भारतकोश
सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

Siddhanta Lesha Sangraha Hindi

श्रीमदप्पय्य दीक्षित द्वारा

स्रोत: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (उद्गम)

DevanagariHindipublished590 पृष्ठ

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पृष्ठ 184
१५४सिद्धान्तलेशसंग्रह[ प्रथम परिच्छेद

जाग्रति तयोरेकीभावायोगात् ।

वृत्तिकृताभेदाभिव्यक्त्या विषयावच्छिन्नस्य ब्रह्मणो जीवत्वप्राप्तौ ब्रह्मणस्तदा तद्विषयसंसर्गाभावेन तद्द्रष्टृत्वासम्भवे सति तस्य सर्वज्ञत्वाभावापत्तेश्च । किन्तु विषयावच्छिन्नं ब्रह्मचैतन्यं विषयसंसृष्टाया वृत्तेरग्रभागे

दर्पण आदि उपाधिके रहनेपर प्रतिबिम्ब और बिम्बका एकीभाव होगा ही नहीं । [ भाव यह है कि जैसे दर्पणके रहनेपर दर्पणमें पड़ा हुआ प्रतिबिम्ब और बिम्बस्थानीय मुख आदिका अभेद अभिव्यक्त नहीं होता, क्योंकि उस स्थलमें बिम्ब और प्रतिबिम्बका स्पष्टरूपसे भेद भासता है, वैसे ही प्रकृत स्थलमें विषय और अन्तःकरणरूप व्यावर्तक उपाधिके रहते बिम्बभूत ब्रह्मचैतन्य और प्रतिबिम्बभूत जीवचैतन्यका अभेद भी अभिव्यक्त नहीं हो सकता, इसलिए वृत्तिसे अभेदाभिव्यक्ति होती है, यह कहना उचित नहीं है ] ।

* और कथञ्चित् यह मान भी लिया जाय कि वृत्तिसे अभेद अभिव्यक्त होता है, तो यह आपत्ति आवेगी कि वृत्तिद्वारा अभेदाभिव्यक्तिसे विषयावच्छिन्न ब्रह्ममें भी जीवत्वकी प्राप्ति होनेसे उस समयमें ब्रह्मका उस विषयके साथ सम्बन्ध न होनेसे ब्रह्मको उस विषयका अवभास नहीं होगा, इससे ब्रह्म असर्वज्ञ होगा । [ तात्पर्य यह है कि विषयावच्छिन्न ब्रह्मके जीव होनेपर उससे ईश्वरत्वकी निवृत्ति अवश्य माननी होगी, इस परिस्थितिमें ब्रह्मकी जीवावस्थामें घटादि विषयके साथ ब्रह्मका संसर्ग नहीं है, इसलिए घटादि विषयका द्रष्टा भी ब्रह्म नहीं होगा । अतः ब्रह्मको विषयका परिज्ञान न होनेसे ब्रह्ममें असर्वज्ञत्व स्पष्ट ही प्रसक्त होगा ] ।


* द्वितीय दोष देनेका तात्पर्य यह है कि तत्त्वसाक्षात्कारसे जैसी अभेदाभिव्यक्ति होती है, प्रकृतमें वैसी अभेदाभिव्यक्ति विवक्षित नहीं है, किन्तु एक पात्रमें क्षीर और नीरके रखनेसे जैसा उनका अभेद प्रतीत होता है, वैसा ही वृत्तिसे अन्तःकरण और विषयरूप उपाधिके एकदेशस्थ होनेसे तन्निबन्धन विषयावच्छिन्न चैतन्य और अन्तःकरणावच्छिन्न चैतन्यकी केवल औपचारिक अभेदाभिव्यक्ति विवक्षित है । इस औपचारिक अभेदाभिव्यक्तिमें व्यावहारिक उपाधिप्रयुक्त दोष नहीं है, अर्थात् उपाधिके रहनेपर अभेद नहीं हो सकता, यह दोष नहीं है; क्योंकि 'मेरा ही मुख दर्पणमें भासता है' इस प्रकार प्रतिबिम्ब और बिम्बका अभेद अभिव्यक्त होता है । इसलिए अभेदाभिव्यक्तिपक्षमें निर्वाह हो सकता है, अतः 'बिम्बस्थानीयस्य' इत्यादिसे कहा गया दोष युक्त नहीं है, इस अस्वरससे 'वृत्तिकृता०' इत्यादिसे द्वितीय दोष कहते हैं ।

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