भारतकोश
सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

Siddhanta Lesha Sangraha Hindi

श्रीमदप्पय्य दीक्षित द्वारा

स्रोत: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (उद्गम)

DevanagariHindipublished590 पृष्ठ

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पृष्ठ 157

जीवेश्वरस्वरूपविचार ] भाषानुवादसहित १२७


आत्मन्यविद्यासंसर्गो हृदयग्रन्थिसंश्रयः ।
तद्भेदात्तदसंसर्गः क्रमान्मुक्तिक्रमः परैः ॥ ४७ ॥

आत्मामें जो अविद्याका सम्बन्ध है, वह हृदयग्रन्थिप्रयुक्त—अन्तःकरणप्रयुक्त है, अतः अन्तःकरणके विनाशसे आत्मा और अविद्याका जो क्रमसे असम्बन्ध है वही मुक्तिक्रम है ऐसा भी कुछ लोग कहते हैं ॥४७॥

अन्ये तु यथा न्यायैकदेशिमते भूतले घटात्यन्ताभावस्य वृत्तौ घटसंयोगाभावो नियामक इति अनेकेषु प्रदेशेषु तद्वत्सु संसृज्य वर्तमानो घटात्यन्ताभावः क्वचित्प्रदेशे घटसंयोगोत्पत्त्या तदभावनिवृत्तौ न संसृज्यते ।

* कुछ लोग यह कहते हैं कि जैसे भूतलमें घटात्यन्ताभावकी वृत्तिमें घटके संयोगका अभाव नियामक ( प्रयोजक ) है, इसलिए अनेक घटसंयोगाभाववाले प्रदेशोंमें सम्बन्ध करके स्थित घटका अत्यन्ताभाव—किसी प्रदेशमें घटके संयोगकी उत्पत्तिसे घटसंयोगाभावकी निवृत्ति होनेसे ( उस


अन्य जीवकी उपलब्धि नहीं होती है, वैसे ही ईश्वरकी भी अनुपलब्धि हो सकती है। अतः उसको ( ईश्वरको ) आवृत मानना अनुचित है।

अज्ञान एक ही है उसमें प्रमाण है—अज्ञानवाचक शब्दोंका श्रुतिस्मृतियोंमें एकवचनान्त प्रयोग, जैसे 'अजामेकाम्' 'मायान्तु प्रकृतिं विद्यात्' 'विभेदजनकेऽज्ञाने' इत्यादिमें 'अजाम्' 'मायांम्' 'प्रकृतिम्' और 'अज्ञाने' ये सब एकवचनान्त ही कहे गये हैं, और इसी एक अज्ञानके नाशसे मोक्ष होता है, ऐसा श्रुति प्रतिपादन करती है—'भूयश्चान्ते विश्वमायानिवृत्तिः'। इस मतमें एकके तत्त्वज्ञानसे समग्र अज्ञानका नाश नहीं माना जाता है, किन्तु जिस पुरुषको तत्त्वज्ञान होगा उसी पुरुषका अज्ञानांश नष्ट होगा, इसलिए बद्ध और मुक्तकी अत्यन्त उचित रीतिसे व्यवस्था हो सकेगी, यह भाव है।

* इस मतमें ज्ञानसे अज्ञानकी निवृत्ति होती है, ऐसा प्रतिपादन करनेवाले शास्त्रोंका अज्ञानके सम्बन्धकी निवृत्तिमें ही तात्पर्य मानना होगा ज्ञानकी निवृत्तिमें नहीं। यदि अज्ञानके नाशमें ही तात्पर्य माना जाय, तो जैसे तृणसमुदायके विरोधी अग्निके उदयसे समग्र तूलराशिका नाश होता है, वैसे ही अज्ञानविरोधी ज्ञानके उदयसे समग्र अर्थात् निःशेष अज्ञानके नाशका प्रसङ्ग आवेगा। ऐसी स्थितिमें जीवन्मुक्तिशास्त्र और बद्धमुक्तिशास्त्रके साथ अवश्य विरोध होगा। इसमें घटात्यन्ताभावका जो दृष्टान्त दिया गया है, उसका तात्पर्य यह है कि 'भूतलमें घट नहीं है' इस अनुभवसे सिद्ध जो अभाव है, वह त्रैकालिक है अर्थात् अत्यन्ताभाव है, इसलिए घटके आनेपर भी 'घट नहीं है' ऐसी प्रतीति होनी चाहिए, परन्तु होती नहीं है, कारण कि घटाधिकरणमें घटात्यन्ताभावप्रतीतिका नियामक सम्बन्ध नहीं है, घटात्यन्ताभावकी प्रतीतिका नियामक है—घटसंयोगाभाव, घटाधिकरणमें घटसंयोगाभावके न रहनेसे उक्त आपत्ति नहीं है।

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