सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)
Siddhanta Lesha Sangraha Hindi
श्रीमदप्पय्य दीक्षित द्वारा
स्रोत: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (उद्गम)
पृष्ठ 192, कुल 590 में से
संदर्भ में पढ़ें| १६२ | सिद्धान्तलेशसंग्रह | [ प्रथम परिच्छेद |
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अत्र केचित् स्वभावेन व्यवस्थां प्रागभाववत् ।
सत्स्वप्यावरकेष्वर्थप्रकाशं च प्रचक्षते ॥ ७७ ॥
इस आक्षेपके समाधानमें कुछ लोग कहते हैं कि प्रागभावके समान आवारक अज्ञानोंके रहते हुए भी विषयोंका प्रकाश और व्यवस्था स्वभावतः हो सकती है ॥७७॥
अत्र केचिदाहुः—यथा ज्ञानप्रागभावानामनेकेषां सत्त्वेऽप्येकज्ञानोदये एक एव प्रागभावो निवर्तते । संशयादिजननशक्ततया तदावरणरूपेषु प्रागभावान्तरेषु सत्स्वपि विषयावभासः । तथैकज्ञानोदये एकमेवाऽज्ञानं निवर्तते, अज्ञानान्तरेषु सत्स्वपि विषयावभास इति ।
करेगा ? किसीका नहीं, क्योंकि आवरण रहे, तो उसका नाश करे, परन्तु आवरण तो है ही नहीं, यह शङ्काका तात्पर्य है ।
इस आक्षेपके समाधानमें कोई लोग कहते हैं कि जैसे ज्ञानके प्रागभावोंके अनेक होनेपर भी एक ज्ञानकी उत्पत्तिसे एक ही ज्ञानके प्रागभावका विनाश होता है । संशय, विपर्यय आदिकी उत्पत्तिमें समर्थ ज्ञानके आवरणरूप अन्य प्रागभावोंके रहते हुए भी विषयका अवभास होता है, वैसे ही एक ज्ञानके उदयसे एक ही अज्ञानका निवर्तन होता है और अन्य अज्ञानोंके रहते हुए भी विषयोंका अवभास होता है । [ तात्पर्यार्थ यह है कि नैयायिकोंके मतमें चार प्रकारके अभाव हैं—प्रागभाव, प्रध्वंसाभाव, अत्यन्ताभाव और अन्योन्याभाव । इनमें प्रागभाव है—वस्तु सत्ताके पूर्वकालमें प्रतीत होनेवाला और वस्तुके उत्पन्न होनेपर नष्ट होनेवाला अभाव, जितने घट या घटज्ञान आदि होते हैं, उतने ही उनके प्रागभाव होते हैं। प्रथम उत्पन्न ज्ञानसे एक ही ज्ञानप्रागभावकी निवृत्ति होती है और अन्य प्रागभाव यथापूर्व रहते हैं, उन दूसरे प्रागभावोंके रहते हुए भी न्यायमतमें विषयका प्रकाश माना जाता है, इसी प्रकार प्रकृतमें इतर आवरणोंके रहते हुए भी प्रथम उत्पन्न ज्ञानसे एक ही आवरणका विनाश होगा और विषयका प्रकाश होगा, इसमें कोई बाधा नहीं है । यद्यपि यहांपर यह शङ्का हो सकती है कि अभावरूप प्रागभाव विषयका आवारक नहीं है और भावरूप अज्ञान-विषयोंको आवृत करता है, इसलिए यह दृष्टान्त असङ्गत है, तथापि यह शङ्का युक्त नहीं है, क्योंकि अज्ञानमें आवारकत्व यही है कि अज्ञातत्वरूपसे अभिमत वस्तुमें संशय, विपर्यय आदिके जननमें ( उत्पादनमें ) सामर्थ्य, उसे नैयायिक ज्ञानप्रागभावमें भी मानते हैं, इसलिए दृष्टान्तकी असङ्गति नहीं है ] ।