सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)
Siddhanta Lesha Sangraha Hindi
श्रीमदप्पय्य दीक्षित द्वारा
स्रोत: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (उद्गम)
पृष्ठ 175, कुल 590 में से
संदर्भ में पढ़ेंवृत्तिके उपयोगका विचार ] भाषानुवादसहित १४५
घटादिकमवभासयति। वृत्तिद्वारा तत्संसृष्टविषयावच्छिन्नब्रह्मचैतन्याभेदाभिव्यक्तौ तु तं विषयं प्रकाशयति।
अथवा सर्वगोऽविद्यावृतोऽसौ न प्रकाशते ।
बुद्धावनावृतो वृत्तिर्भङ्गावरणभासकः ॥ ६४ ॥
अथवा यद्यपि जीव व्यापक और अन्तःकरणावच्छेदेन अनावृत है, तथापि अविद्यावृत होनेसे स्वयं अप्रकाशमान होकर विषयोंका प्रकाश नहीं करता है। वृत्तिद्वारा आवरणका भङ्ग होनेपर तो विषयोंका प्रकाश करता है ॥६४॥
अथवा जीवः सर्वगतोऽप्यविद्यावृतत्वात् स्वयमप्यप्रकाशमानतया विषयाननवभासयन् विषयविशेषे वृत्त्युपरागादावरणतिरोधानेन तत्रैवाऽभि-
कर सकता है। वृत्तिके द्वारा वृत्तिमान् अन्तःकरणके साथ सम्बद्ध विषयावच्छिन्न ब्रह्मचैतन्यके साथ अन्तःकरणावच्छिन्न जीवचैतन्यकी अभेदाभिव्यक्ति होनेसे तो वह जीवचैतन्य घट आदि विषयका प्रकाश करता है * ।
† अथवा जीवके सर्वगत होनेपर भी अविद्यावृत होनेसे वह स्वयं भी
* पहला परिहार—जीवको अविद्याप्रतिबिम्ब मान कर और उसे व्यापक स्वीकार करके किया गया है। इस ‘यद्वा’ पक्षमें जीवको अन्तःकरणोपाधिक मान कर उसे परिच्छन्न माना है, अतः इस मतमें सर्वज्ञत्वकी शङ्का ही नहीं है, क्योंकि स्वल्प परिमाणवाले जीवका विषयोंके साथ संबन्ध न होनेसे वृत्तिके बिना वह प्रकाश नहीं कर सकता है, यह भाव है। इस मतमें अभेदाभिव्यक्ति ही वृत्तिका प्रयोजन है, इस पक्षका अवलम्बन करके वृत्ति द्वारा विषयावच्छिन्न चैतन्य और अन्तःकरणावच्छिन्न चैतन्यकी अभेदाभिव्यक्ति होनेके बाद ही विषयोंका प्रकाश होगा, यह विशेष है।
† अविद्याप्रतिबिम्बित चैतन्य जीव है, इस प्रथम पक्षको मान कर इस ‘अथवा’ कल्पसे परिहार करते हैं । यद्यपि इस पक्षमें जीव व्यापक और जगत्के प्रति अनुपादान है, तथापि उसका संसर्ग माना जाता है। ‘सर्वगतोऽपि’ इसको उपलक्षण मान कर ‘विषयसंसृष्टोऽपि’ (विषयके साथ संसृष्ट होनेपर भी) यह भी जानना चाहिए। अन्यथा यह शङ्का मूलमें हो सकती है कि जीवके व्यापक होनेपर भी विषयोंके साथ उसका संसर्ग न होनेसे जीव विषयका प्रकाश नहीं करता है, यह कह सकते हैं, फिर आवृत माननेकी कोई आवश्यकता नहीं है। यद्यपि ‘मां न जानामि’ (मैं अपनेको नहीं जानता हूँ) इस प्रकारका अनुभव नहीं होता है, इसलिए जीव आवृत नहीं हो सकता है, यह शङ्का हो सकती है, परन्तु यह युक्त नहीं है, क्योंकि अन्तःकरणोपहित चैतन्य ही ‘माम्’ प्रतीतिका विषय होनेसे व्यापक जीवचैतन्यमें अन्तःकरणावच्छेदरूपसे आवृतत्वके न रहनेपर भी विषयदेशमें वह आवृत ही है, और ‘व्यापकरूपसे मैं अपनेको नहीं जानता हूँ’ इस प्रकारका अनुभव भी होता है।
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