भारतकोश
सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

Siddhanta Lesha Sangraha Hindi

श्रीमदप्पय्य दीक्षित द्वारा

स्रोत: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (उद्गम)

DevanagariHindipublished590 पृष्ठ

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पृष्ठ 170
१४०सिद्धान्तलेशसंग्रह[ प्रथम परिच्छेद

भाष्येऽस्य जीवलिङ्गत्वकीर्त्तनादिति ते विदुः ॥ ६० ॥

सूक्ष्मरूपसे सभी पदार्थोंके विद्यमान होनेके कारण साक्षिरूपसे ब्रह्म सब वस्तुका अवभासक है। ऐसा कौमुदीकार कहते हैं। ज्ञानरूपत्व ही सर्वज्ञत्व है, ज्ञानकर्तृत्वरूप नहीं, इसीलिए भाष्यमें ज्ञानकर्तृत्व जीवका लिङ्ग कहा गया है, ऐसा भी वे (कौमुदीकार) कहते हैं ॥५९॥६०॥

कौमुदीकृतस्तु वदन्ति—स्वरूपज्ञानेनैव ब्रह्मणः स्वसंसृष्टसर्वावभासकत्वात् सर्वज्ञत्वम्। अतीतानागतयोरप्यविद्यायां चित्रभित्तौ विमृष्टानुन्मीलितचित्रवत् संस्कारात्मना सत्त्वेन तत्संसर्गस्याऽप्युपपत्तेः। न तु वृत्तिज्ञानैस्तस्य सर्वज्ञत्वम्। 'तमेव भान्तमनु भाति सर्वम्' इति

कौमुदीकार कहते हैं कि स्वरूपज्ञानसे ही * ब्रह्म अपने साथ सम्बद्ध सब पदार्थोंका अवभासक होनेसे सर्वज्ञ है। जैसे विमृष्ट होनेसे अनभिव्यक्त चित्र संस्काररूपसे चित्रभित्तिमें रहता है, वैसे ही अतीत और अनागत पदार्थ अविद्याके संस्काररूपसे रहते हैं, अतः उनके साथ ब्रह्मका सम्बन्ध है, इसलिए अतीत और अनागत विषयके साथ सम्बन्ध होनेसे तत् संसृष्ट ब्रह्म सर्वज्ञ है। वृत्तिज्ञानसे ब्रह्म सर्वज्ञ नहीं है, क्योंकि 'तमेव भान्त०' (उसके ही


* पूर्वके दो मतोंसे वृत्तिज्ञान द्वारा ब्रह्ममें सर्वज्ञत्वका निरूपण किया गया है, और इस मतसे स्वरूपज्ञानसे ब्रह्मकी सर्वज्ञताका निरूपण किया जाता है। अतीत और अनागत प्रपञ्च प्रलयकालमें और सृष्टिकालमें संस्काररूपसे विद्यमान रहते हैं, इसलिए उनका ब्रह्मके साथ सम्बन्ध होता है, अतः अतीत और अनागत वस्तुओंसे सम्पृक्त ब्रह्ममें सर्वज्ञत्वकी अनुपपत्ति नहीं हो सकती है। देवताधिकरणके भाष्यमें और आरम्भणाधिकरणके भाष्यमें अतीत और अनागत वस्तुकी प्रलयकालमें और सृष्टिकालमें संस्कारात्मना अवस्थिति रहती है, इसका निरूपण किया गया है। इसमें एक बातकी न्यूनता रहती है, उसे जानना चाहिए—जब स्थूल प्रपञ्चका अवस्थान है तब सूक्ष्म प्रपञ्च नहीं है और प्रलयकालमें सूक्ष्म प्रपञ्च है, तो उस कालमें स्थूल प्रपञ्च नहीं है, अतः सब कालमें सब प्रपञ्चके साथ ब्रह्मका सम्बन्ध न होनेसे ब्रह्ममें असंकुचित सर्वज्ञत्व सिद्ध नहीं होगा।

'तमेव भान्तम्' इसमें 'एव'के अवधारणार्थक होनेसे यह अर्थ स्पष्ट भासता है कि ब्रह्म विषयके प्रकाशनमें अन्य किसी वस्तुकी अपेक्षा नहीं करता है, अतः ब्रह्मकी सर्वज्ञतामें वृत्तिकी अपेक्षा नहीं है, परन्तु स्वरूपज्ञानसे ही ब्रह्म स्वसम्बद्ध सकल पदार्थोंका अवभास करता है। इस विषयमें भी कुछ विचारणीय अंश है, जैसे ब्रह्मचैतन्य जगत्के अवभासनके लिए मायावृत्तिकी अपेक्षा करे तो 'तमेव' इस श्रौत अवधारणके साथ विरोध होता है, वैसे ही घट आदिके अवभासनमें जीव अन्तःकरण वृत्तिकी अपेक्षा करता है, तो श्रौत अवधारणके