सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)
Siddhanta Lesha Sangraha Hindi
श्रीमदप्पय्य दीक्षित द्वारा
स्रोत: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (उद्गम)
पृष्ठ 153, कुल 590 में से
संदर्भ में पढ़ेंजीवईश्वरस्वरूपविचार ] भाषानुवादसहित १२३
भूताश्चित्रपटलेखितमनुष्यदेहार्पितपटाभासकल्पाः जीवाभासाः संसारादि- भाज इति सविशेषानेकशरीरैकजीववादमातिष्ठन्ते ।
योगीव कायव्यूहेषु जीवोऽन्य इति चापरे ॥ ४४ ॥
जैसे शरीरोंके समूहमें एक ही योगी अपना अधिकार रखता है, वैसे ही हिरण्य- गर्भसे अन्य एक मुख्य जीव है [ और वही सब शरीरों में अधिकार रखता है ] ॥४४॥
अपरे तु हिरण्यगर्भस्य प्रतिकल्पं भेदेन कस्य हिरण्यगर्भस्य मुख्यं . जीवत्वमित्यत्र नियामकं नास्तीति मन्यमाना एक एव जीवोऽविशेषेण सर्वं शरीरमधितिष्ठति ।
चित्रके पटमें लिखित मनुष्यके देहमें अर्पित पटाभासके समान संसार आदि भोगनेवाले जीवाभास हैं, इस प्रकार सजीव हैं अनेक शरीर जिस एक जीववादमें, ऐसे जीवैक्यवादका अङ्गीकार करते हैं ।
प्रत्येक कल्पमें हिरण्यगर्भका भेद होनेसे किस हिरण्यगर्भको मुख्य जीव मानना, इसमें नियामक—प्रमाण—नहीं है अर्थात् अमुक कल्पका हिरण्यगर्भ ही मुख्य जीव है, अमुक कल्पका नहीं, ऐसा माननेमें कोई विनिगमक ( एकतर पक्षपातिनी युक्ति ) नहीं है, विनिगमकके विना यदि हिरण्यगर्भको मुख्य जीव माना जाय, तो अविशेषात् सभी कल्पके हिरण्यगर्भ मुख्य जीव होंगे । तस्मात् पूर्वोक्त पक्षसे भी एकजीववाद सिद्ध नहीं होगा, यह भाव है । इसलिए एक ही जीव मुख्य और अमुख्य विभागके विना सब शरीरोंमें अपने भोगके लिए अधिष्ठित है, ऐसा मानते हुए अविशेषानेकशरीरैकजीववादका* ही कुछ लोग स्वीकार करते हैं । [ भाव यह है कि अविद्यामें चैतन्यप्रतिबिम्ब जीव एक है, क्योंकि अविद्या एक है, वही जीव सब शरीरोंमें स्वभोगके लिए अधिष्ठित है, अविद्यामें ब्रह्मप्रतिबिम्ब हिरण्यगर्भशरीरमें अधिष्ठित है, और हिरण्यगर्भका प्रतिबिम्ब जीवाभास इतर शरीरोंमें अधिष्ठित है, यह युक्त नहीं है, क्योंकि इतर जीवोंके हिरण्यगर्भ-प्रतिबिम्ब होनेमें कोई प्रमाण नहीं है, यही 'एक एव' इसमें उक्त एवकारका अर्थ है ] ।
* अविशेषेण अधिष्ठितानि अनेकशरीराणि यस्मिन् एकजीववादे सः अविशेषानेक- शरीरैकजीववादस्तम्, अर्थात् जीवके मुख्य और अमुख्य विभागके विना अधिष्ठित हैं अनेक शरीर जिसमें ऐसा अनेकजीववाद, यह भाव है ।