सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)
Siddhanta Lesha Sangraha Hindi
श्रीमदप्पय्य दीक्षित द्वारा
स्रोत: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (उद्गम)
पृष्ठ 154, कुल 590 में से
संदर्भ में पढ़ें| १२४ | सिद्धान्तलेशसंग्रह | [ प्रथम परिच्छेद |
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न चैवं शरीरावयवभेद इव शरीरभेदेऽपि परस्परसुखाद्यनुसन्धानप्रसङ्गः । जन्मान्तरीयसुखाद्यनुसन्धानादर्शनेन शरीरभेदस्य तदननुसन्धानप्रयोजकत्वक्लृप्तेः ।
योगिनस्तु कायव्यूहसुखाद्यनुसन्धानं व्यवहितार्थग्रहणवद्योगप्रभाव-निबन्धनमिति न तदुदाहरणमिति अविशेषानेकशरीरैकजीववादं रोचयन्ते ।
यदि सब शरीरोंमें एक ही जीव है तो शरीरके अवयवभेदके समान शरीरका भेद होनेपर भी परस्परके सुखादिका अनुसन्धान होना चाहिए अर्थात् जैसे हाथ, पैर, मस्तक आदि अनेक अवयवोंमें अधिकार रखनेवाले एक ही देवदत्तमें यह अनुभव देखा जाता है कि 'मेरे मस्तकमें वेदना है और पैरोंमें सुख है', वैसे ही यदि एक जीव सभी शरीरोंमें अधिष्ठित है, तो उसे यह अनुभव होना चाहिए कि देवदत्तके शरीरमें मुझे सुख है और यज्ञदत्तके शरीरमें दुःख है, परन्तु यह अनुभव नहीं होता, इसलिए एकजीववाद असङ्गत है । इस प्रकार यदि शङ्का हो, तो वह युक्त नहीं है, क्योंकि [ यद्यपि पूर्वजन्मके शरीरमें अधिकार रखनेवाला जीव और इस जन्मके शरीरमें अधिकार रखनेवाला जीव एक ही है, तो भी जन्मान्तरीय सुख आदिका अनुसन्धान इस शरीरमें नहीं देखा जाता, इससे सुख आदिके अनुसन्धानके अभावमें शरीरभेदको हेतु मानना चाहिए, अतः उक्त दोष नहीं है ।
अनेक शरीरोंमें योगीको जो सुख आदिका अनुसन्धान होता है, वह तो व्यवहित अर्थके ज्ञानके समान योगप्रभावसे होता है, अतः उसे उदाहरणरूपसे नहीं दे सकते हैं; [ तात्पर्य यह है कि योगी अपने विलक्षण प्रभावसे अनेक शरीरोंको धारण करता है और उन सब शरीरोंमें से किसीमें सुख और किसीमें दुःखका अनुभव करता है, शरीर-भेदको यदि अननुभवके प्रति हेतु माना जायगा, तो उसे भिन्न-भिन्न शरीरमें सुख दुःखका अनुभव नहीं होना चाहिए, अतः उक्त नियममें ( सुखादिके अननुसन्धानमें शरीरभेद कारण है, इसमें) व्यभिचार होगा, नहीं व्यभिचार नहीं होगा, क्योंकि योगी जैसे सुदूर भूतकालीन पदार्थका और सुदूर भविष्यत्कालीन अर्थका, ( जिन्हें हम अपने चर्मचक्षुओंसे सर्वथा नहीं देख सकते हैं) योगप्रभावसे ज्ञान कर लेते हैं, वैसे ही योगप्रभावसे अनेक शरीरोंमें सुख और दुःखका अनुभव कर लेते हैं, अतः