सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)
Siddhanta Lesha Sangraha Hindi
श्रीमदप्पय्य दीक्षित द्वारा
स्रोत: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (उद्गम)
पृष्ठ 185, कुल 590 में से
संदर्भ में पढ़ेंअभेदाभिव्यक्तिका स्वरूपविचार] भाषानुवादसहित १५५
विषयप्रकाशकं प्रतिबिम्बं समर्पयतीति तस्य प्रतिबिम्बस्य जीवेनैकीभावः । एवं चाऽन्तःकरणतद्वृत्तिविषयावच्छिन्नचैतन्यानां प्रमातृप्रमाणप्रमेयभावेन असङ्करोऽप्युपपद्यते । न च वृत्त्युपहितचैतन्यस्य विषयप्रमात्वे तस्य विषयाधिष्ठानचैतन्यस्येव विषयेणाऽऽध्यासिकसम्बन्धाभावात् विषयापरोक्ष्ये आध्यासिकसम्बन्धस्तन्त्रं न स्यादिति वाच्यम्, विषयाधिष्ठानचैतन्यस्यैव
इसलिए विम्बस्थानीय ब्रह्मका जीवके साथ एकीभाव अभेदाभिव्यक्ति नहीं है, किन्तु विषयावच्छिन्न ब्रह्मचैतन्य विषयसंसृष्ट वृत्तिके अग्र भागमें विषयका प्रकाश करनेवाले अपने प्रतिबिम्बका समर्पण करता है, इसलिए उसके प्रतिबिम्बका ही जीवके साथ एकीभाव है। [और यही प्रतिबिम्बके साथ एकीभाव अभेदाभिव्यक्ति है, तात्पर्य यह है कि जैसे कौस्तुभमणि या किसी रत्नकी प्रभा अपने स्थानसे निकलती हुई बड़े आकारमें परिणत होकर विषयदेशपर्य्यन्त जाती है, वैसे ही हृदयदेशमें रहनेवाले अन्तःकरणकी वृत्ति अन्तःकरणसे लेकर विषयपर्यन्त अवच्छिन्नरूपसे जाती है, इस वृत्तिका विषयके साथ सम्बद्ध भाग अग्रभाग कहा जाता है। उस अग्रभागमें पड़े हुए ब्रह्मके विषयप्रकाशक प्रतिबिम्बके साथ जीवका एकीभाव 'अभेदाभिव्यक्ति' है। वृत्ति और वृत्तिमान्का अभेद होनेसे वृत्ति और वृत्तिमान्में प्रतिबिम्बित वस्तुका भी अभेद हो सकता है], इसलिए—वृत्तिबिम्बित चैतन्यका वस्तुतः अन्तःकरणप्रतिबिम्बित चैतन्यसे भेद ही है, परन्तु वृत्तिके द्वारा अमेदाभिव्यक्ति होनेपर उनमें विषयाभासकत्वका स्वीकार करनेसे अन्तःकरण, अन्तःकरणकी वृत्ति और विषय—इन तीनोंसे अवच्छिन्न चैतन्योंका प्रमाता, प्रमाण और प्रमेय रूपसे असङ्कर (भेद) भी उपपन्न होता है। ✱ यदि वृत्तिसे उपहित (वृत्तिरूप उपाधिसे युक्त) चैतन्य प्रमा मानी जायगी, तो उसका विषयाधिष्ठान चैतन्यके समान विषयके साथ आध्यासिक सम्बन्ध न होनेसे विषयकी अपरोक्षतामें आध्यासिक सम्बन्ध तन्त्र नहीं होगा, इस प्रकारकी
✱ अन्तःकरणावच्छिन्न चैतन्य प्रमाता है, अन्तःकरणवृत्त्यवच्छिन्न चैतन्य प्रमाण है और विषयावच्छिन्न ब्रह्मचैतन्य प्रमेय है, इस प्रकार अन्तःकरणप्रतिबिम्बित और अन्तःकरणवृत्ति-प्रतिबिम्बित चैतन्य प्रमाता और प्रमाण चैतन्य हैं। इस प्रकारका भेद उपपन्न होता है, यह भाव है।