भारतकोश
सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

Siddhanta Lesha Sangraha Hindi

श्रीमदप्पय्य दीक्षित द्वारा

स्रोत: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (उद्गम)

DevanagariHindipublished590 पृष्ठ

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पृष्ठ 159

जीवैकत्वानेकत्वविचार ] भाषानुवादसहित १२९


अतश्चान्तःकरणप्रतिबिम्बरूपेषु सर्वेषु जीवेषु व्यक्तिषु जातिवत् प्रत्येकपर्यवसायितया वर्तमानमुत्पन्नविद्यं कञ्चित्त्यजति नष्टां व्यक्तिमिव जातिः । स एव मोक्षः । अन्यं यथापूर्वमाश्रयतीति व्यवस्थेत्याहुः ।


वह ब्रह्मविषयक है । इससे प्रत्येकव्यक्तिको व्याप्त करके रहनेवाली जातिके † समान अन्तःकरणमें प्रतिबिम्बरूप सब जीवोंमें रहनेवाला अज्ञान—जैसे जातिरूप धर्म नष्ट व्यक्तिका त्याग करता है, वैसे ही जिस जीवमें ‡ विद्या उत्पन्न हुई है, उसका—त्याग करता है और यही त्याग मोक्ष कहलाता है । अन्य पुरुषका, जिसमें विद्याका आविर्भाव नहीं हुआ है, आश्रय करता है, इस प्रकारसे भी कुछ लोग बन्ध और मोक्षकी व्यवस्था करते हैं ।


—लय और जन्म हैं अतः उसके सादि होनेपर भी स्थूलके सूक्ष्मरूपसे वह अनादि है, ऐसा ‘पुंस्त्वादिवत्त्वस्य सतोऽभिव्यक्तियोगात्’ (ब्र० सू० अ० २ पा० ३ सू० ३१) इस सूत्रमें प्रतिपादन किया गया है । इस सूत्रका यह अर्थ है—जैसे बाल्य अवस्थामें अनभिव्यक्त पुंस्त्व और स्त्रीत्व आदिका यौवनमें प्रादुर्भाव होता है, वैसे ही स्वाप आदिमें अनभिव्यक्त अन्तःकरणकी, जो कि सत् है, स्थूलावस्थारूप अभिव्यक्ति होती है । अनादि चैतन्यप्रतिबिम्बमें अविद्या रहती है, इसका विचार—माया और अविद्याके भेदनिरूपणके प्रसङ्गमें—किया गया है ।

† द्वित्व या बहुत्वके समान अज्ञान व्यासज्यवृत्ति (एकाधिकव्यक्तिमात्रवृत्ति) माना जाय, तो सभी को प्रत्येकरूपसे 'मैं अज्ञ हूँ' ऐसा जो प्रत्यक्ष होता है, वह नहीं होगा, क्योंकि व्यासज्यवृत्ति धर्मके प्रत्यक्षमें यावत् आश्रयीभूत व्यक्तियोंका प्रत्यक्ष कारण होता है, अतः एक-एक जीवको सब जीवोंका प्रत्यक्ष न होनेसे एक व्यक्तिको व्यासज्यवृत्ति अज्ञानका प्रत्यक्ष नहीं होगा, इसलिए अज्ञानको गोत्व आदि जातिरूप धर्मके समान प्रत्येक जीवव्यक्तिमें पर्यवसायी मानना चाहिए । वस्तुतस्तु यदि अज्ञान व्यासज्यवृत्ति माना जाय, तो भी दोष नहीं है, कारण कि अज्ञानप्रत्यक्ष नित्य और साक्षिरूप होनेसे उसके अपरोक्षावभासमें यावदाश्रयका प्रत्यक्ष कारण नहीं है, क्योंकि जन्य-प्रत्यक्षमें ही यावदाश्रयप्रत्यक्ष कारण होता है, यह भाव है ।

‡ उत्पन्न विद्यासे मनकी निवृत्ति होगी और उसके निवृत्त होनेपर तन्निबन्धन चैतन्यप्रतिबिम्बका निरास होगा और इसीसे तद्विशिष्ट चेतन भी निवृत्त हो जायगा, इस क्रमसे मोक्ष होगा । इसीलिए 'जहात्येनां भुक्तभोगामजोऽन्यः' (विद्यावान् जीव जिसके विषय भुक्त हुए हैं, ऐसी अविद्याका त्याग करता है) यह भाव है ।

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