सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)
Siddhanta Lesha Sangraha Hindi
श्रीमदप्पय्य दीक्षित द्वारा
स्रोत: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (उद्गम)
| १३४ | सिद्धान्तलेशसंग्रह | [ प्रथम परिच्छेद |
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प्रसङ्गः । तस्य ब्रह्मस्वरूपत्वेनाऽकार्यत्वात् । एवं च विवरणे जीवस्य सुखादिकर्तृत्वोक्तिः, वीक्षणमात्रसाध्यत्वात् वियदादि वीक्षितम्, हिरण्य-
ज्ञानमें यह प्रसङ्ग नहीं है, क्योंकि ज्ञानके ब्रह्मस्वरूप होनेसे वह किसीका भी कार्य नहीं है । [ तात्पर्यार्थ यह है कि सच्चिदानन्द परमात्मा समस्त जगत्का कर्ता है और पूर्वमतमें कर्ता वह कहा गया है—जिसमें कार्यका ठीक-ठीक परिज्ञान, उसकी चिकीर्षा (कार्यको बनानेकी प्रबल इच्छा) और कार्य-विषयिणी (कार्यानुकूल) कृति हो । जो कर्ता होता है, उसमें कार्यविषयक ज्ञान, कार्यविषयक चिकीर्षा और तदनुकूल कृति रहती है, जैसे—घटका कर्ता है—कुम्भकार, उसमें घटका ज्ञान, घटकी चिकीर्षा और घटानुकूल कृति, ये तीनों विद्यमान हैं । तुल्य युक्तिसे ईश्वरमें भी उपाधिवश कार्यानुकूल ज्ञान, चिकीर्षा और कृति माननी ही पड़ेगी, अन्यथा ईश्वरके कर्तृत्वका निर्वाह नहीं होगा । ऐसी परिस्थितिमें कर्ताके लक्षणमें प्रविष्ट जो चिकीर्षा और कृति है, उनको कार्य माना जाय या नहीं ? यदि उनको कार्य न माना जाय, तो ईश्वरसे अन्य चिकीर्षा और कृतिके भी नित्य होनेसे अद्वितीयत्वश्रुतिके साथ विरोध होगा, इसलिए चिकीर्षा और कृतिको कार्य अवश्य मानना होगा, यदि वे कार्य हैं, तो चिकीर्षाके अनुकूल द्वितीय चिकीर्षा और कृतिके अनुकूल अन्य कृति माननी होगी, इस प्रकार द्वितीय चिकीर्षा और कृतिके कार्य होनेसे तदनुकूल तृतीय चिकीर्षा और कृति माननी होगी, अतः इस क्रमसे विचारधारा करनेपर अनवस्था ही होगी, ज्ञानके ब्रह्मस्वरूप होनेसे वह नित्य है, अतः तत्प्रयुक्त अनवस्था नहीं हो सकती है, इसलिए चिकीर्षा और कृतिसे रहित—'कार्यानुकूल' अर्थात् कार्यके लिए उपयुक्त जो ज्ञान तद्वान् जो हो वह कर्ता है—इस प्रकार प्रथम लक्षणमें अरुचि बतलाकर कर्ताका लक्षण कहा गया, यह भाव है ] । इच्छा और कृतिका कर्ताके लक्षणमें प्रवेश नहीं है, अतः विवरणमें सुख आदिका जीव कर्ता है, ऐसा कहा गया है* । और वीक्षणमात्रसे साध्य होनेसे वियद् आदि वीक्षित कहे गये हैं, हिरण्यगर्भ द्वारा भौतिक
* यह तात्पर्य है—जीवमें सुख आदिकी उत्पत्तिके अनुकूल ज्ञान है, परन्तु सुख आदिकी उत्पत्तिके अनुकूल इच्छा या कृति नहीं है, क्योंकि, ऐसा अनुभूत नहीं है, और किसी तन्त्रकारने स्वीकार भी नहीं किया है। इसीलिए कार्यानुकूल ज्ञानवत्त्वरूपकर्तृत्वका अङ्गीकार करके ही विवरणकारका उक्त वचन सङ्गत होता है, अन्यथा सङ्गत नहीं होगा।
ब्रह्मके कर्तृत्वस्वरूपका विचार] भाषानुवादसहित १३५
गर्भद्वारा वीक्षणाधिकयत्नसाध्यत्वात् भौतिकं स्मितमिति कल्पतरूक्तिश्च सङ्गच्छत इति वदन्ति ।
एवं जीवोऽपि कर्ता स्याज्जगतः स्वप्नजस्य च ।
ततः सृष्ट्यनुकूलार्थाऽऽलोचनेनैवेति चापरे ॥ ५५ ॥
यदि कार्यानुकूल ज्ञानवत्त्व कर्तृत्व माना जायगा, तो जीव भी जगत् और स्वप्नका कर्ता होगा, इसलिए सृष्टिके अनुकूल आलोचनात्मक ज्ञानवत्त्व ही कर्तृत्व है, ऐसा कोई लोग कहते हैं ॥५५॥
अपरे तु कार्यानुकूलस्रष्टव्यालोचनरूपज्ञानवत्त्वं कर्तृत्वम्, न कार्यानुकूलज्ञानवत्त्वमात्रम् । शुक्तिरजतस्वाप्नभ्रमादिषु अध्यासानुकूलाधिष्ठानज्ञानवत्त्वेन
पदार्थ वीक्षणसे अधिक यत्नसाध्य हैं, अतः भौतिक पदार्थ स्मित हैं † इस प्रकार कल्पतरुकी उक्ति भी सङ्गत होती है ।
कुछ लोग कहते हैं कि 'मया इदं स्रष्टव्यम्' इत्याकारक कार्यानुकूल जो आलोचनात्मक ज्ञान है, वह जिसमें हो, वह कर्ता है, केवल कार्यानुकूल ज्ञानवान्
† भामतीग्रन्थके आरम्भमें मङ्गलाचरण है—
निःश्वसितमस्य वेदा वीक्षितमेतस्य पञ्च भूतानि।
स्मितमेतस्य चराचरमस्य च सुप्तं महाप्रलयः ॥
इसका यह अर्थ है—जैसे पुरुषके निःश्वासमें कोई प्रयत्नविशेषकी आवश्यकता नहीं होती, वैसे ही जिस ब्रह्मके—ये समग्र ज्ञानके आगार चारों वेद प्रयत्नके बिना ही—कार्य हैं, जिसकी दृष्टिमात्रसे ही ये महाभूत हुए हैं, जिसका हिरण्यगर्भके साथ चराचर विश्व एक मन्दहास्य है और महाप्रलय जिसकी मानो सुषुप्ति है, उस ब्रह्मका नमन करता हूँ । इस श्लोकमें महाभूत ब्रह्मवीक्षित हैं और भौतिक चराचर प्रपञ्च ब्रह्मस्मित हैं, ऐसा कहा गया है, इसी तात्पर्यको कहनेके लिए कल्पतरूकारने यह कहा है कि ‘वीक्षणमात्रेण सृष्टत्वात् भूतानि वीक्षितम्, हिरण्यगर्भद्वारा साध्यं चराचरं वीक्षणाधिकप्रयत्नसाध्यस्मितसाम्यात् स्मितम्’ (केवल वीक्षणसे ही भूतोंकी उत्पत्ति है, अतः भूत वीक्षित कहे गये हैं हिरण्यगर्भ द्वारा चराचरकी उत्पत्ति हुई है, अतः वीक्षणसे अधिक प्रयत्नसाध्यस्मितकी समानता होनेसे चराचर ब्रह्मका स्मित है अर्थात् लोकमें मन्दहासरूप जो स्मित है, उसमें वीक्षणसे—ज्ञानसे अधिक कुछ ओष्ठसंचालनके अनुकूल यत्न करना पड़ता है, वैसे ही चराचरकी उत्पत्तिमें ब्रह्मको वीक्षणके सिवा हिरण्यगर्भकी उत्पत्तिरूप व्यापार करना पड़ता है, अतः वीक्षणाधिक यत्नकी अपेक्षा होनेसे चराचर स्मित हैं, यह भाव है) इस कल्पतरुव्याख्याके आधारपर कार्यानुकूल ज्ञानवत्त्वरूप कर्तृत्वका ही लाभ होता है, क्योंकि ‘वीक्षणमात्रेण सृष्टत्वात्’ इसमें मात्रशब्दसे स्पष्ट ही चिकीर्षा और कृतिका निरास होता है, यह भाव है ।
| १३६ | सिद्धान्तलेशसंग्रह | [ प्रथम परिच्छेद |
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जीवस्य कर्तृत्वप्रसङ्गात् । न चेष्टापत्तिः, 'अथ रथान् रथयोगान् पथः सृजते स हि कर्ता' इत्यादिश्रुत्यैव जीवस्य स्वप्नप्रपञ्चकर्तृत्वोक्तेरिति वाच्यम् । भाष्यकारैः 'लाङ्गलं गवादीनुद्वहतीतिवत् कर्तृत्वोपचारमात्रं रथादिप्रतिभाननिमित्तत्वेन' इति व्याख्यातत्वादित्याहुः ॥
कर्ता नहीं है, क्योंकि ऐसा माननेपर जीवमें भी शुक्ति-रजत और स्वप्नविभ्रमके प्रति कर्तृत्वका प्रसङ्ग होगा, क्योंकि उसमें अध्यस्यमान (जिनका अध्यास होता है, ऐसे) रजत आदिके अनुकूल जो अधिष्ठानका ज्ञान है, वह है । परन्तु यह दोष नहीं है, प्रत्युत इष्टापत्ति ही है, क्योंकि 'अथ रथान्०' (स्वप्न-कालमें जीव रथ, घोड़े और मार्गको उत्पन्न करता है, क्योंकि वह जीव स्वाप्न पदार्थके हेतुभूत कर्मका कर्ता है) इस श्रुतिसे 'जीव स्वाप्न प्रपञ्चका कर्ता है' ऐसा कहा गया है, नहीं इष्टापत्ति नहीं हो सकती, क्योंकि भाष्यकारने व्याख्यान किया है कि जैसे 'लाङ्गल गो आदिका उद्वहन करता है' यह प्रयोग केवल औपचारिक है, वैसे ही रथ आदिके प्रतिभानके निमित्तरूपसे जीवमें कर्तृत्वका उपचारमात्र * है।
* 'लाङ्गलं गवादीनुद्वहति' (हल गाय आदि पशुओंका उद्वहन करता है अर्थात् गौ आदि पशुओंकी जीवनस्थितिको हल करता है) इस प्रयोगमें लाङ्गलमें गाय आदिका स्थितिकर्तृत्वरूप उद्बोढ़त्व सुना जाता है, वह मुख्य नहीं हो सकता है, क्योंकि हलका भक्षण नहीं किया जा सकता है। पशुओंका उद्वहन करना कैसे हो सकता है, इसलिए—लाङ्गलसे कृषि होगी, कृषिसे गाय आदिकी स्थितिमें कारणभूत भूसा आदिका लाभ होगा—इस प्रकार परम्परासे औपचारिक कहा जाता है, वैसे ही स्वप्नरथ आदिका जो प्रतिभान—प्रतिभास होता है उसमें कारणभूत धर्म आदिके, कर्ता होनेसे 'स हि कर्ता' इत्यादि श्रुतिमें जीवोंमें स्वप्नरथ आदिके प्रति कर्तृता कही गई है, वस्तुतः नहीं। इस प्रकार भाष्यकारने जीवमें औपचारिक कर्तृत्व—स्वप्नरथ आदिके प्रति कहा है, विवरणमें सुख आदिके प्रति जीवमें जो कर्तृत्वका प्रतिपादन किया गया है, वह भी इससे औपचारिक ही साबित होता है। 'मया इदं स्रष्टव्यम्' (मुझे यह बनाना चाहिए) इस प्रकार आत्माके आलोचनात्मक ज्ञानके न रहनेपर भी सुख आदि देखे जाते हैं, अतः मुख्य कर्तृत्वकी सम्भावना नहीं है 'वीक्षणमात्रासाध्यम्' इस प्रकार जो कल्पतरुका वचन है, इससे भी सृष्ट्यालोचनरूप ज्ञान ही वीक्षणशब्दसे अभिप्रेत है, अतः उसके साथ भी कोई विरोध नहीं है, यह भाव है।
ब्रह्मकी सर्वज्ञताका स्वरूपविचार ] भाषानुवादसहित १३७
जगत्कर्तृत्वसंसिद्धं सर्वज्ञत्वं समर्थितम् ।
ईशस्य शास्त्रयोनित्वात्तच्च कीदृग्विधं भवेत् ॥ ५६ ॥
ईश्वर जगत्का कर्ता है, इससे अर्थतः और सम्पूर्ण वेदोंका कर्ता है, इससे साक्षात् ईश्वरमें सर्वज्ञत्व सिद्ध है, वह सर्वज्ञत्व कैसा है ? ॥५६॥
अनेनैव निखिलप्रपञ्चरचनाकर्तृभावेनाऽर्थसिद्धं सर्वज्ञत्वं ब्रह्मणः 'शास्त्रयोनित्वात्' ( उ. मी. अ. १ पा. १ सू. ३ ) इत्यधिकरणे वेदकर्तृत्वेनाऽपि समर्थितम् ॥८॥
अथ कथं ब्रह्मणः सर्वज्ञत्वं सङ्गच्छते । जीववदन्तःकरणाभावेन ज्ञातृत्वस्यैवाऽयोगात् ।
इसी सम्पूर्ण प्रपञ्चरचनाके कर्तृत्वसे ब्रह्ममें अर्थतः सिद्ध हुए सर्वज्ञत्वका 'शास्त्रयोनित्वात्' इस अधिकरणमें वेदकर्तृत्वसे भी समर्थन किया गया है * ॥ ८ ॥
अब शङ्का करते हैं कि ब्रह्म सर्वज्ञ कैसे हो सकता है ? क्योंकि जीवके समान ब्रह्ममें अन्तःकरणका सम्बन्ध न होनेसे ज्ञातृत्वका ही असम्भव है † ।
* 'जन्माद्यस्य यतः' ( जिस आनन्दकन्दसे समस्त प्रपञ्चकी उत्पत्ति, स्थिति और प्रलय होते हैं, वह ब्रह्म है ) इस सूत्रसे समस्त प्रपञ्चका कर्ता होकर जगत्का जो उपादान हो, वह ब्रह्म है, ऐसा लक्षण प्राप्त होता है, परन्तु सर्वज्ञत्वके बिना सम्पूर्ण जगत्की उत्पत्ति, स्थिति और प्रलयके प्रति कर्तृत्व ब्रह्ममें नहीं हो सकता है, अतः ब्रह्मका सर्वज्ञत्व अर्थतः सिद्ध है । और 'शास्त्रयोनित्वात्' ( ब्रह्म सर्वज्ञ है, क्योंकि ऋग्वेद-आदि साङ्ग समस्त वेदोंका कर्ता है ) इस अधिकरणमें वेदकर्तृत्वसे भी सर्वज्ञताका साक्षात् साधन किया गया है, पूर्वके 'जन्माद्यस्य यतः' इस सूत्रमें अर्थतः सिद्ध है और 'शास्त्रयोनित्वात्' में साक्षात् सर्वज्ञत्वका साधन है, क्योंकि पूर्वसूत्र ब्रह्मका लक्षण बोधन करता है 'और शास्त्रयोनित्वात्' सर्वज्ञत्वका साधन करता है ।
† यद्यपि 'यः सर्वज्ञः सर्ववित्' इत्यादि श्रुतियोंसे ब्रह्मके सर्वज्ञत्वका साक्षात् ही कथन है, तथापि युक्तियोंसे सर्वज्ञत्वका अधिक दृढीकरण करनेके लिए इस सर्वज्ञत्वविचारका उपक्रम है । शङ्का करनेवालेका भाव यह है कि जीवमें ज्ञातृत्वका व्यवहार जो होता है, वह अन्तःकरणरूप जीवकी उपाधिके आधारपर ही अवलम्बित है, ईश्वरके अन्तःकरण नहीं है, अतः उसमें ज्ञातृत्वका सर्वथा अभाव ही रहेगा, ईश्वरकी उपाधि अन्तःकरण नहीं हो सकता, क्योंकि 'कार्योपाधिरयं जीवः' इस उदाहृत श्रुतिसे अन्तःकरण जीवकी ही उपाधि कही गई है। ज्ञातृत्व धर्म सर्वज्ञत्वका व्यापक है, अर्थात् जहाँ जहाँ सर्वज्ञत्व होगा वहाँ वहाँ ज्ञातृत्व अवश्य रहेगा, क्योंकि ज्ञातृत्वका एकदेश ही सर्वज्ञत्व है । इसलिए व्यापक
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| १३८ | सिद्धान्तलेशसंग्रह | [ प्रथम परिच्छेद |
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तत्र सर्वार्थविषयसर्वधीवासनोपधः ।
साक्षित्वाद्भारतीतीर्थमते सार्वज्ञ्यमीरितम् ॥ ५७ ॥
सम्पूर्णवस्तुविषयक सम्पूर्णधीवासनाओंसे उपहित ईश्वर सम्पूर्ण विषयवासनाका साक्षी है, अतः ईश्वरमें सर्वज्ञत्व है, ऐसा भारतीतीर्थका मत कहा गया है ॥५७॥
अत्र सर्ववस्तुविषयसकलप्राणिधीवासनोपरक्ताज्ञानोपाधिक ईश्वरः । अतस्तस्य सर्वविषयवासनासाक्षितया सर्वज्ञत्वमिति भारतीतीर्थादिपक्षः प्रागेव दर्शितः ।
चिच्छायाग्राहिभिर्मायावृत्तिभेदैस्तदीशितुः ।
त्रैकालिकेष्वपरोक्ष्यं प्रकटार्थकृतो विदुः ॥ ५८ ॥
चित्प्रतिबिम्बका ग्रहण करनेवाली मायावृत्तियोंसे ईश्वरसे कालत्रयमें रहनेवाले प्रपञ्चका जो अपरोक्ष ज्ञान है, वह सर्वज्ञत्व है, ऐसा प्रकटार्थकार कहते हैं ॥५८॥
प्रकटार्थकारास्त्नाडुः—यथा जीवस्य स्वोपाध्यन्तःकरणपरिणामाश्चैतन्यप्रतिबिम्बग्राहिण इति तद्योगात् ज्ञातृत्वम्, एवं ब्रह्मणः स्वोपाधिमाया-
* इस आक्षेपके समाधानमें भारतीतीर्थ आदिका पक्ष पूर्वमें ही दिखलाया गया है कि सर्ववस्तुविषयक सम्पूर्णप्राणिधीवासनाओंसे उपरक्त अज्ञानसे उपहित † चैतन्य ईश्वर है, इससे अपनी उपाधिभूत वासनाओंके विषयीभूत वस्तुओंके अवभासकरूपसे ईश्वरमें सर्वज्ञत्वकी उपपत्ति हो सकती है ।
प्रकटार्थकार कहते हैं कि ‡ जैसे जीवके उपाधिरूप अन्तःकरणके परिणाम (वृत्तियाँ) चैतन्यके प्रतिबिम्बको ग्रहण करते हैं, इसलिए उनके योगसे जीव ज्ञाता होता है, वैसे ही ब्रह्मकी उपाधिभूत मायाके परिणाम चैतन्यके
ज्ञातृत्वकी निवृत्तिसे व्याप्य सर्वज्ञत्वका भी निरास हुआ, कारण कि व्यापकके अभावसे व्याप्यका अभाव सिद्ध होता है, यह सिद्धान्त है, अतः पूर्वपक्ष होता है कि ब्रह्ममें सर्वज्ञत्वकी उपपत्ति कैसे हो सकती है ।
* ‘सर्ववस्तुविषयसकलप्राणिधीवासनोपाधिकस्य तस्य सर्वज्ञत्वस्य तत एवोपपत्तेः’ इस ग्रन्थसे दिखलाया गया है [ द्रष्टव्य—पृ० ९४ ] ।
† जैसे प्रकटार्थकारके मतसे जीवमें ज्ञातृत्वकी प्रयोजक उपाधि अन्तःकरण है, वैसे ही ईश्वरमें ज्ञातृत्वकी प्रयोजक उपाधि माया है, इसलिए मायोपाधिक ब्रह्ममें सर्वज्ञत्वका व्यापक ज्ञातृत्व नहीं है, ऐसा नहीं है, परन्तु है ही और ‘मायिनन्तु महेश्वरम्’ इत्यादि श्रुतिसे माया ईश्वरकी उपाधि प्रसिद्ध है ।
ब्रह्मकी सर्वज्ञताका स्वरूपविचार] भाषानुवादसहित १३९
परिणामाश्रितप्रतिबिम्बग्राहिणस्सन्तीति तत्प्रतिबिम्बितैः स्फुरणैः कालत्रयवर्तिनोऽपि प्रपञ्चस्याऽपरोक्षेणाऽवकलनात् सर्वज्ञत्वमिति ।
तत्त्वशुद्धिकृतो भूते स्मृतिं भाविनि तूहनम् ॥
ब्रह्ममें [ वर्तमान वस्तुका अनुभव है ], भूतकालीन वस्तुका स्मरण है और भविष्यत्कालीन वस्तुका भी ( मूलोक्त प्रकारसे ) ज्ञान है, इसलिए ब्रह्म सर्वदा सर्वज्ञ है, ऐसा तत्त्वशुद्धिकार कहते हैं ।
तत्त्वशुद्धिकारास्तूक्तरीत्या ब्रह्मणो विद्यमाननिखिलप्रपञ्चसाक्षात्कारसम्भवात् तज्जनितसंस्कारवत्तया च स्मरणोपपत्तेरतीतसकलवस्त्ववभाससिद्धिः । सृष्टेः प्राङ् मायायाः सृज्यमाननिखिलपदार्थस्फुरणरूपेण जीवादृष्टानुरोधेन विवर्तमानत्वात् तत्साक्षितया तदुपाधिकस्य ब्रह्मणोऽपि तत्साधकत्वसिद्धेः अनागतवस्तुविषयविज्ञानोपपत्तिरिति सर्वज्ञत्वं समर्थयन्ते ।
सदा सर्वस्य सत्त्वात्तु साक्षिणा कौमुदीकृतः ॥ ५९ ॥
सार्वज्ञ्ये ज्ञानरूपत्वमिष्टं न ज्ञानकर्तृता ।
प्रतिबिम्बको ग्रहण करनेवाले हैं, अतः उनमें प्रतिबिम्बित स्फुरण ( चैतन्य ) तीनों कालमें रहनेवाले प्रपञ्चको अपरोक्षसे विषय करते हैं, अतः ब्रह्ममें सर्वज्ञत्व हो सकता है ।
! तत्त्वशुद्धिकार कहते हैं कि पूर्वोक्त रीतिसे सम्पूर्ण वर्तमान प्रपञ्चका साक्षात्कार सम्भव है और विद्यमान वस्तुविषयक साक्षात्कारसे उत्पन्न संस्कारके आश्रयरूपसे भूतकालीन सम्पूर्ण वस्तुके अवभासकी सिद्धि होती है । सृष्टिके पूर्वकालमें जीवोंके अदृष्टवशसे सृज्यमान सम्पूर्ण पदार्थोंकी वृत्तिरूपसे मायाका परिणाम होता है, इससे मायामें प्रतिबिम्ब होनेसे मायोपाधिक ब्रह्ममें भी मायाकी वृत्तिके प्रति कर्तृत्वकी सिद्धि होनेसे अनागतवस्तुविषयक विज्ञानकी उपपत्ति है, अतः ब्रह्मके सर्वज्ञत्वकी सिद्धि है ।
‡ इस तत्त्वशुद्धिकारके मतमें पूर्वमतसे यह विशेष है—पूर्वोक्तमतमें ईश्वरका अतीत-अनागत-विषयक ज्ञान अपरोक्ष ही है और इस मतमें जीवके समान ईश्वरका भी अतीत आदिविषयक ज्ञान परोक्ष है, क्योंकि लोकमें वर्तमानविषयक ज्ञान ही अपरोक्ष ज्ञान कहा जाता है । अवर्तमान-विषयक अपरोक्ष ज्ञान नहीं कहा जाता, अतः लोकमें अनुभूत स्वभावका शास्त्र भी अतिक्रमण नहीं कर सकता है ।
| १४० | सिद्धान्तलेशसंग्रह | [ प्रथम परिच्छेद |
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भाष्येऽस्य जीवलिङ्गत्वकीर्त्तनादिति ते विदुः ॥ ६० ॥
सूक्ष्मरूपसे सभी पदार्थोंके विद्यमान होनेके कारण साक्षिरूपसे ब्रह्म सब वस्तुका अवभासक है। ऐसा कौमुदीकार कहते हैं। ज्ञानरूपत्व ही सर्वज्ञत्व है, ज्ञानकर्तृत्वरूप नहीं, इसीलिए भाष्यमें ज्ञानकर्तृत्व जीवका लिङ्ग कहा गया है, ऐसा भी वे (कौमुदीकार) कहते हैं ॥५९॥६०॥
कौमुदीकृतस्तु वदन्ति—स्वरूपज्ञानेनैव ब्रह्मणः स्वसंसृष्टसर्वावभासकत्वात् सर्वज्ञत्वम्। अतीतानागतयोरप्यविद्यायां चित्रभित्तौ विमृष्टानुन्मीलितचित्रवत् संस्कारात्मना सत्त्वेन तत्संसर्गस्याऽप्युपपत्तेः। न तु वृत्तिज्ञानैस्तस्य सर्वज्ञत्वम्। 'तमेव भान्तमनु भाति सर्वम्' इति
कौमुदीकार कहते हैं कि स्वरूपज्ञानसे ही * ब्रह्म अपने साथ सम्बद्ध सब पदार्थोंका अवभासक होनेसे सर्वज्ञ है। जैसे विमृष्ट होनेसे अनभिव्यक्त चित्र संस्काररूपसे चित्रभित्तिमें रहता है, वैसे ही अतीत और अनागत पदार्थ अविद्याके संस्काररूपसे रहते हैं, अतः उनके साथ ब्रह्मका सम्बन्ध है, इसलिए अतीत और अनागत विषयके साथ सम्बन्ध होनेसे तत् संसृष्ट ब्रह्म सर्वज्ञ है। वृत्तिज्ञानसे ब्रह्म सर्वज्ञ नहीं है, क्योंकि 'तमेव भान्त०' (उसके ही
* पूर्वके दो मतोंसे वृत्तिज्ञान द्वारा ब्रह्ममें सर्वज्ञत्वका निरूपण किया गया है, और इस मतसे स्वरूपज्ञानसे ब्रह्मकी सर्वज्ञताका निरूपण किया जाता है। अतीत और अनागत प्रपञ्च प्रलयकालमें और सृष्टिकालमें संस्काररूपसे विद्यमान रहते हैं, इसलिए उनका ब्रह्मके साथ सम्बन्ध होता है, अतः अतीत और अनागत वस्तुओंसे सम्पृक्त ब्रह्ममें सर्वज्ञत्वकी अनुपपत्ति नहीं हो सकती है। देवताधिकरणके भाष्यमें और आरम्भणाधिकरणके भाष्यमें अतीत और अनागत वस्तुकी प्रलयकालमें और सृष्टिकालमें संस्कारात्मना अवस्थिति रहती है, इसका निरूपण किया गया है। इसमें एक बातकी न्यूनता रहती है, उसे जानना चाहिए—जब स्थूल प्रपञ्चका अवस्थान है तब सूक्ष्म प्रपञ्च नहीं है और प्रलयकालमें सूक्ष्म प्रपञ्च है, तो उस कालमें स्थूल प्रपञ्च नहीं है, अतः सब कालमें सब प्रपञ्चके साथ ब्रह्मका सम्बन्ध न होनेसे ब्रह्ममें असंकुचित सर्वज्ञत्व सिद्ध नहीं होगा।
'तमेव भान्तम्' इसमें 'एव'के अवधारणार्थक होनेसे यह अर्थ स्पष्ट भासता है कि ब्रह्म विषयके प्रकाशनमें अन्य किसी वस्तुकी अपेक्षा नहीं करता है, अतः ब्रह्मकी सर्वज्ञतामें वृत्तिकी अपेक्षा नहीं है, परन्तु स्वरूपज्ञानसे ही ब्रह्म स्वसम्बद्ध सकल पदार्थोंका अवभास करता है। इस विषयमें भी कुछ विचारणीय अंश है, जैसे ब्रह्मचैतन्य जगत्के अवभासनके लिए मायावृत्तिकी अपेक्षा करे तो 'तमेव' इस श्रौत अवधारणके साथ विरोध होता है, वैसे ही घट आदिके अवभासनमें जीव अन्तःकरण वृत्तिकी अपेक्षा करता है, तो श्रौत अवधारणके
ब्रह्मकी सर्वज्ञताका स्वरूपविचार ] भाषानुवादसहित १४१
सावधारणश्रुतिविरोधात् सृष्टेः प्रागेकमेवाद्वितीयमित्यवधारणानुरोधेन महाभूतानामिव वृत्तिज्ञानानामपि प्रलयस्य वक्तव्यतया ब्रह्मणस्तदा सर्वज्ञत्वाभावापत्त्या प्राथमिकमायाविवर्तरूपे ईक्षणे तत्पूर्वके महाभूतादौ च स्रष्टृत्वाभावप्रसङ्गाच्च । एवं सति ब्रह्मणस्सर्वविषयज्ञानात्मकत्वमेव स्यात्, न तु सर्वज्ञातृत्वरूपं सर्वज्ञत्वमिति चेत्, सत्यम् । सर्वविषयज्ञानात्मकमेव ब्रह्म, न तु सर्वज्ञानकर्तृत्वरूपं ज्ञातृत्वमस्ति । अत एव 'वाक्यान्वयात्'
प्रकाशित होनेपर सब वस्तुओंका प्रकाश होता है ) इस अवधारण ( एव ) के सहित श्रूयमाण श्रुतिके साथ विरोध होगा और 'एकमेवाद्वितीयम्' ( एक ही अद्वितीय ) इस अवधारण श्रुतिके आधारपर सृष्टिके पूर्वकालमें महाभूतोंके समान वृत्तिज्ञानोंका प्रलय है, यह कहना होगा, इसलिए उस कालमें वृत्तिका अभाव होनेसे ब्रह्ममें सर्वज्ञत्वाभावकी प्रसक्ति होगी और प्राथमिक ( आद्य ) मायाके प्रथम परिणाम ईक्षणमें और उस ईक्षणपूर्वक महाभूत आदिकी सृष्टिमें ब्रह्मकी स्रष्टता भी नहीं रहेगी ।
इस परिस्थितिमें ब्रह्मकी सर्ववस्तुविषयज्ञानात्मकता ही सर्वज्ञता होगी, सर्वज्ञानकर्तृत्त्वरूप नहीं होगी, ठीक है, सर्वविषयकज्ञानात्मकत्व ही सर्वज्ञत्व है, क्योंकि सर्वविषयकज्ञानस्वरूप ब्रह्म है, सर्वज्ञानकर्तृत्वरूप ज्ञातृत्व
साथ विरोध होगा ही, यदि इस अनुपपत्तिके परिहारके लिए सम्पूर्ण जड़ वस्तुएँ वृत्तिवाक्षित चैतन्यसे ही प्रकाशित होती हैं, यह अवधारणश्रुतिका अर्थ माना जाय, तो ब्रह्मचैतन्य भी मायावृत्तिकी अपेक्षा करके जड़ वस्तुको प्रकाशित कर सकता है, इसमें आपत्ति नहीं है ।
इस मतमें वृत्त्यनपेक्ष ब्रह्म स्वरूप ज्ञानसे ही सर्वावभासक होकर सर्वज्ञ है, यह कहा जाता है, क्योंकि 'एकमेवाद्वितीयं ब्रह्म' इत्यादि श्रुतिके आधारपर प्रलयकालमें सब वृत्तियोंका विनाश प्रतीत होता है । इसलिए वृत्ति द्वारा, सृष्टिके पूर्वकालमें वृत्तिका अभाव होनेसे, 'तदैक्षत' ( उसने ईक्षण किया ) इस प्रकार ईक्षण नहीं हो सकता है । यहाँपर भी विचार करने लायक एक बात है—सृष्टिके पूर्वकालमें माया आदिकी सत्ताका अवश्य अङ्गीकार करना होगा, क्योंकि वेदान्तसिद्धान्तमें अविद्या आदि छः पदार्थ अनादि माने गये हैं । 'एकमेवाद्वितीयम्' इत्यादि अद्वितीयत्वके अवधारणको मुख्य नहीं मान सकते हैं, परन्तु माया आदिके अनादित्वकी प्रतिपादक श्रुतिके आधारपर व्याकृत—कार्य्यरूप द्वितीयसे रहित ब्रह्म था, यह 'अद्वितीयम्' का अर्थ करना होगा । इसी न्यायके अनुसार सर्वविषयकज्ञानकर्तृत्वप्रतिपादक श्रुतिके बलसे मायावृत्तिसे व्यतिरिक्त कोई द्वितीय वस्तु है ही नहीं, ऐसा अर्थ अद्वितीय श्रुतिका क्यों न किया जाय । और ईक्षत्यधिकरणमें भाष्यकारने भी मायावृत्तिसे ही सर्वज्ञत्वका समर्थन किया है ।
| १४२ | सिद्धान्तलेशसंग्रह | [ प्रथम परिच्छेद |
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( उ. मी. अ. १ पा. ४ सू. १९ ) इत्याधिकरणे विज्ञातृत्वं जीवलिङ्गमित्युक्तं भाष्यकारैः । 'यः सर्वज्ञः' इत्यादिश्रुतिरपि तस्य ज्ञानरूपत्वाभिप्रायेणैव योजनीयेति ।
दृश्यावच्छिन्नरूपेण चितः कार्यत्वसम्भवात् ।
सार्वज्ञ्यं ज्ञानकर्तृत्वं वाचस्पतिमते स्थितम् ॥ ६१ ॥
दृश्यावच्छिन्नरूपेण चैतन्य कार्यरूप हैं, अतः ज्ञानकर्तृत्व ही सर्वज्ञत्व है, ऐसा वाचस्पतिमिश्रका मत है ॥६१॥
यद्यपि ब्रह्म स्वरूपचैतन्येनैव स्वसंसृष्टसर्वावभासकम्, तथाऽपि तस्य स्वरूपेणाऽकार्यत्वेऽपि दृश्यावच्छिन्नरूपेण तु ब्रह्मकार्यत्वात् । 'यः सर्वज्ञः'
(सर्वज्ञत्व) ब्रह्ममें नहीं हैं अर्थात् ब्रह्म ज्ञाता नहीं है । इसीलिए 'वाक्यान्वयात् ※' इस अधिकरणमें भाष्यकारने विज्ञातृत्वका जीवके लिङ्गरूपसे कथन किया है । 'यः सर्वज्ञः' ( जो सर्वज्ञ ) इस श्रुतिकी भी ज्ञानरूपताके अभिप्रायसे ही योजना करनी चाहिए ।
† आचार्य वाचस्पतिमिश्र कहते हैं कि यद्यपि ब्रह्म अपनेसे सम्बद्ध सब वस्तुओंका अवभासक स्वरूपचैतन्यसे ही है, तथापि स्वरूपतः चैतन्यके उसके कार्य न होनेपर भी दृश्यावच्छिन्नरूपसे वह कार्य ही है, इससे 'यः सर्वज्ञः'
※ 'वाक्यान्वयात्', 'आत्मा वा अरे द्रष्टव्यः' इत्यादि श्रुतिमें द्रष्टव्यरूपसे कहा गया आत्मा जीव नहीं है, किससे ? इससे कि 'इदं सर्वमात्मा' ( यह सब आत्मरूप है ) इत्यादि श्रुति-वाक्य तात्पर्यवृत्तिसे सर्वात्मक ब्रह्ममें ही अन्वित हैं । 'विज्ञातारम्' इत्यादि वाक्यके आधारपर पूर्वोक्त श्रुतिस्थ आत्मासे जीवात्माका ग्रहण नहीं कर सकते हैं, क्योंकि उस वाक्यसे मुक्त पुरुषका ही बोधन होता है, अतः भूतपूर्वविज्ञातृत्व धर्मका, जो जीवमें ही था, अनुवादमात्र है, अतः द्रष्टव्य परमात्मा ही है, जीव नहीं । इसमें विज्ञातृत्व धर्म जीवलिङ्गतया ही उपन्यस्त है, ब्रह्मसाधारणविज्ञातृत्वका कथन नहीं है, अतः ब्रह्म स्वरूपतः सब वस्तुका प्रकाशक है, यह भाव है ।
† सब वेदान्तोंका लक्ष्य नित्य निर्विशेष चैतन्य ही है, अतः 'सर्वज्ञः' इसमें जो ज्ञाधातु .. है, उसका वाच्य यह नहीं हो सकता है, इसलिए उसका अर्थ विशिष्ट चेतन ही होगा, विशिष्ट चेतनके कार्य होनेसे 'सर्वज्ञः' में प्रत्ययार्थ जो कर्तृत्व है, उसकी उपपत्ति हो सकती है । ब्रह्ममें सर्वज्ञानकर्तृत्वप्रतिपादक श्रुति है, उसकी उपपत्ति होनेके लिए ज्ञातृत्व ईश्वरमें मानना होगा । जीवके लिङ्गरूपसे भाष्यकारने जो विज्ञातृत्वका कथन किया है, वह तो केवल वाक्यान्वयाधिकरणकी सिद्धान्तकोटिमें स्वीकृत निर्विशेष ब्रह्मसे व्यावृत्ति करनेके उद्देश्यसे है,
वृत्तिके उपयोगका विचार ] भाषानुवादसहित १४३
इति ज्ञानजननकर्तृत्वश्रुतेरपि न कश्चिद्विरोध इति आचार्यवाचस्पतिमिश्राः ॥ ९ ॥
नन्वीश्वरवज्जीवोऽपि वृत्तिमनपेक्ष्य स्वरूपचैतन्येनेव किमिति विषयान्नावभासयति ?—
बुद्धौ संसृज्यते जीवः सर्वगो व्यक्तिजातिवत् ।
अन्यैस्तद्वृत्यपारूढो ज्ञाता विवरणे स्थितः ॥ ६२ ॥
जैसे गोत्व आदि जातिके व्यापक होनेपर भी उसका गोव्यक्तिमें ही सम्बन्ध होता है, वैसे ही जीवके व्यापक होनेपर भी उसका अन्तःकरणमें ही सम्बन्ध होता है, और अन्तःकरणकी वृत्तिके ऊपर आरूढ़ होकर अन्य विषयोंके साथ उसका सम्बन्ध होता है, अतः वह (जीव) ज्ञाता होता है, ऐसा विवरणमें कहा गया है ॥६२॥
अत्रोक्तं विवरणे—ब्रह्मचैतन्यं सर्वोपादानतया सर्वतादात्म्यापन्नं सत् स्वसंसृष्टं सर्वमवभासयति, न जीवचैतन्यम् । तस्याऽविद्योपाधिकतया
इत्यादि ज्ञानजननकर्तृत्वकी (ज्ञानोत्पत्तिके प्रति कर्तृत्वकी) प्रतिपादक श्रुतिके साथ कोई भी विरोध नहीं है ॥ ९ ॥
शङ्का होती है कि ईश्वरकी नाईं जीव भी वृत्तिकी अपेक्षा न करके स्वरूपचैतन्यसे विषयोंका परिज्ञान (प्रकाश) क्यों नहीं करता है * ?
इसके ऊपर विवरणकारने यह समाधान किया है—ब्रह्मचैतन्य सभीका उपादान है, इसलिए सभीके साथ तादात्म्यरूप होकर स्वसम्बद्ध सब पदार्थोंका प्रकाश करता है, न कि जीवचैतन्य; कारण कि यद्यपि वह अविद्योपाधिक होनेसे
क्योंकि भाष्यकारने ही ईक्षत्यधिकरणमें सर्वविषयकज्ञानकर्तृत्व कहा है, इसलिए पूर्वपक्षमें कोई जीव नहीं है, इसी आशयसे श्रीवाचस्पतिमिश्रके पक्षका उपक्रम है। माया यद्यपि अनादि है, तथापि तत्तन् कार्योंके साथ मायाका तादात्म्य होनेसे मायावच्छिन्न चैतन्य कार्य हो सकता है, इसलिए 'दृष्टावच्छिन्नरूपेण तु घटाद्यकार्यत्वात्' इस ग्रन्थकी अनुपपत्ति नहीं है ।
* यदि वृत्तिकी अपेक्षा न करके जीव भी सब वस्तुओंका अवभासक हो, तो आपत्ति यह होगी कि अविद्याप्रतिबिम्बितचैतन्यरूप जीवके व्यापक होनेसे अपनेसे सम्बद्ध यावत् वस्तुका प्रकाशक होनेसे जीव भी सर्वज्ञ प्रसक्त होगा, अतः जीवको स्वरूपज्ञानसे अवभासक नहीं मानना चाहिए। और स्वरूपचैतन्यको किसी करणकी अपेक्षा न होनेसे चक्षु आदि व्यर्थ ही प्रसक्त होंगे।
| १४४ | सिद्धान्तलेशसंग्रह | [ प्रथम परिच्छेद |
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सर्वगतत्वेऽप्यनुपादानत्वेनाऽसङ्गित्वात् । यथा सर्वगतं गोत्वसामान्यं स्वभावादश्वादिव्यक्तिसङ्गित्वाभावेऽपि सास्नावद्व्यक्तौ संसृज्यते, एवं विषयासङ्ग्यपि जीवः स्वभावादन्तःकरणे संसृज्यते । तथा च यदाऽन्तःकरणस्य परिणामो वृत्तिरूपो नयनादिद्वारेण निर्गत्य विषयपर्यन्तं चक्षूरश्मिवत् झटिति दीर्घप्रभाकारेण परिणम्य विषयं व्याप्नोति, तदा तमुपारुह्य तं विषयं गोचरयति । केवलाग्न्यदाह्यस्याऽपि तृणादेरयःपिण्डसमारूढाग्निदाह्यत्ववत् केवलजीवचैतन्याप्रकाशयस्याऽपि घटादेरन्तःकरणवृत्त्युपारूढस्य तत्प्रकाशयत्वं युक्तम् ।
यद्वाऽन्तःकरणोपाधिर्जीवो वृत्त्या बहिर्गतः ।
विषयब्रह्मचैतन्याभेदव्यक्त्याऽर्थभासकः ॥ ६३ ॥
अथवा अन्तःकरणोपाधिक जीव वृत्तिद्वारा बाहर निकलकर विषयचैतन्य और ब्रह्मचैतन्यकी अभेदाभिव्यक्तिसे अर्थका अवभासक होता है ॥६३॥
यद्वाऽन्तःकरणोपाधिकत्वेन जीवः परिच्छिन्नः । अतः संसर्गाभावान्न
सर्वगत है, तो भी विषयोंके प्रति अनुपादान होनेसे घट आदिके साथ उसका सम्बन्ध नहीं है। जैसे गोत्व जाति व्यापक है, तथापि उसका स्वभावसे अश्व आदि व्यक्तिके साथ सम्बन्ध नहीं है, परन्तु सास्त्रावाली गो व्यक्तिमें ही उसका सम्बन्ध है, वैसे ही जीवके विषयासङ्गी होनेपर भी वह स्वभावतः अन्तःकरणके साथ संसृष्ट होता है। इस रीतिसे जीवका स्वभावतः विषयके साथ सम्बन्ध न होनेपर जब नेत्र आदि द्वारसे अन्तःकरणका वृत्तिरूप परिणाम विषयदेश तक निकलकर चक्षुकी रश्मिके समान सहसा बड़ी प्रभाके आकारसे परिणत होकर विषयको व्याप्त करता है, तब जीवचैतन्य उस परिणामके ऊपर चढ़कर उस विषयको प्रकाशित करता है। जैसे तृण आदिका केवल शुद्ध अग्निसे दाह नहीं होता है, परन्तु अयोगोलक आदिके ऊपर आरूढ़ होकर तृण आदिको अग्नि दग्ध करती है, वैसे ही केवल जीवचैतन्यसे विषयका प्रकाश न होनेपर भी वृत्तिके ऊपर आरूढ़ होकर जीवचैतन्य विषयका प्रकाश करता है, यह मानना युक्त है।
अथवा जीव अन्तःकरणोपाधिक चैतन्य है, अतः वह परिच्छिन्न है। इसलिए विषयके साथ उसका सम्बन्ध न होनेसे घट आदिका प्रकाश नहीं
वृत्तिके उपयोगका विचार ] भाषानुवादसहित १४५
घटादिकमवभासयति। वृत्तिद्वारा तत्संसृष्टविषयावच्छिन्नब्रह्मचैतन्याभेदाभिव्यक्तौ तु तं विषयं प्रकाशयति।
अथवा सर्वगोऽविद्यावृतोऽसौ न प्रकाशते ।
बुद्धावनावृतो वृत्तिर्भङ्गावरणभासकः ॥ ६४ ॥
अथवा यद्यपि जीव व्यापक और अन्तःकरणावच्छेदेन अनावृत है, तथापि अविद्यावृत होनेसे स्वयं अप्रकाशमान होकर विषयोंका प्रकाश नहीं करता है। वृत्तिद्वारा आवरणका भङ्ग होनेपर तो विषयोंका प्रकाश करता है ॥६४॥
अथवा जीवः सर्वगतोऽप्यविद्यावृतत्वात् स्वयमप्यप्रकाशमानतया विषयाननवभासयन् विषयविशेषे वृत्त्युपरागादावरणतिरोधानेन तत्रैवाऽभि-
कर सकता है। वृत्तिके द्वारा वृत्तिमान् अन्तःकरणके साथ सम्बद्ध विषयावच्छिन्न ब्रह्मचैतन्यके साथ अन्तःकरणावच्छिन्न जीवचैतन्यकी अभेदाभिव्यक्ति होनेसे तो वह जीवचैतन्य घट आदि विषयका प्रकाश करता है * ।
† अथवा जीवके सर्वगत होनेपर भी अविद्यावृत होनेसे वह स्वयं भी
* पहला परिहार—जीवको अविद्याप्रतिबिम्ब मान कर और उसे व्यापक स्वीकार करके किया गया है। इस ‘यद्वा’ पक्षमें जीवको अन्तःकरणोपाधिक मान कर उसे परिच्छन्न माना है, अतः इस मतमें सर्वज्ञत्वकी शङ्का ही नहीं है, क्योंकि स्वल्प परिमाणवाले जीवका विषयोंके साथ संबन्ध न होनेसे वृत्तिके बिना वह प्रकाश नहीं कर सकता है, यह भाव है। इस मतमें अभेदाभिव्यक्ति ही वृत्तिका प्रयोजन है, इस पक्षका अवलम्बन करके वृत्ति द्वारा विषयावच्छिन्न चैतन्य और अन्तःकरणावच्छिन्न चैतन्यकी अभेदाभिव्यक्ति होनेके बाद ही विषयोंका प्रकाश होगा, यह विशेष है।
† अविद्याप्रतिबिम्बित चैतन्य जीव है, इस प्रथम पक्षको मान कर इस ‘अथवा’ कल्पसे परिहार करते हैं । यद्यपि इस पक्षमें जीव व्यापक और जगत्के प्रति अनुपादान है, तथापि उसका संसर्ग माना जाता है। ‘सर्वगतोऽपि’ इसको उपलक्षण मान कर ‘विषयसंसृष्टोऽपि’ (विषयके साथ संसृष्ट होनेपर भी) यह भी जानना चाहिए। अन्यथा यह शङ्का मूलमें हो सकती है कि जीवके व्यापक होनेपर भी विषयोंके साथ उसका संसर्ग न होनेसे जीव विषयका प्रकाश नहीं करता है, यह कह सकते हैं, फिर आवृत माननेकी कोई आवश्यकता नहीं है। यद्यपि ‘मां न जानामि’ (मैं अपनेको नहीं जानता हूँ) इस प्रकारका अनुभव नहीं होता है, इसलिए जीव आवृत नहीं हो सकता है, यह शङ्का हो सकती है, परन्तु यह युक्त नहीं है, क्योंकि अन्तःकरणोपहित चैतन्य ही ‘माम्’ प्रतीतिका विषय होनेसे व्यापक जीवचैतन्यमें अन्तःकरणावच्छेदरूपसे आवृतत्वके न रहनेपर भी विषयदेशमें वह आवृत ही है, और ‘व्यापकरूपसे मैं अपनेको नहीं जानता हूँ’ इस प्रकारका अनुभव भी होता है।
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| १४६ | सिद्धान्तलेशसंग्रह | [ प्रथम परिच्छेद |
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व्यक्तस्तमेव विषयं प्रकाशयति । एवं च चिदुपरागार्थत्वेन, विषयचैतन्याभेदाभिव्यक्त्यर्थत्वेन, आवरणाभिभवार्थत्वेन वा वृत्तिनिर्गममपेक्ष्य तत्संसृष्टविषयमात्रावभासकत्वात् जीवस्य किञ्चिज्ज्ञत्वमप्युपपद्यते इति ॥ १० ॥
वृत्तेश्चिदुपरागो वा अभेदव्यक्तिरेव वा ।
फलमावृतिभङ्गो वा तत्राऽऽद्यं कीदृशं भवेत् ॥ ६५ ॥
वृत्तिका प्रयोजन—चित्के साथ सम्बन्ध, अभेदाभिव्यक्ति अथवा आवरणका भङ्ग—है, उनमें से चित्के साथ सम्बन्ध कैसा होता है ? ॥६५॥
अत्र प्रथमपक्षे सर्वगतस्य जीवस्य वृत्त्यधीनः को विषयोपरागः ? वृत्त्याऽपि हि पूर्वसिद्धयोर्निष्क्रिययोर्विषयजीवचैतन्ययोस्तादात्म्यस्य संयोगस्य वा न सम्भवत्याधानम् ।
नैयायिकादिवत् केचिद्विषयत्वं स्वभावतः ।
कोई लोग कहते हैं कि जैसे नैयायिक लोग विषय-विषयिभाव सम्बन्ध स्वभावसे मानते हैं, वैसे ही वृत्तिसे विषयविषयिभाव सम्बन्ध उत्पन्न होता है ।
अप्रकाशमान है, इससे विषयोंका अवभास न करता हुआ किसी एक विषयमें वृत्तिके सम्बन्धसे आवरणका विनाश होनेके अनन्तर उसी विषयमें अभिव्यक्त होकर उसी विषयको प्रकाशित करता है। वृत्तिके बिना जीवचैतन्य विषयका अवभासक नहीं होता है, ऐसा सिद्ध होनेपर चित्के साथ सम्बन्धके लिए, विषय-चैतन्य और जीवचैतन्यके अभेदके लिए और आवरणके विनाशके लिए वृत्तिनिर्गमकी अपेक्षा करके वृत्तिके साथ सम्बद्धमात्र विषयका जीव प्रकाश करता है, इसलिए जीवमें अल्पज्ञत्वकी भी उपपत्ति होती है ॥१०॥
इन पूर्वोक्त तीन पक्षोंमें से प्रथम पक्षमें अर्थात् 'चिदुपरागार्था वृत्ति:'( चैतन्य-के साथ सम्बन्धके लिए वृत्ति है ) इस पक्षमें सर्वतः व्यापक जीवका वृत्तिजन्य कौनसा सम्बन्ध है ? अर्थात् कोई भी सम्बन्ध नहीं है, कारण कि क्रियारहित विषयचैतन्य और जीवचैतन्यका वृत्तिसे भी तादात्म्य या संयोग नहीं हो सकता है [ भाव यह है कि जिनका तादात्म्य व्यवहारमें देखा जाता है, वह पहलेसे ही रहता है, बीचमें कहींसे नहीं आता है, अतः विषय या जीवचैतन्यका तादात्म्य सम्बन्ध प्रथमसे ही रहेगा, आगन्तुक नहीं होगा अर्थात् वृत्तिसे उत्पादित नहीं होगा और संयोग सम्बन्ध एककी क्रियासे या उभयकी क्रियासे उत्पन्न होता है;
वृत्तिके साथ विषयका सम्बन्ध-विचार ] भाषानुवादसहितं १४७
अत्र केचिदाहुः—विषयविषयिभावसम्बन्ध एवेति ।
वृत्तिनिर्गमवैयर्थ्यादन्ये तद्द्वारसङ्गमम् ॥ ६६ ॥
कोई लोग कहते हैं कि केवल विषयविषयिभाव संसर्ग माना जायगा, तो वृत्तिका निकलना ही व्यर्थ होगा, अतः विषयसंयुक्तवृत्तित्तादात्म्यसम्बन्ध ही वृत्तिसे उत्पन्न होता है ॥६६॥
अन्ये तु—विषयविषयिभावमात्रनियामिका वृत्तिश्चेदनिर्गताया अप्यैन्द्रियकवृत्तेस्तन्नियामकत्वं नातिप्रसङ्गावहमिति तन्निर्गमाभ्युपगमवैयर्थ्यापत्तेः स नाऽभिसंहितः । किं तु विषयसन्निहितजीवचैतन्यतादात्म्यापन्नाया
परन्तु विषयचैतन्य और जीवचैतन्य स्वभावतः ही * निष्क्रिय हैं, अतः उनका कोई भी सन्निकर्ष नहीं हो सकता है, इसलिए 'सम्बन्धार्था वृत्तिः' यह कहना असङ्गत है ] ।
इस आक्षेपके समाधानमें कोई लोग कहते हैं कि विषयविषयिभाव सम्बन्ध ही वृत्तिसे उत्पन्न होता है † ।
कुछ लोग कहते हैं कि परोक्षापरोक्षस्थलसाधारणविषयविषयिभावमात्रमें यदि वृत्ति प्रयोजक है, तो अनिर्गत इन्द्रियवृत्तिके भी विषयविषयिभाव सम्बन्धके नियामक होनेमें कोई अतिप्रसङ्ग नहीं है, इससे वृत्तिका निर्गम व्यर्थ होगा, अतः विषयविषयिभावसम्बन्ध अभिप्रेत नहीं है, [ तात्पर्य यह है कि सिद्धान्तमें—परोक्षविषयस्थलमें अनुमित्यादि वृत्तिसे उपहित जीवचैतन्यका अनुमेय आदि विषयके साथ वृत्तिनिर्गमके
* यद्यपि—जैसे सुवर्ण आदिमें अन्यतर कर्म या उभय कर्मके न रहनेपर भी पार्थिव भाग और तेज भागका संयोग देखा जाता है, वैसे ही प्रकृतमें द्विविधकर्मके न रहनेपर भी संयोगसम्बन्ध क्यों न माना जाय ? यह यहाँ शङ्का होती है, किन्तु यह युक्त नहीं है, क्योंकि विषयचैतन्य और जीवचैतन्यका सुवर्णदृष्टान्तके अनुसार आरम्भसे ही संयोगका स्वीकार किया जायगा तो वृत्तिका अङ्गीकार ही निरर्थक होगा, क्योंकि जो संयोग आरम्भसे ही सिद्ध है, उसकी उत्पत्ति वृत्ति कैसे करेगी, अतः आरम्भसे उनका संयोगसम्बन्ध नहीं माना जायगा, यह भाव है ।
† विषयचैतन्य और जीवचैतन्यका वृत्तिकी उत्पत्तिके पूर्वमें विषय-विषयिभाव सम्बन्ध नहीं रहता है, परन्तु वृत्तिके अनन्तर विषयविषयिभाव सम्बन्ध उत्पन्न होता है, और यह अनिर्वचनीय एवं अतिरिक्त है, यह आक्षेपपरिहार करनेवाले 'केचित्तु'का अभिप्राय है, अर्थात् संयोग या तादात्म्यका वृत्तिसे आधान—उत्पत्ति—नहीं होता है, परन्तु उक्त विषयविषयिभाव सम्बन्ध ही उत्पन्न होता है, अतः दोष नहीं है, यह भाव है ।
१४८. सिद्धान्तलेशसंग्रह [ प्रथम परिच्छेद
वृत्तेर्विषयसंयोगे तस्याऽपि तद्द्वारकः परम्परासम्बन्धो लभ्यते इति स एव चिदुपरागोऽभिसंहित इत्याहुः।
तरङ्गतत्संस्पर्शान्निदीस्पर्शं तराविव।
विषये वृत्तिसंसर्गाज्जीवसङ्गं परे विदुः ॥६७॥
जैसे तरङ्ग और तरुके स्पर्शसे वृक्षमें नदीका स्पर्श होता है, वैसे ही विषयमें वृत्तिके सम्बन्धसे जीवका सम्बन्ध होता है, ऐसा भी कोई कहते हैं ॥६७॥
अपरे तु—साक्षादपरोक्षचैतन्यसंसर्गिण एव सुखादेरापरोक्ष्यदर्शनात् अपरोक्षविषये साक्षात्संसर्ग एष्टव्यः। तस्माद् वृत्तेर्विषयसंयोगे वृत्तिरूपा-
बिना ही विषयविषयिभाव सम्बन्ध है—ऐसा माना गया है। परोक्षस्थलमें जैसे वृत्तिका बाहर निर्गमन न मान करके जीवचैतन्यका विषयके साथ सम्बन्ध माना जाता है, वैसे ही अपरोक्षस्थलमें भी वृत्तिके निर्गमनके विना जीवचैतन्यका विषयके साथ विषयविषयिभाव सम्बन्ध मान करके 'जीवकी वृत्ति जिस अर्थको विषय करेगी उसी अर्थका जीव प्रकाश करेगा अन्यका नहीं' इस नियमसे एक विषयके प्रकाशनकालमें अन्य विषयका प्रकाश प्रसक्त नहीं होगा, अतः अपरोक्षस्थलके लिए भी वृत्तिनिर्गमन व्यर्थसा है, इस प्रकार विचार करते हुए विवरणाचार्य, जो वृत्तिका निर्गम मानते हैं, विषय-विषयिभाव सम्बन्धको वृत्ति-जन्य नहीं मानते हैं, ] किन्तु विषयसन्निहितजीवचैतन्यके साथ तादात्म्यापन्न वृत्तिका विषयके साथ संयोग होनेपर विषयसन्निहितजीवचैतन्यका भी वृत्ति और विषयके संयोग द्वारा जो विषयसंयुक्तवृत्तितादात्म्यरूप परम्परासम्बन्ध प्राप्त होता है, वही चिदुपरागशब्दसे कहा गया है, ऐसा मानते हैं * ।
कोई लोग कहते हैं कि जीवचैतन्यके साथ साक्षात् सम्बद्ध ही सुख आदिका आपरोक्ष्य (प्रत्यक्ष) देखा जाता है, इससे अपरोक्ष विषयमें जीव-चैतन्यका (सर्वत्र) साक्षात्सम्बन्ध ही वाञ्छनीय है, परम्परासम्बन्ध नहीं। [ तात्पर्य यह है कि सुख आदि आभ्यन्तर पदार्थोंके साक्षात्कारमें जीवचैतन्यका उनके साथ साक्षात्सम्बन्ध ही देखा जाता है, इसलिए घट आदि अपरोक्ष विषयोंके साक्षात्कारमें भी साक्षात् सम्बन्धको ही प्रयोजक मानना चाहिए, यदि ऐसा न मान
* विषयको व्याप्त करनेवाली वृत्तिका अधिष्ठान है—विषयसमीपवर्ती जीवचैतन्य, इसलिए वृत्तिका तादात्म्य जीवचैतन्यमें है।
द्वितीयपक्षे जीवस्याऽसर्वगतत्वादसङ्करात् ।
वृत्तिके साथविषयका सम्बन्ध-विचार] भाषानुवादसहित १४९ .
वच्छेदकलाभात् तदवच्छेदेन तदुपादानस्य जीवस्याऽपि संयोगजसंयोगः सम्भवति । कारणाकारणसंयोगात् कार्याकार्यसंयोगवत् कार्याकार्यसंयोगात् कारणाकारणसंयोगस्याऽपि युक्तितौल्येनाऽभ्युपगन्तुं युक्तत्वादित्याहुः ।
द्वितीयपक्षे जीवस्याऽसर्वगतत्वादसङ्करात् ।
विषयब्रह्मचैतन्याभेदाभिव्यक्त्यैव तं परे ॥ ६८ ॥
'अभेदाभिव्यक्त्यर्था वृत्तिः' इस द्वितीय पक्षमें जीवके अव्यापक होनेके कारण उसके साथ साङ्कर्य न होनेसे विषयावच्छिन्न ब्रह्मचैतन्यके साथ अभेदाभिव्यक्तिकं द्वारा विषयके साथ तादात्म्य-सम्पादन ही वृत्तिका प्रयोजन है, ऐसा कोई लोग कहते हैं ॥ ६८ ॥
कर, कहींपर साक्षात्सम्बन्ध कहींपर परम्परासम्बन्ध माना जाय, तो कार्य-कारणभावोंमें भेद होनेसे गौरव ही होगा, इसलिए एक ही साक्षात्सम्बन्ध साक्षात्कारमें प्रयोजक है, परम्परासंसर्ग (विषयसंयुक्तवृत्तितादात्म्य) प्रयोजक नहीं है ] । इससे वृत्तिका विषयके साथ संयोग होनेके बाद वृत्तिरूप विशेषणका लाभ होनेसे वृत्त्यवच्छेदेन वृत्तिके उपादानभूत जीवका भी संयोगजन्य संयोग साक्षात् संसर्ग होता है [ तात्पर्य यह है कि वृत्ति जीवचैतन्यका कार्य है और विषय अकार्य है, जीवचैतन्य वृत्तिका उपादान कारण है और विषय वृत्तिका उपादान कारण नहीं है, इसलिए जीवचैतन्यके क्रमशः कार्य और अकार्यरूप जीवचैतन्य और विषयके संयोगसे वृत्तिके प्रति क्रमशः कारण और अकारणरूप जीवचैतन्य और विषयका संयोग होता है, यही संयोगज संयोगरूप साक्षात्सम्बन्ध अपरोक्षविषयक साक्षात्कारमें प्रयोजक है ] जैसे कारण और अकारणके संयोगसे कार्य और अकार्यका संयोग होता है, वैसे ही कार्य और अकार्यके संयोगसे कारण और अकारणका संयोग होता है, ऐसा तुल्य युक्तिसे माननेमें कोई दोष नहीं है * ।
* तात्पर्य यह है कि कारण और अकारणके संयोगसे कार्य और अकार्यका संयोग, तो नैयायिक लोगोंने माना है, जैसे—हस्त और वृक्षके संयोगसे काय और वृक्षका संयोग होता है, इसमें कायरूप ( शरीररूप ) कार्यके प्रति कारण है—हस्त और अकारण है—वृक्ष, इसी प्रकार हस्तका कार्य है—काय, और उसका अकार्य है—वृक्ष, शरीरके प्रति कारणीभूत हस्त और उसके प्रति अकारणीभूत वृक्षके संयोगसे हस्तके कार्य शरीरका और उसके (हस्तके) अकार्य वृक्षका संयोग होता है । परन्तु कार्य और अकार्यके संयोगसे कारण और अकारणका संयोग नहीं माना है, इसीपर मूलमें कहा गया कि उक्त रीति के समान होनेसे कार्याकार्यके संयोगसे कारण और अकारणका संयोग भी हो सकता है, क्योंकि ऐसा माननेमें कोई हरकत नहीं है ।
| १५० | सिद्धान्तलेशसंग्रह | [ प्रथम परिच्छेद |
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एकदेशिनस्तु—अन्तःकरणोपहितस्य विषयाऽवभासकचैतन्यस्य विषयतादात्म्यापन्नब्रह्मचैतन्याभेदाभिव्यक्तिद्वारा विषयतादात्म्यसम्पादनमेव चिदुपरागोऽभिसंहितः । सर्वगततया सर्वविषयसन्निहितस्याऽपि जीवस्य तेन रूपेण विषयाऽवभासकत्वे तस्य साधारणतया पुरुषविशेषापरोक्ष्यव्यवस्थित्ययोगेन तस्याऽन्तःकरणोपहितत्वरूपेणैव विषयाऽवभासकत्वात् । एवं च विषयापरोक्ष्ये आध्यासिकसम्बन्धो नियामक इति सिद्धान्तोऽपि सङ्गच्छते ।
कुछ एकदेशियोंका मत है कि अन्तःकरणसे उपहित घट आदि विषयोंके अवभासक जीवचैतन्यका—विषयोंके साथ तादात्म्यरूपको प्राप्त हुए ब्रह्मचैतन्यके साथ अभेदकी अभिव्यक्ति द्वारा—घट आदि विषयके साथ तादात्म्यका सम्पादन ही * चिदुपरागशब्दसे कहा जाता है । जीवके व्यापक (सर्वगत) होनेसे सब विषयोंका सन्निधान होनेपर भी उसको सर्वगतरूपसे विषयोंका अवभासक माना जायगा, तो प्रत्येक पुरुषके प्रति जीवके साधारण होनेसे पुरुष विशेषके अपरोक्ष्यकी व्यवस्थिति नहीं होगी, इसलिए उसको—अन्तःकरणोपहितत्वरूपसे † ही—विषयोंका अवभासक माना जाता है । विषयावभासक जीवचैतन्यका वृत्तिसे विषयतादात्म्य सम्पादनके स्वीकार होनेपर विषयके
* इन एकदेशियोंका कहना है कि अन्तःकरणके प्रति यदि जीवचैतन्य उपादान हो तो अन्तःकरणवृत्तिका भी उपादान और अधिष्ठान होकर उसके साथ वृत्तिका तादात्म्य हो, परन्तु यह नहीं है, इसलिए विवरणाचार्यको उक्त परम्परासम्बन्ध अभिप्रेत नहीं है । कारण कि खुद विवरणाचार्यने कहा है—'एवं विषयासङ्गत्वपि जीवः स्वभावदन्तःकरणेन संसृज्यते' ( यद्यपि जीवका विषयोंके साथ सम्बन्ध नहीं है, तथापि स्वभावसे ही अन्तःकरणके साथ उसका सम्बन्ध रहता है ) गोत्वादि जातिका जैसे स्वभावसे गोव्यक्तिमें सम्बन्ध होता है, वैसे ही अन्तःकरणके प्रति जीवके उपादान न होनेपर भी उसका स्वभावतः अन्तःकरणसे ही संसर्ग है, अतः संयोगजसंयोग भी विवरणाचार्यको अभिमत नहीं है, इसलिए एकदेशीके मतका उपक्रम है । यद्यपि बिम्बभूत ब्रह्म चैतन्यके विषयोंके प्रति उपादान होनेसे ब्रह्म और विषयका तादात्म्य पूर्वसे ही सिद्ध है, तथापि विषयतादात्म्यापन्न ब्रह्मकी और विषयावभासक जीवचैतन्यकी वृत्तिद्वारा अभेदाभिव्यक्ति होनेसे जीवचैतन्यका विषयके साथ वृत्तिसे ही तादात्म्य सिद्ध होता है, अतः वृत्तिमें तादात्म्य निर्वाहकत्वकी अनुपपत्ति नहीं है ।
† अर्थात् जीव सर्वगत है, तथापि जिस पुरुषके अन्तःकरणसे उपहित होकर जिस अर्थका अवभास करेगा, वही अर्थ उसीको अपरोक्ष होगा अन्यको नहीं, इस प्रकारकी व्यवस्था-सिद्धिके लिए अन्तःकरणोपहितत्व दिया गया है, यह भाव है ।
वृत्तिके साथ विषयका सम्बन्ध-विचार] भाषानुवादसहित १५१
न चैवं द्वितीयपक्षसाङ्कर्यम् । जीवस्य सर्वगतत्वे प्रथमः पक्षः, परिच्छिन्नत्वे द्वितीय इत्येव तयोर्भेदादित्याहुः ॥ ११ ॥
साक्षात्कारमें ( आपरोक्ष्यमें ) अध्याससिद्ध तादात्म्य सम्बन्ध ही नियामक है, ऐसा सिद्धान्त भी सङ्गत होता है, द्वितीय पक्षके साथ साङ्कर्य भी नहीं है ‡, क्योंकि जीवके व्यापकत्वपक्षमें प्रथम पक्ष है, और परिच्छिन्नत्वपक्षमें द्वितीय पक्ष है, इस प्रकारका उनमें भेद है ॥११॥
‡ सम्बन्धके लिए वृत्ति है, यह प्रथम पक्ष है, अभेदाभिव्यक्तिके लिए वृत्ति है, यह द्वितीय पक्ष है और आवरणाभिभवके लिए वृत्ति है, यह तृतीय पक्ष है। इनमें से प्रथम पक्षमें भी वृत्तिसे अभेदाभिव्यक्ति ही मानी जाय, तो द्वितीय पक्षसे प्रथम पक्षमें कोई वैलक्षण्य नहीं होगा, यह शङ्का करनेवालेका भाव है। इसपर उत्तर है कि जीवको व्यापक माननेवालोंके मतसे प्रथम पक्ष है और जो परिच्छिन्न मानते हैं, अर्थात् जिनके मतमें अन्तःकरणोपाधिक जीव है, उस मतसे द्वितीय पक्ष है, अतः साङ्कर्य नहीं है। तात्पर्य यह है कि यद्यपि प्रथम और द्वितीय पक्षमें वृत्तिजन्य अभेदाभिव्यक्ति समान है, तो भी प्रथम पक्षमें अभेदकी अभिव्यक्ति द्वारा विषयावभासक जीवचैतन्यके विषयके साथ तादात्म्यका सम्पादन वृत्ति करती है। और द्वितीय पक्षमें वृत्तिसे—विषयावभासक जीवचैतन्य और विषयावच्छिन्न चैतन्य—की ही—अभेदाभिव्यक्ति होती है, अतः परस्पर उन पक्षोंमें साङ्कर्य नहीं है।
अथवा प्रथम पक्षमें व्यापक होनेसे विषयदेशमें सदा सन्निहित विषयावभासक जीवचैतन्यका विषयतादात्म्यापन्न घटाद्यैतन्यकी अभेदाभिव्यक्ति करनेके लिए वृत्ति है और द्वितीय पक्षमें जीवके परिच्छिन्न होनेसे वृत्ति उसको विषयके सान्निध्यमें ले जाती है, उसके बाद विषया-भिन्न घटाद्यैतन्यके साथ उसकी 'परिच्छिन्न जीवकी' अभेदाभिव्यक्तिका भी सम्पादन करती है, अतः उनका साङ्कर्य नहीं है। इस प्रकारका यह परिहार मूलमें कहे गये सर्वगतत्व और परिच्छिन्नत्व पदोंसे सूचित होता है और पूर्वका परिहार 'प्रथमपक्ष' और 'द्वितीयपक्ष' पदोंसे सूचित होता है।
वस्तुतस्तु साङ्कर्यका परिहार होता ही नहीं है, क्योंकि 'सम्बन्धार्था वृत्तिः' इस पक्षमें सम्बन्ध ही उद्देश्यरूपसे ज्ञात होता है और 'अभेदाभिव्यत्त्यर्था वृत्तिः' इस पक्षमें अभेदाभिव्यक्ति ही उद्देश्यरूपसे प्रतीत होती है, और पूर्वोक्त परिहारसे भी दोनों पक्षोंमें अभेदाभिव्यक्ति ही वृत्तिका प्रयोजन मालूम होता है, अतः साङ्कर्यका परिहार करना केवल वालुकाप्रासादावरोहणमात्र है, इसलिए 'एकदेशिनस्तु' ऐसे एकदेशीके पक्षसे ही इसका उपन्यास किया गया है।
वस्तुस्थितिमें 'सम्बन्धार्था वृत्तिः' (सम्बन्धके लिए वृत्ति है) इस प्रकार कहनेवाले आचार्योंका अभिप्राय यह है—विषयोंके अवभासक रूपसे अभिमत जीवचैतन्यका घट आदि विषयोंके साथ व्यङ्ग्यव्यञ्जकरूप सम्बन्ध तत्तत् विषयोंसे संसृष्ट वृत्तिसे उत्पन्न हुआ विवक्षित है। जैसे—अन्तःकरण अत्यन्त स्वच्छ होनेसे स्वयं ही चैतन्यके अभिव्यञ्जनमें समर्थ है, वैसे घट आदि चैतन्यको अभिव्यक्त नहीं कर सकते हैं, क्योंकि वे अस्वच्छ हैं, किन्तु जब घट
| १५२ | सिद्धान्तलेशसंग्रह | [ प्रथम परिच्छेद |
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अथ द्वितीये काऽभेदव्यक्तिस्तत्राऽपि केचन ।
कुल्याद्वारेव सा वृत्त्या क्षेत्रकासारवारिणोः ॥ ६९ ॥
द्वितीय पक्षमें अभेदाभिव्यक्ति क्या है ? इस प्रश्नके उत्तरमें कोई लोग कहते हैं कि जैसे खेत और तालाबका जल नाली द्वारा एक होता है, वैसे ही वृत्ति द्वारा विषयावच्छिन्न चैतन्य और अन्तःकरणावच्छिन्न चैतन्यका एक होना अभेदाभिव्यक्ति है ॥६९॥
अथ द्वितीयपक्षे केयमभेदाभिव्यक्तिः ?
केचिदाहुः—कुल्याद्वारा तडागकेदारसलिलयोरिव विषयान्तःकरणावच्छिन्नचैतनयोर्वृत्तिद्वारा एकीभावोऽभेदाभिव्यक्तिः एवं च यद्यपि
वृत्तिका प्रयोजन अभेदकी अभिव्यक्ति है, ऐसा जो द्वितीय कल्प कहा गया है, उसमें अभेदाव्यक्तिका स्वरूप क्या है * ?
इस आक्षेपके समाधानमें कोई लोग कहते हैं कि जैसे नालीद्वारा तालाब और खेतके जलका एकीभाव—अभेदाभिव्यक्ति होती है, वैसे ही विषयावच्छिन्न चैतन्य और अन्तःकरणावच्छिन्न चैतन्यका जो वृत्तिद्वारा एकीभाव है, वही अभेदाभिव्यक्ति है †। इस रीतिसे यद्यपि आदिको वृत्ति व्याप्त करती है, तब घट आदिमें रहनेवाली अस्वच्छता उस वृत्तिसे तिरस्कृत हो जाती है, इसलिए घट आदिमें चैतन्याभिव्यञ्जनकी योग्यताका आधान वृत्ति करती है अतः 'अन्तःकरणं हि स्वस्मिन्निव स्वसंसर्गिण्यपि घटादौ चैतन्याभिव्यक्तियोग्यतामापादयति' (अन्तःकरण ही अपनी नाई अपनेसे सम्बन्ध रखनेवाले घट आदिमें भी चैतन्यकी अभिव्यक्तिकी योग्यताका सम्पादन करता है), यह कथन भी उपपन्न होता है। लोकमें यह देखा भी जाता है कि जो स्वतः अस्वच्छ है, वह स्वच्छद्रव्यके संयोगसे प्रतिबिम्ब आदिका ग्रहण करता है, जैसे भित्ति स्वतः अस्वच्छ है, परन्तु जल आदि स्वच्छ द्रव्यके साथ सम्बन्ध होनेसे उसमें प्रतिबिम्बग्रहण करनेकी योग्यता आ जाती है। घट आदिमें स्वसन्निहित जीवचैतन्यकी प्रतिबिम्बग्राहिता ही जीवचैतन्यकी व्यञ्जकता है और प्रतिबिम्बितत्व चैतन्यका व्यङ्ग्यत्व है। विवरणमें भी इसी प्रकारके व्यङ्ग्यव्यञ्जकतारूप सम्बन्धके लिए वृत्तिके निर्गमनका वर्णन किया गया है। और वृत्तिद्वारा सम्पादित इसी सम्बन्धसे घट आदिका अवभास होता है।
* प्रश्नकर्ताका तात्पर्य यह है कि अभेदाभिव्यक्ति वृत्तिका प्रयोजन है, यह द्वितीयपक्ष जीवको परिच्छिन्न मानकर कहा गया है। इसलिए इस मतमें अन्तःकरणोपाधिक जीवकी और बिम्बभूत विषयावच्छिन्न ब्रह्मचैतन्यकी वृत्तिसे अभेदाभिव्यक्ति नहीं हो सकती, क्योंकि जैसे अखण्डब्रह्माकारवृत्ति उपाधिकी निवर्तक है, वैसे घटाद्याकारवृत्ति उपाधिकी निवर्तक नहीं है, अतः भेद करनेवाली उपाधिके (अन्तःकरण और विषयके) रहनेसे जीव और ब्रह्मका अभेद अभिव्यक्त नहीं हो सकता, इसलिए इस मतमें अभेदाभिव्यक्ति क्या है, यह प्रश्न है।
† तात्पर्य यह है कि यद्यपि उपाधि ही उपधेयका भेद करनेवाली है। परन्तु वह यदि एकदेशस्थ हो जाय अर्थात् उपाधि और उपधेय एकदेशमें रह जाँय, तो भेदक नहीं होती,
अभेदामिव्यक्तिका स्वरूपविचार ] भाषानुवादसहित १५३
विषयावच्छिन्नं ब्रह्मचैतन्यमेव विषयप्रकाशकम्, तथाऽपि तस्य वृत्ति- द्वारा एकीभावेन जीवत्वं सम्पन्नमिति जीवस्य विषयप्रकाशोपपत्तिरिति ।
सत्युपाधौ दृढं बिम्बप्रतिबिम्बभिदास्थितेः ।
वृत्त्यग्रे विषयस्फूर्त्याभासार्पणमितीतरे ॥ ७० ॥
कोई लोग कहते हैं कि उपाधिके रहनेपर बिम्ब और प्रतिबिम्बका भेद अवश्य रहता है, इससे वृत्तिके अग्रभागमें ब्रह्मचैतन्य विषयके प्रकाशक प्रतिबिम्बका अर्पण करता है [ और इस प्रतिबिम्बका जीवके साथ एकीभाव अभेदाभिव्यक्ति है ] ॥ ७० ॥
अन्ये त्वाहुः--बिम्बस्थानीयस्य विषयावच्छिन्नस्य ब्रह्मणः प्रतिबिम्ब- भूतेन जीवेन एकीभावो नाऽभेदाभिव्यक्तिः । व्यावर्तकोपाधौ दर्पण इव
विषयावच्छिन्न ब्रह्मचैतन्य ही विषयका अवभासक होता है, जीवचैतन्य विषयका अवभासक नहीं होता, तथापि विषयावच्छिन्न ब्रह्मचैतन्यका वृत्ति द्वारा अन्तःकरणा- वच्छिन्न चैतन्यके साथ एकीभाव होनेसे उसमें (विषयावच्छिन्न ब्रह्मचैतन्यमें) जीवत्वका सम्भव है, इसलिए 'जीव विषयका प्रकाशक है' ऐसा उपपन्न होता है‡।
कोई लोग कहते हैं कि बिम्बस्थानापन्न विषयावच्छिन्न ब्रह्मका प्रतिबिम्बभूत जीवके साथ एकीभाव अभेदाभिव्यक्ति नहीं है, क्योंकि व्यावर्तक
जैसे घट यदि मठमें रहे तो घटावच्छिन्न आकाश और मठावच्छिन्न आकाश भिन्न नहीं होते, क्योंकि मठ और घट एकदेशमें रहते हैं, वैसे ही प्रकृतमें अन्तःकरण और विषय यद्यपि अलग अलग हैं, तथापि वृत्तिद्वारा वे दोनों एकदेशस्थ हुए, इसलिए विषयावच्छिन्न चैतन्य और अन्तःकरणा- वच्छिन्न चैतन्य भिन्न भिन्न नहीं हुए किन्तु एक हुए, यही अभेदाभिव्यक्ति वृत्तिद्वारा अभीप्सित है।
‡ सारांश यह है कि अभेदाभिव्यक्ति होनेपर भी जीवचैतन्य विषयका अवभासक नहीं हो सकता है, क्योंकि यह विषयके प्रति उपादान नहीं है; अतः उसका (जीवचैतन्यका) विषयके साथ तादात्म्य नहीं है। यदि यह कहा जाय कि ब्रह्मचैतन्य ही उपादान होनेसे विषयोंका अवभासक हो, तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि 'आलोकसे घट प्रकाशित हुआ' इस प्रतीतिके समान 'मैंने घट जाना' ऐसी जीव द्वारा घट आदिका अवभास बोधक- प्रतीति होती है। इसलिए ब्रह्मचैतन्य ही विषयका अवभासक है, क्योंकि विषयादिके साथ उसीका वस्तुतः तादात्म्य है। इसपर उत्तर दिया जाता है कि यद्यपि उक्त शङ्का ठीक है, तथापि वृत्तिके द्वारा जीवचैतन्य और ब्रह्मचैतन्यके एक होनेसे ब्रह्मचैतन्य यदि विषयोपादान है, तो जीवचैतन्य भी विषयोपादान हुआ ही और घट आदिके साथ उसका भी तादात्म्य है, अतः जीवमें विषयावभासकत्वकी अनुपपत्ति नहीं है, इसलिए 'मैंने घट जाना' इत्यादि प्रतीतिकी उपपत्ति भी हो सकती है,
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