भारतकोश
सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

Siddhanta Lesha Sangraha Hindi

श्रीमदप्पय्य दीक्षित द्वारा

स्रोत: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (उद्गम)

DevanagariHindipublished590 पृष्ठ

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१२८ | सिद्धान्तलेशसंग्रह | [ प्रथम परिच्छेद


एवमज्ञानस्य चैतन्ये वृत्तौ मनो नियामकमिति तदुपाधिना तत्प्रदेशेषु संसृज्य वर्तमानमज्ञानं क्वचिद् ब्रह्मदर्शनोत्पत्त्या 'भिद्यते हृदयग्रन्थिः' इत्युक्तरीत्या मनसो निवृत्तौ न संसृज्यते । अन्यत्र यथापूर्वमवतिष्ठते । अज्ञानसंसर्गासंसर्गावेव च बन्धमोक्षावित्याहुः ।

जातिर्व्यक्तिमिव ध्वस्तां स्वात्मज्ञं यज्जहाति सा।
जीवं जीवाश्रिताऽविद्या मुक्तिः सेत्यपि चाऽपरैः ॥४८॥

जैसे व्यक्तिमें रहनेवाला जातिरूप धर्म विनष्ट व्यक्तिका परित्याग करता है, वैसे ही जीवाश्रित अविद्या आत्मज्ञानी जीवका जो परित्याग करती है, वही मुक्ति है, यह भी किन्हीं लोगोंका मत है ॥४८॥

अपरे तु नाऽज्ञानं शुद्धचैतन्याश्रयम्, किं तु जीवाश्रयं ब्रह्मविषयम् ।

स्थलमें ) सम्बद्ध नहीं होता, ऐसा किसी नैयायिकका मत है, वैसे ही चैतन्यमें अज्ञानकी वृत्तिका मन नियामक है, इसलिये मनरूप उपाधिसे युक्त प्रदेशमें सम्बन्ध करके रहा हुआ अज्ञान—किसी चैतन्यदेशमें ब्रह्मापरोक्षकी उत्पत्तिसे 'भिद्यते हृदयग्रन्थिः०' (अन्तःकरणरूप ग्रन्थि ब्रह्मदर्शनसे निवृत्त होती है) इस श्रुतिके आधारपर मनकी निवृत्ति होनेसे सम्बद्ध नहीं होता है और अन्यत्र अर्थात् जिस प्रदेशमें ब्रह्मज्ञानसे अज्ञानकी निवृत्ति नहीं हुई है, उस स्थलमें यथापूर्व रहता ही है, [ क्योंकि इस मतमें ] अज्ञानका सम्बन्ध बन्ध है और अज्ञानका असम्बन्ध मोक्ष है [ पूर्व मतमें अज्ञानकी सत्ता बन्धन और उसका नाश मोक्ष है और इस मतमें अज्ञानका सम्बन्ध बन्ध और असम्बन्ध मोक्ष है यह पूर्व मत और इस मतमें भेद है ] ।

अज्ञान शुद्ध चैतन्यमें नहीं रहता है * किन्तु जीवमें ही रहता है और


* वेदान्तशास्त्रसे प्रतिपाद्य जो शुद्ध चैतन्य है, वह अज्ञानका आश्रय नहीं है, क्योंकि 'वेदान्तवेद्यवस्तुको मैं नहीं जानता हूँ' इस अनुभवसे शुद्ध चैतन्यका अज्ञानविषयत्वरूपसे ही अनुभव होता है। और 'मैं परमात्माको नहीं जानता हूँ'। इस अनुभवसे अज्ञानकी जीवाश्रयत्वरूपसे प्रतीति होती है, अतः जीव ही अज्ञानका आश्रय है। अज्ञान अपने कार्यभूत अन्तःकरणसे युक्त चैतन्यरूप जीवमें कैसे रहेगा, यह शङ्का नहीं करनी चाहिए, कारण कि अन्तःकरणमें प्रतिबिम्बभूत जो चैतन्य है उसीमें जीवत्वका स्वीकार होनेसे अन्तःकरणावच्छिन्न चैतन्यको जीव मानते ही नहीं हैं। अन्तःकरण सादि है, इसलिए उसमें प्रतिबिम्बभूत चैतन्यके भी सादि होनेसे वह अनादि अविद्याका आश्रय न होगा, इस प्रकारकी यदि शङ्का हो, तो वह भी युक्त नहीं है, क्योंकि अन्तःकरणके—सुषुप्ति और जाग्रदवस्थाके अनुभवसे