सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)
Siddhanta Lesha Sangraha Hindi
श्रीमदप्पय्य दीक्षित द्वारा
स्रोत: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (उद्गम)
पृष्ठ 182, कुल 590 में से
संदर्भ में पढ़ें| १५२ | सिद्धान्तलेशसंग्रह | [ प्रथम परिच्छेद |
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अथ द्वितीये काऽभेदव्यक्तिस्तत्राऽपि केचन ।
कुल्याद्वारेव सा वृत्त्या क्षेत्रकासारवारिणोः ॥ ६९ ॥
द्वितीय पक्षमें अभेदाभिव्यक्ति क्या है ? इस प्रश्नके उत्तरमें कोई लोग कहते हैं कि जैसे खेत और तालाबका जल नाली द्वारा एक होता है, वैसे ही वृत्ति द्वारा विषयावच्छिन्न चैतन्य और अन्तःकरणावच्छिन्न चैतन्यका एक होना अभेदाभिव्यक्ति है ॥६९॥
अथ द्वितीयपक्षे केयमभेदाभिव्यक्तिः ?
केचिदाहुः—कुल्याद्वारा तडागकेदारसलिलयोरिव विषयान्तःकरणावच्छिन्नचैतनयोर्वृत्तिद्वारा एकीभावोऽभेदाभिव्यक्तिः एवं च यद्यपि
वृत्तिका प्रयोजन अभेदकी अभिव्यक्ति है, ऐसा जो द्वितीय कल्प कहा गया है, उसमें अभेदाव्यक्तिका स्वरूप क्या है * ?
इस आक्षेपके समाधानमें कोई लोग कहते हैं कि जैसे नालीद्वारा तालाब और खेतके जलका एकीभाव—अभेदाभिव्यक्ति होती है, वैसे ही विषयावच्छिन्न चैतन्य और अन्तःकरणावच्छिन्न चैतन्यका जो वृत्तिद्वारा एकीभाव है, वही अभेदाभिव्यक्ति है †। इस रीतिसे यद्यपि आदिको वृत्ति व्याप्त करती है, तब घट आदिमें रहनेवाली अस्वच्छता उस वृत्तिसे तिरस्कृत हो जाती है, इसलिए घट आदिमें चैतन्याभिव्यञ्जनकी योग्यताका आधान वृत्ति करती है अतः 'अन्तःकरणं हि स्वस्मिन्निव स्वसंसर्गिण्यपि घटादौ चैतन्याभिव्यक्तियोग्यतामापादयति' (अन्तःकरण ही अपनी नाई अपनेसे सम्बन्ध रखनेवाले घट आदिमें भी चैतन्यकी अभिव्यक्तिकी योग्यताका सम्पादन करता है), यह कथन भी उपपन्न होता है। लोकमें यह देखा भी जाता है कि जो स्वतः अस्वच्छ है, वह स्वच्छद्रव्यके संयोगसे प्रतिबिम्ब आदिका ग्रहण करता है, जैसे भित्ति स्वतः अस्वच्छ है, परन्तु जल आदि स्वच्छ द्रव्यके साथ सम्बन्ध होनेसे उसमें प्रतिबिम्बग्रहण करनेकी योग्यता आ जाती है। घट आदिमें स्वसन्निहित जीवचैतन्यकी प्रतिबिम्बग्राहिता ही जीवचैतन्यकी व्यञ्जकता है और प्रतिबिम्बितत्व चैतन्यका व्यङ्ग्यत्व है। विवरणमें भी इसी प्रकारके व्यङ्ग्यव्यञ्जकतारूप सम्बन्धके लिए वृत्तिके निर्गमनका वर्णन किया गया है। और वृत्तिद्वारा सम्पादित इसी सम्बन्धसे घट आदिका अवभास होता है।
* प्रश्नकर्ताका तात्पर्य यह है कि अभेदाभिव्यक्ति वृत्तिका प्रयोजन है, यह द्वितीयपक्ष जीवको परिच्छिन्न मानकर कहा गया है। इसलिए इस मतमें अन्तःकरणोपाधिक जीवकी और बिम्बभूत विषयावच्छिन्न ब्रह्मचैतन्यकी वृत्तिसे अभेदाभिव्यक्ति नहीं हो सकती, क्योंकि जैसे अखण्डब्रह्माकारवृत्ति उपाधिकी निवर्तक है, वैसे घटाद्याकारवृत्ति उपाधिकी निवर्तक नहीं है, अतः भेद करनेवाली उपाधिके (अन्तःकरण और विषयके) रहनेसे जीव और ब्रह्मका अभेद अभिव्यक्त नहीं हो सकता, इसलिए इस मतमें अभेदाभिव्यक्ति क्या है, यह प्रश्न है।
† तात्पर्य यह है कि यद्यपि उपाधि ही उपधेयका भेद करनेवाली है। परन्तु वह यदि एकदेशस्थ हो जाय अर्थात् उपाधि और उपधेय एकदेशमें रह जाँय, तो भेदक नहीं होती,