भारतकोश
सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

Siddhanta Lesha Sangraha Hindi

श्रीमदप्पय्य दीक्षित द्वारा

स्रोत: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (उद्गम)

DevanagariHindipublished590 पृष्ठ

पृष्ठ 171, कुल 590 में से

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ब्रह्मकी सर्वज्ञताका स्वरूपविचार ] भाषानुवादसहित १४१

सावधारणश्रुतिविरोधात् सृष्टेः प्रागेकमेवाद्वितीयमित्यवधारणानुरोधेन महाभूतानामिव वृत्तिज्ञानानामपि प्रलयस्य वक्तव्यतया ब्रह्मणस्तदा सर्वज्ञत्वाभावापत्त्या प्राथमिकमायाविवर्तरूपे ईक्षणे तत्पूर्वके महाभूतादौ च स्रष्टृत्वाभावप्रसङ्गाच्च । एवं सति ब्रह्मणस्सर्वविषयज्ञानात्मकत्वमेव स्यात्, न तु सर्वज्ञातृत्वरूपं सर्वज्ञत्वमिति चेत्, सत्यम् । सर्वविषयज्ञानात्मकमेव ब्रह्म, न तु सर्वज्ञानकर्तृत्वरूपं ज्ञातृत्वमस्ति । अत एव 'वाक्यान्वयात्'

प्रकाशित होनेपर सब वस्तुओंका प्रकाश होता है ) इस अवधारण ( एव ) के सहित श्रूयमाण श्रुतिके साथ विरोध होगा और 'एकमेवाद्वितीयम्' ( एक ही अद्वितीय ) इस अवधारण श्रुतिके आधारपर सृष्टिके पूर्वकालमें महाभूतोंके समान वृत्तिज्ञानोंका प्रलय है, यह कहना होगा, इसलिए उस कालमें वृत्तिका अभाव होनेसे ब्रह्ममें सर्वज्ञत्वाभावकी प्रसक्ति होगी और प्राथमिक ( आद्य ) मायाके प्रथम परिणाम ईक्षणमें और उस ईक्षणपूर्वक महाभूत आदिकी सृष्टिमें ब्रह्मकी स्रष्टता भी नहीं रहेगी ।

इस परिस्थितिमें ब्रह्मकी सर्ववस्तुविषयज्ञानात्मकता ही सर्वज्ञता होगी, सर्वज्ञानकर्तृत्त्वरूप नहीं होगी, ठीक है, सर्वविषयकज्ञानात्मकत्व ही सर्वज्ञत्व है, क्योंकि सर्वविषयकज्ञानस्वरूप ब्रह्म है, सर्वज्ञानकर्तृत्वरूप ज्ञातृत्व


साथ विरोध होगा ही, यदि इस अनुपपत्तिके परिहारके लिए सम्पूर्ण जड़ वस्तुएँ वृत्तिवाक्षित चैतन्यसे ही प्रकाशित होती हैं, यह अवधारणश्रुतिका अर्थ माना जाय, तो ब्रह्मचैतन्य भी मायावृत्तिकी अपेक्षा करके जड़ वस्तुको प्रकाशित कर सकता है, इसमें आपत्ति नहीं है ।

इस मतमें वृत्त्यनपेक्ष ब्रह्म स्वरूप ज्ञानसे ही सर्वावभासक होकर सर्वज्ञ है, यह कहा जाता है, क्योंकि 'एकमेवाद्वितीयं ब्रह्म' इत्यादि श्रुतिके आधारपर प्रलयकालमें सब वृत्तियोंका विनाश प्रतीत होता है । इसलिए वृत्ति द्वारा, सृष्टिके पूर्वकालमें वृत्तिका अभाव होनेसे, 'तदैक्षत' ( उसने ईक्षण किया ) इस प्रकार ईक्षण नहीं हो सकता है । यहाँपर भी विचार करने लायक एक बात है—सृष्टिके पूर्वकालमें माया आदिकी सत्ताका अवश्य अङ्गीकार करना होगा, क्योंकि वेदान्तसिद्धान्तमें अविद्या आदि छः पदार्थ अनादि माने गये हैं । 'एकमेवाद्वितीयम्' इत्यादि अद्वितीयत्वके अवधारणको मुख्य नहीं मान सकते हैं, परन्तु माया आदिके अनादित्वकी प्रतिपादक श्रुतिके आधारपर व्याकृत—कार्य्यरूप द्वितीयसे रहित ब्रह्म था, यह 'अद्वितीयम्' का अर्थ करना होगा । इसी न्यायके अनुसार सर्वविषयकज्ञानकर्तृत्वप्रतिपादक श्रुतिके बलसे मायावृत्तिसे व्यतिरिक्त कोई द्वितीय वस्तु है ही नहीं, ऐसा अर्थ अद्वितीय श्रुतिका क्यों न किया जाय । और ईक्षत्यधिकरणमें भाष्यकारने भी मायावृत्तिसे ही सर्वज्ञत्वका समर्थन किया है ।