सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)
Siddhanta Lesha Sangraha Hindi
श्रीमदप्पय्य दीक्षित द्वारा
स्रोत: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (उद्गम)
वृत्तिके उपयोगका विचार ] भाषानुवादसहित १४५
घटादिकमवभासयति। वृत्तिद्वारा तत्संसृष्टविषयावच्छिन्नब्रह्मचैतन्याभेदाभिव्यक्तौ तु तं विषयं प्रकाशयति।
अथवा सर्वगोऽविद्यावृतोऽसौ न प्रकाशते ।
बुद्धावनावृतो वृत्तिर्भङ्गावरणभासकः ॥ ६४ ॥
अथवा यद्यपि जीव व्यापक और अन्तःकरणावच्छेदेन अनावृत है, तथापि अविद्यावृत होनेसे स्वयं अप्रकाशमान होकर विषयोंका प्रकाश नहीं करता है। वृत्तिद्वारा आवरणका भङ्ग होनेपर तो विषयोंका प्रकाश करता है ॥६४॥
अथवा जीवः सर्वगतोऽप्यविद्यावृतत्वात् स्वयमप्यप्रकाशमानतया विषयाननवभासयन् विषयविशेषे वृत्त्युपरागादावरणतिरोधानेन तत्रैवाऽभि-
कर सकता है। वृत्तिके द्वारा वृत्तिमान् अन्तःकरणके साथ सम्बद्ध विषयावच्छिन्न ब्रह्मचैतन्यके साथ अन्तःकरणावच्छिन्न जीवचैतन्यकी अभेदाभिव्यक्ति होनेसे तो वह जीवचैतन्य घट आदि विषयका प्रकाश करता है * ।
† अथवा जीवके सर्वगत होनेपर भी अविद्यावृत होनेसे वह स्वयं भी
* पहला परिहार—जीवको अविद्याप्रतिबिम्ब मान कर और उसे व्यापक स्वीकार करके किया गया है। इस ‘यद्वा’ पक्षमें जीवको अन्तःकरणोपाधिक मान कर उसे परिच्छन्न माना है, अतः इस मतमें सर्वज्ञत्वकी शङ्का ही नहीं है, क्योंकि स्वल्प परिमाणवाले जीवका विषयोंके साथ संबन्ध न होनेसे वृत्तिके बिना वह प्रकाश नहीं कर सकता है, यह भाव है। इस मतमें अभेदाभिव्यक्ति ही वृत्तिका प्रयोजन है, इस पक्षका अवलम्बन करके वृत्ति द्वारा विषयावच्छिन्न चैतन्य और अन्तःकरणावच्छिन्न चैतन्यकी अभेदाभिव्यक्ति होनेके बाद ही विषयोंका प्रकाश होगा, यह विशेष है।
† अविद्याप्रतिबिम्बित चैतन्य जीव है, इस प्रथम पक्षको मान कर इस ‘अथवा’ कल्पसे परिहार करते हैं । यद्यपि इस पक्षमें जीव व्यापक और जगत्के प्रति अनुपादान है, तथापि उसका संसर्ग माना जाता है। ‘सर्वगतोऽपि’ इसको उपलक्षण मान कर ‘विषयसंसृष्टोऽपि’ (विषयके साथ संसृष्ट होनेपर भी) यह भी जानना चाहिए। अन्यथा यह शङ्का मूलमें हो सकती है कि जीवके व्यापक होनेपर भी विषयोंके साथ उसका संसर्ग न होनेसे जीव विषयका प्रकाश नहीं करता है, यह कह सकते हैं, फिर आवृत माननेकी कोई आवश्यकता नहीं है। यद्यपि ‘मां न जानामि’ (मैं अपनेको नहीं जानता हूँ) इस प्रकारका अनुभव नहीं होता है, इसलिए जीव आवृत नहीं हो सकता है, यह शङ्का हो सकती है, परन्तु यह युक्त नहीं है, क्योंकि अन्तःकरणोपहित चैतन्य ही ‘माम्’ प्रतीतिका विषय होनेसे व्यापक जीवचैतन्यमें अन्तःकरणावच्छेदरूपसे आवृतत्वके न रहनेपर भी विषयदेशमें वह आवृत ही है, और ‘व्यापकरूपसे मैं अपनेको नहीं जानता हूँ’ इस प्रकारका अनुभव भी होता है।
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| १४६ | सिद्धान्तलेशसंग्रह | [ प्रथम परिच्छेद |
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व्यक्तस्तमेव विषयं प्रकाशयति । एवं च चिदुपरागार्थत्वेन, विषयचैतन्याभेदाभिव्यक्त्यर्थत्वेन, आवरणाभिभवार्थत्वेन वा वृत्तिनिर्गममपेक्ष्य तत्संसृष्टविषयमात्रावभासकत्वात् जीवस्य किञ्चिज्ज्ञत्वमप्युपपद्यते इति ॥ १० ॥
वृत्तेश्चिदुपरागो वा अभेदव्यक्तिरेव वा ।
फलमावृतिभङ्गो वा तत्राऽऽद्यं कीदृशं भवेत् ॥ ६५ ॥
वृत्तिका प्रयोजन—चित्के साथ सम्बन्ध, अभेदाभिव्यक्ति अथवा आवरणका भङ्ग—है, उनमें से चित्के साथ सम्बन्ध कैसा होता है ? ॥६५॥
अत्र प्रथमपक्षे सर्वगतस्य जीवस्य वृत्त्यधीनः को विषयोपरागः ? वृत्त्याऽपि हि पूर्वसिद्धयोर्निष्क्रिययोर्विषयजीवचैतन्ययोस्तादात्म्यस्य संयोगस्य वा न सम्भवत्याधानम् ।
नैयायिकादिवत् केचिद्विषयत्वं स्वभावतः ।
कोई लोग कहते हैं कि जैसे नैयायिक लोग विषय-विषयिभाव सम्बन्ध स्वभावसे मानते हैं, वैसे ही वृत्तिसे विषयविषयिभाव सम्बन्ध उत्पन्न होता है ।
अप्रकाशमान है, इससे विषयोंका अवभास न करता हुआ किसी एक विषयमें वृत्तिके सम्बन्धसे आवरणका विनाश होनेके अनन्तर उसी विषयमें अभिव्यक्त होकर उसी विषयको प्रकाशित करता है। वृत्तिके बिना जीवचैतन्य विषयका अवभासक नहीं होता है, ऐसा सिद्ध होनेपर चित्के साथ सम्बन्धके लिए, विषय-चैतन्य और जीवचैतन्यके अभेदके लिए और आवरणके विनाशके लिए वृत्तिनिर्गमकी अपेक्षा करके वृत्तिके साथ सम्बद्धमात्र विषयका जीव प्रकाश करता है, इसलिए जीवमें अल्पज्ञत्वकी भी उपपत्ति होती है ॥१०॥
इन पूर्वोक्त तीन पक्षोंमें से प्रथम पक्षमें अर्थात् 'चिदुपरागार्था वृत्ति:'( चैतन्य-के साथ सम्बन्धके लिए वृत्ति है ) इस पक्षमें सर्वतः व्यापक जीवका वृत्तिजन्य कौनसा सम्बन्ध है ? अर्थात् कोई भी सम्बन्ध नहीं है, कारण कि क्रियारहित विषयचैतन्य और जीवचैतन्यका वृत्तिसे भी तादात्म्य या संयोग नहीं हो सकता है [ भाव यह है कि जिनका तादात्म्य व्यवहारमें देखा जाता है, वह पहलेसे ही रहता है, बीचमें कहींसे नहीं आता है, अतः विषय या जीवचैतन्यका तादात्म्य सम्बन्ध प्रथमसे ही रहेगा, आगन्तुक नहीं होगा अर्थात् वृत्तिसे उत्पादित नहीं होगा और संयोग सम्बन्ध एककी क्रियासे या उभयकी क्रियासे उत्पन्न होता है;
वृत्तिके साथ विषयका सम्बन्ध-विचार ] भाषानुवादसहितं १४७
अत्र केचिदाहुः—विषयविषयिभावसम्बन्ध एवेति ।
वृत्तिनिर्गमवैयर्थ्यादन्ये तद्द्वारसङ्गमम् ॥ ६६ ॥
कोई लोग कहते हैं कि केवल विषयविषयिभाव संसर्ग माना जायगा, तो वृत्तिका निकलना ही व्यर्थ होगा, अतः विषयसंयुक्तवृत्तित्तादात्म्यसम्बन्ध ही वृत्तिसे उत्पन्न होता है ॥६६॥
अन्ये तु—विषयविषयिभावमात्रनियामिका वृत्तिश्चेदनिर्गताया अप्यैन्द्रियकवृत्तेस्तन्नियामकत्वं नातिप्रसङ्गावहमिति तन्निर्गमाभ्युपगमवैयर्थ्यापत्तेः स नाऽभिसंहितः । किं तु विषयसन्निहितजीवचैतन्यतादात्म्यापन्नाया
परन्तु विषयचैतन्य और जीवचैतन्य स्वभावतः ही * निष्क्रिय हैं, अतः उनका कोई भी सन्निकर्ष नहीं हो सकता है, इसलिए 'सम्बन्धार्था वृत्तिः' यह कहना असङ्गत है ] ।
इस आक्षेपके समाधानमें कोई लोग कहते हैं कि विषयविषयिभाव सम्बन्ध ही वृत्तिसे उत्पन्न होता है † ।
कुछ लोग कहते हैं कि परोक्षापरोक्षस्थलसाधारणविषयविषयिभावमात्रमें यदि वृत्ति प्रयोजक है, तो अनिर्गत इन्द्रियवृत्तिके भी विषयविषयिभाव सम्बन्धके नियामक होनेमें कोई अतिप्रसङ्ग नहीं है, इससे वृत्तिका निर्गम व्यर्थ होगा, अतः विषयविषयिभावसम्बन्ध अभिप्रेत नहीं है, [ तात्पर्य यह है कि सिद्धान्तमें—परोक्षविषयस्थलमें अनुमित्यादि वृत्तिसे उपहित जीवचैतन्यका अनुमेय आदि विषयके साथ वृत्तिनिर्गमके
* यद्यपि—जैसे सुवर्ण आदिमें अन्यतर कर्म या उभय कर्मके न रहनेपर भी पार्थिव भाग और तेज भागका संयोग देखा जाता है, वैसे ही प्रकृतमें द्विविधकर्मके न रहनेपर भी संयोगसम्बन्ध क्यों न माना जाय ? यह यहाँ शङ्का होती है, किन्तु यह युक्त नहीं है, क्योंकि विषयचैतन्य और जीवचैतन्यका सुवर्णदृष्टान्तके अनुसार आरम्भसे ही संयोगका स्वीकार किया जायगा तो वृत्तिका अङ्गीकार ही निरर्थक होगा, क्योंकि जो संयोग आरम्भसे ही सिद्ध है, उसकी उत्पत्ति वृत्ति कैसे करेगी, अतः आरम्भसे उनका संयोगसम्बन्ध नहीं माना जायगा, यह भाव है ।
† विषयचैतन्य और जीवचैतन्यका वृत्तिकी उत्पत्तिके पूर्वमें विषय-विषयिभाव सम्बन्ध नहीं रहता है, परन्तु वृत्तिके अनन्तर विषयविषयिभाव सम्बन्ध उत्पन्न होता है, और यह अनिर्वचनीय एवं अतिरिक्त है, यह आक्षेपपरिहार करनेवाले 'केचित्तु'का अभिप्राय है, अर्थात् संयोग या तादात्म्यका वृत्तिसे आधान—उत्पत्ति—नहीं होता है, परन्तु उक्त विषयविषयिभाव सम्बन्ध ही उत्पन्न होता है, अतः दोष नहीं है, यह भाव है ।
१४८. सिद्धान्तलेशसंग्रह [ प्रथम परिच्छेद
वृत्तेर्विषयसंयोगे तस्याऽपि तद्द्वारकः परम्परासम्बन्धो लभ्यते इति स एव चिदुपरागोऽभिसंहित इत्याहुः।
तरङ्गतत्संस्पर्शान्निदीस्पर्शं तराविव।
विषये वृत्तिसंसर्गाज्जीवसङ्गं परे विदुः ॥६७॥
जैसे तरङ्ग और तरुके स्पर्शसे वृक्षमें नदीका स्पर्श होता है, वैसे ही विषयमें वृत्तिके सम्बन्धसे जीवका सम्बन्ध होता है, ऐसा भी कोई कहते हैं ॥६७॥
अपरे तु—साक्षादपरोक्षचैतन्यसंसर्गिण एव सुखादेरापरोक्ष्यदर्शनात् अपरोक्षविषये साक्षात्संसर्ग एष्टव्यः। तस्माद् वृत्तेर्विषयसंयोगे वृत्तिरूपा-
बिना ही विषयविषयिभाव सम्बन्ध है—ऐसा माना गया है। परोक्षस्थलमें जैसे वृत्तिका बाहर निर्गमन न मान करके जीवचैतन्यका विषयके साथ सम्बन्ध माना जाता है, वैसे ही अपरोक्षस्थलमें भी वृत्तिके निर्गमनके विना जीवचैतन्यका विषयके साथ विषयविषयिभाव सम्बन्ध मान करके 'जीवकी वृत्ति जिस अर्थको विषय करेगी उसी अर्थका जीव प्रकाश करेगा अन्यका नहीं' इस नियमसे एक विषयके प्रकाशनकालमें अन्य विषयका प्रकाश प्रसक्त नहीं होगा, अतः अपरोक्षस्थलके लिए भी वृत्तिनिर्गमन व्यर्थसा है, इस प्रकार विचार करते हुए विवरणाचार्य, जो वृत्तिका निर्गम मानते हैं, विषय-विषयिभाव सम्बन्धको वृत्ति-जन्य नहीं मानते हैं, ] किन्तु विषयसन्निहितजीवचैतन्यके साथ तादात्म्यापन्न वृत्तिका विषयके साथ संयोग होनेपर विषयसन्निहितजीवचैतन्यका भी वृत्ति और विषयके संयोग द्वारा जो विषयसंयुक्तवृत्तितादात्म्यरूप परम्परासम्बन्ध प्राप्त होता है, वही चिदुपरागशब्दसे कहा गया है, ऐसा मानते हैं * ।
कोई लोग कहते हैं कि जीवचैतन्यके साथ साक्षात् सम्बद्ध ही सुख आदिका आपरोक्ष्य (प्रत्यक्ष) देखा जाता है, इससे अपरोक्ष विषयमें जीव-चैतन्यका (सर्वत्र) साक्षात्सम्बन्ध ही वाञ्छनीय है, परम्परासम्बन्ध नहीं। [ तात्पर्य यह है कि सुख आदि आभ्यन्तर पदार्थोंके साक्षात्कारमें जीवचैतन्यका उनके साथ साक्षात्सम्बन्ध ही देखा जाता है, इसलिए घट आदि अपरोक्ष विषयोंके साक्षात्कारमें भी साक्षात् सम्बन्धको ही प्रयोजक मानना चाहिए, यदि ऐसा न मान
* विषयको व्याप्त करनेवाली वृत्तिका अधिष्ठान है—विषयसमीपवर्ती जीवचैतन्य, इसलिए वृत्तिका तादात्म्य जीवचैतन्यमें है।
द्वितीयपक्षे जीवस्याऽसर्वगतत्वादसङ्करात् ।
वृत्तिके साथविषयका सम्बन्ध-विचार] भाषानुवादसहित १४९ .
वच्छेदकलाभात् तदवच्छेदेन तदुपादानस्य जीवस्याऽपि संयोगजसंयोगः सम्भवति । कारणाकारणसंयोगात् कार्याकार्यसंयोगवत् कार्याकार्यसंयोगात् कारणाकारणसंयोगस्याऽपि युक्तितौल्येनाऽभ्युपगन्तुं युक्तत्वादित्याहुः ।
द्वितीयपक्षे जीवस्याऽसर्वगतत्वादसङ्करात् ।
विषयब्रह्मचैतन्याभेदाभिव्यक्त्यैव तं परे ॥ ६८ ॥
'अभेदाभिव्यक्त्यर्था वृत्तिः' इस द्वितीय पक्षमें जीवके अव्यापक होनेके कारण उसके साथ साङ्कर्य न होनेसे विषयावच्छिन्न ब्रह्मचैतन्यके साथ अभेदाभिव्यक्तिकं द्वारा विषयके साथ तादात्म्य-सम्पादन ही वृत्तिका प्रयोजन है, ऐसा कोई लोग कहते हैं ॥ ६८ ॥
कर, कहींपर साक्षात्सम्बन्ध कहींपर परम्परासम्बन्ध माना जाय, तो कार्य-कारणभावोंमें भेद होनेसे गौरव ही होगा, इसलिए एक ही साक्षात्सम्बन्ध साक्षात्कारमें प्रयोजक है, परम्परासंसर्ग (विषयसंयुक्तवृत्तितादात्म्य) प्रयोजक नहीं है ] । इससे वृत्तिका विषयके साथ संयोग होनेके बाद वृत्तिरूप विशेषणका लाभ होनेसे वृत्त्यवच्छेदेन वृत्तिके उपादानभूत जीवका भी संयोगजन्य संयोग साक्षात् संसर्ग होता है [ तात्पर्य यह है कि वृत्ति जीवचैतन्यका कार्य है और विषय अकार्य है, जीवचैतन्य वृत्तिका उपादान कारण है और विषय वृत्तिका उपादान कारण नहीं है, इसलिए जीवचैतन्यके क्रमशः कार्य और अकार्यरूप जीवचैतन्य और विषयके संयोगसे वृत्तिके प्रति क्रमशः कारण और अकारणरूप जीवचैतन्य और विषयका संयोग होता है, यही संयोगज संयोगरूप साक्षात्सम्बन्ध अपरोक्षविषयक साक्षात्कारमें प्रयोजक है ] जैसे कारण और अकारणके संयोगसे कार्य और अकार्यका संयोग होता है, वैसे ही कार्य और अकार्यके संयोगसे कारण और अकारणका संयोग होता है, ऐसा तुल्य युक्तिसे माननेमें कोई दोष नहीं है * ।
* तात्पर्य यह है कि कारण और अकारणके संयोगसे कार्य और अकार्यका संयोग, तो नैयायिक लोगोंने माना है, जैसे—हस्त और वृक्षके संयोगसे काय और वृक्षका संयोग होता है, इसमें कायरूप ( शरीररूप ) कार्यके प्रति कारण है—हस्त और अकारण है—वृक्ष, इसी प्रकार हस्तका कार्य है—काय, और उसका अकार्य है—वृक्ष, शरीरके प्रति कारणीभूत हस्त और उसके प्रति अकारणीभूत वृक्षके संयोगसे हस्तके कार्य शरीरका और उसके (हस्तके) अकार्य वृक्षका संयोग होता है । परन्तु कार्य और अकार्यके संयोगसे कारण और अकारणका संयोग नहीं माना है, इसीपर मूलमें कहा गया कि उक्त रीति के समान होनेसे कार्याकार्यके संयोगसे कारण और अकारणका संयोग भी हो सकता है, क्योंकि ऐसा माननेमें कोई हरकत नहीं है ।
| १५० | सिद्धान्तलेशसंग्रह | [ प्रथम परिच्छेद |
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एकदेशिनस्तु—अन्तःकरणोपहितस्य विषयाऽवभासकचैतन्यस्य विषयतादात्म्यापन्नब्रह्मचैतन्याभेदाभिव्यक्तिद्वारा विषयतादात्म्यसम्पादनमेव चिदुपरागोऽभिसंहितः । सर्वगततया सर्वविषयसन्निहितस्याऽपि जीवस्य तेन रूपेण विषयाऽवभासकत्वे तस्य साधारणतया पुरुषविशेषापरोक्ष्यव्यवस्थित्ययोगेन तस्याऽन्तःकरणोपहितत्वरूपेणैव विषयाऽवभासकत्वात् । एवं च विषयापरोक्ष्ये आध्यासिकसम्बन्धो नियामक इति सिद्धान्तोऽपि सङ्गच्छते ।
कुछ एकदेशियोंका मत है कि अन्तःकरणसे उपहित घट आदि विषयोंके अवभासक जीवचैतन्यका—विषयोंके साथ तादात्म्यरूपको प्राप्त हुए ब्रह्मचैतन्यके साथ अभेदकी अभिव्यक्ति द्वारा—घट आदि विषयके साथ तादात्म्यका सम्पादन ही * चिदुपरागशब्दसे कहा जाता है । जीवके व्यापक (सर्वगत) होनेसे सब विषयोंका सन्निधान होनेपर भी उसको सर्वगतरूपसे विषयोंका अवभासक माना जायगा, तो प्रत्येक पुरुषके प्रति जीवके साधारण होनेसे पुरुष विशेषके अपरोक्ष्यकी व्यवस्थिति नहीं होगी, इसलिए उसको—अन्तःकरणोपहितत्वरूपसे † ही—विषयोंका अवभासक माना जाता है । विषयावभासक जीवचैतन्यका वृत्तिसे विषयतादात्म्य सम्पादनके स्वीकार होनेपर विषयके
* इन एकदेशियोंका कहना है कि अन्तःकरणके प्रति यदि जीवचैतन्य उपादान हो तो अन्तःकरणवृत्तिका भी उपादान और अधिष्ठान होकर उसके साथ वृत्तिका तादात्म्य हो, परन्तु यह नहीं है, इसलिए विवरणाचार्यको उक्त परम्परासम्बन्ध अभिप्रेत नहीं है । कारण कि खुद विवरणाचार्यने कहा है—'एवं विषयासङ्गत्वपि जीवः स्वभावदन्तःकरणेन संसृज्यते' ( यद्यपि जीवका विषयोंके साथ सम्बन्ध नहीं है, तथापि स्वभावसे ही अन्तःकरणके साथ उसका सम्बन्ध रहता है ) गोत्वादि जातिका जैसे स्वभावसे गोव्यक्तिमें सम्बन्ध होता है, वैसे ही अन्तःकरणके प्रति जीवके उपादान न होनेपर भी उसका स्वभावतः अन्तःकरणसे ही संसर्ग है, अतः संयोगजसंयोग भी विवरणाचार्यको अभिमत नहीं है, इसलिए एकदेशीके मतका उपक्रम है । यद्यपि बिम्बभूत ब्रह्म चैतन्यके विषयोंके प्रति उपादान होनेसे ब्रह्म और विषयका तादात्म्य पूर्वसे ही सिद्ध है, तथापि विषयतादात्म्यापन्न ब्रह्मकी और विषयावभासक जीवचैतन्यकी वृत्तिद्वारा अभेदाभिव्यक्ति होनेसे जीवचैतन्यका विषयके साथ वृत्तिसे ही तादात्म्य सिद्ध होता है, अतः वृत्तिमें तादात्म्य निर्वाहकत्वकी अनुपपत्ति नहीं है ।
† अर्थात् जीव सर्वगत है, तथापि जिस पुरुषके अन्तःकरणसे उपहित होकर जिस अर्थका अवभास करेगा, वही अर्थ उसीको अपरोक्ष होगा अन्यको नहीं, इस प्रकारकी व्यवस्था-सिद्धिके लिए अन्तःकरणोपहितत्व दिया गया है, यह भाव है ।
वृत्तिके साथ विषयका सम्बन्ध-विचार] भाषानुवादसहित १५१
न चैवं द्वितीयपक्षसाङ्कर्यम् । जीवस्य सर्वगतत्वे प्रथमः पक्षः, परिच्छिन्नत्वे द्वितीय इत्येव तयोर्भेदादित्याहुः ॥ ११ ॥
साक्षात्कारमें ( आपरोक्ष्यमें ) अध्याससिद्ध तादात्म्य सम्बन्ध ही नियामक है, ऐसा सिद्धान्त भी सङ्गत होता है, द्वितीय पक्षके साथ साङ्कर्य भी नहीं है ‡, क्योंकि जीवके व्यापकत्वपक्षमें प्रथम पक्ष है, और परिच्छिन्नत्वपक्षमें द्वितीय पक्ष है, इस प्रकारका उनमें भेद है ॥११॥
‡ सम्बन्धके लिए वृत्ति है, यह प्रथम पक्ष है, अभेदाभिव्यक्तिके लिए वृत्ति है, यह द्वितीय पक्ष है और आवरणाभिभवके लिए वृत्ति है, यह तृतीय पक्ष है। इनमें से प्रथम पक्षमें भी वृत्तिसे अभेदाभिव्यक्ति ही मानी जाय, तो द्वितीय पक्षसे प्रथम पक्षमें कोई वैलक्षण्य नहीं होगा, यह शङ्का करनेवालेका भाव है। इसपर उत्तर है कि जीवको व्यापक माननेवालोंके मतसे प्रथम पक्ष है और जो परिच्छिन्न मानते हैं, अर्थात् जिनके मतमें अन्तःकरणोपाधिक जीव है, उस मतसे द्वितीय पक्ष है, अतः साङ्कर्य नहीं है। तात्पर्य यह है कि यद्यपि प्रथम और द्वितीय पक्षमें वृत्तिजन्य अभेदाभिव्यक्ति समान है, तो भी प्रथम पक्षमें अभेदकी अभिव्यक्ति द्वारा विषयावभासक जीवचैतन्यके विषयके साथ तादात्म्यका सम्पादन वृत्ति करती है। और द्वितीय पक्षमें वृत्तिसे—विषयावभासक जीवचैतन्य और विषयावच्छिन्न चैतन्य—की ही—अभेदाभिव्यक्ति होती है, अतः परस्पर उन पक्षोंमें साङ्कर्य नहीं है।
अथवा प्रथम पक्षमें व्यापक होनेसे विषयदेशमें सदा सन्निहित विषयावभासक जीवचैतन्यका विषयतादात्म्यापन्न घटाद्यैतन्यकी अभेदाभिव्यक्ति करनेके लिए वृत्ति है और द्वितीय पक्षमें जीवके परिच्छिन्न होनेसे वृत्ति उसको विषयके सान्निध्यमें ले जाती है, उसके बाद विषया-भिन्न घटाद्यैतन्यके साथ उसकी 'परिच्छिन्न जीवकी' अभेदाभिव्यक्तिका भी सम्पादन करती है, अतः उनका साङ्कर्य नहीं है। इस प्रकारका यह परिहार मूलमें कहे गये सर्वगतत्व और परिच्छिन्नत्व पदोंसे सूचित होता है और पूर्वका परिहार 'प्रथमपक्ष' और 'द्वितीयपक्ष' पदोंसे सूचित होता है।
वस्तुतस्तु साङ्कर्यका परिहार होता ही नहीं है, क्योंकि 'सम्बन्धार्था वृत्तिः' इस पक्षमें सम्बन्ध ही उद्देश्यरूपसे ज्ञात होता है और 'अभेदाभिव्यत्त्यर्था वृत्तिः' इस पक्षमें अभेदाभिव्यक्ति ही उद्देश्यरूपसे प्रतीत होती है, और पूर्वोक्त परिहारसे भी दोनों पक्षोंमें अभेदाभिव्यक्ति ही वृत्तिका प्रयोजन मालूम होता है, अतः साङ्कर्यका परिहार करना केवल वालुकाप्रासादावरोहणमात्र है, इसलिए 'एकदेशिनस्तु' ऐसे एकदेशीके पक्षसे ही इसका उपन्यास किया गया है।
वस्तुस्थितिमें 'सम्बन्धार्था वृत्तिः' (सम्बन्धके लिए वृत्ति है) इस प्रकार कहनेवाले आचार्योंका अभिप्राय यह है—विषयोंके अवभासक रूपसे अभिमत जीवचैतन्यका घट आदि विषयोंके साथ व्यङ्ग्यव्यञ्जकरूप सम्बन्ध तत्तत् विषयोंसे संसृष्ट वृत्तिसे उत्पन्न हुआ विवक्षित है। जैसे—अन्तःकरण अत्यन्त स्वच्छ होनेसे स्वयं ही चैतन्यके अभिव्यञ्जनमें समर्थ है, वैसे घट आदि चैतन्यको अभिव्यक्त नहीं कर सकते हैं, क्योंकि वे अस्वच्छ हैं, किन्तु जब घट
| १५२ | सिद्धान्तलेशसंग्रह | [ प्रथम परिच्छेद |
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अथ द्वितीये काऽभेदव्यक्तिस्तत्राऽपि केचन ।
कुल्याद्वारेव सा वृत्त्या क्षेत्रकासारवारिणोः ॥ ६९ ॥
द्वितीय पक्षमें अभेदाभिव्यक्ति क्या है ? इस प्रश्नके उत्तरमें कोई लोग कहते हैं कि जैसे खेत और तालाबका जल नाली द्वारा एक होता है, वैसे ही वृत्ति द्वारा विषयावच्छिन्न चैतन्य और अन्तःकरणावच्छिन्न चैतन्यका एक होना अभेदाभिव्यक्ति है ॥६९॥
अथ द्वितीयपक्षे केयमभेदाभिव्यक्तिः ?
केचिदाहुः—कुल्याद्वारा तडागकेदारसलिलयोरिव विषयान्तःकरणावच्छिन्नचैतनयोर्वृत्तिद्वारा एकीभावोऽभेदाभिव्यक्तिः एवं च यद्यपि
वृत्तिका प्रयोजन अभेदकी अभिव्यक्ति है, ऐसा जो द्वितीय कल्प कहा गया है, उसमें अभेदाव्यक्तिका स्वरूप क्या है * ?
इस आक्षेपके समाधानमें कोई लोग कहते हैं कि जैसे नालीद्वारा तालाब और खेतके जलका एकीभाव—अभेदाभिव्यक्ति होती है, वैसे ही विषयावच्छिन्न चैतन्य और अन्तःकरणावच्छिन्न चैतन्यका जो वृत्तिद्वारा एकीभाव है, वही अभेदाभिव्यक्ति है †। इस रीतिसे यद्यपि आदिको वृत्ति व्याप्त करती है, तब घट आदिमें रहनेवाली अस्वच्छता उस वृत्तिसे तिरस्कृत हो जाती है, इसलिए घट आदिमें चैतन्याभिव्यञ्जनकी योग्यताका आधान वृत्ति करती है अतः 'अन्तःकरणं हि स्वस्मिन्निव स्वसंसर्गिण्यपि घटादौ चैतन्याभिव्यक्तियोग्यतामापादयति' (अन्तःकरण ही अपनी नाई अपनेसे सम्बन्ध रखनेवाले घट आदिमें भी चैतन्यकी अभिव्यक्तिकी योग्यताका सम्पादन करता है), यह कथन भी उपपन्न होता है। लोकमें यह देखा भी जाता है कि जो स्वतः अस्वच्छ है, वह स्वच्छद्रव्यके संयोगसे प्रतिबिम्ब आदिका ग्रहण करता है, जैसे भित्ति स्वतः अस्वच्छ है, परन्तु जल आदि स्वच्छ द्रव्यके साथ सम्बन्ध होनेसे उसमें प्रतिबिम्बग्रहण करनेकी योग्यता आ जाती है। घट आदिमें स्वसन्निहित जीवचैतन्यकी प्रतिबिम्बग्राहिता ही जीवचैतन्यकी व्यञ्जकता है और प्रतिबिम्बितत्व चैतन्यका व्यङ्ग्यत्व है। विवरणमें भी इसी प्रकारके व्यङ्ग्यव्यञ्जकतारूप सम्बन्धके लिए वृत्तिके निर्गमनका वर्णन किया गया है। और वृत्तिद्वारा सम्पादित इसी सम्बन्धसे घट आदिका अवभास होता है।
* प्रश्नकर्ताका तात्पर्य यह है कि अभेदाभिव्यक्ति वृत्तिका प्रयोजन है, यह द्वितीयपक्ष जीवको परिच्छिन्न मानकर कहा गया है। इसलिए इस मतमें अन्तःकरणोपाधिक जीवकी और बिम्बभूत विषयावच्छिन्न ब्रह्मचैतन्यकी वृत्तिसे अभेदाभिव्यक्ति नहीं हो सकती, क्योंकि जैसे अखण्डब्रह्माकारवृत्ति उपाधिकी निवर्तक है, वैसे घटाद्याकारवृत्ति उपाधिकी निवर्तक नहीं है, अतः भेद करनेवाली उपाधिके (अन्तःकरण और विषयके) रहनेसे जीव और ब्रह्मका अभेद अभिव्यक्त नहीं हो सकता, इसलिए इस मतमें अभेदाभिव्यक्ति क्या है, यह प्रश्न है।
† तात्पर्य यह है कि यद्यपि उपाधि ही उपधेयका भेद करनेवाली है। परन्तु वह यदि एकदेशस्थ हो जाय अर्थात् उपाधि और उपधेय एकदेशमें रह जाँय, तो भेदक नहीं होती,
अभेदामिव्यक्तिका स्वरूपविचार ] भाषानुवादसहित १५३
विषयावच्छिन्नं ब्रह्मचैतन्यमेव विषयप्रकाशकम्, तथाऽपि तस्य वृत्ति- द्वारा एकीभावेन जीवत्वं सम्पन्नमिति जीवस्य विषयप्रकाशोपपत्तिरिति ।
सत्युपाधौ दृढं बिम्बप्रतिबिम्बभिदास्थितेः ।
वृत्त्यग्रे विषयस्फूर्त्याभासार्पणमितीतरे ॥ ७० ॥
कोई लोग कहते हैं कि उपाधिके रहनेपर बिम्ब और प्रतिबिम्बका भेद अवश्य रहता है, इससे वृत्तिके अग्रभागमें ब्रह्मचैतन्य विषयके प्रकाशक प्रतिबिम्बका अर्पण करता है [ और इस प्रतिबिम्बका जीवके साथ एकीभाव अभेदाभिव्यक्ति है ] ॥ ७० ॥
अन्ये त्वाहुः--बिम्बस्थानीयस्य विषयावच्छिन्नस्य ब्रह्मणः प्रतिबिम्ब- भूतेन जीवेन एकीभावो नाऽभेदाभिव्यक्तिः । व्यावर्तकोपाधौ दर्पण इव
विषयावच्छिन्न ब्रह्मचैतन्य ही विषयका अवभासक होता है, जीवचैतन्य विषयका अवभासक नहीं होता, तथापि विषयावच्छिन्न ब्रह्मचैतन्यका वृत्ति द्वारा अन्तःकरणा- वच्छिन्न चैतन्यके साथ एकीभाव होनेसे उसमें (विषयावच्छिन्न ब्रह्मचैतन्यमें) जीवत्वका सम्भव है, इसलिए 'जीव विषयका प्रकाशक है' ऐसा उपपन्न होता है‡।
कोई लोग कहते हैं कि बिम्बस्थानापन्न विषयावच्छिन्न ब्रह्मका प्रतिबिम्बभूत जीवके साथ एकीभाव अभेदाभिव्यक्ति नहीं है, क्योंकि व्यावर्तक
जैसे घट यदि मठमें रहे तो घटावच्छिन्न आकाश और मठावच्छिन्न आकाश भिन्न नहीं होते, क्योंकि मठ और घट एकदेशमें रहते हैं, वैसे ही प्रकृतमें अन्तःकरण और विषय यद्यपि अलग अलग हैं, तथापि वृत्तिद्वारा वे दोनों एकदेशस्थ हुए, इसलिए विषयावच्छिन्न चैतन्य और अन्तःकरणा- वच्छिन्न चैतन्य भिन्न भिन्न नहीं हुए किन्तु एक हुए, यही अभेदाभिव्यक्ति वृत्तिद्वारा अभीप्सित है।
‡ सारांश यह है कि अभेदाभिव्यक्ति होनेपर भी जीवचैतन्य विषयका अवभासक नहीं हो सकता है, क्योंकि यह विषयके प्रति उपादान नहीं है; अतः उसका (जीवचैतन्यका) विषयके साथ तादात्म्य नहीं है। यदि यह कहा जाय कि ब्रह्मचैतन्य ही उपादान होनेसे विषयोंका अवभासक हो, तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि 'आलोकसे घट प्रकाशित हुआ' इस प्रतीतिके समान 'मैंने घट जाना' ऐसी जीव द्वारा घट आदिका अवभास बोधक- प्रतीति होती है। इसलिए ब्रह्मचैतन्य ही विषयका अवभासक है, क्योंकि विषयादिके साथ उसीका वस्तुतः तादात्म्य है। इसपर उत्तर दिया जाता है कि यद्यपि उक्त शङ्का ठीक है, तथापि वृत्तिके द्वारा जीवचैतन्य और ब्रह्मचैतन्यके एक होनेसे ब्रह्मचैतन्य यदि विषयोपादान है, तो जीवचैतन्य भी विषयोपादान हुआ ही और घट आदिके साथ उसका भी तादात्म्य है, अतः जीवमें विषयावभासकत्वकी अनुपपत्ति नहीं है, इसलिए 'मैंने घट जाना' इत्यादि प्रतीतिकी उपपत्ति भी हो सकती है,
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| १५४ | सिद्धान्तलेशसंग्रह | [ प्रथम परिच्छेद |
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जाग्रति तयोरेकीभावायोगात् ।
वृत्तिकृताभेदाभिव्यक्त्या विषयावच्छिन्नस्य ब्रह्मणो जीवत्वप्राप्तौ ब्रह्मणस्तदा तद्विषयसंसर्गाभावेन तद्द्रष्टृत्वासम्भवे सति तस्य सर्वज्ञत्वाभावापत्तेश्च । किन्तु विषयावच्छिन्नं ब्रह्मचैतन्यं विषयसंसृष्टाया वृत्तेरग्रभागे
दर्पण आदि उपाधिके रहनेपर प्रतिबिम्ब और बिम्बका एकीभाव होगा ही नहीं । [ भाव यह है कि जैसे दर्पणके रहनेपर दर्पणमें पड़ा हुआ प्रतिबिम्ब और बिम्बस्थानीय मुख आदिका अभेद अभिव्यक्त नहीं होता, क्योंकि उस स्थलमें बिम्ब और प्रतिबिम्बका स्पष्टरूपसे भेद भासता है, वैसे ही प्रकृत स्थलमें विषय और अन्तःकरणरूप व्यावर्तक उपाधिके रहते बिम्बभूत ब्रह्मचैतन्य और प्रतिबिम्बभूत जीवचैतन्यका अभेद भी अभिव्यक्त नहीं हो सकता, इसलिए वृत्तिसे अभेदाभिव्यक्ति होती है, यह कहना उचित नहीं है ] ।
* और कथञ्चित् यह मान भी लिया जाय कि वृत्तिसे अभेद अभिव्यक्त होता है, तो यह आपत्ति आवेगी कि वृत्तिद्वारा अभेदाभिव्यक्तिसे विषयावच्छिन्न ब्रह्ममें भी जीवत्वकी प्राप्ति होनेसे उस समयमें ब्रह्मका उस विषयके साथ सम्बन्ध न होनेसे ब्रह्मको उस विषयका अवभास नहीं होगा, इससे ब्रह्म असर्वज्ञ होगा । [ तात्पर्य यह है कि विषयावच्छिन्न ब्रह्मके जीव होनेपर उससे ईश्वरत्वकी निवृत्ति अवश्य माननी होगी, इस परिस्थितिमें ब्रह्मकी जीवावस्थामें घटादि विषयके साथ ब्रह्मका संसर्ग नहीं है, इसलिए घटादि विषयका द्रष्टा भी ब्रह्म नहीं होगा । अतः ब्रह्मको विषयका परिज्ञान न होनेसे ब्रह्ममें असर्वज्ञत्व स्पष्ट ही प्रसक्त होगा ] ।
* द्वितीय दोष देनेका तात्पर्य यह है कि तत्त्वसाक्षात्कारसे जैसी अभेदाभिव्यक्ति होती है, प्रकृतमें वैसी अभेदाभिव्यक्ति विवक्षित नहीं है, किन्तु एक पात्रमें क्षीर और नीरके रखनेसे जैसा उनका अभेद प्रतीत होता है, वैसा ही वृत्तिसे अन्तःकरण और विषयरूप उपाधिके एकदेशस्थ होनेसे तन्निबन्धन विषयावच्छिन्न चैतन्य और अन्तःकरणावच्छिन्न चैतन्यकी केवल औपचारिक अभेदाभिव्यक्ति विवक्षित है । इस औपचारिक अभेदाभिव्यक्तिमें व्यावहारिक उपाधिप्रयुक्त दोष नहीं है, अर्थात् उपाधिके रहनेपर अभेद नहीं हो सकता, यह दोष नहीं है; क्योंकि 'मेरा ही मुख दर्पणमें भासता है' इस प्रकार प्रतिबिम्ब और बिम्बका अभेद अभिव्यक्त होता है । इसलिए अभेदाभिव्यक्तिपक्षमें निर्वाह हो सकता है, अतः 'बिम्बस्थानीयस्य' इत्यादिसे कहा गया दोष युक्त नहीं है, इस अस्वरससे 'वृत्तिकृता०' इत्यादिसे द्वितीय दोष कहते हैं ।
अभेदाभिव्यक्तिका स्वरूपविचार] भाषानुवादसहित १५५
विषयप्रकाशकं प्रतिबिम्बं समर्पयतीति तस्य प्रतिबिम्बस्य जीवेनैकीभावः । एवं चाऽन्तःकरणतद्वृत्तिविषयावच्छिन्नचैतन्यानां प्रमातृप्रमाणप्रमेयभावेन असङ्करोऽप्युपपद्यते । न च वृत्त्युपहितचैतन्यस्य विषयप्रमात्वे तस्य विषयाधिष्ठानचैतन्यस्येव विषयेणाऽऽध्यासिकसम्बन्धाभावात् विषयापरोक्ष्ये आध्यासिकसम्बन्धस्तन्त्रं न स्यादिति वाच्यम्, विषयाधिष्ठानचैतन्यस्यैव
इसलिए विम्बस्थानीय ब्रह्मका जीवके साथ एकीभाव अभेदाभिव्यक्ति नहीं है, किन्तु विषयावच्छिन्न ब्रह्मचैतन्य विषयसंसृष्ट वृत्तिके अग्र भागमें विषयका प्रकाश करनेवाले अपने प्रतिबिम्बका समर्पण करता है, इसलिए उसके प्रतिबिम्बका ही जीवके साथ एकीभाव है। [और यही प्रतिबिम्बके साथ एकीभाव अभेदाभिव्यक्ति है, तात्पर्य यह है कि जैसे कौस्तुभमणि या किसी रत्नकी प्रभा अपने स्थानसे निकलती हुई बड़े आकारमें परिणत होकर विषयदेशपर्य्यन्त जाती है, वैसे ही हृदयदेशमें रहनेवाले अन्तःकरणकी वृत्ति अन्तःकरणसे लेकर विषयपर्यन्त अवच्छिन्नरूपसे जाती है, इस वृत्तिका विषयके साथ सम्बद्ध भाग अग्रभाग कहा जाता है। उस अग्रभागमें पड़े हुए ब्रह्मके विषयप्रकाशक प्रतिबिम्बके साथ जीवका एकीभाव 'अभेदाभिव्यक्ति' है। वृत्ति और वृत्तिमान्का अभेद होनेसे वृत्ति और वृत्तिमान्में प्रतिबिम्बित वस्तुका भी अभेद हो सकता है], इसलिए—वृत्तिबिम्बित चैतन्यका वस्तुतः अन्तःकरणप्रतिबिम्बित चैतन्यसे भेद ही है, परन्तु वृत्तिके द्वारा अमेदाभिव्यक्ति होनेपर उनमें विषयाभासकत्वका स्वीकार करनेसे अन्तःकरण, अन्तःकरणकी वृत्ति और विषय—इन तीनोंसे अवच्छिन्न चैतन्योंका प्रमाता, प्रमाण और प्रमेय रूपसे असङ्कर (भेद) भी उपपन्न होता है। ✱ यदि वृत्तिसे उपहित (वृत्तिरूप उपाधिसे युक्त) चैतन्य प्रमा मानी जायगी, तो उसका विषयाधिष्ठान चैतन्यके समान विषयके साथ आध्यासिक सम्बन्ध न होनेसे विषयकी अपरोक्षतामें आध्यासिक सम्बन्ध तन्त्र नहीं होगा, इस प्रकारकी
✱ अन्तःकरणावच्छिन्न चैतन्य प्रमाता है, अन्तःकरणवृत्त्यवच्छिन्न चैतन्य प्रमाण है और विषयावच्छिन्न ब्रह्मचैतन्य प्रमेय है, इस प्रकार अन्तःकरणप्रतिबिम्बित और अन्तःकरणवृत्ति-प्रतिबिम्बित चैतन्य प्रमाता और प्रमाण चैतन्य हैं। इस प्रकारका भेद उपपन्न होता है, यह भाव है।
१५६ | सिद्धान्तलेशसंग्रह | [ प्रथम परिच्छेद
विषयेणाऽवच्छिन्नस्य वृत्तौ प्रतिबिम्बिततया तदभेदेन तत्सम्बन्धसत्त्वादिति।
बिम्बत्वयुक्तं ब्राह्मं स्यात् जैवं तदुपलक्षितम् ।
वृत्तौ विषयचैतन्यं तदभेदं च तां परे ॥ ७१ ॥
बिम्बत्वसे युक्त ब्रह्म-चैतन्य है और बिम्बत्वसे उपलक्षित जीवचैतन्य है, वृत्तिके होनेपर जो विषयचैतन्य है, उसका अभेद ही अभेदाभिव्यक्ति है, ऐसा भी कुछ लोग कहते हैं ॥ ७१ ॥
अपरे त्वाहुः—बिम्बभूतविषयाधिष्ठानचैतन्यमेव साक्षादाध्यासिक-सम्बन्धलाभात् विषयप्रकाशकमिति तस्यैव बिम्बत्वविशिष्टरूपेण भेद-सद्भावेऽपि तदुपलक्षितचैतन्यात्मना एकीभावोऽभेदाभिव्यक्तिः । न चैवं सति जीवब्रह्मसाङ्कर्यम्, न वा ब्रह्मणः सर्वज्ञत्वविरोधः बिम्बात्मना तस्य यथापूर्वमवस्थानादिति ॥१२॥
आशङ्का नहीं करनी चाहिए, क्योंकि विषयसे अवच्छिन्न चैतन्यका ही, जो विषयका अधिष्ठानभूत चैतन्य है, वृत्तिमें प्रतिबिम्ब है, अतः उसके साथ अभेद होनेसे अधिष्ठानके साथ आध्यासिक सम्बन्ध भी है । [ भाव यह है कि विषयके आपरोक्ष्यमें आध्यासिक सम्बन्ध अर्थात् अध्याससिद्ध तादात्म्य सम्बन्ध नियामक माना गया है—इसका निर्वचन ‘एवञ्च विषयापारोक्ष्ये आध्यासिक-सम्बन्धो नियामकः इति सिद्धान्तोऽपि सङ्गच्छते’ इत्यादिसे किया गया है । अध्याससिद्धतादात्म्य अर्थात् विषयाधिष्ठानचैतन्यका विषयके साथ तादात्म्य । प्रकृतमें वृत्तिप्रतिबिम्बितचैतन्य ही अधिष्ठानचैतन्य है, अतः अध्याससिद्ध तादात्म्य सम्बन्धकी उपपत्ति हो सकती है, यह भाव है ]
कोई लोग कहते हैं कि विषयका अधिष्ठानभूत बिम्बस्वरूप ब्रह्मचैतन्य ही, साक्षात् आध्यासिक सम्बन्धका लाभ होनेसे, विषयका प्रकाशक है, इसलिए बिम्बत्वविशिष्टचैतन्यका बिम्बत्वरूपसे प्रतिबिम्बत्वविशिष्ट चैतन्यरूप जीवके साथ भेद होनेपर भी बिम्बत्व और प्रतिबिम्बत्व रूपसे उपलक्षित शुद्धचैतन्य-रूपसे जो एकीभाव है वही अभेदाभिव्यक्ति है । उपलक्षित चैतन्यरूपसे अभेदाभिव्यक्तिके माननेपर जीव और ब्रह्मका साङ्कर्य अथवा ब्रह्मके सर्वज्ञत्वका विरोध भी नहीं है, क्योंकि बिम्बरूपसे ब्रह्मकी यथापूर्व अवस्थिति है ही ॥१२॥
आवरणाभिभव-स्वरूपविचार ] भाषानुवादसहित १५७
अथावरणभङ्गोऽपि तृतीये कीदृशो मतः ।
मोहनाशः स चेदिष्टो मोक्षः स्याद् घटवेदनात् ॥ ७२ ॥
तृतीय पक्षमें आवरणभङ्ग क्या है ? इसके समाधानमें यदि कहा जाय कि अज्ञानका विनाश आवरणभङ्ग है, तो घटज्ञानसे ही, सम्पूर्ण प्रपञ्चनाशका सम्भव होनेसे, मोक्ष हो जायगा ॥ ७२ ॥
अथ तृतीयपक्षे को नामाऽऽवरणाभिभवः ? अज्ञाननाशश्चेत्, घटज्ञानेनैवाऽज्ञानमूलः प्रपञ्चो निवर्तेतेति चेत् ।
खद्योतेनेव तमसिच्छिद्रं केचित् प्रचक्षते ।
कटवद्वेष्टनं भीतभटवद्वा पलायनम् ॥ ७३ ॥
जैसे अन्धकारमें जुगनूके प्रकाशसे छिद्र होता है वैसे ज्ञानसे अज्ञानके एक देशमें छिद्र या चटाईके समान अज्ञानका वेष्टन, या भीत भट (सैनिक) के समान पलायन आवरणभंग है ॥ ७३ ॥
अत्र केचिदाहुः—चैतन्यमात्रावारकस्याऽज्ञानस्य विषयावच्छिन्नप्रदेशे खद्योतादिप्रकाशेन महान्धकारस्येव ज्ञानेनैकदेशेन नाशो वा, कटवत् संवेष्टनं वा, भीतभटवदपसरणं वाऽभिभव इति ।
'आवरणाभिभवके लिए वृत्ति है' इस तृतीय पक्षमें आवरणका अभिभव क्या है अर्थात् आवरणाभिभव किसे कहते हैं ? यदि अज्ञानका नाश आवरणाभिभव है, तो अज्ञानके एक होनेसे घटज्ञानसे सम्पूर्ण अज्ञानका नाश होनेके कारण तन्मूलक 'समस्त प्रपञ्चकी निवृत्ति भी प्रसक्त होगी [ परन्तु प्रपञ्चकी निवृत्ति तो होती नहीं है, अतः अज्ञानका विनाश आवरणाभिभव नहीं हो सकता है ] ।
इस आक्षेपके समाधानमें कोई लोग कहते हैं कि जैसे महान्धकारमें जुगनूके प्रकाशसे महान्धकारका एकदेशसे विनाश होता है, सम्पूर्णका विनाश नहीं होता, वैसे ही साक्षीसे अन्य चैतन्यमात्रका आवरण करनेवाले महान् अज्ञानान्धकारके विषयावच्छिन्न प्रदेशमें—एक देशका ही ज्ञानसे विनाश होता है, सम्पूर्णका विनाश नहीं होता, अतः घटज्ञानसे सम्पूर्ण प्रपञ्चका विनाश नहीं होता, क्योंकि उस ज्ञानसे अज्ञानके एकदेशका ही विनाश होता है । अथवा चटाईके समान ज्ञानसे विषयावच्छिन्न अज्ञानका कुछ वेष्टन होता है, वही आवरणाभिभव है, या
| १५८ | सिद्धान्तलेशसंग्रह | [ प्रथम परिच्छेद |
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पुनः कन्दलनादन्येऽनावृतिं वृत्त्यनेहसम् ।
अज्ञोऽहमिति विज्ञानात् स्वाश्रितेनाऽप्यनावृतिम् ॥ ७४ ॥
पुनः आवरणके होनेसे वृत्तिकालपर्य्यन्त विषयावच्छिन्न चैतन्यका आवरण न रहना ही आवरणभंग है। 'मैं अज्ञ हूँ' इत्यादि अनुभवसे अहमर्थके अज्ञानाश्रय होनेपर भी अहमर्थको वह आवृत नहीं करता है ॥ ७४ ॥
अन्ये तु—अज्ञानस्यैकदेशेन नाशे उपादानाभावात् पुनस्तत्र कन्दलनायोगेन संकृदपगते समयान्तरेऽप्यावरणाभावप्रसङ्गात्, निष्क्रियस्याऽपसरणसंवेष्टनयोरसम्भवाच्च न यथोक्तरूपोऽभिभवः सम्भवति । अतः चैतन्यमात्रावारकस्याऽप्यज्ञानस्य तत्तदाकारवृत्तिसंसृष्टावस्थविषयावच्छिन्नचैतन्यानावारकत्वस्वाभाव्यमेवाभिभवः । न च विषयावगुण्ठनपटवद्विषयचैतन्यमाश्रित्य स्थितस्याज्ञानस्य कथं तदनावारकत्वं युज्यते इति शङ्क्यम्, 'अहमज्ञः' इति प्रतीत्याऽहमनुभवे प्रकाशमानचैतन्यमाश्रयत एव तस्य तदनावारकत्वप्रतिपत्तेरित्याहुः ।
युद्धमें डरे हुए योद्धाके समान अज्ञान ज्ञान द्वारा विषयावच्छिन्न प्रदेशसे पलायन करता है, वही आवरणाभिभव है।
कुछ लोग तो यह कहते हैं कि अज्ञानका एकदेशसे विनाश, संवेष्टन या अपसरण आवरणाभिभव नहीं है, क्योंकि अज्ञानका एकदेशसे विनाश होनेपर उपादान कारणके न रहनेसे विषयावच्छिन्न चैतन्य प्रदेशमें फिर आवरणकी उत्पत्ति नहीं होगी, इस प्रकार एक बार अज्ञानका नाश होनेपर अन्य समयमें भी आवरणाभावका प्रसङ्ग होगा और क्रियारहित अज्ञानका वेष्टन या अपसरण भी नहीं हो सकता है। इससे चैतन्यमात्रके आवरक ( आवरणकर्ता ) अज्ञानका तत्-तत् विषयाकार वृत्तिसे सम्पृक्त अवस्थावाले विषयावच्छिन्न चैतन्यका आवरण न करना—यह जो स्वभाव है वही स्वभाव आवरणाभिभव है । परन्तु जैसे घट आदि विषयका अवगुण्ठन करके अर्थात् घटको व्याप्तकर स्थित पट घटको आवृत करता है वैसे ही अज्ञान भी विषयचैतन्यको आवृत करेगा ही, तो यह कल्पना कैसे हो सकती है कि उसका अनावारकत्व स्वभाव है। यदि इस प्रकार शङ्का की जाय तो युक्त नहीं है, क्योंकि 'अहमज्ञः' 'मैं अज्ञ हूँ' इस प्रकार अनुभव होता है, इसलिए 'अहम्' अनुभवमें प्रकाशमान जीवचैतन्यका अज्ञान
आवरणाभिभव-स्वरूपविचार ] भाषानुवादसहित १५९
वृत्तिनाश्यं परे वृत्तिसमसङ्ख्यं प्रचक्षते ।
अवस्थाज्ञानमज्ञानं नष्टमित्यनुभूतितः ॥ ७५ ॥
वृत्तिसे नष्ट होनेवाले और संख्यामें वृत्तिके बराबर अवस्थारूप अज्ञान अनेक हैं, क्योंकि 'एक अज्ञान नष्ट हुआ' ऐसा अनुभव होता है, यहाँ वृत्तिसे अवस्थारूप अज्ञानका विनाश आवरणभंग है ॥ ७५ ॥
अपरे तु—‘घटं न जानामि’ इति घटज्ञानविरोधित्वेन, घटज्ञाने सति घटाज्ञानं निवृत्तमिति तन्निवर्त्यत्वेन चाऽनुभूयमानं न मूलाज्ञानम् । शुद्धचैतन्यविषयस्य तज्ज्ञाननिवर्त्यस्य च तस्य तथात्वायोगात् । किन्तु घटावच्छिन्नचैतन्यविषयं मूलाज्ञानस्यावस्थाभेदरूपमज्ञानान्तरमिति तन्नाश एवाऽभिभवः । न चैवमेकेन ज्ञानेन तन्नाशे तत्समानविषयाणां ज्ञानान्तराणामावरणाभिभावकत्वानापत्तिः । यावन्ति ज्ञानानि, तावन्ति अज्ञानानीत्यभ्युपगमादित्याहुः ।
आश्रय करता ही है, परन्तु वह अज्ञान उसको आवृत नहीं करता, यह भी ज्ञात होता है, [ अतः पटदृष्टान्तसे यह विलक्षण है, और दहराधिकरणमें जीवको आवृत माननेमें सभी व्यवहारोंकी लोपप्रसक्ति होगी, ऐसा साधन किया है, और इस ग्रन्थमें साक्षी चैतन्यकी अनावृति भी कहेंगे, यह भाव है ]
कुछ लोग कहते हैं कि ‘घटं न जानामि’ ( मैं घटको नहीं जानता हूँ ) इस प्रकार घटज्ञानके विरोधीरूपसे और ‘घटज्ञान होनेपर घटका अज्ञान निवृत्त हुआ’ इस प्रकार घटज्ञानके निवर्त्यरूपसे अनुभूयमान अज्ञान मूलाज्ञान नहीं है, कारण कि शुद्धचैतन्यविषयक शुद्धचैतन्यज्ञानसे निवृत्त होनेवाला अज्ञान घटावच्छिन्नचैतन्यविषयक और घटज्ञानसे निवर्त्य नहीं हो सकता । परन्तु घटावच्छिन्न चैतन्यको अवलम्बन करनेवाले मूलाज्ञानका अवस्थाविशेष कोई अन्य ही अज्ञान है, इसलिए उस अवस्थाविशेषरूप अज्ञानका विनाश ही आवरणाभिभव है । एक ज्ञानसे अवस्थारूप अज्ञानका नाश होनेपर तत्समानविषयक अन्य ज्ञान आवरणके नाशक नहीं होंगे, यह आपत्ति नहीं हो सकती है, क्योंकि जितने ( संसारमें ) ज्ञान हैं, उतने ही अज्ञान भी हैं, ऐसा स्वीकार है ।
| १६० | सिद्धान्तलेशसंग्रह | [ प्रथम परिच्छेद |
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केचिदूचुरनादीदं मूलाज्ञानमिव—
कोई लोग कहते हैं कि अवस्थारूप अज्ञान मूलाज्ञानके समान अनादि है ।
इमानि चाऽवस्थारूपाणि अज्ञानानि मूलाज्ञानवदज्ञानत्वादनादीनीति केचित् ।
इतरे ।
सादि निद्रादिवत्, तत्रानादित्वे कस्य नाश्यता ॥ ७६ ॥
अन्य लोग कहते हैं कि अवस्थारूप अज्ञान निद्रा आदिके समान सादि है, यदि अवस्थारूप अज्ञानको अनादि मानें तो नाश किसका होगा ?
व्यावहारिकौ जगज्जीवावावृत्य स्वाप्नौ जगज्जीवौ विक्षिपन्ती निद्रा तावदावरणविक्षेपशक्तियोगात् अज्ञानावस्थाभेदरूपा । तथा निद्रा सुषुप्तावस्थाऽप्यन्तःकरणादौ विलीने 'सुखमहमस्वाप्सं न किञ्चिदवेदिषम्' इति परामर्शदर्शनात् मूलाज्ञानवत् सुषुप्तिकाले अनुभूयमानाज्ञानावस्थाभेदरूपैव । तयोश्च जाग्रद्भोगप्रदकर्मोपरमे सत्येवोद्भवात् सादित्वम्, तद्वद् अन्यदप्य-
कुछ लोग यह कहते हैं कि जो ये अवस्थारूप अज्ञान हैं, वे सबके सब मूल अज्ञानके समान अनादि ही हैं, क्योंकि अज्ञानत्व धर्म अवस्थारूप अज्ञानमें भी है * ।
जाग्रत् अवस्थाके जगत् और जीवका आवरण करके स्वप्नावस्थावाले जगत् और जीवकी उत्पत्ति करती हुई निद्रा अज्ञानकी ही विशेष अवस्था है, क्योंकि निद्रामें भी आवरण और विक्षेपशक्तिका योग है । इसी प्रकार अन्तःकरण आदिके विलीन होनेपर 'मैं सुखसे सोया था, मैंने कुछ भी नहीं जाना' इस प्रकारके स्मरणके देखनेसे सुषुप्तिकालमें मूलाज्ञानके समान अनुभूयमान सुषुप्ति अवस्था भी अज्ञानकी विशेष अवस्था ही है । जाग्रत्कालीन भोगके देनेवाले कर्मका क्षय होनेपर ही निद्रा और सुषुप्तिकी उत्पत्ति होती है, अतः वे सादि...
* अवस्थाऽज्ञानानि अनादीनि, अज्ञानत्वात्, मूलाज्ञानवत्, अर्थात् अवस्थारूप अज्ञान अनादि हैं, अज्ञानत्व होनेसे, मूलाज्ञानके समान, यह अनुमानप्रमाण अवस्थारूप अज्ञानके अनादित्वका साधक है । देवताधिकरणमें ( ब्र० सू० अ० १ पा० ३ सू० २६ ) इस मूल अज्ञानको अनादि सिद्ध किया है, अतः दृष्टान्तासिद्धि नहीं है ।
आवरणाभिभव-स्वरूपविचार ] भाषानुवादसहित १६१
ज्ञानमवस्थारूपं सादीत्यन्ये । नन्वनादित्वपक्षे घटे प्रथममुत्पन्नेनैव ज्ञानेन सर्वतदज्ञाननाशो भवेत्, विनिगमनाविरहात्; तदवच्छिन्नचैतन्यावरकसर्वाज्ञानानाशे विषयप्रकाशा-योगाच्च। अतः पाश्चात्त्यज्ञानानामावरणानभिभावकत्वं तदवस्थमेवेति चेत्,
है, इसीके समान अन्य घटादिविषयावच्छिन्न चैतन्यका आवरण करनेवाला अज्ञान भी सादि † है।
[ यदि अवस्थारूप अज्ञान सादि माने जायँ, तो प्रथम उत्पन्न घटज्ञानसे पूर्वकालिक घटका आवरण करके स्थित अज्ञानका नाश होनेपर भी पुनः उत्पन्न अवस्थारूप अज्ञानसे उसका आवरण होगा, इससे सादिपक्षमें तो व्यवस्था हो सकती है, परन्तु अनादित्वपक्षमें व्यवस्था नहीं हो सकती, यह शङ्का करते हैं—] अज्ञानके अनादित्वपक्षमें प्रथम उत्पन्न घटविषयक ज्ञानसे ही सम्पूर्ण घटविषयक अज्ञानका नाश होगा, क्योंकि 'प्रथम उत्पन्न ज्ञानसे एक ही अज्ञान नष्ट होता है, अन्य अज्ञान नष्ट नहीं होते, इसमें कोई विनिगमक (युक्तिविशेष) नहीं है और घटावच्छिन्न चैतन्यका आवरण करनेवाले सम्पूर्ण अज्ञानका विनाश न माना जाय, अर्थात् प्रथम उत्पन्न घटज्ञानसे एक आवरण अज्ञानका नाश माना जाय, तो [ एक आवरणके विनष्ट होनेपर भी अन्य आवरणोंके रहनेसे ] विषय-प्रकाशकी अनुपपत्ति होगी, [ अर्थात् एक आवरणका नाश होनेपर भी अन्य आवरणोंसे घट आदिके आवृत होनेसे घटादिका कदापि प्रकाश होगा ही नहीं, अतः सम्पूर्ण आवरणोंका एक ज्ञानसे नाश मानना होगा, यह भाव है,]। इससे—प्रथम उत्पन्न ज्ञानसे सम्पूर्ण अज्ञानका नाश माननेसे—उत्तरकालीन ज्ञान आवरणके अभिभावक नहीं होंगे, यह दोष तदवस्थ ही है, अर्थात् प्रथम उत्पन्न घटज्ञानसे ही घटके सब आवरणोंका विनाश हुआ, तो उत्तरज्ञान—द्वितीय कालमें उत्पन्न हुआ घटज्ञान—किस आवरणका विनाश
† विमतानि अवस्थाऽज्ञानानि सादिमन्ति, अवस्थाज्ञानत्वात्, निद्रावत्, सुप्तिवच्च; अर्थात् अवस्थारूप अज्ञान सादि है, क्योंकि अवस्थारूप अज्ञानत्व धर्म उनमें है, निद्रा और सुप्ति रूप अवस्थाऽज्ञानके समान, इस अनुमानसे उन अवस्थारूप अज्ञानोंमें सादित्वकी सिद्धि की जाती है, पूर्वोक्त अनादित्वसाधक अनुमानसे विरोध नहीं है, क्योंकि वह अनुमान मूलाज्ञानमें ही अनादित्वका साधक है, अवस्थारूप अज्ञानमें नहीं। मूलाज्ञानमें अनादित्वका सिद्धान्तमें अभ्युपगम है, अतः सिद्धान्तसे विरोध नहीं है।
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| १६२ | सिद्धान्तलेशसंग्रह | [ प्रथम परिच्छेद |
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अत्र केचित् स्वभावेन व्यवस्थां प्रागभाववत् ।
सत्स्वप्यावरकेष्वर्थप्रकाशं च प्रचक्षते ॥ ७७ ॥
इस आक्षेपके समाधानमें कुछ लोग कहते हैं कि प्रागभावके समान आवारक अज्ञानोंके रहते हुए भी विषयोंका प्रकाश और व्यवस्था स्वभावतः हो सकती है ॥७७॥
अत्र केचिदाहुः—यथा ज्ञानप्रागभावानामनेकेषां सत्त्वेऽप्येकज्ञानोदये एक एव प्रागभावो निवर्तते । संशयादिजननशक्ततया तदावरणरूपेषु प्रागभावान्तरेषु सत्स्वपि विषयावभासः । तथैकज्ञानोदये एकमेवाऽज्ञानं निवर्तते, अज्ञानान्तरेषु सत्स्वपि विषयावभास इति ।
करेगा ? किसीका नहीं, क्योंकि आवरण रहे, तो उसका नाश करे, परन्तु आवरण तो है ही नहीं, यह शङ्काका तात्पर्य है ।
इस आक्षेपके समाधानमें कोई लोग कहते हैं कि जैसे ज्ञानके प्रागभावोंके अनेक होनेपर भी एक ज्ञानकी उत्पत्तिसे एक ही ज्ञानके प्रागभावका विनाश होता है । संशय, विपर्यय आदिकी उत्पत्तिमें समर्थ ज्ञानके आवरणरूप अन्य प्रागभावोंके रहते हुए भी विषयका अवभास होता है, वैसे ही एक ज्ञानके उदयसे एक ही अज्ञानका निवर्तन होता है और अन्य अज्ञानोंके रहते हुए भी विषयोंका अवभास होता है । [ तात्पर्यार्थ यह है कि नैयायिकोंके मतमें चार प्रकारके अभाव हैं—प्रागभाव, प्रध्वंसाभाव, अत्यन्ताभाव और अन्योन्याभाव । इनमें प्रागभाव है—वस्तु सत्ताके पूर्वकालमें प्रतीत होनेवाला और वस्तुके उत्पन्न होनेपर नष्ट होनेवाला अभाव, जितने घट या घटज्ञान आदि होते हैं, उतने ही उनके प्रागभाव होते हैं। प्रथम उत्पन्न ज्ञानसे एक ही ज्ञानप्रागभावकी निवृत्ति होती है और अन्य प्रागभाव यथापूर्व रहते हैं, उन दूसरे प्रागभावोंके रहते हुए भी न्यायमतमें विषयका प्रकाश माना जाता है, इसी प्रकार प्रकृतमें इतर आवरणोंके रहते हुए भी प्रथम उत्पन्न ज्ञानसे एक ही आवरणका विनाश होगा और विषयका प्रकाश होगा, इसमें कोई बाधा नहीं है । यद्यपि यहांपर यह शङ्का हो सकती है कि अभावरूप प्रागभाव विषयका आवारक नहीं है और भावरूप अज्ञान-विषयोंको आवृत करता है, इसलिए यह दृष्टान्त असङ्गत है, तथापि यह शङ्का युक्त नहीं है, क्योंकि अज्ञानमें आवारकत्व यही है कि अज्ञातत्वरूपसे अभिमत वस्तुमें संशय, विपर्यय आदिके जननमें ( उत्पादनमें ) सामर्थ्य, उसे नैयायिक ज्ञानप्रागभावमें भी मानते हैं, इसलिए दृष्टान्तकी असङ्गति नहीं है ] ।
आवरणाभिभव-स्वरूपविचार ] भाषानुवादसहित १६३
विशेषदर्शनाभावकूटात् संशयसम्भवात् ।
आवृतस्याऽप्रकाशाच्च पर्यायेणाऽऽवृतिं परे ॥ ७८ ॥
विशेषदर्शनके अभावसमुदायसे संशयका सम्भव है और आवृतका अप्रकाश होनेसे क्रमशः अज्ञान विषयको आवृत करते हैं, अर्थात् एक ज्ञानसे एक अज्ञानकी निवृत्ति होगी अनन्तर उसका उपशम होनेपर अन्य अज्ञान आवरण करेगा, ऐसा भी कोई लोग कहते हैं ॥ ७८ ॥
अन्ये तु—आवृतस्याऽऽपरोक्ष्यं विरुद्धम् । एकज्ञानोदये च प्राग्भावान्तरसत्त्वेऽपि यावद्विशेषदर्शनाभावकूटरूपमावरणं विशेषदर्शनान्नास्तीति मन्यमाना वदन्ति—यदा यदज्ञानमावृणोति, तदा तेन ज्ञानेन तस्यैव नाशः । सर्वं च सर्वदा नाऽऽवृणोति, वैयर्थ्यात् । किन्त्वावरकाज्ञाने वृत्त्या नाशिते तद्वृत्त्युपशमे अज्ञानान्तरमावृणोति ।
पर्वतीय वह्नि आदि जो आवृत हैं, उनका आपरोक्ष्य नहीं माना जाता है, किन्तु सिद्धान्तमें उनका परोक्ष ज्ञान ही माना गया है । एक ज्ञानके उदित होनेपर अन्य प्राग्भावोंकी सत्तामें भी * सम्पूर्ण विशेषदर्शनका अभाव-समुदायरूप जो आवरण है, वह विशेषके दर्शनसे है ही नहीं, ऐसा मानते हुए कुछ लोग कहते हैं कि जिस कालमें जो अज्ञान जिस वस्तुका आवरण करता है, उस कालमें उस वस्तुके ज्ञानसे उसी अज्ञानका नाश होता है। सब अज्ञान सर्वदा आवृत्त नहीं करते, क्योंकि ऐसा मानना व्यर्थ है, परन्तु अन्य वृत्तिसे आवरण करनेवाले अज्ञानका नाश होनेपर, उस वृत्तिका जब उपशम होता है, तब अन्य अज्ञान उसको आवृत्त करता है ।
* भाव यह है कि स्थाणु आदिमें अर्थात् स्थाणु आदिविषयक—संशयात्मक ज्ञानको उत्पन्न करनेमें—संशय आदिके प्रति विरोधिभूत विशेष दर्शनका प्राग्भावमात्र समर्थ नहीं है, क्योंकि ऐसा माननेपर 'अयं स्थाणुः' ( यह स्थाणु है ) इस प्रकारके निश्चयकालमें भी समानविषयक अन्य निश्चयका प्राग्भाव होनेसे पुरुषत्वकी स्मृतिवाले पुरुषको फिर संशयकी आपत्ति होगी, इसलिए नैयायिक यह मानते हैं कि संशय आदिके समानविषयक जितने निश्चयात्मक ज्ञान हैं, उन सबके प्राग्भावोंका समुदाय संशय आदिकी उत्पत्तिमें समर्थ है और वही आवरण है । एकके निश्चयकालमें आवरणरूपसे सम्मत सम्पूर्ण विशेष दर्शन प्राग्भावकूटरूप विशेषदर्शनका अभाव होनेसे पुनः संशयकी आपत्ति नहीं हो सकती है और प्राथमिक घटज्ञानकालमें न्यायमतमें विषयप्रकाशकी अनुपपत्ति भी नहीं हो सकती है, क्योंकि प्राग्भावकूटरूप आवरण नहीं है । इसलिए 'संशयादिजनक-
| १६४ | सिद्धान्तलेशसंग्रह | [ प्रथम परिच्छेद |
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न चाऽनावरकाज्ञानशेषो मुक्तौ प्रसज्यते ।
मूलाज्ञानच्छिदा छेद्यास्तदवस्था इमा यतः ॥ ७९ ॥
मुक्ति अवस्थामें आवरण न करनेवाले अज्ञानोंका अवशेष प्रसक्त नहीं होता, क्योंकि उस दशामें मूलाज्ञानका विनाश होनेसे अवस्थारूप अज्ञान भी विनष्ट होते हैं ॥७९॥
न चैवं ब्रह्मावगमोत्पत्तिकालेऽनावरकत्वेन स्थितानामज्ञानानां ततोऽप्यनिवृत्तिप्रसङ्गः । तेषां साक्षाद्विरोधित्वाभावेऽपि तन्निवर्त्यमूलाज्ञानपरतन्त्रतया अज्ञानसम्बन्धादिवत् तन्निवृत्त्यैव निवृत्त्युपपत्तेः । एतदर्थमेव तेषां तदवस्थाभेदरूपतया तत्पारतन्त्र्यमिष्यत इति ।
यदि सर्वदा सब अज्ञान आवारक न हों, तो ब्रह्मज्ञानके उत्पत्तिकालमें अनावारक ( आवरण नहीं करनेवाले ) रूपसे विद्यमान अज्ञानोंकी ब्रह्मज्ञानसे भी निवृत्ति नहीं होगी, [ भाव यह है कि ब्रह्मज्ञानके उत्पत्तिकालमें मूूल अज्ञानके समान अवस्थाऽज्ञान भी ब्रह्मचैतन्यको विषय प्रदेशमें आवृत करके रहेंगे, तो ब्रह्मज्ञानसे ब्रह्मविषयक मूलाज्ञानकी नाईं उन चैतन्यके आवारक अवस्थारूप अज्ञानोंकी भी निवृत्ति होगी, यदि अवस्थारूप अज्ञान आवारकरूप नहीं होंगे, तो उनकी निवृत्ति नहीं होगी, क्योंकि समानविषयमें ज्ञानाज्ञानका निवर्त्यनिवर्तकभाव होनेसे ब्रह्मज्ञानका समानविषयक अवस्थारूप अज्ञान नहीं है ] । नहीं, ब्रह्मज्ञानसे अवस्थारूप अज्ञानोंकी भी निवृत्ति होगी, क्योंकि अवस्थारूप अज्ञानोंके साक्षात् ब्रह्मज्ञानके विरोधी न होनेपर भी वे ( अवस्थारूप अज्ञान ) ब्रह्मज्ञानसे निवृत्त होनेवाले मूलाज्ञानके परतन्त्र अधीन हैं, इसलिए जैसे अज्ञानकी निवृत्ति होनेपर अज्ञानपरतन्त्र चैतन्य और अज्ञानके सम्बन्धकी निवृत्ति होती है, वैसे ही अज्ञानकी निवृत्तिसे ही अवस्थारूप अज्ञानकी भी निवृत्ति होती है। जैसे अज्ञानकी निवृत्तिसे संसारकी निवृत्ति होनेसे संसार अज्ञानपरतन्त्र माना जाता है, वैसे ही अज्ञानकी निवृत्तिसे अवस्थारूप अज्ञानके निवृत्त होनेसे घटादिविषयक अज्ञान, मूलाज्ञानके अवस्थाविशेषरूप होनेसे, मूलाज्ञानके अधीन माने जाते हैं।
तया' इत्यादिसे जो पूर्वमें दृष्टान्त दिया गया है, वह नहीं घटता है, इसी अस्वरससे यह 'अन्ये तु' मत है।