है, यह भाव है ।
† विशिष्ट जीव और ईश्वर अज्ञानके आश्रय नहीं हो सकते हैं, क्योंकि वे स्वयं ही अज्ञानसे कल्पित हैं, अतः शुद्ध ब्रह्म ही उसका आश्रय है, इसी प्रकार अज्ञानविषयत्व अर्थात् अज्ञानावृतत्वरूपविषयत्व भी शुद्धमें है ईश्वरमें नहीं है, क्योंकि जैसे औपाधिक भेदसे
जीवेश्वरस्वरूपविचार ] भाषानुवादसहित १२७
आत्मन्यविद्यासंसर्गो हृदयग्रन्थिसंश्रयः ।
तद्भेदात्तदसंसर्गः क्रमान्मुक्तिक्रमः परैः ॥ ४७ ॥
आत्मामें जो अविद्याका सम्बन्ध है, वह हृदयग्रन्थिप्रयुक्त—अन्तःकरणप्रयुक्त है, अतः अन्तःकरणके विनाशसे आत्मा और अविद्याका जो क्रमसे असम्बन्ध है वही मुक्तिक्रम है ऐसा भी कुछ लोग कहते हैं ॥४७॥
अन्ये तु यथा न्यायैकदेशिमते भूतले घटात्यन्ताभावस्य वृत्तौ घटसंयोगाभावो नियामक इति अनेकेषु प्रदेशेषु तद्वत्सु संसृज्य वर्तमानो घटात्यन्ताभावः क्वचित्प्रदेशे घटसंयोगोत्पत्त्या तदभावनिवृत्तौ न संसृज्यते ।
* कुछ लोग यह कहते हैं कि जैसे भूतलमें घटात्यन्ताभावकी वृत्तिमें घटके संयोगका अभाव नियामक ( प्रयोजक ) है, इसलिए अनेक घटसंयोगाभाववाले प्रदेशोंमें सम्बन्ध करके स्थित घटका अत्यन्ताभाव—किसी प्रदेशमें घटके संयोगकी उत्पत्तिसे घटसंयोगाभावकी निवृत्ति होनेसे ( उस
अन्य जीवकी उपलब्धि नहीं होती है, वैसे ही ईश्वरकी भी अनुपलब्धि हो सकती है। अतः उसको ( ईश्वरको ) आवृत मानना अनुचित है।
अज्ञान एक ही है उसमें प्रमाण है—अज्ञानवाचक शब्दोंका श्रुतिस्मृतियोंमें एकवचनान्त प्रयोग, जैसे 'अजामेकाम्' 'मायान्तु प्रकृतिं विद्यात्' 'विभेदजनकेऽज्ञाने' इत्यादिमें 'अजाम्' 'मायांम्' 'प्रकृतिम्' और 'अज्ञाने' ये सब एकवचनान्त ही कहे गये हैं, और इसी एक अज्ञानके नाशसे मोक्ष होता है, ऐसा श्रुति प्रतिपादन करती है—'भूयश्चान्ते विश्वमायानिवृत्तिः'। इस मतमें एकके तत्त्वज्ञानसे समग्र अज्ञानका नाश नहीं माना जाता है, किन्तु जिस पुरुषको तत्त्वज्ञान होगा उसी पुरुषका अज्ञानांश नष्ट होगा, इसलिए बद्ध और मुक्तकी अत्यन्त उचित रीतिसे व्यवस्था हो सकेगी, यह भाव है।
* इस मतमें ज्ञानसे अज्ञानकी निवृत्ति होती है, ऐसा प्रतिपादन करनेवाले शास्त्रोंका अज्ञानके सम्बन्धकी निवृत्तिमें ही तात्पर्य मानना होगा ज्ञानकी निवृत्तिमें नहीं। यदि अज्ञानके नाशमें ही तात्पर्य माना जाय, तो जैसे तृणसमुदायके विरोधी अग्निके उदयसे समग्र तूलराशिका नाश होता है, वैसे ही अज्ञानविरोधी ज्ञानके उदयसे समग्र अर्थात् निःशेष अज्ञानके नाशका प्रसङ्ग आवेगा। ऐसी स्थितिमें जीवन्मुक्तिशास्त्र और बद्धमुक्तिशास्त्रके साथ अवश्य विरोध होगा। इसमें घटात्यन्ताभावका जो दृष्टान्त दिया गया है, उसका तात्पर्य यह है कि 'भूतलमें घट नहीं है' इस अनुभवसे सिद्ध जो अभाव है, वह त्रैकालिक है अर्थात् अत्यन्ताभाव है, इसलिए घटके आनेपर भी 'घट नहीं है' ऐसी प्रतीति होनी चाहिए, परन्तु होती नहीं है, कारण कि घटाधिकरणमें घटात्यन्ताभावप्रतीतिका नियामक सम्बन्ध नहीं है, घटात्यन्ताभावकी प्रतीतिका नियामक है—घटसंयोगाभाव, घटाधिकरणमें घटसंयोगाभावके न रहनेसे उक्त आपत्ति नहीं है।
१२८ | सिद्धान्तलेशसंग्रह | [ प्रथम परिच्छेद
एवमज्ञानस्य चैतन्ये वृत्तौ मनो नियामकमिति तदुपाधिना तत्प्रदेशेषु संसृज्य वर्तमानमज्ञानं क्वचिद् ब्रह्मदर्शनोत्पत्त्या 'भिद्यते हृदयग्रन्थिः' इत्युक्तरीत्या मनसो निवृत्तौ न संसृज्यते । अन्यत्र यथापूर्वमवतिष्ठते । अज्ञानसंसर्गासंसर्गावेव च बन्धमोक्षावित्याहुः ।
जातिर्व्यक्तिमिव ध्वस्तां स्वात्मज्ञं यज्जहाति सा।
जीवं जीवाश्रिताऽविद्या मुक्तिः सेत्यपि चाऽपरैः ॥४८॥
जैसे व्यक्तिमें रहनेवाला जातिरूप धर्म विनष्ट व्यक्तिका परित्याग करता है, वैसे ही जीवाश्रित अविद्या आत्मज्ञानी जीवका जो परित्याग करती है, वही मुक्ति है, यह भी किन्हीं लोगोंका मत है ॥४८॥
अपरे तु नाऽज्ञानं शुद्धचैतन्याश्रयम्, किं तु जीवाश्रयं ब्रह्मविषयम् ।
स्थलमें ) सम्बद्ध नहीं होता, ऐसा किसी नैयायिकका मत है, वैसे ही चैतन्यमें अज्ञानकी वृत्तिका मन नियामक है, इसलिये मनरूप उपाधिसे युक्त प्रदेशमें सम्बन्ध करके रहा हुआ अज्ञान—किसी चैतन्यदेशमें ब्रह्मापरोक्षकी उत्पत्तिसे 'भिद्यते हृदयग्रन्थिः०' (अन्तःकरणरूप ग्रन्थि ब्रह्मदर्शनसे निवृत्त होती है) इस श्रुतिके आधारपर मनकी निवृत्ति होनेसे सम्बद्ध नहीं होता है और अन्यत्र अर्थात् जिस प्रदेशमें ब्रह्मज्ञानसे अज्ञानकी निवृत्ति नहीं हुई है, उस स्थलमें यथापूर्व रहता ही है, [ क्योंकि इस मतमें ] अज्ञानका सम्बन्ध बन्ध है और अज्ञानका असम्बन्ध मोक्ष है [ पूर्व मतमें अज्ञानकी सत्ता बन्धन और उसका नाश मोक्ष है और इस मतमें अज्ञानका सम्बन्ध बन्ध और असम्बन्ध मोक्ष है यह पूर्व मत और इस मतमें भेद है ] ।
अज्ञान शुद्ध चैतन्यमें नहीं रहता है * किन्तु जीवमें ही रहता है और
* वेदान्तशास्त्रसे प्रतिपाद्य जो शुद्ध चैतन्य है, वह अज्ञानका आश्रय नहीं है, क्योंकि 'वेदान्तवेद्यवस्तुको मैं नहीं जानता हूँ' इस अनुभवसे शुद्ध चैतन्यका अज्ञानविषयत्वरूपसे ही अनुभव होता है। और 'मैं परमात्माको नहीं जानता हूँ'। इस अनुभवसे अज्ञानकी जीवाश्रयत्वरूपसे प्रतीति होती है, अतः जीव ही अज्ञानका आश्रय है। अज्ञान अपने कार्यभूत अन्तःकरणसे युक्त चैतन्यरूप जीवमें कैसे रहेगा, यह शङ्का नहीं करनी चाहिए, कारण कि अन्तःकरणमें प्रतिबिम्बभूत जो चैतन्य है उसीमें जीवत्वका स्वीकार होनेसे अन्तःकरणावच्छिन्न चैतन्यको जीव मानते ही नहीं हैं। अन्तःकरण सादि है, इसलिए उसमें प्रतिबिम्बभूत चैतन्यके भी सादि होनेसे वह अनादि अविद्याका आश्रय न होगा, इस प्रकारकी यदि शङ्का हो, तो वह भी युक्त नहीं है, क्योंकि अन्तःकरणके—सुषुप्ति और जाग्रदवस्थाके अनुभवसे
जीवैकत्वानेकत्वविचार ] भाषानुवादसहित १२९
अतश्चान्तःकरणप्रतिबिम्बरूपेषु सर्वेषु जीवेषु व्यक्तिषु जातिवत् प्रत्येकपर्यवसायितया वर्तमानमुत्पन्नविद्यं कञ्चित्त्यजति नष्टां व्यक्तिमिव जातिः । स एव मोक्षः । अन्यं यथापूर्वमाश्रयतीति व्यवस्थेत्याहुः ।
वह ब्रह्मविषयक है । इससे प्रत्येकव्यक्तिको व्याप्त करके रहनेवाली जातिके † समान अन्तःकरणमें प्रतिबिम्बरूप सब जीवोंमें रहनेवाला अज्ञान—जैसे जातिरूप धर्म नष्ट व्यक्तिका त्याग करता है, वैसे ही जिस जीवमें ‡ विद्या उत्पन्न हुई है, उसका—त्याग करता है और यही त्याग मोक्ष कहलाता है । अन्य पुरुषका, जिसमें विद्याका आविर्भाव नहीं हुआ है, आश्रय करता है, इस प्रकारसे भी कुछ लोग बन्ध और मोक्षकी व्यवस्था करते हैं ।
—लय और जन्म हैं अतः उसके सादि होनेपर भी स्थूलके सूक्ष्मरूपसे वह अनादि है, ऐसा ‘पुंस्त्वादिवत्त्वस्य सतोऽभिव्यक्तियोगात्’ (ब्र० सू० अ० २ पा० ३ सू० ३१) इस सूत्रमें प्रतिपादन किया गया है । इस सूत्रका यह अर्थ है—जैसे बाल्य अवस्थामें अनभिव्यक्त पुंस्त्व और स्त्रीत्व आदिका यौवनमें प्रादुर्भाव होता है, वैसे ही स्वाप आदिमें अनभिव्यक्त अन्तःकरणकी, जो कि सत् है, स्थूलावस्थारूप अभिव्यक्ति होती है । अनादि चैतन्यप्रतिबिम्बमें अविद्या रहती है, इसका विचार—माया और अविद्याके भेदनिरूपणके प्रसङ्गमें—किया गया है ।
† द्वित्व या बहुत्वके समान अज्ञान व्यासज्यवृत्ति (एकाधिकव्यक्तिमात्रवृत्ति) माना जाय, तो सभी को प्रत्येकरूपसे 'मैं अज्ञ हूँ' ऐसा जो प्रत्यक्ष होता है, वह नहीं होगा, क्योंकि व्यासज्यवृत्ति धर्मके प्रत्यक्षमें यावत् आश्रयीभूत व्यक्तियोंका प्रत्यक्ष कारण होता है, अतः एक-एक जीवको सब जीवोंका प्रत्यक्ष न होनेसे एक व्यक्तिको व्यासज्यवृत्ति अज्ञानका प्रत्यक्ष नहीं होगा, इसलिए अज्ञानको गोत्व आदि जातिरूप धर्मके समान प्रत्येक जीवव्यक्तिमें पर्यवसायी मानना चाहिए । वस्तुतस्तु यदि अज्ञान व्यासज्यवृत्ति माना जाय, तो भी दोष नहीं है, कारण कि अज्ञानप्रत्यक्ष नित्य और साक्षिरूप होनेसे उसके अपरोक्षावभासमें यावदाश्रयका प्रत्यक्ष कारण नहीं है, क्योंकि जन्य-प्रत्यक्षमें ही यावदाश्रयप्रत्यक्ष कारण होता है, यह भाव है ।
‡ उत्पन्न विद्यासे मनकी निवृत्ति होगी और उसके निवृत्त होनेपर तन्निबन्धन चैतन्यप्रतिबिम्बका निरास होगा और इसीसे तद्विशिष्ट चेतन भी निवृत्त हो जायगा, इस क्रमसे मोक्ष होगा । इसीलिए 'जहात्येनां भुक्तभोगामजोऽन्यः' (विद्यावान् जीव जिसके विषय भुक्त हुए हैं, ऐसी अविद्याका त्याग करता है) यह भाव है ।
१७
१३० | सिद्धान्तलेशसंग्रह | [ प्रथम परिच्छेद
प्रतिजीवमविद्याया भेदमाश्रित्य चेतरे ।
तद्विनाशक्रमान्मुक्तिव्यवस्थां संप्रचक्षते ॥४९॥
कोई-कोई प्रत्येक जीवमें अविद्याका भेद मानकर उसके विनाशक्रमसे मुक्ति-व्यवस्था करते हैं ॥४९॥
इतरे तु प्रतिजीवमविद्याभेदमभ्युपगम्यैव तदनुवृत्तिनिवृत्तिभ्यां बद्धमुक्तव्यवस्थां समर्थयन्ते ।
अविशेषेण सर्वेषामविद्यातः प्रवर्त्तते ।
प्रपञ्चोऽस्मिन्नैकतन्त्वारब्धः पक्षे पटो यथा ॥ ५० ॥
जैसे अनेक तन्तुओंसे एक पट उत्पन्न होता है, वैसे ही अविशेषसे सभी जीवोंकी अविद्यासे प्रपञ्च उत्पन्न होता है, ऐसा अनेक जीववादियोंमें कुछ लोग कहते हैं ॥५०॥
अस्मिन् पक्षे कस्याऽविद्यया प्रपञ्चः कृतोऽस्त्विति चेत्, विनिगमका-भावात् सर्वाविद्याकृतोऽनेकतन्त्वारब्धघटतुल्यः। एकस्य मुक्तौ तदविद्या-नाशे एकतन्तुनाशे पटस्येव तत्साधारणप्रपञ्चस्य नाशः, तदैव विद्यमान-
कुछ लोग प्रत्येक जीवमें अज्ञानका भेद मानकर ही अज्ञानकी अनुवृत्ति और निवृत्तिसे बन्ध और मोक्षका समर्थन करते हैं ✕ ।
इस अनेक-अज्ञानपक्षमें किसकी अविद्यासे प्रपञ्च हुआ है ? इस प्रश्नके उत्तरमें कुछ लोग कहते हैं कि जैसे अनेक तन्तुओंसे पटका आरम्भ हुआ है, वैसे ही सभी जीवोंके अज्ञानसे यह समस्त प्रपञ्च हुआ है, क्योंकि किसी एक जीवके अज्ञानसे प्रपञ्चकी उत्पत्ति माननेमें कोई बलवत्तर विनिगमक ( युक्तिविशेष ) नहीं है। जैसे एक तन्तुका नाश होनेसे उस तन्तुकी सत्त्वदशामें जो विजातीय पट था, उसका नाश हो जाता है, वैसे ही एक जीवकी अविद्याका नाश होनेसे
✕ इस पक्षमें अविद्याकी अनुवृत्ति बन्ध है और अननुवृत्ति मोक्ष है। और अविद्या प्रत्येक जीवमें अलग-अलग है। एक माननेपर बन्ध और मोक्षका उपपादन नहीं हो सकेगा। यदि शङ्का की जाय कि अविद्याके अंशके आधारपर बन्ध और मोक्षकी व्यवस्था हो सकती है ? नहीं, नहीं हो सकती, क्योंकि विरोधी विद्याका उदय होनेपर उस अविद्याका किसी अंशसे भी अवस्थान नहीं हो सकता और जीवन्मुक्तिके निर्वाहके लिए अविद्याका लेश नहीं माना गया है, किन्तु अविद्याका नाश होनेपर भी प्रारब्धके अनुसार उसके संस्कार कुछ रहते हैं, इसीको अविद्याका लेश कहा गया है। वस्तुतस्तु अविद्याका लेश है ही नहीं। अतः अविद्याका प्रत्येक जीवमें भेद मानना ही उचित है।
जीवैकत्वानेकत्वविचार ] भाषानुवादसहित १३१
तन्त्वन्तरैः पटान्तरस्येव इतराविद्यादिभिः सकलेतरसाधारणप्रपञ्चान्तरस्योत्पादनमित्येके ।
प्रत्यविद्यं प्रपञ्चस्य भेदं न्यायनये यथा ।
अपेक्षाबुद्धिजद्वित्वं शुक्तिरूप्यं च भिद्यते ॥ ५१ ॥
जैसे न्यायमतमें प्रत्येक पुरुषकी अपेक्षाबुद्धिसे जन्य द्वित्व भिन्न-भिन्न होते हैं, और शुक्तिरूप्यादि प्रातिभासिक पदार्थ भी तत्-तद् अज्ञानसे भिन्न हैं, वैसे ही प्रत्येक अज्ञानके भेदसे प्रपञ्चका भी भेद है, ऐसा भी कोई लोग कहते हैं ॥५१॥
तत्तदज्ञानकृतप्रातिभासिकरजतवत् न्यायमते तत्तदपेक्षाबुद्धिजन्यद्वित्ववच्च तत्तदविद्याकृतो वियदादिप्रपञ्चः प्रतिपुरुषं भिन्नः। शुक्तिरजते त्वया यद् दृष्टं रजतम्, तदेव मयाऽपीतिवदैक्यभ्रममात्रमित्यन्ये ।
तत्साधारण विजातीय प्रपञ्चका नाश होता है और जैसे उसी क्षणमें ( तन्तुके नाशक्षणमें ) वर्तमान अन्य तन्तुओंसे पूर्वपटसे विलक्षण पट उत्पन्न होता है, वैसे ही इतर जीवोंकी अविद्या आदिसे—मुक्त जीवसे अन्य समस्त जीवोंका साधारण अन्य प्रपञ्च उत्पन्न होता है ।
जैसे उन उन पुरुषोंके अज्ञानसे ✻ प्रातिभासिक रजतकी उत्पत्ति होती है और जैसे न्यायमतमें † उन उन पुरुषोंकी अपेक्षाबुद्धिसे ( अनेकमें एकत्र बुद्धि—यह एक है, यह एक है, इत्यादिरूपसे ) द्वित्व आदि संख्या उत्पन्न होती है, वैसे ही उन उन पुरुषोंके अज्ञानसे आकाश आदि समस्त पदार्थोंकी उत्पत्ति हुई है, अतः अज्ञानके भेदसे प्रत्येक पुरुषके प्रति प्रपञ्च भिन्न-भिन्न है । शुक्तिरजतस्थलमें जैसे एकत्वका भ्रम होता है, जिस रजतको तुमने देखा था वही मैने देखा, वैसे ही जिस प्रपञ्चको तुम देखते हो, उसी प्रपञ्चको 'मैं देख रहा हूँ', इस प्रकार ऐक्यका भ्रम ही है, वस्तुतः प्रपञ्च एक नहीं है, ऐसा भी उन्हीं लोगोंका मत है ।
✻ यहाँ एक शङ्का होती है कि जिस स्थलमें एक कालमें अनेक पुरुषोंको एक साथ ही भ्रम हुआ है, उस स्थलमें उन सभी पुरुषोंके अज्ञान एक रजतके प्रति कारण होंगे, अतः दृष्टान्तकी असम्पत्ति अवश्य होगी, परन्तु यह युक्त नहीं है, क्योंकि उस स्थलमें दैवयोगसे एक पुरुषमें शुक्तिका ज्ञान होनेसे 'नेदं रजतम्' ऐसे बाधक प्रत्यक्षसे सोपादान रजतका नाश होनेपर भी अन्योंमें रजतका भ्रम यथापूर्व अनुवर्तमान रहता ही है। अतः रजतका भेद अवश्य मानना होगा, इसलिए दृष्टान्तकी असिद्धि नहीं है, यह भाव है।
† 'न्यायमते' इस कथनका आशय यह है कि वेदान्तसिद्धान्तमें—द्वित्व आदि अपेक्षा-
| १३२ | सिद्धान्तलेशसंग्रह | [ प्रथम परिच्छेद |
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प्रातिभासिकरूप्यादेः प्रकृतिर्जीवसंश्रया ।
अविद्येशाश्रया माया विश्वस्येत्यपरे जगुः ॥ ५२ ॥
प्रातिभासिक रूप्य आदिकी प्रकृति ( उपादान ) जीववृत्ति अविद्या है और ईशमें रहनेवाली माया समस्त विश्वकी प्रकृति है, ऐसा कोई-कोई कहते हैं ॥५२॥
जीवाश्रिताविद्यानिवहाद्भिन्ना मायैव ईश्वराश्रिता प्रपञ्चकारणम् । जीवानामविद्यास्तु आवरणमात्रे प्रातिभासिकशुक्तिरजतादिविक्षेपेऽपि च उपयुज्यन्ते इत्यपरे ॥ ७ ॥
ईशस्य कर्तृता कीदृक् ? तत्र केचित् प्रचक्षते ।
कार्यानुकूलविज्ञानचिकीर्षाकृतिकेति ताम् ॥ ५३ ॥
ईश्वरमें कैसा कर्तृत्व है ? इस प्रश्नके उत्तरमें कोई लोग कहते हैं कि कार्यानुकूल ज्ञानचिकीर्षा-कृतिमत्त्व ही कर्तृत्व है ॥५३॥
अवसितमुपादानत्वम्, तत्प्रसक्तानुप्रसक्तं च ।
कुछ लोगोंका यह मत है कि जीवोंमें रहनेवाले अज्ञानके समुदायसे ईश्वरमें रहनेवाली माया पृथक् है और यही समस्त वियद् आदि संसारके प्रति उपादान है । और जीवोंकी अविद्या आवरणमात्रमें और उपादानरूपसे प्रातिभासिक शुक्ति आदि विक्षेपमें उपयुक्त होती है * ॥७॥
[ अभिन्ननिमित्तोपादानत्वरूप ब्रह्मलक्षणमें प्रविष्ट ] उपादानत्वका लक्षण समाप्त हुआ और उसके प्रसङ्गसे प्राप्त जीवेश्वरस्वरूपनिरूपण तथा जीवेश्वर-स्वरूपनिरूपणके अनन्तर प्राप्त जीवैकत्व, नानात्व आदिका भी निरूपण समाप्त हुआ । [ अब कर्तृत्वका निरूपण करते हैं ]—
बुद्धिजन्य नहीं हैं, किन्तु अनेकद्रव्यजन्य ही हैं, क्योंकि अनेक द्वित्व आदिकी और उनकी उत्पत्ति आदिकी कल्पनामें गौरव है इसलिए अपेक्षाबुद्धि द्वित्व आदिकी व्यञ्जक है, यह माना गया है ।
* यद्यपि जीवाश्रित अविद्या स्वाप्न प्रपञ्चके प्रति उपादान है, अतः इसका स्वप्नप्रपञ्चमें भले ही उपयोग हो, परन्तु शुक्तिरजतके प्रति उसका उपयोग नहीं हो सकता, कारण कि रजटका अधिष्ठान जो शुक्त्यवच्छिन्न चैतन्य है, उसमें जीवाविद्या नहीं रहती है, तथापि अनुपपत्ति नहीं है, क्योंकि 'रजतादिमें' आदि पदसे स्वप्नप्रपञ्च ही गृहीत है, अथवा वाचस्पतिमिश्रके समान शुक्तिरजतादिको जीवाविद्याविषयीकृतशुक्त्याद्यवच्छिन्नचैतन्यका ही विवर्त मानकर जीवाविद्याओंका प्रातिभासिक रजत आदिके प्रति उपयोग बतलाया गया है, अतः अनुपपत्ति नहीं है ।
ब्रह्मके कर्तृत्वस्वरूपका विचार ] भाषानुवादसहित १३३
अथ कीदृशं कर्तृत्वम् । ?
केचिदाहुः—'तदैक्षत सोऽकामयत तदात्मानं स्वयमकुरुत' इति श्रवणान्न्यायमत इव कार्यानुकूलज्ञानचिकीर्षाकृतिमत्त्वरूपमिति ।
कार्यानुकूलविज्ञानमात्रं सा नेतरे तयोः ।
कार्यत्वेनानवस्थानादिति चान्ये प्रचक्षते ॥ ५४ ॥
कोई-कोई कहते हैं कि कार्यानुकूलज्ञानवत्त्व ही कर्तृत्व है, क्योंकि चिकीर्षा (करनेकी इच्छा) और कृतिके कार्य होनेसे तदनुकूल अन्य चिकीर्षा और कृतिके माननेमें अनवस्था प्रसक्त होगी ॥५४॥
अन्ये तु चिकीर्षाकृतिकर्तृत्वनिर्वाहाय चिकीर्षाकृत्यन्तरापेक्षायामनवस्थाप्रसङ्गात् कार्यानुकूलज्ञानवत्त्वमेव ब्रह्मणः कर्तृत्वम् । न च ज्ञानेऽप्येष
ब्रह्ममें कर्तृत्व कैसा है ? [ ब्रह्ममें कोई धर्म नहीं है, अतः यदि कर्तृत्व है, तो उसका स्वरूप क्या है, यह आक्षेपकर्ताका भाव है ]
इस आक्षेपके समाधानमें कोई लोग कहते हैं कि जैसे न्यायमतमें कार्यानुकूलज्ञानचिकीर्षाकृतिमत्त्वरूप * कर्तृत्वका लक्षण किया है, वैसे ही प्रकृतमें कर्तृत्वका यही लक्षण है, क्योंकि 'तदैक्षत०' (उसने (ब्रह्मने) देखा, उसने चाहा, और उसने स्वतः ही अपनेको जगद्रूप किया) इत्यादि श्रुति है [ यद्यपि ब्रह्ममें स्वतः कर्तृत्व नहीं है, तथापि औपाधिक कर्तृत्व है, यह भाव है ] ।
कुछ लोग कहते हैं कि चिकीर्षाके प्रति और कृतिके प्रति कर्तृताका निर्वाह करनेके लिए यदि अन्य चिकीर्षा और अन्य कृतिका स्वीकार किया जायगा, तो अनवस्था होगी, इससे कार्यानुकूलज्ञानवत्त्व ही कर्तृत्वका लक्षण है।
* कार्यानुकूलज्ञानचिकीर्षाकृतिमत्त्वम्—कर्तृत्वम् । इसका विवेचन कुछ पङ्क्तियोंके अनन्तर अनुवादमें स्पष्टरूपसे किया गया है, लक्षणमें इच्छा, कृति आदिका यद्यपि समावेश नहीं होता, इच्छानुकूल इच्छा कृतिके अनुकूल कृति ऐसा मानकर उनमें (इच्छा आदिके कर्तृत्वमें) लक्षण-समन्वय किया जायगा, तो परिशेषसे अनवस्था ही प्रसक्त होगी, तथापि इस लक्षणकर्ताओंका अभिप्राय है कि इच्छा आदिसे भिन्न जो कार्य हैं, उनके प्रति कर्तृत्वका यह लक्षण है इच्छा आदिके प्रति नहीं, इच्छा आदिके प्रति अन्यविध कर्तृत्व होगा । इससे इसमें कर्तृत्वलक्षणका अननुगम दोष होता है, यही अस्वरस है, अतः 'कार्यानुकूलज्ञानवत्त्वं कर्तृत्वम्' अर्थात् कार्यका अनुकूल ज्ञान जिसमें रहे, वह कर्ता है, ऐसा 'अन्ये तु' इत्यादिसे अन्य पक्ष कहा जाता है ।