सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)
Siddhanta Lesha Sangraha Hindi
श्रीमदप्पय्य दीक्षित द्वारा
स्रोत: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (उद्गम)
पृष्ठ 183, कुल 590 में से
संदर्भ में पढ़ेंअभेदामिव्यक्तिका स्वरूपविचार ] भाषानुवादसहित १५३
विषयावच्छिन्नं ब्रह्मचैतन्यमेव विषयप्रकाशकम्, तथाऽपि तस्य वृत्ति- द्वारा एकीभावेन जीवत्वं सम्पन्नमिति जीवस्य विषयप्रकाशोपपत्तिरिति ।
सत्युपाधौ दृढं बिम्बप्रतिबिम्बभिदास्थितेः ।
वृत्त्यग्रे विषयस्फूर्त्याभासार्पणमितीतरे ॥ ७० ॥
कोई लोग कहते हैं कि उपाधिके रहनेपर बिम्ब और प्रतिबिम्बका भेद अवश्य रहता है, इससे वृत्तिके अग्रभागमें ब्रह्मचैतन्य विषयके प्रकाशक प्रतिबिम्बका अर्पण करता है [ और इस प्रतिबिम्बका जीवके साथ एकीभाव अभेदाभिव्यक्ति है ] ॥ ७० ॥
अन्ये त्वाहुः--बिम्बस्थानीयस्य विषयावच्छिन्नस्य ब्रह्मणः प्रतिबिम्ब- भूतेन जीवेन एकीभावो नाऽभेदाभिव्यक्तिः । व्यावर्तकोपाधौ दर्पण इव
विषयावच्छिन्न ब्रह्मचैतन्य ही विषयका अवभासक होता है, जीवचैतन्य विषयका अवभासक नहीं होता, तथापि विषयावच्छिन्न ब्रह्मचैतन्यका वृत्ति द्वारा अन्तःकरणा- वच्छिन्न चैतन्यके साथ एकीभाव होनेसे उसमें (विषयावच्छिन्न ब्रह्मचैतन्यमें) जीवत्वका सम्भव है, इसलिए 'जीव विषयका प्रकाशक है' ऐसा उपपन्न होता है‡।
कोई लोग कहते हैं कि बिम्बस्थानापन्न विषयावच्छिन्न ब्रह्मका प्रतिबिम्बभूत जीवके साथ एकीभाव अभेदाभिव्यक्ति नहीं है, क्योंकि व्यावर्तक
जैसे घट यदि मठमें रहे तो घटावच्छिन्न आकाश और मठावच्छिन्न आकाश भिन्न नहीं होते, क्योंकि मठ और घट एकदेशमें रहते हैं, वैसे ही प्रकृतमें अन्तःकरण और विषय यद्यपि अलग अलग हैं, तथापि वृत्तिद्वारा वे दोनों एकदेशस्थ हुए, इसलिए विषयावच्छिन्न चैतन्य और अन्तःकरणा- वच्छिन्न चैतन्य भिन्न भिन्न नहीं हुए किन्तु एक हुए, यही अभेदाभिव्यक्ति वृत्तिद्वारा अभीप्सित है।
‡ सारांश यह है कि अभेदाभिव्यक्ति होनेपर भी जीवचैतन्य विषयका अवभासक नहीं हो सकता है, क्योंकि यह विषयके प्रति उपादान नहीं है; अतः उसका (जीवचैतन्यका) विषयके साथ तादात्म्य नहीं है। यदि यह कहा जाय कि ब्रह्मचैतन्य ही उपादान होनेसे विषयोंका अवभासक हो, तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि 'आलोकसे घट प्रकाशित हुआ' इस प्रतीतिके समान 'मैंने घट जाना' ऐसी जीव द्वारा घट आदिका अवभास बोधक- प्रतीति होती है। इसलिए ब्रह्मचैतन्य ही विषयका अवभासक है, क्योंकि विषयादिके साथ उसीका वस्तुतः तादात्म्य है। इसपर उत्तर दिया जाता है कि यद्यपि उक्त शङ्का ठीक है, तथापि वृत्तिके द्वारा जीवचैतन्य और ब्रह्मचैतन्यके एक होनेसे ब्रह्मचैतन्य यदि विषयोपादान है, तो जीवचैतन्य भी विषयोपादान हुआ ही और घट आदिके साथ उसका भी तादात्म्य है, अतः जीवमें विषयावभासकत्वकी अनुपपत्ति नहीं है, इसलिए 'मैंने घट जाना' इत्यादि प्रतीतिकी उपपत्ति भी हो सकती है,
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